छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| २६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
| स यः कश्चिदेतदेवं यथोदितमृङ् मधुकरतापरससंक्षरणमृग्वेदविहितकर्मपुष्पात्तस्य चादित्यसंश्रयणं रोहितरूपत्वं चामृतस्य प्राचीदिग्गतरश्मिनाडीसंस्थतां वसुदेवभोग्यतां तद्विदश्च वसुभिः सहैकतां गत्वाग्निना मुखेनोपजीवनं दर्शनमात्रेण तृप्तिं स्वभोगावसर उद्यमनं तत्कालापाये च संवेशनं वेद सोऽपि वसुवत्सर्वं तथैवानुभवति ॥ ३ ॥ | जो कोई पुरुष इस यथोक्त अमृतको इस प्रकार [ जानता है ] अर्थात् ऋग्वेदविहित कर्मरूप पुष्पसे ऋक्-श्रुतिरूप मधुकरोंके अभितापद्वारा रसका संक्षरण होना, उसका आदित्यके आश्रित होना, रोहितरूप होना, अमृतका पूर्वदिग्वर्तिनी रश्मिनाडियोंमें स्थित होना, वसुनामक देवोंका भोग्य होना, उसे जाननेवालोंका वसुगणके साथ एकताको प्राप्त होकर अग्निप्रधानतासे उसके आश्रित जीवन धारण करना, उसके दर्शनमात्रसे उनका ( उसे जाननेवालोंका ) तृप्त होना, अपने भोगके समय उनका उससे उत्साहित होना और भोगावसरकी समाप्तिपर उदासीन हो जाना जानता है वह भी वसुओंके समान इन सब बातोंका उसी प्रकार अनुभव करता है ॥ ३ ॥ |
| कियन्तं कालं विदांस्तदमृतमुपजीवति ? इत्युच्यते— | विद्वान् कितने समयतक उस अमृतके आश्रित होकर जीवन धारण करता है, यह बतलाया जाता है— |
स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमता वसूनामेव तावदाधिपत्यꣳस्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥
जबतक आदित्य पूर्व दिशासे उदित होता है और पश्चिम दिशामें अस्त होता है तबतक वह [ विद्वान् ] वसुओंके आधिपत्य और स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यं २६१
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स विद्वान्यावदादित्यः पुरस्तात्प्राच्यां दिश्युदेता पश्चात्प्रतीच्यामस्तमेता तावद्वसूनां भोगकालस्तावन्तमेव कालं वसूनामाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता परितो गन्ता भवतीत्यर्थः । न यथा चन्द्रमण्डलस्थः केवलकर्मी परतन्त्रो देवानामनभूतः । किं तर्हि ? अयमाधिपत्यं स्वराड्भावं चाधिगच्छति ॥ ४ ॥ | जबतक आदित्य पूर्वकी ओर—पूर्वदिशामें उदित होता और पश्चिमकी ओर अस्त होता है तबतक वसुओंका भोगकाल है; वह विद्वान् उतने ही समयतक वसुओंके आधिपत्य और स्वाराज्यको 'पर्येता'—सब ओरसे प्राप्त होता है—ऐसा इसका भावार्थ है । जिस प्रकार चन्द्रमण्डलमें स्थित केवल कर्मपरायण पुरुष देवताओंका भोग्य होकर परतन्त्र रहता है उस प्रकार यह नहीं रहता । तो फिर किस प्रकार रहता है ? [ इसपर कहते हैं— ] यह तो आधिपत्य और स्वाराज्य—स्वराड्भावको प्राप्त हो जाता है ॥४॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
षष्ठखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥
सप्तम खण्ड
रुद्रोंके जीवनाश्रयभूत द्वितीय अमृतकी उपासना
अथ यद्द्वितीयममृतं तद्रुद्रा उपजीवन्तीन्द्रेण मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥
अब, जो दूसरा अमृत है, रुद्रगण इन्द्रप्रधान होकर उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं और न पीते हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं ॥ १ ॥
त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥२॥
वे इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन हो जाते हैं और इसीसे उद्यमशील होते हैं ॥ २ ॥
स य एतदेवममृतं वेद रुद्राणामेवैको भूत्वेन्द्रेणैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३ ॥
