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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages

८६६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

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८६६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८
तु विद्याग्रहणसम्प्रदानविधिप्रदर्शिनार्था विद्यास्तुत्यर्था च । राजसेवितं पानीयमितिवत् ।विधि प्रदर्शित करने एवं विद्याकी स्तुतिके लिये है, जिस प्रकार [ जलकी प्रशंसा करनेके लिये ] 'यह जल राजाद्वारा सेवित है' ऐसा कहा जाता है ।

य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वाँश्च लोकानाप्नोति सर्वाँश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच ॥ १ ॥

जो आत्मा [ धर्माधर्मादिरूप ] पापशून्य, जरारहित, मृत्युहीन, विशोक, क्षुधारहित, पिपासारहित, सत्यकाम और सत्यसंकल्प है उसे खोजना चाहिये और उसे विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये। जो उस आत्माको शास्त्र और गुरुके उपदेशानुसार खोजकर जान लेता है वह सम्पूर्ण लोक और समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है—ऐसा प्रजापतिने कहा ॥ १ ॥

य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः, यस्योपासनायोपलब्ध्यर्थं हृदयपुण्डरीकमभिहितम्, यस्मिन्कामाः समाहिताः सत्या अनृतापिधानाः, यदुपासनसहभावि ब्रह्मचर्यंजो आत्मा पापरहित, जराहीन, मृत्युहीन, शोकरहित, क्षुधारहित, तृषाहीन, सत्यकाम और सत्यसंकल्प है, जिसकी उपासना अर्थात् उपलब्धिके लिये हृदयपुण्डरीक स्थान बतलाया गया है, जिसमें मिथ्यासे अपिहित (ढँके हुए) सत्यकाम सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं, जिसकी उपासनाके साथ-साथ रहनेवाला
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खण्ड ७ ]शाङ्करभाष्यार्थ८१७
संस्कृत भाष्यभाष्यार्थ
साधनमुक्तम्, उपासनफलभूतकामप्रतिपत्तये च मूर्धन्यया नाड्या गतिरभिहिता सोऽन्वेष्टव्यः शास्त्राचार्योपदेशैर्ज्ञातव्यः स विशेषेण ज्ञातुमेष्टव्यो विजिज्ञासितव्यः स्वसंवेद्यतामापादयितव्यः ।ब्रह्मचर्यरूप साधन बतलाया गया है और उपासनाके फलभूत कामकी प्राप्तिके लिये मूर्धन्य नाड़ीसे गति बतलायी गयी है उसका अन्वेषण करना चाहिये—शास्त्र और आचार्यके उपदेशोंसे उसका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये; वह विजिज्ञासितव्य—विशेषरूपसे जाननेके लिये इष्ट है अर्थात् स्वसंवेद्यताको प्राप्त करानेयोग्य है ।
किं तस्यान्वेषणाद्विजिज्ञासनाच्च स्यात् ? इत्युच्यते—स सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान्यस्तमात्मानं यथोक्तेन प्रकारेण शास्त्राचार्योपदेशेनान्विष्य विजानाति स्वसंवेद्यतामापादयति तस्यैतत्सर्वलोककामावाप्तिः सर्वात्मता फलं भवतीति ह किल प्रजापतिरुवाच ।उसके अन्वेषण और विशेषरूपसे जाननेकी इच्छासे क्या होता है, यह बतलाया जाता है—जो उपर्युक्त प्रकारसे उस आत्माको शास्त्र और आचार्यके उपदेशानुसार अन्वेषणकर विशेषरूपसे जान लेता है अर्थात् स्वसंवेद्यताको प्राप्त कर लेता है उसे इन समस्त लोकोंके भोगोंकी प्राप्ति और सर्वात्मतारूप फलकी प्राप्ति होती है—ऐसा प्रजापतिने कहा ।
अन्वेष्टव्यो विजिज्ञासितव्य इति चैष नियमविधिरेव नापूर्वविधिः । एवमन्वेष्टव्यो विजिज्ञासितव्य इत्यर्थः । दृष्टार्थत्वादन्वे-'अन्वेषण करना चाहिये, विशेषरूपसे जानना चाहिये' यह नियमविधि ही है, अपूर्व विधि नहीं है । इसका तात्पर्य यह है कि उसे इस प्रकार अन्वेषण करना चाहिये, इस प्रकार जानना चाहिये, क्योंकि

छा० उ० २८—

८६८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

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८६८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

| षणविजिज्ञासनयोः । दृष्टार्थत्वं च दर्शयिष्यति नाहमत्र भोग्यं पश्यामीत्यनेनासकृत्। पररूपेण च देहादिधर्मैरवगम्यमानस्यात्मनः स्वरूपाधिगमे विपरीताधिगमनिवृत्तिदृष्टं फलमिति नियमार्थतैवास्य विधेर्युक्ता न त्वग्निहोत्रादीनामिवापूर्वविधित्वमिह सम्भवति ॥ १ ॥ | अन्वेषण और विजिज्ञासा ये दोनों ही दृष्टार्थ हैं [ इनका फल प्रत्यक्ष सिद्ध है, परलोकादिकी भाँति अदृष्ट नहीं है ]। इनकी दृष्टार्थता 'मैं इसमें भोग्य नहीं देखता' इस [ इन्द्रके ] वाक्यसे श्रुति बारंबार दिखलायेगी । देहादि धर्मोंसे अतीत रूपसे ज्ञात होनेवाले आत्माके स्वरूपका ज्ञान होनेमें विपरीत ज्ञानकी निवृत्ति—यह दृष्ट फल है; अतः इस विधिक नियतार्थक होना ही उचित है; अग्निहोत्रादिके समान इसका अपूर्वविधि होना सम्भव नहीं है ॥ १ ॥ |

