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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages
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खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९३

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संस्कृतहिन्दी
सत्यमेवं न सतः सदन्तर-<br>मुत्पद्यते किं तर्हि ? सदेव संस्था-<br>नान्तरेणावतिष्ठते । यथा सर्पः<br>कुण्डलीभवति । यथा च मृच्चूर्ण-<br>पिण्डघटकपालादिप्रभेदैः ।समाधान— यह ठीक है, एक सत्से दूसरे सत्की उत्पत्ति नहीं होती। तो फिर क्या होता है?—सत् ही एक दूसरे आकारमें स्थित हो जाता है, जिस प्रकार कि सर्प ही कुण्डली हो जाता है और जैसे मृत्तिका ही चूर्ण, पिण्ड, घट, कपालादि भेदोंसे स्थित हो जाती है।
यद्येवं सदेव सर्वप्रकारावस्थं कथं प्रागुत्पत्तेरिदमासीदित्युच्यते ।शङ्का— यदि ऐसी बात है तो सम्पूर्ण प्रकारोंमें स्थित सत् ही है फिर यह क्यों कहा जाता है कि यह उत्पत्तिसे पूर्व था ?
ननु न श्रुतं त्वया सदेवेत्यवधारणमिदंशब्दवाच्यस्य ?समाधान— अरे ! क्या तूने नहीं सुना कि ‘सदेव’ यह पद इदंशब्दवाच्यका निश्चय करानेके लिये है।
प्राप्तं तर्हि प्रागुत्पत्तेरसदेवासीन्नेदंशब्दवाच्यमिदानीमिदं जातमिति ।शङ्का— तब तो यह सिद्ध होता है कि उत्पत्तिसे पूर्व असत् ही था, इदंशब्दवाच्य नहीं था, यह अभी उत्पन्न हुआ है।
न; सत एवेदंशब्दबुद्धिविषयतयावस्थानाद्यथा मृदेव पिण्डघटादिशब्दबुद्धिविषयत्वेनावतिष्ठते तद्वत् ।समाधान— ऐसी बात नहीं है, क्योंकि जिस प्रकार मृत्तिका ही पिण्ड एवं घटादि शब्द और बुद्धिका विषय होकर सिद्ध होती है उसी प्रकार सत् ही इदंशब्द और इदंबुद्धिके विषयरूपसे स्थित होता है।
ननु यथा मृद्वस्त्वेवं पिण्ड-शङ्का— किंतु जिस प्रकार

५९४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

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५९४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| घटाद्यपि तद्वत्सद्बुद्धेरन्यबुद्धिविषयत्वात्कार्यस्य सतोऽन्यद्वस्त्वन्तरं स्यात्कार्यजातं यथाश्वाद्गौः। <br><br> न; पिण्डघटादीनामितरेतरव्यभिचारेऽपि मृत्त्वाव्यभिचारात्। यद्यपि घटः पिण्डं व्यभिचरति पिण्डश्च घटं तथापि पिण्डघटौ मृत्त्वं न व्यभिचरतस्तस्मान्मृन्मात्रं पिण्डघटौ। व्यभिचरति त्वश्वं गौरश्वो वा गाम्। तस्मान्मृदादिसंस्थानमात्रं घटादयः। एवं सत्संस्थानमात्रमिदं सर्वमिति युक्तं प्रागुत्पत्तेः सदेवेति; वाचारम्भणमात्रत्वाद्विकारसंस्थानस्य। <br><br> ननु निरवयवं सत्, “निष्कलं निष्क्रयं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम्” (श्वेता०उ० ६।१९) | मृत्तिका वस्तु है उसी प्रकार पिण्ड और घटादि भी हैं। उन्हींके समान सत्‌का कार्य सद्बुद्धिसे अन्यबुद्धिका विषय होनेके कारण वह सत्‌की अपेक्षा कोई अन्य वस्तु होना चाहिये, जिस प्रकार कि अश्वसे गौ। <br><br> समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि पिण्ड और घटादिका परस्पर व्यभिचार होनेपर भी उनमें मृत्तिकात्वका व्यभिचार नहीं है। यद्यपि घट पिण्डसे पृथक् रहता है और पिण्ड घटसे, तो भी पिण्ड और घट दोनों ही मृत्तिकात्वसे कभी पृथक् नहीं होते। अतः पिण्ड और घट आदि तो मृत्तिकामात्र ही हैं। किंतु अश्व गौको और गौ अश्वको पृथक् करते हैं; इसलिये घटादि केवल मृत्तिकादिके संस्थान (आकार) मात्र हैं। इस प्रकार यह सारा जगत् सत्‌का संस्थानमात्र है। अतः उत्पत्तिसे पूर्व सत् ही था—यह कथन ठीक ही है, क्योंकि विकारसंस्थान तो केवल वाणीके ही आश्रित है। <br><br> शङ्का—किंतु “पुरुष निष्कल, निष्क्रिय, शान्त, निर्मल, निर्लेप है” तथा “दिव्य, अमूर्त, बाहर-भीतर वर्त- |

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खंड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९५


| “दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः” (मु० उ० २।१।२) इत्यादिश्रुतिभ्यो निरवयवस्य सतः कथं विकारसंस्थानमुपपद्यते ।<br><br>नैष दोषः, रज्ज्वाद्यवयवेभ्यः सर्पादिसंस्थानवद्बुद्धिपरिकल्पितेभ्यः सदवयवेभ्यो विकारसंस्थानोपपत्तेः “वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्” (छा० उ० ६।१।४) एवम् ‘सदेव सत्यम्’ इति श्रुतेः । एकमेवाद्वितीयं परमार्थत इदंबुद्धिकालेऽपि ॥ २ ॥ | मान और अजन्मा है” इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार सत् निरवयव है। उस निरवयव सत्‌का विकार संस्थान होना कैसे सम्भव है?<br><br>समाधान—इसमें कोई दोष नहीं है, क्योंकि रज्जु आदिके अवयवोंसे सर्पादि आकारकी प्रतीतिके समान बुद्धिसे कल्पना किये हुए सत्‌के अवयवोंसे विकारसंस्थानका प्रतीत होना सम्भव है; जैसा कि कहा है— “विकार वाणीके आश्रित केवल नाममात्र है, मृत्तिका ही सत्य है”। इसी प्रकार ‘सत् ही सत्य है’ इस श्रुतिसे प्रमाणित होता है। वस्तुतः इदंबुद्धिके समय भी वह एकमात्र अद्वितीय ही है ॥ २ ॥ |

तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत । तत्तेज ऐक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तदपोऽसृजत । तस्माद्यत्र क्व च शोचति स्वेदते वा पुरुषस्तेजस एव तदध्यापो जायन्ते ॥ ३ ॥

उस (सत्) ने ईक्षण किया ‘मैं बहुत हो जाऊँ—अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ’। इस प्रकार [ईक्षण कर] उसने तेज उत्पन्न किया। उस तेजने ईक्षण किया ‘मैं बहुत हो जाऊँ—नाना प्रकारसे उत्पन्न होऊँ’। इस प्रकार [ईक्षण कर] उसने जलकी रचना की। इसीसे जहाँ कहीं पुरुष शोक (संताप) करता है उसे पसीने आ जाते हैं। उस समय वह तेजसे ही जलकी उत्पत्ति होती है ॥ ३ ॥

५९६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

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५९६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| तत्सदैक्षतेक्षां दर्शनं कृतवत् । अतश्च न प्रधानं सांख्यपरिकल्पितं जगत्कारणम्; प्रधानस्याचेतनत्वाभ्युपगमात्, इदं तु सचेतनमीक्षितृत्वात्। तत्कथमैक्षत ? इत्याह—बहु प्रभूतं स्यां भवेयं प्रजायेय प्रकर्षेणोत्पद्येय । यथा मृद्घटाद्याकारेण, यथा वा रज्ज्वादि सर्पाद्याकारेण बुद्धिपरिकल्पितेन । | उस सत्‌ने ईक्षण किया, ईक्षण अर्थात् दर्शन किया। इससे सिद्ध होता है कि सांख्यका कल्पना किया हुआ प्रधान जगत्‌का कारण नहीं है, क्योंकि प्रधान अचेतन माना गया है और यह सत् ईक्षण करनेके कारण चेतन है। उसने किस प्रकार ईक्षण किया सो श्रुति बतलाती है—मैं बहु—अधिक हो जाऊँ 'प्रजायेय'—प्रकर्षसे उत्पन्न होऊँ, जिस प्रकार कि घटादि आकारसे मृत्तिका अथवा बुद्धिसे कल्पना किये हुए सर्पादि आकारसे रज्जु उत्पन्न होती है। | | असदेव तर्हि सर्वं यद्गृह्यते रज्जुरिव सर्पाद्याकारेण । | शङ्का--तब तो रज्जु जिस प्रकार सर्पादि आकारसे ग्रहण की जाती है उसी प्रकार जो कुछ ग्रहण किया जाता है वह असत् ही है। | | न; सत एव द्वैतभेदेनान्यथागृह्यमाणत्वान्नासत्त्वं कस्यचित्क्वचिदिति ब्रूमः । यथा सतोऽन्यद्वस्त्वन्तरं परिकल्प्य पुनस्तस्यैव प्रागुत्पत्तेः प्रध्वंसाच्चोर्ध्वमसत्त्वं ब्रुवते तार्किका न तथा- | समाधान--नहीं, हमारा तो यह कथन है कि द्वैतभेदसे सत् ही अन्यथारूपसे गृहीत होनेके कारण कभी किसी पदार्थकी असत्ता नहीं है। [ अब इसी बातको और अधिक स्पष्ट करते हैं-- ] जिस प्रकार तार्किक लोग सत्‌से भिन्न किसी अन्य पदार्थकी कल्पना कर फिर उत्पत्तिसे पूर्व और नाशके पश्चात् उसकी असत्ता बतलाते हैं |

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खण्ड २ ]शाङ्करभाष्यार्थ५९७
संस्कृतहिन्दी
स्माभिः कदाचित्क्वचिदपि स-<br>तोऽन्यदभिधानमभिधेयं वा वस्तु<br>परिकल्प्यते । सदैव तु सर्व-<br>मभिधानमभिधीयते च यदन्य-<br>बुद्ध्या । यथा रज्जुरेव सर्प-<br>बुद्ध्या सर्प इत्यभिधीयते यथा<br>वा पिण्डघटादि मृदोऽन्यबुद्ध्या<br>पिण्डघटादिशब्देन अभिधीयते<br>लोके । रज्जुविवेकदर्शिनां तु<br>सर्पाभिधानबुद्धी निवर्तेते यथा च<br>मृद्विवेकदर्शिनां घटादिशब्द-<br>बुद्धी तद्वत्सद्विवेकदर्शिनामन्य-<br>विकारशब्दबुद्धी निवर्तेते ।<br>“यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य<br>मनसा सह” (तै० उ. २।४)<br>इति । “अनिरुक्तेऽनिलयने”<br>(तै० उ० २ । ६ । १) इत्यादि<br>श्रुतिभ्यः ।उसी प्रकार हमारेद्वारा कभी कहीं<br>भी सत्‌से भिन्न किसी नाम अथवा<br>नामकी विषयभूत वस्तुकी कल्पना<br>नहीं की जाती । सारे नाम और<br>जो अन्यबुद्धिसे कहे जाते हैं वे<br>सारे पदार्थ सत् ही हैं, जिस प्रकार<br>कि लोकमें रज्जु ही सर्पबुद्धिसे<br>‘सर्प’ इस प्रकार कही जाती है<br>अथवा जिस प्रकार मृत्तिकासे अन्य-<br>बुद्धिके कारण पिण्ड और घटादिको<br>पिण्ड एवं घट आदि शब्दोंसे पुकारा<br>जाता है । जिस प्रकार रज्जुका<br>विवेक करके देखनेवालोंकी दृष्टिमें<br>‘सर्प’ शब्द और सर्पबुद्धि निवृत्त हो<br>जाते हैं तथा मृत्तिकाका विवेक<br>करके देखनेवालोंकी दृष्टिमें घटादि-<br>शब्द और तत्सम्बन्धिनी बुद्धिका<br>निरास हो जाता है, उसी प्रकार<br>सत्‌का विवेक करके देखनेवालोंके<br>लिये अन्य विकारसम्बन्धी शब्द<br>और बुद्धि निवृत्त हो जाते हैं, जैसा<br>कि “जहाँसे मनके सहित वाणी<br>न पहुँचकर लौट आती है” “जो<br>वाणीका अविषय और अनाश्रय है<br>उसमें” इत्यादि श्रुतियोंसे प्रमाणित<br>होता है ।