वह, जो इस प्रकार इस अमृतको जानता है, रुद्रोंमेंसे ही कोई एक होकर इन्द्रकी ही प्रधानतासे इस अमृतको ही देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपसे ही उदासीन हो जाता है और इस रूपसे ही उद्यमशील होता है ॥ ३ ॥
| अथ यद्द्वितीयममृतं तद्रुद्रा <br> उपजीवन्तीत्यादिसमानम् ।१-३। | ‘अथ यद्द्वितीयममृतं तद्रुद्रा उपजीवन्ति’ इत्यादि श्रुतियोंका अर्थ पूर्ववत् है ॥ १-३ ॥ |
—: ० :—
खण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ २६३
स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता द्विस्तावद्दक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता रुद्राणामेव तावदाधिपत्यꣳस्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥
जबतक आदित्य पूर्वसे उदित होता और पश्चिममें अस्त होता है उससे दुगुने समयतक वह दक्षिणसे उदित होता है और उत्तरमें अस्त होता है। इतने समयपर्यन्त वह रुद्रोंके ही आधिपत्य एवं स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
| स यावदादित्यः पुरस्तादु-<br>देता पश्चादस्तमेता द्विस्ताव-<br>त्ततो द्विगुणं कालं दक्षिणत<br>उदेतोत्तरतोऽस्तमेता रुद्राणां<br>तावद्भोगकालः ॥ ४ ॥ | वह आदित्य जबतक पूर्वसे उदित होता और पश्चिममें अस्त होता है उससे दूने समयतक दक्षिणसे उदित होता और उत्तरमें अस्त होता रहता है। इतना समय रुद्रोंका भोगकाल है [अर्थात् वसुओंकी अपेक्षा रुद्रोंका भोगकाल दूना है] ॥ ४ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
सप्तमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥
अष्टम खण्ड
आदित्योंके जीवनाश्रयभूत तृतीय अमृतकी उपासना
अथ यत्तृतीयममृतं तदादित्या उपजीवन्ति वरुणेन मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥
तदनन्तर जो तीसरा अमृत है, आदित्यगण वरुणप्रधान होकर उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं और न पीते हैं; वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं ॥ १ ॥
त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥ २ ॥
वे इस रूपको ही लक्षित करके उदासीन होते हैं और इसीसे उद्यमशील हो जाते हैं ॥ २ ॥
स य एतदेवममृतं वेदादित्यानामेवैको भूत्वा वरुणेनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३ ॥
वह, जो इस प्रकार इस अमृतको जानता है, आदित्योंमेंसे ही कोई एक होकर वरुणकी ही प्रधानतासे इस अमृतको देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपसे ही उदासीन होता है और इसीसे उद्योगी हो जाता है ॥ ३ ॥
स यावदादित्यो दक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता द्विस्तावत्पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेतादित्यानामेव तावदाधिपत्यँस्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥
खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थं २६५
वह आदित्य जितने समयतक दक्षिणसे उदित होता और उत्तरमें अस्त होता है उससे दूने समयतक पश्चिमसे उदित होता और पूर्वमें अस्त होता रहता है । इतने समयतक वह आदित्योंके ही आधिपत्य और स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| तथा पश्चादुत्तरत ऊर्ध्वमुदेता विपर्ययेणास्तमेता ।