-:००:-

तद्धोभये देवासुरा अनुबुबुधिरे ते होचुर्हन्त तमात्मानमन्विच्छामो यमात्मानमन्विष्य सर्वाँश्च लोकानाप्नोति सर्वाँश्च कामानितीन्द्रो हैव देवाना-मभिप्रवव्राज विरोचनोऽसुराणां तौ हासंविदानावेव समित्पाणी प्रजापति सकाशमाजग्मतुः ॥ २ ॥

प्रजापतिके इस वाक्यको देवता और असुर दोनोंहीने परम्परासे जान लिया। वे कहने लगे—'हम उस आत्माको जानना चाहते हैं जिसे जाननेपर जीव सम्पूर्ण लोकों और समस्त भोगोंको प्राप्त कर लेता है'—ऐसा निश्चय कर देवताओंका राजा इन्द्र और असुरोंका राजा विरोचन—ये दोनों परस्पर ईर्ष्या करते हुए हाथोंमें समिधाएँ लेकर प्रजापतिके पास आये ॥ २ ॥

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खण्ड ७ ]शाङ्करभाष्यार्थ८६९

| तद्धोभय इत्याद्याख्यायिकाप्रयोजनमुक्तम्। तद्ध किल प्रजापतेर्वचनमुभये देवासुरा देवाश्चासुराश्च देवासुरा अनु परम्परागतं स्वकर्णगोचरापन्नमनुबुबुधिरेऽनुबुद्धवन्तः। | 'तद्धोभये' इत्यादि आख्यायिकाका प्रयोजन पहले बतला दिया गया। परम्परासे आये हुए—अपने कर्णोंके विषय हुए उस प्रजापतिके वचनको देवता और असुर इन दोनोंने जान लिया। | | ते चैतत्प्रजापतिवचो बुद्ध्वा किमकुर्वन्नित्युच्यते—ते होचुरुक्तवन्तोऽन्योन्यं देवाः स्वपरिषदद्यसुराश्च हन्त यद्यनुमतिर्भवतां प्रजापतिनोक्तं तमात्मानमन्विच्छामोऽन्वेषणं कुर्मो यमात्मानमन्विष्य सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामानित्युक्त्वेन्द्रो हैव राजैव स्वयं देवानामितरान्देवांश्च भोगपरिच्छदं च सर्वं स्थापयित्वा शरीरमात्रेणैव प्रजापतिंप्रत्यभिप्रवव्राज प्रगतवांस्तथा विरोचनोऽसुराणाम्। | प्रजापतिके इस वचनको जानकर उन्होंने क्या किया—यह बतलाया जाता है—उन देवता और असुरोंने अपनी-अपनी सभामें आपसमें कहा, 'यदि आपलोगोंकी अनुमति हो तो प्रजापतिके बतलाये हुए उस आत्माका अन्वेषण करें, जिस आत्माका अन्वेषण कर लेनेपर मनुष्य सम्पूर्ण लोक और समस्त भोगोंको प्राप्त कर लेता है। ऐसा कहकर स्वयं देवताओंका राजा इन्द्र ही अपनी सम्पूर्ण भोगसामग्री देवताओंको सौंपकर शरीरमात्रसे ही प्रजापतिके पास गया। इसी प्रकार असुरोंका राजा विरोचन भी गया। | | विनयेन गुरवोऽभिगन्तव्या इत्येतद्दर्शयति, त्रैलोक्यराज्याच्च गुरुतरा विद्येति। यतो देवासुर- | गुरुजनोंके प्रति विनयपूर्वक जाना चाहिये—यह बात श्रुति दिखलाती है; तथा यह भी [ प्रदर्शित करती है ] कि विद्या त्रिलोकीके राज्यसे |

८७० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८

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८७० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८

| राजौ महार्हभोगार्हौ सन्तौ तथा<br>गुरुमभ्युपगतवन्तौ। तौ ह किला-<br>संविदानावेवान्योन्यं संविदम्-<br>कुर्वाणौ विद्याफलं प्रत्यन्योन्य-<br>मीर्ष्यां दर्शयन्तौ समित्पाणी<br>समिद्भारहस्तौ प्रजापतिसकाश-<br>माजग्मतुरागतवन्तौ ॥ २ ॥ | भी बढ़कर है, क्योंकि देवराज और<br>असुरराज ये दोनों बहुमूल्य भोगके<br>पात्र होनेपर भी इस प्रकार गुरुके<br>समीप गये । वे दोनो परस्पर<br>असंविदान—संविद् ( सद्भाव ) न<br>करते हुए अर्थात् विद्याके फलके<br>लिये एक दूसरेके प्रति ईर्ष्या<br>प्रदर्शित करते हुए समित्पाणि—<br>हाथोंमें समिधाओंके भार लिये<br>प्रजापतिके समीप आये ॥ २ ॥ |


तौ ह द्वात्रिंशतं वर्षाणि ब्रह्मचर्यमूषतुस्तौ ह प्रजापतिरुवाच किमिच्छन्ताववास्तमिति तौ होचतुर्य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वाँश्च लोकानाप्नोति सर्वाँश्च कामान् यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति भगवतो वचो वेदयन्ते तमिच्छन्ताववास्तमिति ॥ ३ ॥

उन्होंने बत्तीस वर्षतक ब्रह्मचर्यवास किया । तब उनसे प्रजापतिने कहा—'तुम यहाँ किस इच्छासे रहे हो ?' उन्होंने कहा—'जो आत्मा पापरहित, जरारहित, मृत्युहीन, शोकरहित, क्षुधाहीन, तृषाहीन, सत्यकाम और सत्यसंकल्प है उसका अन्वेषण करना चाहिये और उसे विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये । जो उस आत्माका अन्वेषण कर उसे विशेषरूपसे जान लेता है वह सम्पूर्ण लोक और समस्त भोगोंको प्राप्त कर लेता है—इस श्रीमान्के वाक्यको शिष्टजन बतलाते हैं । उसीको जाननेकी इच्छा करते हुए हम यहाँ रहे हैं' ॥ ३ ॥

