भारतकोश
संग्रह पर लौटें

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

५३० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

५३०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
तत्तत्र तेष्वनुशयिनां य इह लोके रमणीयं शोभनं चरणं शीलं येषां ते रमणीयचरणा रमणीयचरणेनोपलक्षितः शोभनोऽनुशयः पुण्यं कर्म येषां ते रमणीयचरणा उच्यन्ते। क्रौर्या-नृतमायावर्जितानां हि शक्य उपलक्षयितुं शुभानुशयसद्भावः। तेनानुशयेन पुण्येन कर्मणा चन्द्रमण्डले भुक्तशेषेणाभ्याशो ह क्षिप्रमेव, यदितिक्रियाविशे-षणम्, ते रमणीयां क्रौर्यादि-वर्जितां योनिमापद्येरन्प्राप्नु-युर्ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिय-योनिं वा वैश्ययोनिं वा स्व-कर्मानुरूपेण ।तत्-वहाँ उन अनुशयी जीवोंमें जिनका इस लोकमें रमणीय-शुभ चरण-शील होता है वे शुद्धाचारी जीव-जिनका रमणीयचरणसे उपलक्षित शुभ अनुशय यानी पुण्य-कर्म होता है-वे रमणीयचरण कहलाते हैं । जो लोग क्रूरता, असत्य और कपटसे रहित हैं उन्हींमें शुभानुशयकी सत्ता देखी जा सकती है । चन्द्रमण्डलके भोगसे बचे हुए उस पुण्य अनुशय यानी कर्मसे वे अभ्याश-शीघ्र ही रमणीय-क्रूरता आदिसे रहित योनिको प्राप्त होते हैं। यहाँ 'यत' शब्द क्रियाविशेषण है । अपने कर्मोंके अनुसार वे ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि अथवा वैश्ययोनिको प्राप्त करते हैं।
अथ पुनर्ये तद्विपरीताः कपू-यचरणोपलक्षितकर्माणोऽशुभानु-शया अभ्याशो ह यत्ते कपूयां यथाकर्म योनिमापद्येरन्कपूया-मेव धर्मसंबन्धवर्जितां जुगुप्सितां योनिमापद्येरञ्श्वयोनिं वाकिंतु उनसे विपरीत जो कपूय-चरणसे उपलक्षित कर्मवाले अर्थात् अशुभ अनुशयवाले होते हैं वे शीघ्र ही अपने कर्मानुसार कपूययोनिको प्राप्त होते हैं। कपूय-धर्मसम्बन्ध-से रहित अर्थात् निन्दनीय योनिको ही प्राप्त होते हैं। वे भी अपने

खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ ५३१

सूकरयोनिं वा चाण्डाल-कर्मोंके ही अनुसार कुत्तेकी योनि,
योनिं वा स्वकर्मानुरूपे-सूकरयोनि अथवा चाण्डालयोनि
णैव ॥ ७ ॥प्राप्त करते हैं ॥ ७ ॥

चतुर्थ प्रश्नका उत्तर

(अशास्त्रीय प्रवृत्तिवालोंकी गति)

ये तु रमणीयचरणा द्विजा-किंतु जो शुभाचरणशील
तयस्ते स्वकर्मस्थाश्चेदिष्टदिका-द्विजाति हैं वे यदि अपने कर्मोंमें
रिणस्ते धूमादिगत्या गच्छ-स्थित रहकर इष्टादि कर्म करनेवाले
न्त्यागच्छन्ति च पुनः पुनर्घ-होते हैं तो घटीयन्त्रके समान
टीयन्त्रवत् । विद्यां चेत्प्राप्नु-धूमादि मार्गसे पुनः-पुनः आते-जाते
युस्तदार्चिरादिना गच्छन्ति। यदारहते हैं और यदि उन्हें [उपासना-
तु न विद्यासेविनो नापीष्टा-त्मक] विद्याकी प्राप्ति हो जाती है
दिकर्म सेवन्ते तदा—तो अर्चि आदि मार्गसे जाते हैं।
और जिस समय वे न तो उपासना
करनेवाले होते हैं और न इष्टादि
कर्मोंका ही सेवन करते हैं, उस
समय—

अथैतयोः पथोर्न कतरेण च न तानीमानि क्षुद्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्वेत्येतत्तृतीयꣳस्थानं तेनासौ लोको न सम्पूर्यते तस्माज्जुगुप्सेत तदेष श्लोकः ॥ ८ ॥

इनमेंसे किसी मार्गद्वारा नहीं जाते। वे ये क्षुद्र और बारम्बार आने-जानेवाले प्राणी होते हैं। 'उत्पन्न होओ और मरो' यही उनका तृतीय स्थान होता है। इसी कारण यह परलोक नहीं भरता। अतः [इस संसारगतिसे] घृणा करनी चाहिये। इस विषयमें यह मन्त्र है-॥८॥