५६८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६

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५६८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६

एवमीक्षित्वा तत्तेजोऽसृजत तेजः सृष्टवत् ।इस प्रकार ईक्षण कर उसने तेजकी रचना की ।
ननु “तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः” (तै० उ० १) इति श्रुतिमिह कथं प्राथम्येन तस्मादेव तेजः सृज्यते तत एव चाकाशमिति विरुद्धम् ।शङ्का—किंतु “उस इस आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ [ तथा आकाशसे वायु और वायुसे तेज हुआ ]” ऐसी भी श्रुति है। फिर उसीसे सबसे पहले तेज रचा गया और उसीसे आकाश—यह विरुद्ध कथन क्यों किया जाता है ?
नैष दोषः; आकाशवायुसर्गानन्तरं तत्सत्तेजोऽसृजतेतिकल्पनोपपत्तेः । अथ वाविवक्षित इह सृष्टिक्रमः । सत्कार्यमिदं सर्वमतःसदेकमेवाद्वितीयमित्येतद्विवक्षितम्, मृदादिदृष्टान्तात् । अथवा त्रिवृत्करणस्य विवक्षितत्वात्तेजोऽबन्नानामेव सृष्टिमाचष्टे तेज इति प्रसिद्धं लोके दग्धृ पक्तृ प्रकाशकं रोहितं चेति ।समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि यहाँ ऐसी कल्पना भी की जा सकती है कि आकाश और वायुकी रचनाके अनन्तर उस सत्‌ने तेजकी रचना की । अथवा यह भी सम्भव है कि यहाँ सृष्टिक्रम बतलाना इष्ट न हो । यह सारा जगत् सत्‌का कार्य है, इसलिये एकमात्र अद्वितीय सत् ही है—यही बतलाना इष्ट हो, क्योंकि यहाँ मृत्तिका आदिका दृष्टान्त दिया गया है ! अथवा त्रिवृत्करण विवक्षित होनेके कारण श्रुति तेज, अप् और अन्नकी ही सृष्टिका निरूपण करती है । तेज—यह दग्ध करनेवाला, पकानेवाला, प्रकाशक और कुछ लाल रंगका लोकमें प्रसिद्ध है ।
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खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९९


| तत्सत्सृष्टं तेज ऐक्षत तेजोरूपसंस्थितं सदैक्षतेत्यर्थः । बहु स्यां प्रजायेयेति पूर्ववत् । तदपोऽसृजत । आपो द्रवाः स्निग्धाः स्यन्दिन्यः शुक्लाश्चेति प्रसिद्धा लोके । यस्मात्तेजसः कार्यभूता आपस्तस्माद्यत्र क्व च देशे काले वा शोचति संतप्यते स्वेदते प्रस्विद्यते वा पुरुषस्तेजस एव तत्तदापोऽधिजायन्ते ॥ ३ ॥ | सत्के रचे हुए उस तेजने ईक्षण किया; अर्थात् तेजके रूपमें स्थित सत्ने ‘मैं बहुत हो जाऊँ—अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ’, इस प्रकार पूर्ववत् ईक्षण किया । उसने जलकी रचना की । जल द्रवरूप, स्निग्ध, बहनेवाला और शुक्ल वर्ण इस प्रकार लोकमें प्रसिद्ध है । क्योंकि जल तेजका कार्यभूत है, इसलिये जब कहीं किसी देश या कालमें पुरुष शोक-संताप करता है तो पसीनेसे युक्त हो जाता है । उस समय तेजसे ही जलकी उत्पत्ति होती है ॥ ३ ॥ |

—: ० :—

ता आप ऐक्षन्त बह्व्यः स्याम प्रजायेमहीति ता अन्नमसृजन्त । तस्माद्यत्र क्व च वर्षति तदेव भूयिष्ठमन्नं भवत्यद्भ्य एव तदध्यन्नाद्यं जायते ॥ ४ ॥

उस जलने ईक्षण किया 'हम बहुत हो जायँ—अनेक रूपसे उत्पन्न हों।' उसने अन्नकी रचना की । इससे जहाँ कहीं वर्षा होती है वहीं बहुत-सा अन्न होता है । वह अन्नाद्य जलसे ही उत्पन्न होता है ॥ ४ ॥

| ता आप ऐक्षन्त पूर्ववदेवापाकारसंस्थितं सदैक्षतेत्यर्थः । बह्व्यः प्रभूताः स्याम भवेम प्रजायेमोत्पद्येमहीति । ता अन्न- | उस जलने ईक्षण किया, अर्थात् पहलेहीके समान जलरूपमें स्थित सत्ने ईक्षण किया । 'हम बहुत—अधिक हो जायँ, प्रकर्षसे उत्पन्न हों ।' उसने पृथिवीरूप अन्नकी |