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खण्ड ७]शाङ्करभाष्यार्थे८७१

| तौ ह गत्वा द्वात्रिंशतं वर्षाणि शुश्रूषापरौ भूत्वा ब्रह्मचर्यमूषतुरुषितवन्तौ । अभिप्रायज्ञः प्रजापतिस्तानुवाच किमिच्छन्तौ किं प्रयोजनमभिप्रेत्येच्छन्ताववास्तमुषितवन्तौ युवामितीत्युक्तौ तौ होचतुः—य आत्मेत्यादि भगवतो वचो वेदयन्ते शिष्टा अतस्तमात्मानं ज्ञातुमिच्छन्ताववास्तमिति । यद्यपि प्राक् प्रजापतेः समीपागमनादन्योन्यमीर्ष्यायुक्तावभूतां तथापि विद्याप्राप्तिप्रयोजनगौरवात्त्यक्तरागद्वेषमोहेर्ष्यादिदोषावेव भूत्वोषतुर्ब्रह्मचर्यं प्रजापतौ । तेनेदं प्रख्यापितमात्मविद्यागौरवम् ॥ ३ ॥ | वहाँ जाकर उन्होंने बत्तीस वर्षतक सेवामें तत्पर रहते हुए ब्रह्मचर्यवास किया । तब उनके अभिप्रायको जाननेवाले प्रजापतिने उनसे कहा—'तुमने किस प्रयोजनके अभिप्रायसे अर्थात् क्या चाहते हुए यहाँ निवास किया है ?' इस प्रकार कहे जानेपर वे बोले—'शिष्टजन श्रीमान्-का 'य आत्मा' इत्यादि वाक्य बतलाते हैं, अतः उस आत्माको जाननेके लिये हमने निवास किया है ।' यद्यपि प्रजापतिके पास आनेसे पूर्व वे एक दूसरेके प्रति ईर्ष्यायुक्त थे, तथापि विद्याप्राप्तिके प्रयोजनके गौरवसे उन्होंने प्रजापतिके यहाँ रागद्वेष, मोह एवं ईर्ष्यादि दोषोंको त्यागकर ही ब्रह्मचर्यवास किया । इससे इस आत्मविद्याके गौरवकी सूचना मिलती है ॥ ३ ॥ |


— : • : —

तौ ह प्रजापतिरुवाच य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेत्यथ योऽयं भगवोऽप्सु परिख्यायते यश्चायमादर्शे कतम एष इत्येष उ एवैषु सर्वेष्वन्तेषु परिख्यायते इति होवाच ॥ ४॥

८७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

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८७२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

उनसे प्रजापतिने कहा—'यह जो पुरुष नेत्रोंमें दिखायी देता है यह आत्मा है, यह अमृत है, यह अभय है, यह ब्रह्म है।' [तब उन्होंने पूछा—] 'भगवन् ! यह जो जलमें सब ओर प्रतीत होता है और जो दर्पणमें दिखायी देता है उनमें आत्मा कौन-सा है ?' इसपर प्रजापतिने कहा—'मैंने जिस नेत्रान्तर्गत पुरुषका वर्णन किया है वही इन सबमें सब ओर प्रतीत होता है' ॥ ४ ॥

तावेवं तपस्विनौ शुद्धकल्मषौ योग्यावुपलक्ष्य प्रजापतिरुवाच ह । य एषोऽक्षिणि पुरुषो निवृत्तचक्षुर्भिर्मृदितकषायैर्दृश्यते योगिभिर्द्रष्टा । एष आत्मापहतपाप्मादिगुणो यमवोचं पुराहं यद्विज्ञानात्सर्वलोककामावाप्तिरेतदमृतं भूमाख्यम् । अत एवाभयमत एव ब्रह्म वृद्धतममिति ।उन्हें इस प्रकार तपस्वी, विशुद्धकल्मष (जिनके दोष निवृत्त हो गये हैं) और योग्य जानकर प्रजापतिने कहा—'जिनकी इन्द्रियाँ विषयोंसे निवृत्त हो गयी हैं और जिनके राग-द्वेषादि दोषोंका नाश हो गया है उन योगियोंको जो नेत्रके भीतर यहाँ द्रष्टा पुरुष दिखायी देता है, यह अपहतपाप्मादि गुणोंवाला आत्मा है, जिसके विषयमें पहले मैंने कहा था और जिसका ज्ञान होनेपर सम्पूर्ण लोक और कामनाओंकी प्राप्ति हो जाती है। यह भूमासंज्ञक अमृत है, इसलिये अभय है और इसीसे ब्रह्म यानी वृद्धतम है।'
अथैतत्प्रजापतिनोक्तमक्षिणि पुरुषो दृश्यत इति वचः श्रुत्वा छायारूपं पुरुषं जगृहतुः ।तब प्रजापतिके कहे हुए 'नेत्रोंके भीतर जो पुरुष दिखायो देता है' इस वाक्यसे उन्होंने छायारूप पुरुषको ग्रहण किया
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खण्ड ७] शाङ्करभाष्यार्थ [८०३