५१२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

५१२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

अथैतयोः पथोर्यथोक्तयोरर्चिर्धूमादिलक्षणयोर्न कतरेण अन्यतरेण च नापियन्ति । तानीमानि भूतानि क्षुद्राणि दंशमशककीटादीन्यसकृदावर्तीनि भवन्ति । अत उभयमार्गपरिभ्रष्टा ह्यसकृज्जायन्ते म्रियन्ते चेत्यर्थः । तेषां जननमरणसन्ततेरनुकरणमिदमुच्यते । जायस्व म्रियस्वेतीश्वरनिमित्तचेष्टोच्यते । जननमरणक्षणेनैव कालयापना भवति, न तु क्रियासु शोभनेषु भोगेषु वा कालोऽस्तीत्यर्थः ।वे इन पूर्वोक्त अर्चि आदि और धूमादि मागोंमेंसे किसी भी एकके द्वारा नहीं जाते । वे ये क्षुद्र प्राणी डाँस, मच्छर और कीड़े आदि बारम्बार आने-जानेवाले जीव होते हैं । अतः तात्पर्य यह है कि वे इन दोनों ही मागोंसे परिभ्रष्ट होकर बारम्बार जन्मते-मरते रहते हैं । यह उनके जन्म-मरणकी अविच्छिन्न परम्पराका अनुकरण कहा जाता है; 'जन्म लो और मरो' यह ईश्वरसम्बन्धी चेष्टा बतलायी जाती है*। अर्थात् उनका समय जन्म लेने और मरनेमें ही जाता है, कर्म करने अथवा सुन्दर भोग भोगनेके लिये उन्हें अवकाश ही नहीं मिलता ।
एतत्क्षुद्रजन्तुलक्षणं तृतीयं पूर्वोक्तौ पन्थानावपेक्ष्य स्थानं संसरताम्, येनैवं दक्षिणमार्गगा अपि पुनरागच्छन्ति, अनधिकृतानां ज्ञानकर्मणोरगमनमेव दक्षिणेन पथेति, तेनासौ लोको न सम्पूर्यते ।जन्म-मरण-परम्परामें पड़े हुए जीवोंका पहले दो मागोंकी अपेक्षा यह क्षुद्र जीवरूप तीसरा स्थान है । क्योंकि इस प्रकार दक्षिणमार्गगामी भी लौट आते हैं तथा ज्ञान और कर्मके अनधिकारियोंका तो दक्षिणमार्गसे वहाँ जाना भी नहीं होता, इसलिये यह परलोक नहीं भरता ।

  • ॐ तात्पर्य यह है कि उन जीवोंको दोनों मागोंसे पतित हुए देखकर मानो ईश्वर ही कहता है कि 'तुम जन्म लो और मरो।'

खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३१


संस्कृत-भाष्यभाष्यार्थ
पञ्चमस्तु प्रश्नः पञ्चाग्निविद्यया व्याख्यातः । प्रथमो दक्षिणोत्तरमार्गाभ्यामपाकृतः । दक्षिणोत्तरयोः पथोर्व्यावर्तनापि—मृतानामग्नौ प्रक्षेपः समानः, ततो व्यावर्तना, अन्येऽर्चिरादिना यन्ति, अन्ये धूमादिना, पुनरुत्तरदक्षिणायने षण्मासान्प्राप्नुवन्तः संयुज्य पुनर्व्यावर्तन्ते, अन्ये संवत्सरमन्ये मासेभ्यः पितृलोकम्—इति व्याख्याता । पुनरावृत्तिरपि क्षीणानुशयानां चन्द्रमण्डलादाकाशादिक्रमेणोक्ता । अमुष्य लोकस्यापूरणं स्वशब्देनैवोक्तम्, तेनासौ लोको न सम्पूर्यत इति ।[ उपर्युक्त प्रश्नोंमेंसे ] पाँचवें प्रश्नकी व्याख्या पञ्चाग्निविद्याद्वारा की गयी; प्रथम प्रश्नका अपाकरण दक्षिण एवं उत्तरमार्गके वर्णनसे किया गया । तथा—मरे हुए उपासक और कर्मठ इनको अग्निमें डालना एक समान होता है, वहाँसे आगे उनका वियोग होता है, उनमेंसे एक अर्चि आदि मार्गसे जाते हैं और दूसरे धूमादि मार्गसे; फिर उत्तरायण और दक्षिणायन—इन छः-छः मासोंको प्राप्त होकर वे एक बार मिलकर फिर बिछुड़ जाते हैं । उनमेंसे एक तो संवत्सरको प्राप्त होते हैं और दूसरे मासाभिमानी देवताओंसे पितृलोकको जाते हैं—इस प्रकार दक्षिण और उत्तर मार्गोंकी व्यावर्तना—व्यावृत्तिकी भी व्याख्या की गयी । जिनका अनुशय (कर्म) क्षीण हो गया है, उन जीवोंकी चन्द्रमण्डलसे आकाशादि क्रमसे पुनरावृत्ति भी बतला दी गयी । इस परलोककी अपूर्तिका तो 'तेनासौ लोको न सम्पूर्यते' ऐसे प्रत्यक्ष शब्दोंसे ही उल्लेख कर दिया गया ।
यस्मादेवं कष्टा संसारगतिस्तस्माज्जुगुप्सेत । यस्माच्चक्योंकि इस प्रकार संसारगति अत्यन्त कष्टमयी है, इसलिये उससे घृणा करनी चाहिये । क्योंकि

५३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

५३४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५
जन्ममरणजनितवेदनानुभवकृत-<br>क्षणाः क्षुद्रजन्तवो ध्वान्ते च<br>घोरे दुस्तरे प्रवेशिताः सागर<br>इवागाधेऽप्लवे निराशाश्चोत्तरणं<br>प्रति; तस्माच्चैवंविधां संसार-<br>गतिं जुगुप्सेत बीभत्सेत घृणी<br>भवेत्, मा भूदेवंविधे संसार-<br>महोदधौ घोरे पात इति ।<br>तदेतस्मिन्नर्थ एष श्लोकः पञ्चा-<br>ग्निविद्यास्तुतये ॥ ८ ॥जन्म-मरणसे होनेवाली वेदनाके<br>अनुभवमें ही जिनका समय जाता<br>है वे क्षुद्र जीव नौकाहीन अगाध<br>सागरके समान, जिसे पार करनेमें<br>वे निराश रहते हैं, अति दुस्तर घोर<br>अज्ञानान्धकारमें प्रविष्ट कर दिये<br>जाते हैं; इसलिये इस प्रकारकी<br>संसारगतिमें जुगुप्सा—बीभत्सा<br>अर्थात् घृणा करनी चाहिये कि इस<br>प्रकारके घोर संसार महासागरमें<br>हमारा पतन न हो । उसी अर्थमें<br>पञ्चाग्निविद्याकी स्तुतिके लिये यह<br>मन्त्र है ॥ ८ ॥
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पाँच पतित