६०० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

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६००छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६
मसृजन्त पृथिवीलक्षणम्। पार्थिवं ह्यन्नं तस्माद्यत्र क्व च वर्षति देशे तत्तत्रैव भूयिष्ठं प्रभूतमन्नं भवति। अतोऽद्द्भ्य एव तदन्नामन्नाद्यमधिजायते। ता अन्नमसृजन्तेति पृथिव्युक्ता पूर्वमिह तु दृष्टान्तेऽन्नं च तदाद्यं चेति विशेषणाद्व्रीहियवाद्या उच्यन्ते। अन्नं च गुरु स्थिरं धारणं कृष्णं च रूपतः प्रसिद्धम्।रचना की। अन्न पृथिवीका विकार है, इसलिये जहाँ कहीं वर्षा होती है वहीं बहुत-सा अन्न हो जाता है। अतः वह अन्नाद्य जलसे ही उत्पन्न होता है। 'उसने अन्नकी रचना की' ऐसा कहकर पहले तो श्रुतिने 'अन्न' शब्दसे पृथिवी कही है और अब दृष्टान्तमें 'वह अन्न और आद्य' ऐसा विशेषण देनेके कारण [ आद्य शब्दसे ] धान, जौ आदि कहे हैं। अन्न भारी, स्थिर, धारण करनेवाला और रूपसे कृष्णवर्ण होता है—ऐसा प्रसिद्ध है !
ननु तेजःप्रभृतिष्वीक्षणं न गम्यते हिंसादिप्रतिषेधाभावात्त्रासादिकार्यानुपलम्भाच्च। तत्र कथं तत्तेज ऐक्षतेत्यादि।शङ्का—किंतु तेज आदिमें तो ईक्षण होना समझमें नहीं आता; क्योंकि उनमें हिंसादिके प्रतिषेधका अभाव है और त्रास आदि कार्य भी नहीं देखे जाते। फिर श्रुतिने 'तेजने ईक्षण किया' इत्यादि कथन कैसे किया ?
नैष दोषः, ईक्षितृकारणपरिणामत्वात्तेजःप्रभृतीनां सत् एवेक्षितृनियतकर्मविशिष्टकार्योत्पादकत्वाच्च तेजःप्रभृतीक्षत इवेक्षत इत्युच्यते भूतम्।समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि तेज आदि भूत ईक्षण करनेवाले कारणके परिणाम हैं। ईक्षण करनेवाला सत् ही नियतक्रमविशिष्ट होकर कार्यका उत्पन्न करनेवाला होनेसे तेज आदि भूतोंने 'मानो ईक्षण किया' ऐसे अर्थमें 'ईक्षण किया' ऐसा कहा जाता है।
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खण्ड २] शाङ्करभाष्यार्थ ३०१


ननु सतोऽप्युपचरितमेवेक्षितृत्वम् ।शङ्का—किंतु सत्‌का ईक्षण भी तो उपचारसे ही है ?
न; सदीक्षणस्य केवलशब्दगम्यत्वान्न शक्यमुपचरितं कल्पयितुम् । तेजःप्रभृतीनां त्वनुमीयते मुख्येक्षणाभाव इति युक्तमुपचरितं कल्पयितुम् ।समाधान—नहीं, सत्‌का ईक्षण केवल शब्दगम्य है; इसलिये वह उपचारसे है—ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती। तेज आदिके मुख्य ईक्षणका अभाव तो अनुमानसे सिद्ध है; इसलिये उसे उपचरित मानना ठीक है।
ननु सतोऽपि मृद्वत्कारणत्वादचेतनत्वं शक्यमनुमातुम् । अतः प्रधानस्यैवाचेतनस्य सचेतनार्थत्वान्नियतकालक्रमविशिष्टकार्योत्पादकत्वाच्चैक्षतेवैक्षतेति शक्यमनुमातुमुपचरितमेवेक्षणम् । दृष्टश्च लोकेऽचेतने चेतनवदुपचारः । यथा कूलं पिपतिषतीति तद्वत्सतोऽपि स्यात् ।शङ्का—परंतु मृत्तिकाके समान कारण होनेसे सत्‌के अचेतनत्वका भी अनुमान किया जा सकता है। अतः अचेतन प्रधानरूप जो सत्‌ है वह चेतनके प्रयोजनके लिये है और नियतकालक्रमसे विशिष्ट कार्यका उत्पादक है, इस कारण उसीने ईक्षण करनेके समान ईक्षण किया—इस प्रकार उसका ईक्षण उपचरित ही है, ऐसा अनुमान किया ही जा सकता है। लोकमें अचेतनमें चेतनके समान उपचार होता देखा ही जाता है, जिस प्रकार 'किनारा गिरना चाहता है' ऐसा कहा जाता है उसी प्रकार सत्‌का ईक्षण भी औपचारिक हो सकता है।
न; तत्सत्यं स आत्मेति तस्मिन्नात्मोपदेशात् ।समाधान—ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि, 'वह सत्य है' वह आत्मा है, ऐसा कहकर उसीमें आत्माका उपदेश किया गया है ।

६०२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

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६०२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
आत्मोपदेशोऽप्युपचरित इति चेद्यथा ममात्मा भद्रसेन इति सर्वार्थकारिण्यनात्मन्यात्मोपचारस्तद्वत् ।शङ्का— यदि 'भद्रसेन मेरा आत्मा है' इस वाक्यमें जिस प्रकार आत्माके सम्पूर्ण कार्य करनेवाले अनात्मामें आत्माका उपचार किया गया है उसी प्रकार यह आत्मोपदेश भी उपचारसे ही है ऐसा मानें तो ?
न; तदस्मीति सत्सत्याभिसंधस्य 'तस्य तावदेव चिरम्' इति मोक्षोपदेशात् ।समाधान— ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि 'वह सत् मैं हूँ' इस प्रकार सत्में दृढ़ अभिनिवेश करनेवालेके लिये 'उसके मोक्षमें अभीतक देरी है [ जबतक कि शरीरपात नहीं होता ]' इस प्रकार मोक्षका उपदेश किया गया है।
सोऽप्युपचार इति चेत्, प्रधानात्माभिसंधस्य मोक्षसामीप्यं वर्तत इति मोक्षोपदेशोऽप्युपचरित एव; यथा लोके ग्रामं गन्तुं प्रस्थितः प्राप्तवानहं ग्राममिति ब्रूयात्त्वरापेक्षया तद्वत् ।शङ्का— यदि यह भी उपचार ही हो तो ? जिस प्रकार लोकमें गाँवकी ओर जानेवाला पुरुष अपनी शीघ्रताकी अपेक्षासे कह देता है कि 'मैं तो गाँवमें पहुँच गया' उसी प्रकार प्रधानमें आत्मबुद्धि करनेवालेके लिये मोक्षकी समीपता होनेके कारण यह मोक्षका उपदेश भी उपचारसे ही हो तो ?
न; येन विज्ञातेनाविज्ञातं विज्ञातं भवतीत्युपक्रमात् । सत्येकस्मिन्विज्ञाते सर्वं विज्ञातं भवति तदनन्यत्वात्सर्वस्याद्वितीयवचनाच्च । न चान्यद्विज्ञा-समाधान— नहीं, क्योंकि जिसे जान लेनेपर बिना जाना हुआ भी जान लिया जाता है--ऐसा उपक्रम किया गया है। एक सत्‌के जान लेनेपर ही सब कुछ जान लिया जाता है, क्योंकि सब उससे अभिन्न है और उसे अद्वितीय भी बतलाया
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खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६०३