गृहीत्वा च दृढीकरणाय प्रजापतिं पृष्टवन्तौ । अथ योऽयं हे भगवोऽप्सु परिख्यायते परिसमन्ताज्ज्ञायते यश्चायमादर्श आत्मनः प्रतिबिम्बाकारः परिख्यायते खड्गादौ च कतम एष एषां भवद्भिरुक्तः किं वैक एव सर्वेष्विति ।<br><br>एवं पृष्टः प्रजापतिरुवाच—<br>एष उ एव यश्चक्षुषि द्रष्टा मयोक्त इति । एतन्मनसि कृत्वैषु सर्वेष्वन्तेषु मध्येषु परिख्यायत इति होवाच ।<br><br>ननु कथं युक्तं शिष्ययोर्विपरीतग्रहणमनुज्ञातुं प्रजापतेर्विगतदोषस्याचार्यस्य सतः ?<br><br>सत्यमेवं नानुज्ञातम् ।और उसे ग्रहणकर अपने विचारको पुष्ट करनेके लिये प्रजापतिसे पूछा, 'हे भगवन् ! यह जो पुरुष जलमें परिख्यात—'परि'—सब ओर 'ख्यात'—प्रतीत होता है और जो यह दर्पणमें अपने प्रतिबिम्बरूपसे दिखायी देता है तथा जो खड्गादि [स्वच्छ पदार्थों] में दीखता है इन सबमें आपका बतलाया हुआ आत्मा कौन है ? अथवा इन सबमें एक ही आत्मा है ?'<br><br>इस प्रकार पूछे जानेपर प्रजापतिने कहा—'मैंने जो नेत्रान्तर्गत द्रष्टा बतलाया है वही आत्मा है'* इस बातको मनमें रखकर ही उसने कहा कि 'वह इन सभीके भीतर दिखायी देता है ।'<br><br>शङ्का—किंतु निर्दोष आचार्य होकर भी प्रजापतिका अपने शिष्योंके विपरीत ग्रहणका अनुमोदन करना कैसे उचित हो सकता है ?<br><br>समाधान—यह ठीक है, परंतु प्रजापतिने उसका अनुमोदन नहीं किया ।

* इस उक्तिसे प्रजापतिने यह सूचित कर दिया है कि तुम मेरा अभिप्राय नहीं समझे, मैंने द्रष्टाको आत्मा बतलाया है और तुम दृश्यको आत्मा समझ बैठे हो।

८७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

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८७४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

| [प्रजापतिविषय-काक्षेपवारणम्]<br><br>कथम्—<br>आत्मन्यध्यारोपितपाण्डित्यमहत्त्वबोद्धृत्वौहीन्द्रविरोचनौ तथैव च प्रथितौ लोके । तौ यदि प्रजापतिना मूढौ युवां विपरीतग्राहिणावित्युक्तौ स्यातां ततस्तयोश्चित्ते दुःखं स्यात्तज्जनिताच्च चित्तावसादात्पुनः प्रश्नश्रवणग्रहणावधारणं प्रत्युत्साहविघातः स्यादतो रक्षणीयौ शिष्याविति मन्यते प्रजापतिः । गृहीतां तावत्तदुदशरावदृष्टान्तेनापनेष्यामीति च । | शङ्का — सो किस प्रकार ?<br>समाधान — इन्द्र और विरोचन इन दोनोंने अपनेमें पाण्डित्य, महत्त्व और ज्ञातृत्वका आरोप किया था और ये लोकमें प्रतिष्ठित भी थे । यदि उनसे प्रजापति यह कहते कि 'तुम मूढ हो और उलटा समझनेवाले हो, तो उनके चित्तमें दुःख हो जाता और उससे होनेवाले चित्तके पराभवसे फिर प्रश्न करने, सुनने, ग्रहण करने और समझनेके लिये उत्साहका ह्रास हो जाता । अतः प्रजापति यही मानते हैं कि शिष्योंकी रक्षा करनी चाहिये । अभी ये विपरीत ग्रहण करते हैं तो भले ही करें, मैं जलके शकोरे आदिके दृष्टान्तसे उसे निवृत्त कर दूँगा । | | ननु न युक्तमेष उ एवेत्यनृतं वक्तुम् । | शङ्का — किंतु 'यही वह आत्मा है' ऐसा कहकर मिथ्याभाषण करना तो उचित नहीं है । | | न चानृतमुक्तम् । | समाधान — प्रजापतिने मिथ्याभाषण तो नहीं किया । | | कथम् ? | शङ्का — किस प्रकार नहीं किया ? | | आत्मनोक्तोऽक्षिपुरुषो मनसि | समाधान — शिष्यके ग्रहण |

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खण्ड ७] शाङ्करभाष्यार्थ ८७५


| सन्निहिततरः शिष्यगृहीताच्छायात्मनः । "सर्वेषां चाभ्यन्तरः" इति श्रुतेः । तमेवावोचदेष उ एवेत्यतो नानृतमुक्तं प्रजापतिना तथा च तयोर्विपरीतग्रहणनिवृत्त्यर्थं ह्याह ॥ ४ ॥ | किये हुए छायात्मासे प्रजापतिका स्वयं बतलाया हुआ नेत्रान्तर्गत पुरुष उनके मनमें बहुत समीपवर्ती है; क्योंकि "आत्मा सबके भीतर है" ऐसी श्रुति है । 'यही वह आत्मा है' इस वाक्यसे प्रजापतिने उसीका निर्देश किया है, इसलिये उन्होंने मिथ्याभाषण नहीं किया । तथा उन्होंने उनके विपरीत ग्रहणकी निवृत्तिके लिये इस प्रकार कहा ॥ ४ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदष्टमाध्याये सप्तमखण्ड- भाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ७ ॥

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अष्टम खण्ड

—: ❀ :—

इन्द्र तथा विरोचनका जलके झकोरेमें अपना प्रतिबिम्ब देखना

उदशराव आत्मानमवेक्ष्य यदात्मनो न विजानीथस्तन्मे प्रब्रूतमिति तौ होदशरावेऽवेक्षाञ्चक्राते तौ ह प्रजापतिरुवाच किं पश्यथ इति तौ होचतुः सर्वमेवेदमावां भगव आत्मानं पश्याव आ लोमभ्य आ नखेभ्यः प्रतिरूपमिति ॥ १ ॥