स्तेनो हिरण्यस्य सुरां पिबंश्च गुरोस्तल्पमावसन्ब्र-<br>ह्महा चैते पतन्ति चत्वारः पञ्चमश्चाचरंस्तैरिति ॥९॥

सुवर्णका चोर, मद्य पीनेवाला, गुरुस्त्रीगामी, ब्रह्महत्यारा ये चारों पतित होते हैं और पाँचवाँ उनके साथ संसर्ग करनेवाला भी ॥ ९ ॥

स्तेनो हिरण्यस्य ब्राह्मणसु-<br>वर्णस्य हर्ता। सुरां पिबन्ब्राह्मणः<br>सन् । गुरोश्च तल्पं दारानाव-<br>सन् । ब्रह्महा ब्राह्मणस्य हन्ता<br>चेत्येते पतन्ति चत्वारः पञ्च-<br>मश्च तैः सहाचरन्निति ॥ ९ ॥सुवर्णका चोर अर्थात् ब्राह्मणका<br>सोना चुरानेवाला, ब्राह्मण होकर<br>मदिरा पीनेवाला, गुरुके तल्प यानी<br>पत्नीसे सहवास करनेवाला और<br>ब्रह्महा—ब्राह्मणकी हत्या करनेवाला<br>—ये चार पतित होते हैं और<br>पाँचवाँ उनके साथ आचरण<br>(व्यवहार) करनेवाला ॥ ९ ॥
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खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३५


पञ्चाग्निविद्याका महत्त्व

अथ ह य एतानेवं पञ्चाग्नीन्वेद न सह तैरप्याचरन्पाप्मना लिप्यते शुद्धः पूतः पुण्यलोको भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ १० ॥

किन्तु जो इस प्रकार इन पञ्चाग्नियोंको जानता है वह उनके साथ आचरण (संसर्ग) करता हुआ भी पापसे लिप्त नहीं होता । वह शुद्ध पवित्र और पुण्यलोकका भागी होता है, जो इस प्रकार जानता है, जो इस प्रकार जानता है ॥१०॥

| अथ ह पुनर्यो यथोक्तानपञ्चाग्नीन्वेद, स तैरप्याचरन्महापातकिभिः सह न पाप्मना लिप्यते, शुद्ध एव । तेन पञ्चाग्निदर्शनेन पावितो यस्मात्पूतः, पुण्यो लोकः प्राजापत्यादिर्यस्य सोऽयं पुण्यलोको भवति । य एवं वेद यथोक्तं समस्तं पञ्चभिः प्रश्नैः पृष्टमर्थजातं वेद । द्विरुक्तिःसमस्तप्रश्ननिर्णयप्रदर्शनार्था ॥ १० ॥ | किंतु जो उपर्युक्त पञ्चाग्नियोंको जानता है वह उन महापापियोंके साथ आचरण (व्यवहार) करता हुआ भी पापसे लिप्त नहीं होता, शुद्ध ही रहता है; क्योंकि उस पञ्चाग्निविद्यासे वह पवित्र हो जाता है इसलिये पुण्यलोक—जिसे ब्रह्मलोक आदि पवित्र लोककी प्राप्ति होती है ऐसा पुण्यलोक हो जाता है; जो कि इस प्रकार जानता है अर्थात् पाँच प्रश्नोंद्वारा पूछे हुए उपर्युक्त समस्त विषयको जानता है । द्विरुक्ति समस्त प्रश्नोंका निर्णय प्रदर्शित करनेके लिये है ॥१०॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
दशमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १० ॥

—:०:—

एकादश खण्ड


| दक्षिणेन पथा गच्छतामन्नभाव उक्तः--'तद्देवानामन्नम्' 'तं देवा भक्षयन्ति' इति; क्षुद्रजन्तुलक्षणा च कष्टा संसारगतिरुक्ता । तदुभयदोषपरिजिहीर्षया वैश्वानरात्तृभावप्रतिपत्त्यर्थमुत्तरो ग्रन्थ आरभ्यते, 'अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियम्' इत्यादिलिङ्गात् । आख्यायिका तु सुखावबोधार्था विद्यासंप्रदानन्यायप्रदर्शनार्था च । | 'वह देवताओंका अन्न है' देवगण उसका भक्षण करते हैं'—ऐसा कहकर दक्षिणमार्गसे जानेवालोंके अन्नभावका प्रतिपादन किया गया तथा क्षुद्रजन्तुरूप संसारकी कष्टमयी गति भी बतलायी गयी । उन दोनों दोषोंको त्यागनेकी इच्छासे वैश्वानरसंज्ञक भोक्तृत्वकी प्राप्तिके लिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है—जैसा कि 'तू अन्न भक्षण करता है, प्रियको देखता है' इत्यादि लिङ्गोंसे जाना जाता है । यहाँ जो आख्यायिका है वह सरलतासे समझानेके लिये और विद्याप्रदानकी उचित विधि प्रदर्शित करनेके लिये है । |

औपमन्यव आदिका आत्ममीमांसाविषयक प्रस्ताव

प्राचीनशाल औपमन्यवः सत्ययज्ञः पौलुषिरिन्द्रद्युम्नो भाल्लवेयो जनः शार्कराक्ष्यो बुडिल आश्वतराश्विस्ते हैते महाशाला महाश्रोत्रियाः समेत्य मीमांसाञ्चक्रुः को न आत्मा किं ब्रह्मेति ॥ १ ॥

उपमन्युका पुत्र प्राचीनशाल, पुलुषका पुत्र सत्ययज्ञ, भल्लविके पुत्रका पुत्र इन्द्रद्युम्न, शर्कराक्षका पुत्र जन और अश्वतराश्वका पुत्र

खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५२७


बुडिल—ये महागृहस्थ और परम श्रोत्रिय एकत्रित होकर परस्पर विचार करने लगे कि हमारा आत्मा कौन है और ब्रह्म क्या है ? ॥ १ ॥