<br><br>(उत्तरोत्तरेण द्विगुणकालात्यये आक्षेपः)<br>पूर्वस्मात्पूर्वस्माद् द्विगुणोत्तरोत्तरेण कालेनेत्यपौराणं दर्शनम् । सवितुश्चतुर्दिशमिन्द्रयमवरुणसोमपुरीषूदयास्तमयकालस्य तुल्यत्वं हि पौराणिकैरुक्तम् । मानसोत्तरस्य मूर्धनि मेरोः प्रदक्षिणावृत्तेस्तुल्यत्वादिति । | इसी प्रकार पूर्व-पूर्वकी अपेक्षा उत्तरोत्तर दूने समयतक पश्चिम, उत्तर और ऊपरकी ओर सूर्य उदित होता है और इनसे विपरीत दिशाओंमें अस्त होता है । किंतु यह तो पुराणदृष्टिके विरुद्ध है; क्योंकि पौराणिकोंने चारों दिशाओंमें इन्द्र, यम, वरुण और सोमकी पुरियोंमें सूर्यके उदय और अस्तके काल समान ही बतलाये हैं, कारण कि मानसोत्तर पर्वतके शिखर-पर जो सूर्यका सुमेरुके चारों ओर घूमनेका मार्ग है वह सर्वत्र समान है । |
| (उक्ताक्षेप-निरसनम्)<br>अत्रोक्तः परिहार आचार्यैः । अमरावत्यादीनां पुरीणां द्विगुणोत्तरोत्तरेण कालेनोद्वासः स्यात् । उदयश्च नाम सवितुस्तन्निवासिनां प्राणिनां चक्षुर्गोचरापत्तिस्तदत्ययश्चास्तमनं न परमार्थत | यहाँ आचार्योंने (श्रीद्रविडाचार्य-ने) इस प्रकार इस (आक्षेप) का परिहार किया है—अमरावती आदि पुरियोंका उत्तरोत्तर दूने समयमें उद्वास (नाश) होता है। उन पुरियोंके निवासियोंकी दृष्टिमें आना ही सूर्यका उदय है और उनकी दृष्टिसे छिप जाना ही सूर्यका अस्त है। वस्तुतः सूर्यके |
२६६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| २६६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| उदयास्तमने स्तः। तन्निवासिनां च प्राणिनामभावे तान्प्रति तेनैव मार्गेण गच्छन्नपि नैवोदेता नास्तमेतेति चक्षुर्गोचरापत्तेस्तदत्ययस्य चाभावात्। | उदय और अस्त हैं ही नहीं। उन पुरियोंमें निवास करनेवाले प्राणियोंका अभाव हो जानेपर उनके लिये सूर्यदेव उसी मार्गसे जाते हुए भी न तो उदित होते हैं और न अस्त ही होते हैं, क्योंकि उस समय सूर्यका किसीकी दृष्टिका विषय होना अथवा न होना समाप्त हो जाता है। |
| तथामरावत्याः सकाशाद् द्विगुणं कालं संयमनी पुरी वस्यतस्तन्निवासिनः प्राणिनः प्रति दक्षिणत इवोदेत्युत्तरतोऽस्तमेतीत्युच्यतेऽस्मद्बुद्धिंचापेक्ष्य; तथोत्तरास्वपि पुरीषु योजना। सर्वेषां च मेरुत्तरतो भवति। | तथा अमरावती पुरीकी अपेक्षा दूने समय संयमनी पुरी रहती है। अतः उसमें रहनेवाले प्राणियोंके लिये सूर्य मानो दक्षिणकी ओरसे उदित होता है और उत्तरमें अस्त हो जाता है—यह बात हमलोगोंकी दृष्टिको लेकर कही गयी है। इसी प्रकार आगेकी अन्य पुरियोंमें भी योजना कर लेनी चाहिये। तथा मेरु इन सभीके उत्तरकी ओर है। |
| यदामरावत्यां मध्याह्नगतः सविता तदा संयमन्यामुद्यन् दृश्यते, तत्र मध्याह्नगतो वारुण्यामुद्यन्दृश्यते, तथोत्तरस्याम्; प्रदक्षिणावृत्तेस्तुल्यत्वात्। इलावृतवासिनां सर्वतः पर्वतप्राकारनि- | जिस समय अमरावती पुरीमें सूर्य मध्याह्नमें स्थित होता है उस समय संयमनी पुरीमें वह उदित होता देखा जाता है, और वहाँपर मध्याह्नमें स्थित होनेपर वरुणकी पुरीमें उदित होता दिखायी देता है। इसी प्रकार उत्तरदिशावर्तिनी पुरीके विषयमें समझना चाहिये; क्योंकि उसकी प्रदक्षिणाका चक्र सर्वत्र समान है। सूर्यरश्मियोंके |
| खण्ड ८ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | २६७ |
|---|
| वारितादित्यरश्मीनां सवितोर्ध्व इवोदेतावागस्तमेता दृश्यते । पर्वतोर्ध्वच्छिद्रप्रवेशात्सवितृप्रकाशस्य । | सब ओरसे पर्वतरूप परकोटेद्वारा रोक लिये जानेके कारण इलावृतखण्डमें रहनेवालोंको वह मानो ऊपरकी ओर उदित होता और नीचेकी ओर अस्त होता दिखायी देता है, क्योंकि वहाँ सूर्यका प्रकाश पर्वतोंके ऊपरी छिद्रद्वारा ही प्रवेश करता है । | | तथर्गाद्यमृतोपजीविनाममृतानां च द्विगुणोत्तरोत्तरवीर्यवत्त्वमनुमीयते भोगकालद्वैगुण्यलिङ्गेन । उद्यमनसंवेशनादि देवानां रुद्रादीनां विदुषश्च समानम् ॥ १-४ ॥ | इस प्रकार ऋगादि अमृतके आश्रित जीवन व्यतीत करनेवाले देवताओंके पराक्रमकी उत्तरोत्तर द्विगुणताका उनके भोगकालके द्विगुणत्वरूप लिङ्गसे अनुमान किया जाता है । रुद्रादि देवताओं और विद्वानोंके उद्यमन और संवेशन समान ही हैं ॥ १-४ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये अष्टमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ८ ॥
