छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
७७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
७७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| तस्मात्— | अतः— |
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प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नतिवादी भवति तं चेद्ब्रूयुरतिवाद्यसीत्यतिवाद्यस्मीति ब्रूयान्नापह्नुवीत ॥४॥
प्राण ही ये सब [ पिता आदि ] हैं । वह जो इस प्रकार देखनेवाला, इस प्रकार चिन्तन करनेवाला और इस प्रकार जाननेवाला है अतिवादी होता है । उससे यदि कोई कहे कि, 'तू अतिवादी है' तो उसे यही कहना चाहिये कि 'हाँ, अतिवादी हूँ', उसे छिपाना नहीं चाहिये ॥४॥
| प्राणो ह्येवैतानि पित्रादीनि सर्वाणि भवति चलानि स्थिराणि च। स वा एष प्राणविदेवं यथोक्तप्रकारेण पश्यन्फलतोऽनुभवन्नेवं मन्वान उपपत्तिभिश्चिन्तयन्नेवं विजानन्नुपपत्तिभिः संयोज्यैवमेवेति निश्चयं कुर्वन्नित्यर्थः । मननविज्ञानाभ्यां हि सम्भूतः शास्त्रार्थो निश्चितो दृष्टो भवेत् । अत एवं पश्यन्नतिवादी भवति नामाद्याशान्तमतीत्य वदनशीलो भवतीत्यर्थः । | प्राण ही ये सब चर और अचर पिता आदि हैं । वह यह प्राणवेत्ता इस प्रकार उपर्युक्त रीतिसे देखता हुआ अर्थात् फलतः अनुभव करता हुआ¹, इस प्रकार मनन करता हुआ अर्थात् युक्तियोंद्वारा चिन्तन करता हुआ और इस प्रकार जानता हुआ यानी उपपत्तियोंसे संयुक्त करके 'यह ऐसा ही है' इस प्रकार निश्चय करता हुआ, क्योंकि मनन और विज्ञानके द्वारा निष्पन्न हुआ शास्त्रका अर्थ निश्चित देखा जाता है; अतः इस प्रकार देखता हुआ वह अतिवादी होता है; तात्पर्य यह है कि उसका नामसे लेकर आशापर्यन्त सम्पूर्ण तत्त्वोंका अतिक्रमण करके बोलनेका स्वभाव होता है। |
१. यानी स्वरूपतः साक्षात्कार करता हुआ।
खण्ड १५] शाङ्करभाष्यार्थे ७७३
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| तं चेद्ब्रूयुस्तं यद्येवमतिवादिनं सर्वदा सर्वैः शब्दैर्नामाद्याशान्तमतीत्य वर्तमानं प्राणमेव वदन्त्येवं पश्यन्तमतिवदनशीलमतिवादिनं ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तस्य हि जगतः प्राण आत्माहमिति ब्रुवाणं यदि ब्रूयुरतिवाद्यसीति । बाढमतिवाद्यस्मीति ब्रूयान्नापह्नुवीत । कस्माद्ध्यसावपह्नुवीत यत्प्राणं सर्वेश्वरमयमहमस्मीत्यात्मत्वेनोपगतः ॥ ४ ॥ | उससे यदि कहें, अर्थात इस प्रकार अतिवदन करनेवाले यानी जो ऐसा देखता है कि सब लोग सर्वदा सम्पूर्ण शब्दोंद्वारा नामसे लेकर आशापर्यन्त तत्त्वोंका अतिक्रमण करके स्थित हुए प्राणका ही वर्णन करते हैं उस अतिवदनशील अतिवादीसे, जो 'मैं ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्का प्राण यानी आत्मा हूँ' ऐसा कहनेवाला है, यदि कहें कि 'तू अतिवादी है' तो उसे यही कहना चाहिये कि 'हाँ, मैं अतिवादी हूँ' उसे छिपाना नहीं चाहिये। जो सर्वेश्वर प्राणको 'यह मैं हूँ' इस प्रकार आत्मभावसे प्राप्त हो गया है वह किस प्रकार उस (अतिवादित्व) को छिपावेगा ? [ अर्थात् उसके लिये अपने अतिवादित्वको छिपानेका कोई प्रयोजन नहीं है ] ॥ ४ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये पञ्चदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १५ ॥
षोडश खण्ड
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सत्य ही जानने योग्य है