प्राचीनशाल इति नामत उपमन्योरपत्यमौपमन्यवः । सत्ययज्ञो नामतः पुलुषस्यापत्यं पौलुपिः । तथेन्द्रद्युम्नो नामतो भल्लवेरपत्यं भाल्लविस्तस्यापत्यं भाल्लवेयः । जन इति नामतः शर्कराक्षस्यापत्यं शार्कराक्ष्यः । बुडिलो नामतोऽश्वतराश्वस्यापत्यमाश्वतराश्विः । पञ्चापि ते हैते महाशाला महागृहस्था विस्तीर्णाभिः शालाभिर्युक्ताः संपन्ना इत्यर्थः । महाश्रोत्रियाः श्रुताध्ययनवृत्तसंपन्ना इत्यर्थः । त एवंभूताः सन्तः समेत्य संभूय क्वचिन्मीमांसां विचारणां चक्रुः कृतवन्त इत्यर्थः ।<br><br>कथम् ? को नोऽस्माकमात्मा ? किं ब्रह्म ? इत्यात्मब्रह्मशब्दयोरितरेतरविशेषणविशेष्यत्वम् । ब्रह्मेत्यप्यात्मपरिच्छिन्नमात्मानं निवर्तयत्यात्मेति चात्मव्यतिरिक्तस्यादित्यादिब्रह्मण उपास्यत्वं निवर्तयति । अभेदेनात्मैव ब्रह्मजो नामसे प्राचीनशाल था वह उपमन्युका पुत्र औपमन्यव, पुलुषका पुत्र पौलुषि जो नामसे सत्ययज्ञ था, भल्लविके पुत्रको भाल्लवि कहते हैं, उसका पुत्र भाल्लवेय जो नामसे इन्द्रद्युम्न था, जन ऐसे नामवाला शर्कराक्षका पुत्र शार्कराक्ष्य तथा बुडिल नामक अश्वतराश्वकां पुत्र आश्वतराश्वि—ये पाँचों ही महाशाल—बड़े कुटुम्बी अर्थात् विस्तृत शालाओंसे युक्त तथा महाश्रोत्रिय अर्थात् श्रुत यानी शास्त्राध्ययन और सदाचारसे सम्पन्न थे । इस प्रकारके वे सब किसी समय आपसमें मिलकर मीमांसा अर्थात् विचार करने लगे ।<br><br>किस प्रकार विचार करने लगे ?—'हमारा आत्मा कौन है ? ब्रह्म क्या है ?' यहाँ 'आत्मा' और 'ब्रह्म' शब्दोंका परस्पर विशेषण-विशेष्यभाव है । 'ब्रह्म' इस शब्दसे श्रुति देह-परिच्छिन्न आत्माके ग्रहणका निवारण करती है तथा 'आत्मा' इस शब्दसे आत्मासे भिन्न आदित्यादि ब्रह्मके उपास्यत्वकी निवृत्ति करती है । अतः दोनोंका अभेद होनेके

| ५३८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |

५३८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| ब्रह्मैवात्मेत्येवं सर्वात्मा वैश्वानरो ब्रह्म स आत्मेत्येतत्सिद्धं भवति। "मूर्धा ते व्यपतिष्यत्" (छा० उ० ५। १२। २) "अन्धोऽभविष्यः" (५। १३। २) इत्यादिलिङ्गात् ॥ १ ॥ | कारण आत्मा ही ब्रह्म है और ब्रह्म ही आत्मा है; अतः सर्वात्मा वैश्वानर ब्रह्म है और वही आत्मा है-यह सिद्ध होता है। यह बात [खण्ड १२ से १७ तक आये हुए] "तेरा मस्तक गिर जाता" "तू अन्धा हो जाता" इत्यादि लिङ्गोंसे जानी जाती है*॥ १॥ |


औपमन्यवादिका उद्दालकके पास आना

ते ह संपादयाञ्चक्रुरुद्दालको वै भगवन्तोऽयमारुणिः संप्रतीममात्मानं वैश्वानरमध्येति तꣳहन्ताभ्यागच्छामेति तꣳहाभ्याजग्मुः ॥ २ ॥


* आगे यह दिखलाया गया है कि आरुणिके सहित औपमन्यवादि पाँचों मुनि राजा अश्वपतिके पास गये और उससे वैश्वानर आत्माका उपदेश करनेके लिये प्रार्थना की। तब अश्वपतिने उनमेंसे प्रत्येकसे अलग-अलग यह प्रश्न किया कि तुम किसे वैश्वानर (विराट् रूप) समझकर उपासना करते हो ? इसपर औपमन्यवने कहा कि मैं द्युलोकको वैश्वानर समझता हूँ। तब अश्वपति बोला—'यह वैश्वानर आत्माका मस्तक है। इसकी तुम समस्त वैश्वानर-बुद्धिसे उपासना करते हो इसलिये यद्यपि तुम्हारे यज्ञ-यागादि-सम्बन्धी सामग्रीकी बहुलता है तथापि यदि मेरे पास न आते तो इस अन्यथाग्रहणके दोषसे तुम्हारा मस्तक गिर जाता।' इसके पश्चात् उसने सत्ययज्ञसे पूछा तो वह बोला—'मैं आदित्यको वैश्वानर समझकर उपासना करता हूँ।' इसपर अश्वपतिने कहा—'यह उसका केवल नेत्र है; इसकी समस्त बुद्धिसे उपासना करनेके कारण यद्यपि तुम्हारे पास अनेक प्रकारकी सम्पत्ति दिखायी देती है तथापि यदि तुम मेरे पास न आते तो अन्धे हो जाते।' इसी प्रकार अन्य मुनियोंसे भी पूछा गया और यह देखकर कि उनमेंसे प्रत्येक ही वैश्वानर आत्माके किसी-न-किसी अङ्गकी ही उपासना करता है उसने उनकी व्यस्तोपासनाके परिणाममें उनके उन्हीं-उन्हीं अङ्गोंके भंग होनेका भय दिखलाते हुए अन्तमें अठारहवें खण्डमें वैश्वानरके स्वरूपका उपदेश किया है। यहाँ दो श्रुतियोंके प्रतीक देकर यह दिखलाया है कि भेदोपासनामें श्रुति भय प्रदर्शित करती है; इसलिये उसे आत्मा और ब्रह्मका अभेद ही अभिमत है।

खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३९


उन पूजनीयोंने स्थिर किया कि यह अरुणका पुत्र उद्दालक इस समय इस वैश्वानर आत्माको जानता है; अतः हम उसके पास चलें। ऐसा निश्चय कर वे उसके पास आये ॥ २ ॥

| ते ह मीमांसन्तोऽपि निश्चयमलभमानाः संपादयाञ्चक्रुः संपादितवन्त आत्मन उपदेष्टारम् । उद्दालको वै प्रसिद्धो नाम्तो भगवन्तः पूजावन्तोऽयमारुणिररुणस्यापत्यं संप्रति सम्यगिममात्मानं वैश्वानरमस्मदभिप्रेतमध्येति स्मरति । तं हन्तेदानीमभ्यागच्छामेत्येवं निश्चित्य तं हाभ्याजग्मुर्गतवन्तस्तमारुणिम् ॥ २ ॥ | विचार करनेपर भी कोई निश्चय न होनेपर उन पूजावानोंने सम्पादन किया—अपना उपदेशक स्थिर किया। [ वे बोले— ] ‘इस समय उद्दालक नामसे प्रसिद्ध यह अरुणका पुत्र आरुणि इस हमारे अभिप्रेत वैश्वानर आत्माको ‘अध्येति’—स्मरण रखता यानी जानता है। अच्छा तो, अब उसके पास चलें।’ इस प्रकार निश्चयकर वे उस आरुणिके पास आये ॥ २ ॥ |

— : ० : —

उद्दालकका औपमन्यवाधिके सहित अश्वपतिके पास आना

स ह संपादयाञ्चकार प्रक्ष्यन्ति मामिमे महाशाला महाश्रोत्रियास्तेभ्यो न सर्वमिव प्रतिपत्स्ये हन्ताहमन्यमभ्यनुशासानीति ॥ ३ ॥

उसने निश्चय किया ये परम श्रोत्रिय महागृहस्थ मुझसे प्रश्न करेंगे, किंतु मैं इन्हें पूरी तरहसे नहीं बतला सकूँगा अतः मैं उन्हें दूसरा उपदेष्टा बतला दूँ ॥ ३ ॥

| स ह तान्दृष्ट्वैव तेषामागमनप्रयोजनं बुद्ध्वा संपादयाञ्चकार; कथम् ? प्रक्ष्यन्ति मां वैश्वानरमिमे महाशाला महा- | उन्हें देखते ही उसने उनके आनेका प्रयोजन समझकर [चित्तमें] स्थिर किया। किस प्रकार स्थिर किया ? ये महागृहस्थ और परम श्रोत्रिय मुझसे वैश्वानरके विषयमें पूछेंगे। |

५४० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

५४०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| श्रोत्रियास्तेभ्योऽहं न सर्वमिव <br> पृष्टं प्रतिपत्स्ये वक्तुं नोत्सहे। <br> अतो हन्ताहमिदानीमन्यमेषाम- <br> भ्यनुशासानि वक्ष्याम्युपदेष्टार- <br> मिति ॥ ३ ॥ | किंतु मैं इन्हें इनकी पूछी हुई बात <br> पूरी तरह नहीं बतला सकूँगा। <br> अतः मैं इस समय इन्हें एक दूसरे <br> उपदेष्टाके लिये अनुशासन करता <br> हूँ अर्थात् इन्हें दूसरा उपदेशक <br> बतलाये देता हूँ॥ ३॥ |

| एवं संपाद्य— | ऐसा निश्चय कर— |

तान्होवाचाश्वपतिर्वै भगवन्तोऽयं कैकेयः संप्रती- <br> ममात्मानं वैश्वानरमध्येति तꣳहन्ताभ्यागच्छामेति तꣳ- <br> हाभ्याजग्मुः ॥ ४ ॥

उसने उनसे कहा—'हे पूजनीयगण ! इस समय केकयकुमार अश्वपति इस वैश्वानरसंज्ञक आत्माको अच्छी तरह जानता है। आइये, हम उसीके पास चलें।' ऐसा कहकर वे उसके पास चले गये ॥ ४ ॥

| तान्होवाच—अश्वपतिर्वै नामतो भगवन्तोऽयं केकयस्यापत्यं कैकेयः संप्रति सम्यगिममात्मानं वैश्वानरमध्येतीत्यादि समानम् ॥ ४ ॥ | उसने उनसे कहा—'हे भगवन् ! इस समय केकयका पुत्र अश्वपति नामवाला कैकेय इस वैश्वानर आत्माको अच्छी तरह समझता है' इत्यादि अर्थ पूर्ववत् है॥ ४॥ |

अश्वपतिद्वारा मुनियोंका स्वागत

तेभ्यो ह प्राप्तेभ्यः पृथगर्हाणि कारयाञ्चकार स <br> ह प्रातः संजिहान उवाच न मे स्तेनो जनपदे न <br> कदर्यो न मद्यपो नानाहिताग्निर्नाविद्वान्न स्वैरी स्वैरिणी <br> कुतो यक्ष्यमाणो वै भगवन्तोऽहमस्मि यावदेकैकस्मा

खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यम् ५४१

ऋत्विजे धनं दास्यामि तावद्भगवद्भ्यो दास्यामि वसन्त्व भगवन्त इति ॥ ५ ॥

अपने पास आये हुए उन ऋषियोंका राजाने अलग-अलग सत्कार कराया। [दूसरे दिन] सबेरे उठते ही उसने कहा—'मेरे राज्यमें कोई चोर नहीं है तथा न अदात्ता, न मद्यप, न अनाहिताग्नि, न अविद्वान् और न परस्त्रीगामी ही है; फिर कुलटा स्त्री तो आयी ही कहाँसे ? हे पूज्यगण ! मैं भी यज्ञ करनेवाला हूँ। मैं एक-एक ऋत्विक्को जितना धन दूँगा उतना ही आपको भी दूँगा; अतः आपलोग यहाँ ठहरिये' ॥ ५ ॥

| तेभ्यो ह राजा प्राप्तेभ्यः पृथक्पृथगर्हाण्यर्हणानि पुरोहितैर्भृत्यैश्च कारयाञ्चकार कारितवान् । स हान्येद्यू राजा प्रातः संजिहान उवाच विनयेनोपगम्यैतद्धनं मत्त उपादध्वमिति । तैः प्रत्याख्यातो मयि दोषं पश्यन्ति नूनं यतो न प्रतिगृह्णन्ति मत्तो धनमिति मन्वान आत्मनः सद्वृत्ततां प्रतिपिपादयिषन्नाह—न मे मम जनपदे स्तेनः परस्वहर्ता विद्यते । न कदर्योऽदाता सति विभवे । न मद्यपो द्विजोत्तमः सन् । नानाहिताग्निः शतगुः। नाविद्वानधि- | अपने पास आये हुए उन ऋषियोंका राजाने पुरोहित और सेवकोंसे अलग-अलग सत्कार कराया। दूसरे दिन राजाने प्रातःकाल उठते ही उनके पास जाकर विनयपूर्वक कहा—आपलोग मुझसे यह धन ग्रहण कीजिये। तब उनके निषेध करनेपर यह सोचकर कि निश्चय ही ये मुझमें दोष देखते हैं, क्योंकि मुझसे धन नहीं लेते, अपने सदाचारका प्रतिपादन करनेकी इच्छासे उसने कहा—'मेरे राज्यमें कोई चोर—दूसरेका धन हरण करनेवाला नहीं है, न कोई कदर्य—सम्पत्ति रहते हुए दान न करनेवाला है, न कोई द्विजश्रेष्ठ मद्यपान करनेवाला है, न सौ गौओंवाला होकर अनाहिताग्नि है; न अपने अधिकारके अनुरूप कोई |

५४२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

५४२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| कारानुरूपम् । न स्वैरी परदारेषु गन्ता । अत एव स्वैरिणी कुतो दुष्टचारिणी न संभवतीत्यर्थः । <br><br> तैश्च न वयं धनेनार्थिन इत्युक्त आहाल्पं मत्वैते धनं न गृह्णन्तीति । यक्ष्यमाणो वै कतिभिरहोभिरहं हे भगवन्तोऽस्मि, तदर्थं क्लृप्तं धनं मया यावदेकैकस्मै यथोक्तमृत्विजे धनं दास्यामि तावत्प्रत्येकं भगवद्भ्योऽपि दास्यामि । वसन्तु भगवन्तः पश्यन्तु च मम यागम् ॥ ५ ॥ | अविद्वान् है और न कोई स्वैरी—परस्त्रियोंके प्रति गमन करनेवाला है; अतः स्वैरिणी भी कैसे हो सकती है ? अर्थात् कोई दुराचारिणी स्त्री होनी भी सम्भव नहीं है।' <br><br> फिर उनके यह कहनेपर कि 'हम धनके अर्थी नहीं हैं' यह समझकर कि ये लोग थोड़ा मानकर धन नहीं लेते, उसने कहा—'हे पूज्यगण ! कुछ दिनोंमें मैं यज्ञानुष्ठान करनेवाला हूँ, उसके लिये मैंने धनका संकल्प कर दिया है। उस समय शास्त्राज्ञानुसार मैं जितना-जितना धन एक-एक ऋत्विक्‌को दूँगा। उतना ही आपमेंसे प्रत्येकको भी दूँगा। अतः आपलोग यहीं ठहरिये और मेरा यज्ञ देखिये' ॥५॥ |


अश्वपतिके प्रति मुनियोंकी प्रार्थना

इत्युक्ताः—इस प्रकार कहे जानेपर—

ते होचुर्येन हैवार्थेन पुरुषश्चरेत्तᳪहैव वदेदात्मानमेवेमं वैश्वानरᳪसंप्रत्यध्येषि तमेव नो ब्रूहीति ॥ ६ ॥

वे बोले—'जिस प्रयोजनसे कोई पुरुष कहीं जाता है उसे चाहिये कि अपने उसी प्रयोजनको कहे। इस समय आप वैश्वानर आत्माको जानते हैं, उसीका आप हमारे प्रति वर्णन कीजिये' ॥ ६ ॥

खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५४३


| ते होचुः--येन हैवार्थेन प्रयोजनेन यं प्रति चरेद्गच्छेत्पुरुषस्तं हैवार्थं वदेत्, इदमेव प्रयोजनमागमनस्येत्ययं न्यायः सताम् । वयं च वैश्वानरज्ञानार्थिनः । आत्मानमेवेमं वैश्वानरं संप्रत्यध्येषि सम्यग्जानासि । अतस्तमेव नोऽस्मभ्यं ब्रूहि ॥६॥ | वे बोले-जिस अर्थ यानी प्रयोजनसे कोई पुरुष किसीके पास जाय उसे अपना वह प्रयोजन बतला देना चाहिये कि 'मेरे आनेका केवल यही प्रयोजन है।' सत्पुरुषोंका ऐसा ही नियम है । हमलोग भी वैश्वानरको जाननेकी इच्छावाले हैं । इस समय आप इस वैश्वानर आत्माको अच्छी तरह जानते हैं; अतः हमारे प्रति उसीका वर्णन कीजिये ॥ ६ ॥ |