'जलपूर्ण शकोरेमें अपनेको देखकर तुम आत्माके विषयमें जो न जान सको वह मुझे बतलाओ' ऐसा [ प्रजापतिने कहा ] । उन्होंने जलके शकोरेमें देखा । उनसे प्रजापतिने कहा—'तुम क्या देखते हो?' उन्होंने कहा, 'भगवन् ! हम अपने इस समस्त आत्माको लोम और नखपर्यन्त ज्यों-का-त्यों देखते हैं' ॥ १ ॥

| उदशराव उदकपूर्णे शरावादावात्मानमवेक्ष्यानन्तं यत्तत्रात्मानं पश्यन्तौ न विजानीथस्तन्मे मम प्रब्रूतमाचक्षीयाथामित्युक्तौ तौ ह तथैवोदशरावेऽवेक्षाञ्चक्राते अवेक्षणं चक्रतुस्तथा कृतवन्तौ । तौ ह प्रजापतिरुवाच किं पश्यथ इति ? | [ प्रजापतिने कहा— ] 'उदशराव अर्थात् जलसे भरे हुए शकोरे आदिमें अपनेको देखकर फिर अपने आत्माको देखनेपर जो कुछ तुम न समझ सको वह तुम मुझसे कहना ।' इस प्रकार कहे जानेपर उन्होंने उसी प्रकार जलके शकोरेमें ईक्षण-अवलोकन किया अर्थात् [ जैसा प्रजापतिने कहा था ] वैसा ही किया । तब उनसे प्रजापतिने कहा—'तुमने क्या देखा ?' |

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खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थं ८०७


| ननु तन्मे प्रब्रूतमित्युक्ताभ्यामुदशरावेऽवेक्षणं कृत्वा प्रजापतये न निवेदितमिदमावाभ्यां न विदितमित्यनिवेदिते चाज्ञानहेतौ ह प्रजापतिरुवाच किं पश्यथ इति ? तत्र कोऽभिप्राय इति ।<br><br>उच्यते नैव तयोरिदमावयोरविदितामत्याशङ्काभूच्छायात्मन्यात्मप्रत्ययो निश्चित एवासीत् । येन वक्ष्यति—'तौ ह शान्तहृदयौ प्रवव्रजतुः' इति । न ह्यनिश्चितेऽभिप्रेतार्थे प्रशान्तहृदयत्वमुपपद्यते । तेन नोचतुरिदमावाभ्यामविदितमिति । विपरीतग्राहिणौ च शिष्यावनुपेक्षणीयाविति स्वयमेव पप्रच्छ किंपश्यथ इति ? विपरीतनिश्चया- | शङ्का—किंतु 'वह मुझसे कहना' इस प्रकार कहे हुए उन दोनोंने तो जलपूर्ण शिकोरेमें देखकर प्रजापतिसे ऐसा कोई निवेदन नहीं किया कि 'यह बात हम नहीं समझ सके ।' इस प्रकार अज्ञानका कारण न बतलानेपर भी प्रजापतिने जो कहा कि 'तुमने क्या देखा ?' सो इसका क्या अभिप्राय है ?<br><br>समाधान—इसका उत्तर दिया जाता है—उन्हें इस प्रकारकी कोई शङ्का नहीं हुई कि अमुक बात हमको ज्ञात नहीं है । छायात्मामें उनकी आत्मप्रतीति निश्चित ही थी । इसीसे आगे चलकर श्रुति यह कहती है कि वे शान्तचित्तसे चले गये । तथा अभीष्ट वस्तुका निश्चय हुए बिना प्रशान्तचित्तता सम्भव नहीं है; इसीसे उन्होंने यह नहीं कहा कि यह बात हमें विदित नहीं है । किंतु विपरीत ग्रहण करनेवाले शिष्योंकी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये; इसीसे उन्होंने स्वयं ही पूछ लिया कि तुम क्या देखते हो; तथा उनके विपरीत निश्चयका |

८७८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

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८७८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

| पनयाय च वक्ष्यति साध्वलङ्कृतावित्येवमादि ।<br>तौ होचतुः--सर्वमेवेदमावां भगव आत्मानं पश्याव आ लोमभ्य आ नखेभ्यः प्रतिरूपमिति, यथैवावां हे भगवो लोमनखादिमन्तौ स्वः, एवमेवेदं लोमनखादिसहितमावयोः प्रतिरूपमुदशरावे पश्याव इति ॥ १ ॥ | निराकरण करनेके लिये [ पीछे ] 'साध्वलङ्कृतौ' इत्यादि वाक्य भी कहा ।<br>उन्होंने कहा—'हे भगवन् ! हम दोनों अपने आत्माको लोम और नखपर्यन्त ज्यों-का-त्यों देखते हैं । हे भगवन् ! हमारे स्वरूप जैसे लोम एवं नखादियुक्त हैं उसी प्रकार हम जलके शकोरेमें अपने प्रतिबिम्बको भी लोम और नखादियुक्त देखते हैं' ॥ १ ॥ |

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तौ ह प्रजापतिरुवाच साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षेथामिति तौ ह साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षाञ्चक्राते तौ ह प्रजापतिरुवाच किं पश्यथ इति ॥ २ ॥

उन दोनोंसे प्रजापतिने कहा—'तुम अच्छी तरह अलंकृत होकर, सुन्दर वस्त्र पहनकर और परिष्कृत होकर जलके शकोरेमें देखो ।' तब उन्होंने अच्छी तरह अलंकृत हो, सुन्दर वस्त्र धारणकर और परिष्कृत होकर जलके शकोरेमें देखा । उनसे प्रजापतिने पूछा, 'तुम क्या देखते हो ?' ॥ २ ॥

तौ ह पुनः प्रजापतिरुवाच—<br>छायात्मनिश्चयापनयाय साध्वलङ्कृतौ यथा स्वगृहे सुवसनौ महा-उन दोनोंसे प्रजापतिने छायात्मामें आत्मत्वके निश्चयकी निवृत्तिके लिये फिर कहा— 'तुम दोनों जिस प्रकार अपने घरमें
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खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७९