| तन्यमवशिष्टं श्रावितं श्रुत्यानुमेयं वा लिङ्गतोऽस्ति येन मोक्षोपदेश उपचारितः स्यात् । सर्वस्य च प्रपाठकार्थस्योपचरितत्वपरिकल्पनायां वृथा श्रमः परिकल्पयितुः स्यात्पुरुषार्थसाधनविज्ञानस्य तर्केणैवाधिगतत्वात्तस्य । तस्माद्वेदप्रामाण्यान्न युक्तः श्रुतार्थपरित्यागः । अचश्वेतनावत्कारणं जगत इति सिद्धम् ॥ ४ ॥ | गया है । उसके सिवा कोई और विज्ञातव्य न तो श्रुतिसे सुना गया है और न किसी लिङ्गसे ही अनुमान किया जा सकता है, जिसके कारण इस मोक्षोपदेशको उपचरित माना जाय । तथा सारे प्रपाठकका उपचरितत्व माननेमें तो इस प्रकारकी कल्पना करनेवालेका श्रम व्यर्थ ही होगा, क्योंकि उसके सिद्धान्तानुसार पुरुषार्थका साधनभूत विज्ञान तो तर्कसे ही सिद्ध हो जाता है । अतः वेदकी प्रमाणता होनेके कारण इस श्रुत (प्रसिद्ध) अर्थका त्याग करना उचित नहीं है । इसलिये यह सिद्ध हुआ कि संसारका चेतन कारण है ॥ ४ ॥ |


—: ० :—

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये द्वितीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २ ॥

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तृतीय खण्ड

—: ० :—

सृष्टिका क्रम

तेषां खल्वेषां भूतानां त्रीण्येव बीजानि भव-
न्त्याण्डजं जीवजमुद्भिज्जमिति ॥ १ ॥

उन इन [ पक्षी आदि ] प्रसिद्ध प्राणियोंके तीन ही बीज होते हैं—आण्डज, जीवज और उद्भिज्ज ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
तेषां जीवाविष्टानां खल्वेषां पक्ष्यादीनां भूतानाम्, एषामिति प्रत्यक्षनिर्देशान्न तु तेजःप्रभृतीनां तेषां त्रिवृत्करणस्य वक्ष्यमाणत्वादसति त्रिवृत्करणे प्रत्यक्षनिर्देशानुपपत्तिः । देवताशब्दप्रयोगाच्च तेजःप्रभृतिष्विमास्तिस्रो देवता इति । तस्मात्तेषां खल्वेषां भूतानां पक्षिपशुस्थावरादीनां त्रीण्येव नातिरिक्तानि बीजानि कारणानि भवन्ति ।जीवोंद्वारा आविष्ट उन इन पक्षी आदि प्राणियोंके—यहाँ 'एषाम्' ऐसा प्रत्यक्ष निर्देश होनेके कारण [ 'इन पक्षी आदि भूतोंके' ऐसा अर्थ करना चाहिये ] 'उन तेजःप्रभृति भूतोंके' ऐसा अर्थ करना ठीक नहीं, क्योंकि आगे त्रिवृत्करणका वर्णन किया जानेवाला है और त्रिवृत्करणके हुए बिना ही प्रत्यक्ष निर्देश बन नहीं सकता । इसके सिवा तेजःप्रभृतिके लिये 'इमाः तिस्रो देवताः' इस प्रकार 'देवता' शब्दका प्रयोग होनेसे भी [ यहाँ 'भूत' शब्दसे पक्षी आदि ही विवक्षित हैं ]—अतः उन इन पक्षी, पशु एवं स्थावर आदि प्रसिद्ध भूतोंके तीन ही बीज हैं, इससे अधिक बीज-कारण नहीं हैं ।
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खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६०५