</div>नवम खण्ड
मरुद्गणके जीवनाश्रयभूत चतुर्थ अमृतकी उपासना
अथ यच्चतुर्थममृतं तन्मरुत उपजीवन्ति सोमेन मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥
तथा जो चौथा अमृत है, मरुद्गण सोमकी प्रधानतासे उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं और न पीते हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं ॥ १ ॥
त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति ॥२॥
वे इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन होते हैं और इसीसे उद्यमशील हो जाते हैं ॥ २ ॥
स य एतदेवममृतं वेद मरुतामेवैको भूत्वा सोमे-
नैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूप-
मभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३ ॥
वह, जो इस प्रकार इस अमृतको जानता है, मरुतोंमेंसे ही कोई एक होकर सोमकी प्रधानतासे ही इस अमृतको देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपसे ही उदासीन होता है और इस रूपसे ही उत्साहित होता है ॥ ३ ॥
खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ २११
स यावदादित्यः पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेता द्विस्ता-
वदुत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता मरुतामेव तावदाधि-
पत्यँस्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥
वह आदित्य जितने समयतक पश्चिमसे उदित होता और पूर्वमें अस्त होता है उससे दूने कालतक उत्तरसे उदित होता और दक्षिणमें अस्त होता रहता है । इतने कालतक वह मरुद्गणके ही आधिपत्य और स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
नवमखण्डः सम्पूर्णः ॥ ९ ॥
दशम खण्ड
साध्योंके जीवनाश्रयभूत पञ्चम अमृतकी उपासना
अथ यत्पञ्चमममृतं तत्साध्या उपजीवन्ति ब्रह्मणा मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥
तथा जो पांचवां अमृत है, साध्यगण ब्रह्माकी प्रधानतासे उसके आश्रित जीवन धारण करते हैं। देवगण न तो खाते हैं और न पीते हैं, वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं ॥ १ ॥
—: ० :—
य एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादूद्यन्ति ॥२॥
वे इस रूपको लक्षित करके ही उदासीन होते हैं और इसीसे उद्यमशील हो जाते हैं ॥ २ ॥
—: ० :—
स य एतदेवममृतं वेद साध्यानामेवैको भूत्वा ब्रह्मणैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥ ३ ॥
वह, जो इस प्रकार इस अमृतको जानता है, साध्यगणमेंसे ही कोई एक होकर ब्रह्माकी ही प्रधानतासे इस अमृतको ही देखकर तृप्त हो जाता है। वह इस रूपको लक्ष्य करके ही उदासीन होता है और इस रूपसे ही उत्साहित हो जाता है ॥ ३ ॥
—: ० :—
खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ २७१
स यावदादित्य उत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता द्विस्तावदूर्ध्व उदेतार्वाङस्तमेता साध्यानामेव तावदाधिपत्यँस्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥