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
ईवस्त्रपरिधानौ परिष्कृतौ छिन्नलोमनखौ च भूत्वोदशरावे पुनरीक्षेथामिति । इह च नादिदेश यदज्ञातं तन्मे प्रब्रूतमिति । कथं पुनरनेन साध्वलङ्कारादि कृत्वोदशरावेऽवेक्षणेन तयोश्छायात्मग्रहोऽपनीतः स्यात् । <br><br> साध्वलङ्कारसुवसनादीनामागन्तुकानां छायाकरत्वमुदशरावे यथा शरीरसम्बद्धानामेवं शरीरस्यापिच्छायाकरत्वं पूर्वं बभूवेति गम्यते । शरीरैकदेशानां च लोमनखादीनां नित्यत्वेनाभिप्रेतानामखण्डितानां छायाकरत्वं पूर्वमासीत् । छिन्नेषु च तेषु नैव लोमनखादिच्छाया दृश्यतेऽतो लोमनखादिवच्छरीरस्याप्यागमापायित्वं सिद्धमित्युदशरावादौरहते हो उसी भाँति अच्छी तरह अलंकृत होकर 'सुवसन'—महामूल्य वस्त्र धारणकर तथा परिष्कृत यानी लोम और नख काटकर जलके शकोरेमें फिर देखो ।' यहाँ प्रजापतिने ऐसा आदेश नहीं किया कि उस समय तुम जो न जान सको वह मुझे बतलाना । [ क्योंकि वे यही चाहते थे कि ] इस प्रकार सुन्दर अलंकारादि धारण कर जलके शकोरेमें देखनेसे किसी-न किसी तरह उनकी छायात्मबुद्धि निवृत्त हो जाय । <br><br> जिस प्रकार देहसे सम्बद्ध सुन्दर अलंकार और बहुमूल्य वस्त्रादि आगन्तुक पदार्थ जलके शकोरेमें अपनी छाया प्रकट करते हैं उसी प्रकार पहले शरीर भी छायाकारक था—ऐसा इससे ज्ञात होता है । शरीरके एकदेशरूप तथा नित्यरूपसे माने गये अखण्डित लोम और नखादि भी पहले छायाजनक थे । किंतु अब उन्हें काट लिये जानेपर उन लोम एवं नखादिकी छाया दिखायी नहीं देती । इससे लोम और नखादिके समान शरीर भी आगमापायी ( उत्पन्न और नष्ट होनेवाला ) सिद्ध होता है ।

८८० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

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८८०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
दृश्यमानस्य तन्निमित्तस्य च देहस्यानात्मत्वं सिद्धम्, उदशरावादौ छायाकरत्वाद्देहसम्बद्धालङ्कारादिवत् ।इस प्रकार जलके शकोरे आदिमें दीखनेवाले उनके निमित्तभूत देहका भी अनात्मत्व सिद्ध होता है, क्योंकि देहसम्बन्धी अलंकारादिके समान उसका भी जलके शकोरे आदिमें छायाकरत्व है।
न केवलमेतावदेतेन यावत्किञ्चिदात्मीयत्वाभिमतं सुखदुःखरागद्वेषमोहादि च कादाचित्कत्वान्नखलोमादिवदनात्मेति प्रत्ये- तव्यम् । एवमशेषमिथ्याग्रहापन- यनिमित्ते साध्वलङ्कारादिदृष्टान्ते प्रजापतिनोक्ते श्रुत्वा तथा कृत- वतोरपिच्छायात्मविपरीतग्रहो नापजगाम यस्मात्तस्मात्स्व- दोषेणैव केनचित्प्रतिबद्धविवेक- विज्ञानाविन्द्रविरोचनावभूतामिति गम्यते । तौ पूर्ववदेव दृढनिश्चयौ पप्रच्छ किं पश्यथ इति ॥ २ ॥इसीसे केवल इतनी ही बात सिद्ध होती हो सो नहीं, बल्कि सुख, दुःख, राग, द्वेष और मोहादि जितना कुछ भी आत्मीयरूपसे माना जाता है वह भी नख एवं लोमादिके समान कभी-कभी होनेवाला होनेके कारण अनात्मा ही है—ऐसा जानना चाहिये । इस प्रकार सम्पूर्ण मिथ्या ग्रहणकी निवृत्तिका हेतुभूत प्रजापतिका कहा हुआ साधु अलं- कारादिका दृष्टान्त सुनकर वैसा ही करनेपर भी, क्योंकि उनका छायात्मसम्बन्धी विपरीत ज्ञान निवृत्त नहीं हुआ इसलिये यह विदित होता है कि उन इन्द्र और विरोचनका विवेकविज्ञान उनके किसी अपने दोषसे ही प्रतिबद्ध हो गया था । तब प्रजापतिने पहलेहीके समान दृढ़ निश्चयवाले उन दोनोंसे पूछा, 'तुम क्या देखते हो ?' ॥२॥
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खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८८१


तौ होचतुर्यथैवेद्मावां भगवः साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ स्व एवमेवेमौ भगवः साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतावित्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति तौ ह शान्तहृदयौ प्रवव्रजतुः ॥ ३ ॥

उन दोनोंने कहा—'भगवन् ! जिस प्रकार हम दोनों उत्तम प्रकारसे अलंकृत, सुन्दर वस्त्र धारण किये और परिष्कृत हैं उसी प्रकार हे भगवन् ! ये दोनों भी उत्तम प्रकारसे अलंकृत, सुन्दर वस्त्रधारी और परिष्कृत हैं।' तब प्रजापतिने कहा—'यह आत्मा है, यह अमृत और अभय है और यही ब्रह्म है।' तब वे दोनों शान्तचित्तसे चले गये ॥ ३ ॥


संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
तौ तथैव प्रतिपन्नौ यथैवेद- <br> मिति पूर्ववद्यथा साध्वलङ्कारा- <br> दिविशिष्टावावां स्व एवमेवेमौ <br> छायात्मानाविति सुतरां विपरीत- <br> निश्चयौ बभूवतुः । यस्यात्मनो <br> लक्षणं य आत्मापहतपाप्मेत्युक्त्वा <br> पुनस्तद्विशेषमन्विष्यमाणयोर्य <br> एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत इति <br> साक्षादात्मनि निर्दिष्टे तद्विपरीत- <br> ग्रहापनयायोदशरावसाध्वलङ्कार- <br> दृष्टान्तेऽप्यभिहित आत्मस्वरूप- <br> बोधाद्विपरीतग्रहो नापगतः ।उन्होंने उसी प्रकार समझा । <br> 'यथैवेदम्' अर्थात् पूर्ववत जिस <br> प्रकार हम साधु-अलंकारादिविशिष्ट <br> हैं उसी प्रकार ये छायात्मा भी हैं। <br> इस प्रकार वे सर्वथा विपरीत <br> निश्चयवाले हो गये । जिस आत्माका <br> लक्षण 'य आत्मापहतपाप्मा' <br> इस प्रकार कहकर फिर उसकी <br> विशेषताकी जिज्ञासावालोंके प्रति <br> 'यह जो नेत्रान्तर्गत पुरुष दिखायी <br> देता है, इस प्रकार आत्माका <br> साक्षात् निर्देश करनेपर तथा <br> उसके विपरीत ज्ञानकी निवृत्तिके <br> लिये उदशराव और साधु-अलंकारादि <br> दृष्टान्त देनेपर भी उन दोनोंका <br> आत्मस्वरूपज्ञानसे विपरीत ग्रह <br> निवृत्त नहीं हुआ; अतः ऐसा

८८२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ८

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८८२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ८


| अतः स्वदोषेण केनचित्प्रतिबद्धविवेकविज्ञानसामर्थ्याविति मत्वा यथाभिप्रेतमेवात्मानं मनसि निधायैष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति प्रजापतिः पूर्ववत्। न तु तदभिप्रेतमात्मानम्। | मानकर कि इन दोनोंकी विवेक-विज्ञानसामर्थ्य अपने किसी दोषके कारण प्रतिबद्ध हो गयी है प्रजापतिने उनके माने हुए आत्माका नहीं बल्कि अपने मन्में यथाभिमत आत्माका ही निश्चय कर पहलेहीकी तरह कहा—'यह आत्मा है, यह अमृत और अभय है तथा यही ब्रह्म है।' | | य आत्मेत्याद्यात्मलक्षणश्रवणेनाक्षिपुरुषश्रुत्या चोदशरावाद्युपपत्त्या च संस्कृतौ तावत्। मद्वचनं सर्वं पुनः पुनः स्मरन्तोः प्रतिबन्धक्षयाच्च स्वयमेवात्मविषये विवेको भविष्यतीति मन्वानः पुनर्ब्रह्मचर्यादेशे च तयोश्चित्तदुःखोत्पत्तिं परिजिहीर्षन्कृतार्थबुद्धितया गच्छन्तावप्युपेक्षितवान्प्रजापतिः। तौ हेन्द्रविरोचनौ शान्तहृदयौ तुष्टहृदयौ कृतार्थबुद्धी इत्यर्थः। न तु शम एव शमश्चेत्तयोर्जातो विपरीतग्रहो विगतोऽभविष्यत्प्रवव्रजतुर्गतवन्तौ ॥ ३ ॥ | 'य आत्मापहतपाप्मा' इत्यादि आत्माका लक्षण सुननेसे, अक्षिपुरुषसम्बन्धिनी श्रुतिसे और उदशरावादिकी युक्तिसे तो ये संस्कारयुक्त हो ही गये हैं; अब मेरी सारी बातको बारंबार स्मरण करते हुए प्रतिबन्धका क्षय होनेपर इन्हें स्वयं ही आत्माके सम्बन्धमें विवेक हो जायगा—ऐसा मानकर और पुनः ब्रह्मचर्यका आदेश देनेपर उन्हें जो दुःख होगा उसे बचानेके लिये प्रजापतिने कृतार्थबुद्धि होकर जाते हुए उन दोनोंकी उपेक्षा कर दी। वे इन्द्र और विरोचन शान्तचित्त-संतुष्टहृदय अर्थात् कृतार्थबुद्धि होकर चले गये। किंतु यह शम नहीं था, क्योंकि यदि उन्हें वास्तविक शम ही होता तो उनका विपरीतग्रहण निवृत्त हो जाता ॥३॥ |


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खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८८३


एवं तयोर्गतयोरिन्द्रविरोचनयो राज्ञोर्भोगासक्तयोर्यथोक्तविस्मरणं स्यादित्याशङ्कयाप्रत्यक्षं प्रत्यक्षवचनेन च चित्तदुःखं परिजिहीर्षुः—इस प्रकार गये हुए उन भोगासक्त राजा इन्द्र और विरोचनको पहले कहे हुए [ आत्मलक्षण ] का विस्मरण हो जायगा—ऐसी आशङ्कासे प्रत्यक्ष वचनद्वारा अप्रत्यक्षरूपसे उनके हार्दिक दुःखकी निवृत्ति चाहनेवाले—

तौ हान्वीक्ष्य प्रजापतिरुवाचानुपलभ्यात्मानमनु-
विद्य व्रजतो यतर एतदुपनिषदो भविष्यन्ति देवा वासुरा
वा ते पराभविष्यन्तीति स ह शान्तहृदय एव विरोचनो-
ऽसुराञ्जगाम तेभ्यो हैतामुपनिषदं प्रोवाचात्मैवेह महय्य
आत्मा परिचर्य आत्मानमेवेह महयन्नात्मानं परिचर-
न्नुभौ लोकाववाप्नोतीमं चामुं चेति ॥ ४ ॥

