भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 473, कुल 978 में से

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पृष्ठ 473
खण्ड २ ]शाङ्करभाष्यार्थ४६९
मति भक्षयति मन्त्रस्यैकैकेन पादेनैकेकं ग्रासं भक्षयति । तद्भोजनं सवितुः सर्वस्य प्रसवितुः प्राणमादित्यं चैकीकृत्योच्यते, आदित्यस्य वृणीमहे प्रार्थयेमहि मन्थरूपम् । येनान्नेन सावित्रेण भोजनेनोपभुक्तेन वयं सवितृस्वरूपापन्ना भवेमेत्यभिप्रायः । देवस्य सवितुरिति पूर्वेण संबन्धः श्रेष्ठं प्रशस्यतमं सर्वान्नेभ्यः सर्वधातमं सर्वस्य जगतो धारयितृतममतिशयेन विधातृतममिति वा । सर्वथा भोजनविशेषणम् । तुरं त्वरं तूर्णं शीघ्रमित्येतत् । भगस्य देवस्य सवितुः स्वरूपमिति शेषः । धीमहि चिन्तयेमहि विशिष्टभोजनेन संस्कृताः शुद्धात्मानः सन्त इत्यभिप्रायः । अथवा भगस्य श्रियः कारणं महत्त्वं प्राप्तुं कर्ममन्त्रके एक-एक पादसे एक-एक ग्रास भक्षण करता है । हम सविता—सबका प्रसव करनेवाले आदित्यके उस मन्थरूप भोजनकी प्रार्थना करते हैं—यहाँ प्राण और आदित्यको एक मानकर ऐसा कहा गया है—जिस अन्न अर्थात् सविता देवतासे उपभोग किये हुए भोजनद्वारा हम सूर्यस्वरूपको प्राप्त होंगे—ऐसा इसका अभिप्राय है । 'देवस्य सवितुः' इस प्रकार 'देवस्य' पदका पहले [ सवितुः पद ] से सम्बन्ध है । श्रेष्ठ—समस्त अन्नोंकी अपेक्षा प्रशस्यतम, 'सर्वधातमम्'—समस्त जगत्के उत्कृष्ट धारयिता अथवा सम्पूर्ण जगत्के अतिशय विधाता ( उत्पत्तिकर्ता ) [—इस प्रकार कुछ भी अर्थ किया जाय ] यह सर्वथा भोजनका विशेषण है । हम तुर-त्वर--तूर्णं अर्थात् शीघ्र ही भग—सविता देवताके स्वरूपका—'स्वरूप' शब्द यहाँ शेष है—[ अर्थात् यह ऊपरसे लाना पड़ता है ] ध्यान—चिन्तन करते हैं; तात्पर्य यह है कि उस विशिष्ट भोजनसे संस्कारयुक्त और शुद्धचित्त होकर हम उसके स्वरूपका ध्यान करते हैं । अथवा भग यानी श्रीके कारणभूत महत्त्वको प्राप्त करनेके
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