कानि तानि ? इत्युच्यन्ते, आण्डजमण्डाज्जातमण्डजम् , अण्डजमेवाण्डजं पक्ष्यादि । पक्षिसर्पादिभ्यो हि पक्षिसर्पादयो जायमाना दृश्यन्ते । तेन पक्षी पक्षिणां बीजं सर्पः सर्पाणां तथान्यदप्यण्डाज्जातं तज्जातीयानां बीजमित्यर्थः ।वे कौन-से हैं ? सो बतलाये जाते हैं—आण्डज—अण्डसे उत्पन्न हुएको अण्डज कहते हैं, अण्डज ही आण्डज हैं, अर्थात् पक्षी आदि; क्योंकि पक्षी एवं सर्पादिसे पक्षी और सर्पादि उत्पन्न होते देखे गये हैं; अतः पक्षियोंके बीज पक्षी हैं और सर्पोंके सर्प । इसी प्रकार अण्डेसे उत्पन्न हुए अन्य जीव भी अपनी-अपनी जातिके बीज हैं—ऐसा इसका तात्पर्य है ।
नन्वण्डाज्जातमण्डजमुच्यतेऽतोऽण्डमेव बीजमिति युक्तं कथमण्डजं बीजमुच्यते ।शङ्का—किंतु अण्डेसे उत्पन्न हुएको अण्डज कहते हैं; इसलिये अण्डा ही बीज है—ऐसा कहना उचित है; फिर अण्डजको बीज क्यों कहा जाता है ?
सत्यमेवं स्यात्, यदि त्वदिच्छास्तन्त्रा श्रुतिः स्यात्; स्वतन्त्रा तु श्रुतिः, यत आहाण्डजाद्येव बीजं नाण्डादीति । दृश्यते चाण्डजाद्यभावे तज्जातीयसन्तत्यभावो नाण्डाद्यभावे । अतोऽण्डजादीन्येव बीजान्यण्डजादीनाम् ।समाधान—यदि श्रुति तुम्हारी इच्छाके अधीन होती तो सचमुच ऐसा ही होता; किंतु श्रुति स्वतन्त्र है, क्योंकि उसने अण्डज आदिको बीज बतलाया है, अण्डे आदिको नहीं बतलाया। यही बात देखी भी जाती है कि अण्डज आदिका अभाव होनेपर ही उस जातिकी संततिका अभाव होता है, अण्डे आदिका अभाव होनेपर नहीं । अतः अण्डजादिके बीज अण्डजादि ही हैं ।

३०६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

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३०६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| तथा जीवाज्जातं जीवजं जरायुजमित्येतत्पुरुषपश्वादि । उद्भिज्जमुद्भिनत्तीत्युद्भिदुत्स्थावरं ततो जातमुद्भिज्जं धाना वोद्भिद्ततो जायत इत्युद्भिज्जं स्थावरबीजं स्थावराणां बीजमित्यर्थः । स्वेदजसंशोकजयोरण्डजोद्भिज्जयोरेव यथासंभवमन्तर्भावः । एवं ह्यवधारणं त्रीण्येव बीजानीत्युपपन्नं भवति ॥ १ ॥ | इसी प्रकार जीवसे उत्पन्न हुआ जीवज यानी जरायुज पुरुष एवं पशु आदि तथा उद्भिज्ज—जो पृथिवीको ऊपरकी ओर भेदन करता है उसे उद्भिद् यानी स्थावर कहते हैं, उससे उत्पन्न हुएका नाम उद्भिज्ज है; अथवा धाना (बीज) उद्भिद् है उससे उत्पन्न हुआ उद्भिज्ज स्थावरबीज अर्थात् स्थावरोंका बीज है। स्वेदज और संशोकज (ऊष्मासे उत्पन्न होनेवाले) जीवोंका यथासम्भव अण्डज और उद्भिज्जोंमें ही अन्तर्भाव होगा, क्योंकि ऐसा माननेपर ही 'तीन ही बीज हैं' यह निश्चय उत्पन्न हो सकता है ॥ १ ॥ |


सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणीति ॥२॥

उस इस [ 'सत्' नामक ] देवताने ईक्षण किया, 'मैं इस जीवात्म-रूपसे' इन तीनों देवताओंमें अनुप्रवेश कर नाम और रूपकी अभिव्यक्ति करूँ' ॥ २ ॥

| सेयं प्रकृता सदाख्या तेजोऽबन्नयोनिर्देवतैक्षतैक्षितवती यथापूर्वं बहु स्यामिति । तदेव | उस इस सत् नामक तेज, जल और अन्नके योनिभूत उपर्युक्त देवताने, जैसा कि पहले ईक्षण किया था कि 'मैं बहुत हो जाऊँ' उसी प्रकार, ईक्षण किया। वह |

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| खण्ड ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६०७ | | :--- | :--- |


| बहुभवनं प्रयोजनं नाद्यापि निर्वृत्तमित्यत ईक्षां पुनः कृतवती बहुभवनमेव प्रयोजनमुररीकृत्य । | बहुत होनारूप प्रयोजन अभीतक समाप्त नहीं हुआ था, इसलिये बहुत होनारूप प्रयोजनको ही मनमें रखकर उसने फिर ईक्षण किया । | | कथम् ? हन्तेदानीमहमिमा यथोक्तास्तेजआद्यास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनेति स्वबुद्धिस्थं पूर्वसृष्ट्यनुभूतप्राणाधारणमात्मानमेव स्मरन्त्याहानेन जीवेनात्मनेति । प्राणधारणकर्त्रात्मनेति वचनात्स्वात्मनोऽव्यतिरिक्तेन चैतन्यस्वरूपतया विशिष्टेनेत्येतद्दर्शयति । अनुप्रविश्य तेजोऽबन्नभूतमात्रासंसर्गेण लब्धविशेषविज्ञाना सती नाम च रूपं च नामरूपे व्याकरवाणि विस्पष्टमाकरवाण्यसौ नामायमिदरूप इति व्याकुर्यामित्यर्थः । | किस प्रकार ईक्षण किया ? 'अब मैं इन उपर्युक्त तेज आदि तीन देवताओंमें इस जीवरूपसे—ऐसा कहकर श्रुति पूर्वसृष्टिमें अनुभूत प्राणधारी आत्माका स्मरण करती हुई ही कहती है कि इस जीवात्मरूपसे—प्राण धारण करनेवाले आत्माके द्वारा—इस कथनसे श्रुति यह दिखलाती है कि अपने आत्मासे अभिन्न अर्थात् चैतन्यस्वरूपतया आत्मासे अविशिष्ट जीवरूपसे अनुप्रवेश कर अर्थात् तेज, अप् और अन्न इन भूतमात्राओंके संसर्गसे, जिसने विशेष विज्ञान प्राप्त किया है, ऐसा होकर मैं नामरूप–नाम और रूपोंका व्याकरण–व्यक्तीकरण करूँ; अर्थात् यह इस नामवाला है और इस रूपका है—ऐसा अभिव्यक्त करूँ ।' | | ननु न युक्तमिदमसंसारिण्याः सर्वज्ञाया देवताया बुद्धिपूर्वकमनेकशतसहस्रानर्थाश्रयं | शङ्का—किंतु स्वतन्त्रता रहते हुए भी असंसारी सर्वज्ञ देवताका बुद्धिपूर्वक ऐसा संकल्प करना कि, सैकड़ों-हजारों अनर्थोंके |

