छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished978 pages
Page 597 of 978
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खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९३
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| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| सत्यमेवं न सतः सदन्तर-<br>मुत्पद्यते किं तर्हि ? सदेव संस्था-<br>नान्तरेणावतिष्ठते । यथा सर्पः<br>कुण्डलीभवति । यथा च मृच्चूर्ण-<br>पिण्डघटकपालादिप्रभेदैः । | समाधान— यह ठीक है, एक सत्से दूसरे सत्की उत्पत्ति नहीं होती। तो फिर क्या होता है?—सत् ही एक दूसरे आकारमें स्थित हो जाता है, जिस प्रकार कि सर्प ही कुण्डली हो जाता है और जैसे मृत्तिका ही चूर्ण, पिण्ड, घट, कपालादि भेदोंसे स्थित हो जाती है। |
| यद्येवं सदेव सर्वप्रकारावस्थं कथं प्रागुत्पत्तेरिदमासीदित्युच्यते । | शङ्का— यदि ऐसी बात है तो सम्पूर्ण प्रकारोंमें स्थित सत् ही है फिर यह क्यों कहा जाता है कि यह उत्पत्तिसे पूर्व था ? |
| ननु न श्रुतं त्वया सदेवेत्यवधारणमिदंशब्दवाच्यस्य ? | समाधान— अरे ! क्या तूने नहीं सुना कि ‘सदेव’ यह पद इदंशब्दवाच्यका निश्चय करानेके लिये है। |
| प्राप्तं तर्हि प्रागुत्पत्तेरसदेवासीन्नेदंशब्दवाच्यमिदानीमिदं जातमिति । | शङ्का— तब तो यह सिद्ध होता है कि उत्पत्तिसे पूर्व असत् ही था, इदंशब्दवाच्य नहीं था, यह अभी उत्पन्न हुआ है। |
| न; सत एवेदंशब्दबुद्धिविषयतयावस्थानाद्यथा मृदेव पिण्डघटादिशब्दबुद्धिविषयत्वेनावतिष्ठते तद्वत् । | समाधान— ऐसी बात नहीं है, क्योंकि जिस प्रकार मृत्तिका ही पिण्ड एवं घटादि शब्द और बुद्धिका विषय होकर सिद्ध होती है उसी प्रकार सत् ही इदंशब्द और इदंबुद्धिके विषयरूपसे स्थित होता है। |
| ननु यथा मृद्वस्त्वेवं पिण्ड- | शङ्का— किंतु जिस प्रकार |