वह आदित्य जबतक उत्तरसे उदित होता है और दक्षिणमें अस्त होता है उससे दूने समयतक ऊपरकी ओर उदित होता है और नीचेकी ओर अस्त होता है। इतने कालतक वह साध्योंके ही आधिपत्य और स्वाराज्यको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
—: ० :—
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
दशमखण्डः सम्पूर्णः ॥ १० ॥
एकादश खण्ड
—: ० :—
भोगक्षयके अनन्तर सबका उपसंहार हो जानेपर आदित्यरूप ब्रह्मकी स्वस्वरूपमें स्थिति
| कृत्वैवमुदयास्तमनेन प्राणिनां स्वकर्मफलभोगनिमित्तमनुग्रहं तत्कर्मफलोपभोगक्षये तानि प्राणिजातान्यात्मनि संहृत्य— | इस प्रकार उदय और अस्तके द्वारा प्राणियोंको अपने-अपने कर्मफलभोगके लिये अनुगृहीत कर, उनके कर्मफलभोगका क्षय होनेपर उन प्राणियोंका अपनेमें उपसंहार कर— |
अथ तत ऊर्ध्व उदेत्य नैवोदेता नास्तमेतैकल एव मध्ये स्थाता तदेष श्लोकः ॥ १ ॥
फिर उसके पश्चात् वह ऊर्ध्वगत होकर उदित होनेपर फिर न तो उदित होगा और न अस्त ही होगा; बल्कि अकेला ही मध्यमें स्थित रहेगा। उसके विषयमें यह श्लोक है ॥ १ ॥
| अथ ततस्तस्मादनन्तरं प्राण्यनुग्रहकालादूर्ध्वः सन्नात्मन्युदेत्योद्गम्य यान्प्रत्युदेति तेषां प्राणिनामभावात्स्वात्मस्थो नैवोदेता नास्तमेतैकलोऽद्वितीयोऽनवयवो मध्ये स्वात्मन्येव स्थाता। | फिर उसके पश्चात्—प्राणियोंपर अनुग्रह करनेके कालके अनन्तर ऊर्ध्वगत हो—अपनेमें उदित हो अर्थात् जिन प्राणियोंपर अनुग्रह करनेके लिये उदित होता है उन प्राणियोंका अभाव हो जानेके कारण अपनेहीमें स्थित हो वह न तो उदित ही होगा और न अस्त ही होगा; बल्कि अकेला—अद्वितीय अर्थात् निरवयव होकर मध्यमें अपनेमें ही स्थित रहेगा। |
| खण्ड ११ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | २७३ |
|---|---|---|
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| तत्र कश्चिद्विद्वान्वस्वादिसमा-<br>नाचरणो रोहिताद्यमृतभोग-<br>भागी यथोक्तक्रमेण स्वात्मानं<br>सवितारमात्मत्वेनोपेत्य समा-<br>हितः सन्नेतं मन्त्रं दृष्ट्वोत्थितो-<br>ऽन्यस्मै पृष्टवते जगाद । यत-<br>स्त्वमागतो ब्रह्मलोकात्किं तत्रा-<br>प्यहोरात्राभ्यां परिवर्तमानः<br>सविता प्राणिनामायुः क्षपयति<br>यथेहास्माकमित्येवं पृष्टः प्रत्याह-<br>तत्तत्र यथापृष्टे यथोक्ते चार्थे<br>एष श्लोको भवति तेनोक्तो<br>योगिनेति श्रुतेर्वचनमिदम् ॥१॥ | वहाँ [ क्रममुक्तिमें ] जिसका आचरण वसु आदिके समान है और जो रोहितादि अमृतभोगका भाजन है ऐसे किसी विद्वान्ने उपर्युक्त क्रमसे आत्मभूत सूर्यको आत्मरूपसे उपलब्ध करते हुए समाहितचित्त हो इस मन्त्रका साक्षात्कार कर व्युत्थान होनेपर अपनेसे प्रश्न करनेवाले एक दूसरे व्यक्तिसे इस प्रकार कहा था । उससे जब यह पूछा गया कि 'तुम ब्रह्मलोकसे आये हो [ अतः बताओ तो ] क्या वहाँ भी सूर्य दिन-रात विचरता हुआ प्राणियोंकी आयुको क्षीण करता है जिस प्रकार कि वह यहाँ हमारी आयुका क्षय करता है ?' —तब उसने निम्नाङ्कित उत्तर दिया । 'इस प्रकार पूछे हुए उपर्युक्त प्रश्नके विषयमें उस योगीद्वारा कहा हुआ यह श्लोक है।' यह श्रुतिका वाक्य है॥ १॥ |
—:०:—
ब्रह्मलोकके विषयमें विद्वान्का अनुभव
न वै तत्र न निम्लोच नोदियाय कदाचन ।
देवास्तेनाहꣳसत्येन मा विराधिषि ब्रह्मणेति ॥ २ ॥
वहाँ निश्चय ही ऐसा नहीं होता । वहाँ [ सूर्यका ] न कभी अस्त होता है और न उदय होता है । हे देवगण ! इस सत्यके द्वारा मैं ब्रह्मसे विरुद्ध न होऊँ ॥ २ ॥
२७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| २७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
