छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
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Read in context| ४७० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| कृतवन्तो वयं तद्धीमहि चिन्त-<br>येमहीति सर्वं च मन्थलेपं पिबति<br>निर्णिज्य प्रक्षाल्य कंसं कंसाकारं<br>चमसं चमसाकारं बौदुम्बरं<br>पात्रम् ।<br> पीत्वाचम्य पश्चादग्नेः प्रा-<br>क्शिराः संविशति चर्मणि वाऽजिने<br>स्थण्डिले केवलायां वा भूमौ,<br>वाचंयमो वाग्यतः सन्नित्यर्थः,<br>अप्रसाहो न प्रसह्यते नाभिभूयते<br>स्त्र्याद्यनिष्टस्वप्नदर्शनेन यथा<br>तथा संयतचित्तः सन्नित्यर्थः,<br>स एवंभूतो यदि स्त्रियं पश्येत्स्व-<br>प्नेषु तदा विद्यात्समृद्धं ममेदं<br>कर्मेति ॥ ७ ॥ | लिये कर्म करनेवाले हम उसका ध्यान<br>—चिन्तन करते हैं। ऐसा कहकर<br>कंस—कंसाकार अथवा चमस—<br>चमसाकार गूलरके पात्रको धोकर<br>सारे मन्थलेपको पी जाता है।<br> मन्थलेपको पीकर आचमन<br>करनेके अनन्तर अग्निके पीछे चर्म-<br>[ मृगादिकी ] खालपर अथवा<br>स्थण्डिल--केवल भूमिपर ही पूर्वकी<br>ओर शिर करके वाचंयम अर्थात्<br>संयतवाक् होकर तथा अप्रसाह<br>यानी इस प्रकार संयतचित्त होकर<br>कि जिससे स्त्री आदि अनिष्ट स्वप्नके<br>देखनेसे विकृत न हो जाय सो जाता<br>है। ऐसी अवस्थामें यदि वह स्वप्नमें<br>स्त्रीको देखे तो यह समझे कि मेरा<br>यह कर्म समृद्ध हो गया ॥ ७ ॥ |
तदेष श्लोको यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियꣳस्वप्नेषु पश्यति समृद्धिं तत्र जानीयात्तस्मिन्स्वप्ननिदर्शने तस्मिन्स्वप्ननिदर्शने ॥ ८ ॥
इस विषयमें यह श्लोक है—जिस समय काम्यकर्मोंमें स्वप्नमें स्त्रीको देखे तो उस स्वप्नदर्शनके होनेपर उस कर्ममें समृद्धि जाने ॥ ८ ॥
| तदेतस्मिन्नर्थ एष श्लोको<br>मन्त्रोऽपि भवति । यदा कर्मसु | उस इसी अर्थमें यह श्लोक-<br>मन्त्र भी है। जब कि काम्य- |
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