| स एष नारदः सर्वातिशयं प्राणं स्वमात्मानं सर्वात्मानं श्रुत्वा नातः परमस्तीत्युपरराम । न पूर्ववत्किमस्ति भगवः प्राणाद्भूय इति पप्रच्छयतः । तमेवं विकारानृतब्रह्मविज्ञानेन परितुष्टमकृतार्थं परमार्थसत्यातिवादिनमात्मानं मन्यमानं योग्यं शिष्यं मिथ्याग्रहविशेषाद्विप्रच्यावयन्नाह भगवान्सनत्कुमारः । एष तु वा अतिवदति यमहं वक्ष्यामि न प्राणविद्वतिवादी परमार्थतः । नामाद्यपेक्षं तु तस्यातिवादित्वम् । यस्तु भूमाख्यं सर्वातिक्रान्तं तत्त्वं परमार्थसत्यं वेद सोऽतिवादीत्यत आह— | वे नारदजी सबसे उत्कृष्ट अपने आत्मा प्राणको ही सर्वात्मा सुनकर यह समझकर कि इससे परे और कुछ नहीं है, शान्त हो गये, क्योंकि पूर्ववत् उन्होंने ऐसा प्रश्न नहीं किया कि 'भगवन् ! प्राणसे बढ़कर क्या है ?' इस प्रकार विकाररूप मिथ्या ब्रह्मके ज्ञानसे संतुष्ट हुए, अकृतार्थ तथा अपनेको परमार्थसत्यातिवादी माननेवाले उस योग्य शिष्यको उस मिथ्याग्रहविशेषसे च्युत करते हुए, भगवान् सनत्कुमारने कहा—'मैं जिसका आगे वर्णन करूँगा वही अतिवदन करता है, परमार्थतः प्राणवेत्ता अतिवादी नहीं है । उसका अतिवादित्व तो नामादिकी अपेक्षासे ही है । किंतु अतिवादी तो वही है जो भूमासंज्ञक सर्वातीत परमार्थसत्य तत्त्वको जानता है ।' इसी आशयसे वे कहते हैं— |
एष तु वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति सोऽहं भगवः सत्येनातिवदानोति सत्यं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति सत्यं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७५
[ सनत्कुमार— ] जो सत्य ( परमार्थ सत्य आत्माके विज्ञान ) के कारण अतिवदन करता है वही निश्चय अतिवदन करता है । [ नारद— ] भगवन् ! मैं तो परमार्थ सत्य विज्ञानके कारण ही अतिवदन करता हूँ । [ सनत्कुमार— ] सत्यकी ही तो विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये । [ नारद— ] भगवन् ! मैं विशेषरूपसे सत्यकी जिज्ञासा करता हूँ ॥ १ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एष तु वा अतिवदति यः सत्येन परमार्थसत्यविज्ञानवत्तयातिवदति सोऽहं त्वां प्रपन्नो भगवन्सत्येनातिवदानि । तथा मां नियुनक्तु भगवान् यथाहं सत्येनातिवदानीत्यभिप्रायः । यद्येवं सत्येनातिवदितुमिच्छसि सत्यमेव तु तावद्विजिज्ञासितव्यमित्युक्त आह नारदः । तथास्तु तर्हि सत्यं भगवो विजिज्ञासे विशेषेण ज्ञातुमिच्छेयं त्वत्तोऽहमिति ॥ १ ॥ | [ सनत्कुमार— ] किंतु अतिवदन तो वही करता है जो परमार्थसत्यविज्ञानके कारण अतिवदन करता है । [ नारद— ] भगवन् ! आपका शरणागत हुआ मैं तो सत्यके ही कारण अतिवदन करता हूँ । तात्पर्य यह है कि भगवान् मुझे इस प्रकार उपदेश करें जिससे कि मैं सत्य ज्ञानके कारण अतिवदन करूँ । 'यदि इस प्रकार तुम सत्यके द्वारा अतिवदन करना चाहते हो तो सत्यकी ही जिज्ञासा करनी चाहिये'—ऐसा कहे जानेपर नारदजी बोले—'ठीक है, अच्छा तो भगवन् ! मैं सत्यकी विजिज्ञासा—आपके द्वारा विशेषरूपसे सत्यको जाननेकी इच्छा करता हूँ' ॥१॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
षोडशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १६ ॥
सप्तदश खण्ड
—: ॐ :—
विज्ञान ही जानने योग्य है
यदा वै विजानात्यथ सत्यं वदति नाविजानन्सत्यं वदति विजानन्नेव सत्यं वदति विज्ञानं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति विज्ञानं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
जिस समय पुरुष सत्यको विशेषरूपसे जानता है तभी वह सत्य बोलता है, बिना जाने सत्य नहीं बोलता; अपितु विशेषरूपसे जानने-वाला ही सत्यका कथन करता है। अतः विज्ञानकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये। [नारद—] ‘भगवन्! मैं विज्ञानको विशेष-रूपसे जानना चाहता हूँ’ ॥ १ ॥
| यदा वै सत्यं परमार्थतो विजानाति। इदं परमार्थतः सत्यमिति। ततोऽनृतं विकारजात वाचारम्भणं हित्वा सर्वविकारावस्थं सदेवैकं सत्यमिति तदेवाथ वदति यद्वदति। <br><br> ननु विकारोऽपि सत्यमेव। “नामरूपे सत्यं ताभ्यामयं प्राणश्छन्नः” (बृ०उ० १।६।३)। “प्राणा वै सत्यं तेषामेव सत्यम्” (बृ० उ० २।१।२०) इति श्रुत्यन्तरात्। | जिस समय पुरुष सत्यको परमार्थतः जानता है, अर्थात् ‘यह परमार्थतः सत्य है’ ऐसा जानता है उस समय वह वाणीपर अवलम्बित मिथ्या विकारजातको त्यागकर सम्पूर्ण विकारमें स्थित एक सत् ही सत्य है—ऐसा समझकर फिर जो कुछ बोलता है उसीको बोलता है। <br><br> शङ्का—किंतु विकार भी तो सत्य ही है, क्योंकि “नाम और रूप सत्य हैं, उनसे यह प्राण आच्छादित है”, “[वागादि] प्राण ही सत्य हैं, यह [मुख्य प्राण] उनका भी सत्य है”, इस अन्य श्रुतिसे भी [यही सिद्ध होता है]। |