| न वै तत्र यतोऽहं ब्रह्मलोकादागतस्तस्मिन्न वै तत्रैतदस्ति यत्पृच्छसि । न हि तत्र निम्लोचास्तमगमत्सविता न चोदियायोद्गतः कुतश्चित्कदाचन कस्मिंश्चिदपि काल इति ।<br><br>उदयास्तमयवर्जितो ब्रह्मलोक इत्यनुपपन्नमित्युक्तः शपथामिव प्रतिपेदे । हे देवाः साक्षिणो यूयं शृणुत यथा मयोक्तं सत्यं वचस्तेन सत्येनाहं ब्रह्मणा ब्रह्मस्वरूपेण मा विराधिषि मा विरुद्धयेयमप्राप्तिर्ब्रह्मणो मम मा भूदित्यर्थः ॥ २ ॥ | जहाँसे—जिस ब्रह्मलोकसे मैं आया हूँ—वहाँ उसमें निश्चय ही यह तुम जो कुछ पूछते हो नहीं है। वहाँ न तो सूर्यास्त होता है और न कभी—किसी भी समय सूर्य कहींसे उदित होता है।<br><br>ब्रह्मलोक सूर्यके उदय और अस्तसे रहित है—यह बात तो असङ्गत है—इस प्रकार कहे जानेपर वह मानो शपथ करता है—हे देवगण ! तुम साक्षी हो, सुनो—मैंने जो सत्य वचन कहा है उस सत्यके द्वारा मैं ब्रह्मसे—ब्रह्मके स्वरूपसे विरुद्ध न होऊँ; अर्थात् मुझे ब्रह्मकी अप्राप्ति न हो ॥ २ ॥ |
मधुविद्याका फल
| सत्यं तेनोक्तमित्याह श्रुतिः— | उसने सत्य ही कहा है—यह बात श्रुति बतलाती है— |
न ह वा अस्मा उदेति न निम्लोचति सकृद्दिवा हैवास्मै भवति य एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद ॥ ३ ॥
जो इस प्रकार इस ब्रह्मोपनिषद् (वेदरहस्य) को जानता है उसके लिये न तो सूर्यका उदय होता है और न अस्त होता है। उसके लिये सर्वदा दिन ही रहता है ॥ ३ ॥
| न ह वा अस्मै यथोक्तब्रह्मविदे नोदेति न निम्लोचति | इसके अर्थात् उपर्युक्त ब्रह्मवेत्ताके लिये न तो सूर्य उदित होता है और न अस्तमित ही होता है। |
खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७५
| नास्तमेति किन्तु ब्रह्मविदेऽस्मै सकृद्दिवा हैव सदैवाहर्भवति स्वयंज्योतिष्ट्वात् । य एतां यथोक्तां ब्रह्मोपनिषदं वेदगुह्यं वेद । एवं तन्त्रेण वंशादित्रयं प्रत्यमृतसम्बन्धं च यच्चान्यदवोचामैवं जानातीत्यर्थः । विद्वानुदयास्तमयकालापरिच्छेद्यं नित्यमजं ब्रह्म भवतीत्यर्थः ॥ ३ ॥ | बल्कि इस ब्रह्मवेत्ताके लिये 'सकृद्दिवा'—सर्वदा दिन ही बना रहता है, क्योंकि वह स्वयं प्रकाशस्वरूप होता है [ ऐसा किसके लिये होता है ? ऐसा प्रश्न होनेपर कहते हैं -- ] जो इस उपर्युक्त ब्रह्मोपनिषद्—वेदरहस्यको जानता है; अर्थात् जो शास्त्रद्वारा वंशादित्रय¹, प्रत्येक अमृतके साथ वस्तु आदिका सम्बन्ध तथा और भी जो कुछ हमने कहा है उसे उसी प्रकार जानता है । तात्पर्य यह है कि वह विद्वान् उदय और अस्तरूप कालसे अपरिच्छेद्य नित्य अजन्मा ब्रह्म ही हो जाता है ॥३॥ |
सम्प्रदायपरम्परा
तद्धैतद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्यस्तद्धैतदुद्दालकायारुणये ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रोवाच ॥ ४ ॥
वह यह मधुज्ञान ब्रह्माने विराट् प्रजापतिसे कहा था, प्रजापतिने मनुसे कहा और मनुने प्रजावर्गके प्रति कहा । तथा अपने ज्येष्ठ पुत्र अरुणनन्दन उद्दालकको उसके पिताने इस ब्रह्मविज्ञानका उपदेश दिया था ॥ ४ ॥
| तद्धैतन्मधुज्ञानं ब्रह्मा हिरण्यगर्भो विराजे प्रजापतय उवाच । | वह यह मधुज्ञान ब्रह्मा—हिरण्यगर्भने विराट् प्रजापतिको सुनाया था । उसने भी इसे मनुको सुनाया और |
१ तिरश्चीनवंश, मध्वपूप और मधुनाडी—इन तीनोंको ।
२७६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३
२७६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ३