| ६०८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |

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६०८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| देहमनुप्रविश्य दुःखमनुभविष्यामीति संकल्पनमनुप्रवेशश्च स्वातन्त्र्ये सति । | आश्रयभूत शरीरमें अनुप्रवेश करके दुःखका अनुभव करूँ, और फिर उसमें अनुप्रवेश करना सम्भव नहीं है । | | सत्यमेवं न युक्तं स्याद्यदि स्वेनैवाविकृतेन रूपेणानुप्रविशेयं दुःखमनुभवेयमिति च संकल्पितवती, न त्वेनम्; कथं तर्हि ? अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्येति वचनात् । | समाधान - ठीक है, यदि वह ऐसा संकल्प करता कि अपने अविकृतरूपसे ही अनुप्रवेश करूँ और दुःखका अनुभव करूँ तब तो ऐसा करना ठीक नहीं था, किंतु ऐसी बात है नहीं । तो फिर क्या है ?— 'इस जीवात्मारूपसे अनुप्रवेश करूँ' ऐसा वचन होनेके कारण [ उसका साक्षात् प्रवेश सिद्ध नहीं होता ] । | | जीवो हि नाम देवताया आभासमात्रम् । बुद्ध्यादिभूतमात्रासंसर्गजनित आदर्श इव प्रविष्टः पुरुषप्रतिबिम्बो जलादिष्विव च सूर्यादीनाम् । अचिन्त्यानन्तशक्तिमत्या देवताया बुद्ध्यादिसंबन्धश्चैतन्याभासो देवतास्वरूपविवेकाग्रहणनिमित्तः सुखी दुःखी मूढ इत्याद्यनेकविकल्पप्रत्ययहेतुः । | जीव तो उस देवताका आभासमात्र है, जो दर्पणमें प्रविष्ट हुए पुरुषके प्रतिबिम्बके समान तथा जल आदिमें प्रविष्ट हुए सूर्यके आभासके समान बुद्धि आदि भूतमात्राओंके संसर्गसे उत्पन्न हुआ है । अचिन्त्य एवं अनन्त शक्तिसे युक्त उस देवताका बुद्धि आदिसे सम्बन्ध रूप जो चैतन्याभास है वही उस देवताके स्वरूपका विवेक ग्रहण न करनेके कारण सुखी, दुःखी, मूढ इत्यादि अनेकों विकल्पोंकी प्रतीतिका कारण होता है । |

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खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६०९


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
छायामात्रेण जीवरूपेणानुप्रविष्टत्वाद्देवता न दैहिकैः स्वतः सुखदुःखादिभिः संबध्यते । यथा पुरुषादित्यादय आदर्शोदकादिषुच्छायामात्रेणानुप्रविष्टा आदर्शोदकादिदोषैर्न संबध्यन्ते तद्वद्देवतापि । "सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः" (क० उ० २।२।१२) । "आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः" इति हि काठके । "ध्यायतीव लेलायतीव" (बृह० उ० ४।३।७) इति च वाजसनेयके ।छायामात्र जीवरूपसे अनुप्रविष्ट होनेके कारण वह देवता स्वयं देहके सुख-दुःखादिसे सम्बद्ध नहीं होता । जिस प्रकार दर्पण और जल आदिमें छायामात्रसे अनुप्रविष्ट हुए मनुष्य और सूर्य आदि दर्पण और जल आदिके दोषोंसे लिप्त नहीं होते उसी प्रकार वह देवता भी निर्लिप्त रहता है । "जिस प्रकार सम्पूर्ण लोकका चक्षुरूप सूर्य चक्षुसम्बन्धी बाह्य दोषोंसे लिप्त नहीं होता उसी प्रकार समस्त प्राणियोंका एक ही अन्तरात्मा लौकिक दुःखोंसे लिप्त नहीं होता बल्कि उनसे बाहर रहता है" "तथा वह आकाशके समान सर्वत्र व्याप्त एवं नित्य है", इस प्रकार कठोपनिषद्में तथा "मानो ध्यान करता है, मानो चेष्टा करता है", इस प्रकार बृहदारण्यकोपनिषद्में भी कहा है ।
ननुच्छायामात्रश्चेज्जीवो मृषैव प्राप्तस्तथा परलोकेहलोकादि च तस्य ।**शङ्का—**यदि जीव छायामात्र ही है तो वह मिथ्या ही सिद्ध होता है तथा उसके परलोक, इहलोक आदि भी मिथ्या ही ठहरते हैं ?
नैष दोषः; सदात्मना सत्यत्वाभ्युपगमात् । सर्वं च नाम-**समाधान—**ऐसा दोष नहीं है, क्योंकि सत्स्वरूपसे उसका सत्यत्व स्वीकार किया गया है । सारा

६१० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

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६१०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| रूपादि सदात्मनैव सत्यं विकाराजातं स्वतस्त्वनृतमेव । 'वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्' इत्युक्तत्वात् । तथा जीवोऽपीति । यक्षानुरूपो हि बलिरिति न्यायप्रसिद्धिः । अतः सदात्मना सर्वव्यवहाराणां सर्वविकाराणां च सत्यत्वं सतोऽन्यत्वे चानृतत्वमिति न कश्चिद्दोषस्तार्किकैरिहानुषङ्क्तुं शक्यः । यथेतेरेतरविरुद्धद्वैतवादाः स्वबुद्धिविकल्पमात्रा अतत्त्वनिष्ठा इति शक्यं वक्तुम् ॥ २ ॥ | नाम-रूपादि विकारजात सत्स्वरूपसे ही सत्य है, स्वयं तो वह मिथ्या ही है, क्योंकि 'विकार तो केवल कहनेके लिये नाममात्र है' ऐसा कहा जा चुका है ऐसा ही जीव भी है । 'जैसा यक्ष वैसी ही बलि' यह न्याय प्रसिद्ध ही है । अतः सत्स्वरूपसे सम्पूर्ण व्यवहार और सारे विकारोंकी सत्यता है तथा सत्से पृथक् माननेपर उनका मिथ्यात्व है—इस प्रकार तार्किकोंद्वारा इस विषयमें किसी दोषका प्रसङ्ग नहीं उपस्थित किया जा सकता, जैसा कि हम कह सकते हैं कि एक दूसरेसे विरुद्ध द्वैतवाद अपनी ही बुद्धिके विकल्पमात्र और अतत्त्वनिष्ठ हैं ॥ २ ॥ |