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राजाके प्रति मुनियोंकी उपसत्ति

| इत्युक्तः-- | इस प्रकार कहे जानेपर— |

तान्होवाच प्रातर्वः प्रतिवक्तास्मीति ते ह समित्पाणयः पूर्वाह्णे प्रतिचक्रमिरे तान्हानुपनीयैवैतदुवाच ॥७॥

वह उनसे बोला—'अच्छा, मैं प्रातःकाल आपलोगोंको इसका उत्तर दूँगा।' तब दूसरे दिन वे पूर्वाह्णमें हाथमें समिधाएँ लेकर राजाके पास गये । उनका उपनयन न करके ही राजाने उस विद्याका उपदेश किया ॥ ७ ॥

| तान्होवाच--प्रातर्वो युष्मभ्यं प्रतिवक्तास्मि प्रतिवाक्यं दातास्मीत्युक्तास्ते ह राज्ञोऽभिप्रायज्ञाः समित्पाणयः समिद्भारहस्ता अपरेद्युः पूर्वाह्णे राजानं प्रतिचक्रमिरे गतवन्तः। | वह उनसे बोला--'मैं आप लोगोंको इसका उत्तर प्रातःकाल दूँगा।' इस प्रकार कहे जानेपर राजाके अभिप्रायको जाननेवाले वे मुनिगण दूसरे दिन पूर्वाह्नमें समित्पाणि--हाथोंमें समिधाएँ लिये राजाके पास आये । |

५४४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

५४४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| यतः एवं महाशाला महाश्रोत्रिया ब्राह्मणाः सन्तो महाशालत्वाद्यभिमानं हित्वा समिद्धारहस्ता जातितो हीनं राजानं विद्यार्थिनो विनयेनोपजग्मुः, तथान्यैर्विद्योपादित्सुभिर्भवितव्यम् । तेभ्यश्चादाद्विद्यामनुपनीयैवोपनयनमकृत्वैव । तान्यथा योग्येभ्यो विद्यामदात्तथान्येनापि विद्या दातव्येत्याख्यायिकार्थः । एतद्वैश्वानरविज्ञानमुवाचेति वक्ष्यमाणेन संबन्धः ॥ ७ ॥ | क्योंकि इस प्रकार महागृहस्थ और परमश्रोत्रिय ब्राह्मण होनेपर भी वे महागृहस्थत्व आदिके अभिमानको छोड़कर हाथोंमें समिधाएँ ले विद्यार्थी बन अपनेसे हीन जातिवाले राजाके पास विनयपूर्वक गये थे इसलिये विद्योपार्जनकी इच्छावाले अन्य पुरुषोंको भी ऐसा ही होना चाहिये । तब राजाने उनका उपनयन न करके ही उन्हें विद्या दे दी । अतः इस आख्यायिकाका यही तात्पर्य है कि जिस प्रकार उन योग्य विद्यार्थियोंको राजाने विद्या दी थी उसी प्रकार दूसरोंको भी विद्यादान करना चाहिये । [ मूलके ‘एतत्’ शब्दका ] ‘एतद् वैश्वानरविज्ञानम् उवाच’ इस प्रकार आगे कहे जानेवाले वैश्वानरविज्ञानसे सम्बन्ध है ॥ ७ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये एकादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ११ ॥

द्वादश खण्ड

अश्वपति और औपमन्यवका संवाद

स कथमुवाच ? इत्याह—उसने किस प्रकार उपदेश दिया ? सो बतलाते हैं—

औपमन्यव कं त्वमात्मानमुपास्स इति। दिवमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै सुतेजा आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्तव सुतं प्रसुतमासुतं कुले दृश्यते ॥ १ ॥

[ राजा— ] 'हे उपमन्युकुमार ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' 'हे पूज्य राजन् ! मैं द्युलोककी ही उपासना करता हूँ' ऐसा उसने उत्तर दिया । [ राजा— ] 'तुम जिस आत्माकी उपासना करते हो यह निश्चय ही, 'सुतेजा' नामसे प्रसिद्ध वैश्वानर आत्मा है, इसीसे तुम्हारे कुलमें सुत, प्रसुत और आसुत दिखायी देते हैं' ॥ १ ॥

| औपमन्यव हे कमात्मानं वै वैश्वानरं त्वमुपास्स इति पप्रच्छ । | 'हे औपमन्यव ! तुम किस वैश्वानर आत्माकी उपासना करते हो ?' ऐसा राजाने पूछा । | | नन्वयमन्याय आचार्यः सन्-ञ्शिष्यं पृच्छतीति । | शङ्का—किंतु आचार्य होकर भी शिष्यसे पूछता है—यह तो अनुचित है । | | नैष दोषः; 'यद्वेत्थ तेन मोपसीद ततस्त ऊर्ध्वं वक्ष्यामि' | समाधान—यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि 'जो कुछ तू जानता है उसे बतलाकर तू मेरे प्रति उपसन्न हो; तब उससे आगे मैं |