| सोऽपि मनवे । मनुरिक्ष्वाकाभ्यः प्रजाभ्यः प्रोवाचेति विद्यां स्तौति ब्रह्मादिविशिष्टक्रमागतेति । किं च तद्वैतन्मधुज्ञानमुद्दालकायारुणये पिता ब्रह्मविज्ञानं ज्येष्ठाय पुत्राय प्रोवाच ॥ ४ ॥ | मनुने इक्ष्वाकु आदि प्रजावर्ग (अपनी संतान) को सुनाया—इस प्रकार 'यह विद्या ब्रह्मादिविशिष्ट परम्परासे आयी है' ऐसा कहकर श्रुति इस विद्याकी स्तुति करती है। यही नहीं, यह मधुज्ञान अरुणपुत्र उद्दालकको अर्थात् यह ब्रह्मविज्ञान पिताने अपने ज्येष्ठ पुत्रको सुनाया था ॥४॥ |
इदं वाव तज्ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रब्रूयात् प्रणाय्याय वान्तेवासिने ॥ ५ ॥
अतः इस ब्रह्मविज्ञानका पिता अपने ज्येष्ठ पुत्रको अथवा सुयोग्य शिष्यको उपदेश करे ॥ ५ ॥
| इदं वाव तद्यथोक्तमन्योऽपि ज्येष्ठाय पुत्राय सर्वप्रियार्हाय ब्रह्म प्रब्रूयात् । प्रणाय्याय वा योग्यायान्तेवासिने शिष्याय ॥ ५ ॥ | अतः कोई दूसरा विद्वान् भी यह उपर्युक्त ब्रह्मविज्ञान सबसे प्रिय वस्तुके पात्र अपने ज्येष्ठ पुत्रको ही बतावे, अथवा जो शिष्य सुयोग्य हो उससे कहे॥५॥ |
—: ० :—
नान्यस्मै कस्मैचन यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो भूय इत्येतदेव ततो भूय इति ॥ ६ ॥
किसी दूसरेको नहीं बतलावे, यद्यपि इस आचार्यको यह समुद्र-परिवेष्टित और धनसे परिपूर्ण सारी पृथिवी दे [ तो भी किसी
खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ २७७
दूसरेको इस विद्याका उपदेश न करे, क्योंकि ] उससे यही बढ़कर है, यही बढ़कर है ॥ ६ ॥
| नान्यस्मै कस्मैचन प्रब्रूयात्ती- <br> र्थद्वयमनुज्ञातमनेकेषां प्राप्तानां <br> तीर्थानामाचार्यादीनाम्। कस्मा- <br> त्पुनस्तीर्थसंकोचनं विद्यायाः <br> कृतम् ? इत्याह-यद्यप्यस्मा <br> आचार्याय इमां कश्चित्पृथिवी- <br> मद्भिः परिगृहीतां समुद्रपरि- <br> वेष्टितां समस्तामपि दद्यात्, यस्या <br> विद्याया निष्क्रयार्थम्, आचार्याय <br> धनस्य पूर्णां संपन्नां भोगोपकर- <br> णैः; नासावस्य निष्क्रयः, यस्मा- <br> त्ततोऽपि दानादेतदेव यन्मधुवि- <br> द्यादानं भूयो बहुतरफलमित्यर्थः। <br> द्विरभ्यास आदरार्थः ॥ ६ ॥ | किसी औरको इसका उपदेश <br> न करे—ऐसा कहकर श्रुतिने <br> आचार्य (विद्या देकर विद्या सीखने- <br> वाले) आदि अनेक तीर्थों (विद्या- <br> दानके पात्रों) मेंसे केवल दो तीर्थ <br> (ज्येष्ठ पुत्र और योग्य शिष्य) के <br> लिये ही आज्ञा दी है। किंतु इस <br> विद्याके पात्रोंका संकोच क्यों किया <br> गया है ? इसपर श्रुति कहती है— <br> यदि इस विद्याका बदला चुकानेके <br> लिये कोई पुरुष इस आचार्यको <br> जलसे परिगृहीत अर्थात् समुद्रसे <br> घिरी हुई और धनसे परिपूर्ण यानी <br> भोगकी सामग्रियोंसे सम्पन्न यह सारी <br> पृथिवी भी दे तो भी वह इसका बदला <br> नहीं हो सकता ? क्योंकि उस <br> दानसे भी यह मधुविद्याका दान ही <br> बड़ा—अधिक फलवाला है, ऐसा <br> इसका तात्पर्य है। द्विरुक्ति विद्याके <br> आदरके लिये है ॥ ६ ॥ |
<div align="center">इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये एकादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ११ ॥
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</div>द्वादश खण्ड
गायत्रीद्वारा ब्रह्मकी उपासना