| सैवं तिस्रो देवता अनुप्रविश्य स्वात्मावस्थे बीजभूते अव्याकृते नामरूपे व्याकरवाणीतीक्षित्वा— | इस प्रकार उसने उन तीनों देवताओंमें अनुप्रवेश कर और इस प्रकार ईक्षण कर कि ‘मैं अपने स्वरूपमें स्थित अव्याकृत नाम रूपोंका व्याकरण करूँ’— |

तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणीति सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत् ॥ ३ ॥

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खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६११


‘और उनमेंसे एक-एक देवताको त्रिवृत्-त्रिवृत् करूँ’ ऐसा विचार कर उस इस देवताने इस जीवात्मरूपसे ही उन तीन देवताओंमें अनुप्रवेश कर नामरूपका व्याकरण किया ॥ ३ ॥

संस्कृत (शाङ्करभाष्य)हिन्दी अनुवाद
तासां च तिसृणां देवताना-<br><br>मेकैकां त्रिवृतं त्रिवृतं करवाणि । एकैकस्याः प्राधान्यं द्वयोर्द्वयो-<br><br>र्गुणभावोऽन्यथा हि रज्ज्वा इवैकमेव त्रिवृत्करणं स्यात्, न<br><br>तु तिसृणां पृथक्पृथक्त्रिवृत्करण-<br><br>मिति । एवं हि तेजोऽबन्नानां<br><br>पृथङ्नामप्रत्ययलाभः स्यात्तेज<br><br>इदमीमा आपोऽन्नमिदमिति च<br><br>सति च पृथङ्नामप्रत्ययलाभे<br><br>देवतानां—सम्यग्व्यवहारस्य<br><br>प्रसिद्धिः प्रयोजनं स्यात् ।‘और उन तीनों देवताओंमेंसे एक-एकको त्रिवृत्-त्रिवृत् करूँ ।’ एक-एक देवताके त्रिवृत्करणमें एक-एककी प्रधानता और दो-दोकी गौणता रहती है, नहीं तो तीन [लड़वाली] रस्सीके समान एक ही त्रिवृत्करण होता । तीनों देवताओं-का पृथक्-पृथक् त्रिवृत्करण नहीं होता । इस प्रकार ही तेज, अप् और अन्नको ‘यह तेज है, यह जल है, यह अन्न है’ ऐसे पृथक् पृथक् नाम और प्रतीतिकी प्राप्ति हो सकती है, और पृथक्-पृथक् नाम तथा प्रतीतिकी प्राप्ति होनेपर ही देवताओंके सम्यक् व्यवहारकी सिद्धिरूप प्रयोजनकी पूर्ति हो सकती है ।
एवमीक्षित्वा सेयं देवतेमा-<br><br>स्तिस्रो देवता अनेनैव यथोक्ते-<br><br>नैव जीवेन सूर्यबिम्बवदन्तः-<br><br>प्रविश्य वैराजं पिण्डं प्रथमं<br><br>देवादीनां च पिण्डाननुप्रविश्यइस प्रकार ईक्षण कर उस देवता-ने इन तीनों देवताओंमें इस उपर्युक्त जीवरूपसे ही सूर्यबिम्बके समान भीतर प्रवेश कर अर्थात् पहले विराट् पिण्डमें और उसके पश्चात् देवादि पिण्डोंमें अनुप्रवेश कर अपने संकल्प-के अनुसार ही नाम-रूपोंका

छा० उ० २०—

११२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६

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११२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| यथासंकल्पमेव नामरूपे व्याकरोदसौ नामायमिदंरूप इति ॥ ३ ॥ | व्याकरण किया । अर्थात् यह पदार्थ इस नामवाला और इस रूपवाला है—इस प्रकार पदार्थोंका व्यक्तीकरण किया ॥ ३ ॥ |


तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकामकरोद्यथा तु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवतास्त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥ ४ ॥

उस देवताने उनमेंसे प्रत्येकको त्रिवृत्-त्रिवृत् किया । हे सोम्य ! जिस प्रकार ये तीनों देवता एक-एक करके प्रत्येक त्रिवृत्-त्रिवृत् हैं वह मेरेद्वारा जान ॥ ४ ॥

| तासां च देवतानां गुणप्रधानभावेन त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकामकरोत्कृतवती देवता । तिष्ठतु तावद्देवतापिण्डानां नामरूपाभ्यां व्याकृतानां तेजोऽबन्नमयत्वेन त्रिधात्वं यथा तु बहिरिमाः पिण्डेभ्यस्तिस्रो देवतास्त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तन्मे मम निगदतो विजानीहि विस्पष्टमवधारयोदाहरतः ॥ ४ ॥ | उस देवताने उन देवताओंमेंसे एक-एकको गुण-प्रधानभावसे त्रिवृत्-त्रिवृत किया । अभी, नामरूपसे व्यक्त हुए देवता आदि पिण्डोंके तेज, अप् और अन्नरूपसे त्रिविधत्वकी बात अलग रहे, इन पिण्डोंसे बाहर भी ये तीनों देवता एक-एक करके किस प्रकार त्रिवृत्-त्रिवृत हैं सो मेरे कथनद्वारा जान अर्थात् उदाहरणद्वारा अच्छी तरह समझ ले ॥ ४ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये तृतीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥

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