५४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

५४६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| इति न्यायदर्शनात् । अन्यत्राप्याचार्यस्याप्रतिभानवति शिष्ये प्रतिभात्पादनार्थः प्रश्नो दृष्टोऽजातशत्रोः, 'क्वँैष तदाभूत्कुत एतदागात्' इति । | तुझे बतलाऊँगा' ऐसा न्याय देखा जाता है*। इसके सिवा अन्यत्र भी आचार्य अजातशत्रुका अपने प्रतिभा-शून्य शिष्यमें प्रतिभा उत्पन्न करनेके लिये 'तो फिर यह कहाँ उत्पन्न हुआ, और कहाँसे आया ?' ऐसा प्रश्न करना देखा जाता है । | | दिवमेव द्युलोकमेव वैश्वानरमुपासे भगवो राजन्निति होवाच । एष वै सुतेजाः शोभनं तेजो यस्य सोऽयं सुतेजा इति प्रसिद्धो वैश्वानर आत्मा, आत्मनोऽवयवभूतत्वात् । यंत्वमात्मानमात्मैकदेशमुपास्से तस्मात्सुतेजसो वैश्वानरस्योपासनात्तव सुतमभिषुतं सोमरूपं कर्मणि प्रस्रुतं प्रकर्षेण च सुतमासुतं चाहर्गणादिषु तव | 'हे पूज्य राजन् ! मैं द्युलोककी ही अर्थात् द्युलोकरूप वैश्वानरकी ही उपासना करता हूँ' ऐसा उसने उत्तर दिया । [तब राजाने कहा-] 'यह निश्चय ही 'सुतेजा'—जिनका तेज शोभन है ऐसा यह 'सुतेजा' नामसे प्रसिद्ध वैश्वानर आत्मा है । क्योंकि आत्माका अवयवभूत है; जिस आत्मा अर्थात् आत्माके एक देशकी तुम उपासना करते हो उसी सुतेजा वैश्वानरकी उपासना करनेसे यहाँ--तुम्हारे कुलमें अहर्गण ( एकाहादिरूप ज्योतिष्टोम ) आदिमें 'सुत'—अभिषुत (निकाला हुआ) सोमरूप लताद्रव्य, [अहीन] कर्ममें प्रस्रुत—विशेषरूपसे निकाला हुआ द्रव्य तथा [सत्रमें] 'आसुत' |

* यह न्याय छा० ७ । १ । ७ में सनत्कुमारकी उक्तिसे जाना जाता है ।

खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५४७


| कुले दृश्यतेऽतीव कर्मिणस्त्व-<br><br>त्कुलीना इत्यर्थः ॥ १ ॥ | (सर्वतोभावेन निकाला हुआ) सोमरस अधिक देखा जाता है। तात्पर्य यह है कि तुम्हारे कुटुम्बी बड़े ही कर्मनिष्ठ हैं' ॥ १ ॥ |

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अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्त्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते मूर्धा त्वेष आत्मन इति होवाच मूर्धा ते व्यपतिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥

'तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन करते हो। जो इस वैश्वानर आत्माकी इस प्रकार उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है। यह वैश्वानर आत्माका मस्तक है।' ऐसा राजाने कहा, और यह भी कहा कि—'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा मस्तक गिर जाता' ॥२॥

| अत्स्यन्नं दीप्ताग्निः सन्पश्यसि च पुत्रपौत्रादि प्रियमिष्टम् । अन्योऽप्यत्त्यन्नं पश्यति च प्रियं भवत्यस्य सुतं प्रसूतमासुतमित्यादि कर्मित्वं ब्रह्मवर्चसं कुले यः कश्चिदेतं यथोक्तमेवं वैश्वानरमुपास्ते । मूर्धा त्वात्मनो वैश्वानरस्यैष न समस्तो वैश्वानरः। | 'तुम दीप्ताग्नि होकर अन्न भक्षण करते हो। तथा पुत्र-पौत्रादिरूप प्रिय-इष्टका दर्शन करते हो। और भी जो कोई इस उपयुक्त वैश्वानरकी इस प्रकार उपासना करता है वह भी अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें सुत, प्रसूत एवं आसुत इत्यादि कर्मित्वरूप ब्रह्मतेज होता है। किंतु यह वैश्वानर आत्माका मस्तक ही है, सम्पूर्ण वैश्वानर नहीं है; अतः इस- |

छा० उ० १८—

५४८ | छाान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५

५४८छाान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| अतः समस्तबुद्ध्या वैश्वानरस्यो-<br>पासनान्मूर्धा शिरस्ते विपरीत-<br>ग्राहिणो व्यपतिष्यद्विपतितम-<br>भविष्यत्, यद्यदि मां नागमि-<br>ष्यो नागतोऽभविष्यः । साध्व-<br>कार्षीर्यन्मामागतोऽसीत्यभि-<br>प्रायः ॥ २ ॥ | की समस्त बुद्धिसे उपासना करनेके<br>कारण विपरीत ग्रहण करनेवाले<br>तुम्हारा मस्तक गिर जाता, यदि<br>तुम मेरे पास न आते अर्थात् मेरे<br>पास आगमन न करते । तात्पर्य<br>यह है कि तुम मेरे पास चले आये<br>यह अच्छा ही किया' ॥ २ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १२ ॥

त्रयोदश खण्ड

अश्वपति और सत्ययज्ञका संवाद

अथ होवाच सत्ययज्ञं पौलुपि प्राचीनयोग्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यादित्यमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै विश्वरूप आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात्तव बहु विश्वरूपं कुले दृश्यते ॥ १ ॥

फिर उसने पुलुषके पुत्र सत्ययज्ञसे कहा—'हे प्राचीनयोग्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' वह बोला—'हे पूज्य राजन् ! मैं आदित्यकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजाने कहा— ] 'यह निश्चय ही विश्वरूप वैश्वानर आत्मा है, जिस आत्माकी तुम उपासना करते हो; इसीसे तुम्हारे कुलमें बहुत-सा विश्वरूप साधन दिखायी देता है' ॥ १ ॥

| अथ होवाच सत्ययज्ञं पौलुपिं हे प्राचीनयोग्य कं त्वमात्मानमुपास्से ? इत्यादित्यमेव भगवो राजन्निति होवाच । शुक्लनीलादिरूपत्वाद्विश्वरूपत्वमादित्यस्य, सर्वरूपत्वाद्वा, सर्वाणि रूपाणि हि त्वाष्ट्राणि यतोऽतो वा विश्वरूप आदित्यः; | फिर उसने पुलुषके पुत्र सत्ययज्ञसे कहा—'हे प्राचीनयोग्य ! तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' तब उसने 'हे पूज्य राजन् ! मैं आदित्यकी ही उपासना करता हूँ' ऐसा उत्तर दिया । शुक्लनीलादिरूप होनेके कारण आदित्यकी विश्वरूपता है, अथवा सर्वरूप होनेके कारण; या सारे रूप त्वष्टाके ही हैं, इस लिये आदित्य विश्वरूप है। उसकी |