| यत एवमतिशयफलैषा ब्रह्म-विद्यातः सा प्रकारान्तरेणापि वक्तव्येति गायत्री वा इत्याद्यारभ्यते । गायत्रीद्वारेण चोच्यते, ब्रह्मणः सर्वविशेषरहितस्य नेति नेतीत्यादिविशेषप्रतिषेधगम्यस्य दुर्बोधत्वात्। सत्स्वनेकेषुच्छन्दःसु गायत्र्या एव ब्रह्मज्ञानद्वारतयोपादानं प्राधान्यात् । सोमाहरणादितरच्छन्दोऽक्षराहरणेनेतरच्छन्दो- | क्योंकि इस प्रकार ब्रह्मविद्या अतिशय फलवती है इसलिये उसका अन्य प्रकारसे भी वर्णन करना चाहिये; इसीसे 'गायत्री वा' इत्यादि मन्त्रका आरम्भ किया जाता है। गायत्रीद्वारा भी ब्रह्मका ही निरूपण किया जाता है, क्योंकि 'नेति नेति' इत्यादि प्रकारसे विशेषोंके प्रतिषेध-द्वारा अनुभूत होनेवाला सर्वविशेष-रहित ब्रह्म कठिनतासे समझमें आने-वाला है। अनेकों छन्दोंके रहते हुए भी प्रधानताके कारण गायत्रीका ही ब्रह्मज्ञानके द्वाररूपसे ग्रहण किया जाता है। सोमाहरण^१ करनेसे अन्य छन्दोंके अक्षरोंको लानेसे^२, |
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१. एक बार सोमाभिलाषी देवताओंने सोम लानेके लिये गायत्री, त्रिष्टुप् और जगती—इन तीन छन्दोंको नियुक्त किया; परंतु असमर्थ होनेके कारण जगती और त्रिष्टुप्—ये दो छन्द तो मार्गमेंसे ही लौट आये, केवल एक गायत्री छन्द ही सोमके पास जा सका और वही सोमके रक्षकोंको परास्त कर उसे देवताओंके पास लाया। यह कथा ऐतरेय ब्राह्मणमें 'सोमो वै राजाऽमुष्मिल्लोक आसीत्' इस प्रसङ्गमें आयी है।
२. गायत्रीके सिवा जो और छन्द सोम लानेके लिये गये थे वे मार्गमें ही थक जानेके कारण अपने कुछ अक्षर छोड़ आये थे। जगतीके तीन अक्षर और त्रिष्टुपका एक अक्षर—ये मार्गमें रह गये थे। इन्हें लाकर गायत्रीने उनकी पूर्ति की।
खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ [२७९
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| व्याप्त्या च सर्वसवनव्यापकत्वाच्च यज्ञे प्राधान्यं गायत्र्याः। गायत्रीसारत्वाच्च ब्राह्मणस्य, मातरमिव हित्वा गुरुतरां गायत्रीं ततोऽन्यद्गुरुतरं न प्रतिपद्यते यथोक्तं ब्रह्मापीति। तस्यामत्यन्तगौरवस्य प्रसिद्धत्वात्। अतो गायत्रीमुखेनैव ब्रह्मोच्यते— | इतर छन्दोंमें व्याप्त^१ रहनेसे और सभी सवनोंमें व्यापक होनेसे^२ यज्ञमें गायत्रीकी प्रधानता है। क्योंकि ब्राह्मणका सार गायत्री ही है, इसलिये उपर्युक्त ब्रह्म भी माताके समान गुरुतरा गायत्री को छोड़कर उससे उत्कृष्टतर किसी अन्य आलम्बनको प्राप्त नहीं होता, क्योंकि उसमें लोकका अत्यन्त गौरव प्रसिद्ध ही है। अतः गायत्रीके द्वारा ही ब्रह्मका निरूपण किया जाता है— |
गायत्री वा इदꣳ सर्वं भूतं यदिदं किं च वाग्वै गायत्री वाग्वा इदꣳ सर्वं भूतं गायति च त्रायते च ॥ १॥
गायत्री ही ये सब भूत-प्राणिवर्ग हैं। जो कुछ भी ये स्थावर-जंगम प्राणी हैं वे गायत्री ही हैं। वाक् ही गायत्री है और वाक् ही ये सब प्राणी हैं, क्योंकि यही गायत्री उनका गान (नामोच्चारण) करती और उनकी [ भय आदिसे ] रक्षा करती है ॥ १ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गायत्री वा इत्यवधारणार्थो वैशब्दः। इदं सर्वं भूतं प्राणिजातं यत्किं च स्थावरं जङ्गमं वा तत्सर्वं गायत्र्येव। तस्याश्छन्दो- | 'गायत्री वै' इस पद में 'वै' शब्द निश्चयार्थक है। ये समस्त भूत अर्थात् ये जो कुछ स्थावर-जङ्गम प्राणी हैं वे सब गायत्री ही हैं। वह (गायत्री) तो केवल छन्दमात्र |
पाद-टिप्पणी:
१. उष्णिक् और अनुष्टुप् आदि अन्य छन्दोंके प्रत्येक पादमें क्रमशः ७ और ८ आदि अक्षर होते हैं और गायत्रीके एक पादमें ६ अक्षर होते हैं; इसलिये यह उन छन्दोंमें भी व्याप्त है, क्योंकि अधिक संख्याकी सत्ता न्यून संख्याके बिना नहीं हो सकती।
२. प्रातःसवन गायत्र है, मध्याह्नसवन त्रैष्टुभ है और तृतीय सवन जागत है। अर्थात् गायत्री, त्रिष्टुप् और जगती ये क्रमशः उनके छन्द हैं। गायत्री त्रिष्टुप् और जगतीमें व्याप्त है; इसलिये वह उन सवनोंमें भी व्यापक है।