प्रजापतिने उन्हें [ दूर गया ] देखकर कहा—'ये दोनों आत्माको उपलब्ध किये बिना—उसका साक्षात्कार किये बिना जा रहे हैं; देवता हों या असुर जो कोई ऐसे निश्चयवाले होंगे उन्हींका पराभव होगा।' वह जो विरोचन था शान्तचित्तसे असुरोंके पास पहुँचा और उनको यह आत्मविद्या सुनायी—'इस लोकमें आत्मा ( देह ) ही पूजनीय है और आत्मा ही सेवनीय है। आत्माकी ही पूजा और परिचर्या करनेवाला पुरुष इहलोक और परलोक दोनों लोकोंको प्राप्त कर लेता है' ॥ ४ ॥

तौ दूरं गच्छन्तावान्वीक्ष्य य आत्मापहतपाप्मेत्यादिवचनवदे-प्रजापतिने उन्हें दूर गया देखकर, यह मानते हुए कि 'य आत्मापहतपाप्मा' इत्यादि

८८४ | छाान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८

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८८४छाान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८

| तदप्यनयोः श्रवणगोचरत्वमेष्यतीति मत्वोवाच प्रजापतिः । अनुपलभ्य यथोक्तलक्षणमात्मानमननुविद्य स्वात्मप्रत्यक्षं चाकृत्वा विपरीतनिश्चयौ च भूत्वेन्द्रविरोचनावेतौ व्रजतो गच्छेयाताम् । अतो यतरे देवा वासुरा वा किं विशेषितेनैतदुपनिषद आभ्यां या गृहीतात्मविद्या सेयमुपनिषद्येषां देवानामुसुराणां वा त एतदुपनिषद एवंविज्ञाना एतन्निश्चया भविष्यन्तीत्यर्थः । ते किं पराभविष्यन्ति श्रेयोमार्गात्पराभूता बहिर्भूता विनष्टा भविष्यन्तीत्यर्थः । | वाक्यके समान यह वचन भी उनके कानोंमें पड़ जायगा; कहा— 'ये इन्द्र और विरोचन उपर्युक्त लक्षणवाले आत्माको बिना जाने—उसे अपने प्रत्यक्ष किये बिना विपरीत निश्चयवाले होकर जा रहे हैं। इसलिये विशेषरूपसे क्या कहा जाय, जो भी देवता या असुर इस उपनिषद्वाले होंगे—इनके द्वारा जो आत्मविद्या ग्रहण की गयी है वही जिन देवता या असुरोंकी उपनिषद् होगी वे ऐसे उपनिषद्—ऐसे विज्ञान अर्थात् ऐसे निश्चयवाले जो भी होंगे। उनका क्या होगा ? उनका पराभव होगा। तात्पर्य यह है कि वे श्रेयोमार्गसे पराभूत—बहिर्भूत अर्थात् विनष्ट हो जायेंगे।' | | स्वगृहं गच्छतोः सुरासुरराजयोर्योऽसुरराजः स ह शान्तहृदय एव संन्विरोचनोऽसुराञ्जगाम । गत्वा च तेभ्योऽसुरेभ्यः शरीरात्मबुद्धिर्योपनिषत्तामेतामुपनिषदं प्रोवाचोक्तवान् । देहमात्रमेवात्मा पित्रोक्त इति । | अपने घरको जानेवाले देवराज और असुरराजोंमें जो असुरराज था वह विरोचन शान्तचित्तसे ही असुरोंके पास पहुँचा। तथा वहाँ पहुँचकर उन असुरोंके प्रति जो देहात्मबुद्धिरूप उपनिषद् थी वही उपनिषद् सुना दी। अर्थात् यह कह दिया कि प्रजापतिने देहको ही आत्मा बतलाया है। इसलिये |

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खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८८५


| तस्मादात्मैव देह इह लोके महय्यः पूजनीयस्तथा परिचर्यः परिचरणीयस्तथात्मानमेवेह लोके देहं महयन् परिचरंश्चोभय- लोकाववाप्नोतीमं चामुं च। इह- लोकपरलोकयोरेव सर्वे लोकाः कामाश्चान्तर्भवन्तीति राज्ञोऽभि- प्रायः ॥ ४ ॥ | इस लोकमें देहरूप आत्मा ही महय्य—पूजनीय तथा परिचर्य—सेवनीय है और इस लोकमें देहरूप आत्माकी ही पूजा-सेवा करनेसे इस और उस दोनों लोकोंको प्राप्त कर लेता है। इस लोक और परलोकमें ही सम्पूर्ण लोक और भोग अन्तर्भूत होते हैं—ऐसा राजा विरोचनका अभिप्राय है ॥४॥ |


तस्मादप्यद्येहाददानमश्रद्दधानमयजमानमाहुरासुरो बतेत्यसुराणां ह्येषोपनिषत्प्रेतस्य शरीरं भिक्षया वसने- नालङ्कारेणेति संस्कुर्वन्त्येतेन ह्यमुं लोकं जेष्यन्तो मन्यन्ते ॥ ५ ॥

इसीसे इस लोकमें जो दान न देनेवाला, श्रद्धा न करनेवाला और यजन न करनेवाला पुरुष होता है उसे शिष्टजन 'अरे ! यह तो आसुर (आसुरीस्वभाववाला) ही है' ऐसा कहते हैं। यह उपनिषद् असुरोंकी ही है। वे ही मृतक पुरुषके शरीरको [ गन्ध-पुष्प-अन्नादि ] भिक्षा, वस्त्र और अलंकारसे सुसज्जित करते हैं और इसके द्वारा हम परलोक प्राप्त करेंगे—ऐसा मानते हैं ॥ ५ ॥

| तस्मात्तत्सम्प्रदायोऽद्याप्यनुव- <br><br> र्तत इतीह लोकेऽददानं दानम- <br><br> कुर्वाणमविभागशीलमश्रद्दधानं <br><br> सत्कार्येषु श्रद्धारहितं यथाश- | इसीसे उन (असुरों) का सम्प्रदाय इस समय भी विद्यमान है। अतः इस लोकमें अददान—दान न करनेवाले अर्थात् जिसका स्वभाव अपने धनका विभाग करनेका नहीं है, अश्रद्दधान-- |