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खण्ड १७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७७
| [विकारस्य परमार्थसत्यत्वनिरासः] <br><br> सत्यम्, उक्तं सत्यत्वं श्रुत्यन्तरे विकारस्य न तु परमार्थापेक्षमुक्तम् । किं तर्हि ? इन्द्रियविषयाविषयत्वापेक्षं सच्च त्यच्चेति सत्यमित्युक्तम् । तद्द्वारेण च परमार्थसत्यस्योपलब्धिर्विवक्षितेति । प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यमिति चोक्तम् ।<br><br>इहापि तदिष्टमेव, इह तु प्राणविषयात्परमार्थसत्यविज्ञानाभिमानाद्व्युत्थाप्य नारदं यत्तत्सदेव सत्यं परमार्थतो भूमाख्यं तद्विज्ञापयिष्यामीत्येष विशेषतो विवक्षितोऽर्थः । नाविजानन्सत्यं वदति । यस्त्वविजानन्वदति सोऽग्न्यादिशब्देनाग्न्यादीन्परमार्थसद्रूपान्मन्यमानो वदति । न तु ते रूपत्रयव्यतिरेकेण परमार्थतः सन्ति तथा तान्यपि रूपाणि सदपेक्षया | समाधान— ठीक है, श्रुत्यन्तरमें विकारका सत्यत्व अवश्य बतलाया गया है, परंतु वह परमार्थकी अपेक्षासे नहीं बतलाया गया । तो फिर क्या बात है?—इन्द्रियोंके विषय होने और न होनेकी अपेक्षासे सत् और त्यत् हैं, इस प्रकार वहाँ सत्यका उल्लेख किया गया है । तथा उसके द्वारा वहाँ परमार्थ सत्यकी उपलब्धि ही विवक्षित है । इसीसे वहाँ यह कहा गया है कि ‘[वागादि] प्राण ही सत्य है, यह [मुख्य प्राण] उनका भी सत्य है ।’<br><br>यहाँ भी वह इष्ट ही है । परंतु यहाँ विशेषरूपसे सनत्कुमारजीको यही अर्थ बतलाना अभीष्ट है कि नारदजीको प्राणविषयक परमार्थ सत्य विज्ञानके अभिमानसे निवृत्त कर जो भूमासंज्ञक सत् ही परमार्थ सत्य है, उसे विशेषरूपसे समझाऊँगा । उसे विशेषरूपसे जाने बिना कोई सत्य नहीं बोलता । जो कोई उसे बिना जाने बोलता है वह ‘अग्नि’आदि शब्दसे अग्नि आदिको ही परमार्थ सद्रूप समझकर बोलता है । किंतु परमार्थतः वे रूपत्रय (रक्त, शुक्ल और कृष्णरूप) से अतिरिक्त हैं नहीं । तथा वे रूप भी सत्की अपेक्षा |
७७८ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ७
| ७७८ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ७ |
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| नैव सन्तीत्यतो नाविजानन्सत्यं वदति । विजानन्नेव सत्यं वदति ।<br><br>न च तत्सत्यविज्ञानमविजिज्ञासितमप्रार्थितं ज्ञायत इत्याह—<br><br>विज्ञानंत्वेव विजिज्ञासितव्यमिति । यद्येवं विज्ञानं भगवो विजिज्ञास इति । एवं सत्यादीनां चोत्तरोत्तराणां करोत्यन्तानां पूर्वपूर्वहेतुत्वं व्याख्यातव्यम् ॥ १ ॥ | तो हैं ही नहीं। अतः परमार्थको बिना जाने कोई सत्य नहीं बोल सकता। सत्यका विशेष ज्ञान होनेपर ही पुरुष सत्य बोल सकता है।<br><br>किन्तु वह सत्यविज्ञान बिना जिज्ञासा किये—बिना उसकी प्रार्थना किये नहीं जाना जाता; इसीसे कहते हैं कि 'विज्ञानकी* ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये।' [नारद—] 'यदि ऐसी बात है, तो भगवन्! मैं विज्ञानको विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करता हूँ। इसी प्रकार सत्यसे लेकर [आगे बाईसवें खण्डके] 'करोति' पर्यन्त उत्तरोत्तर पदार्थोंके पूर्व-पूर्व पदार्थ कारण हैं—ऐसी व्याख्या करनी चाहिये ॥ १ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये सप्तदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १७ ॥
* 'विज्ञान' शब्द अष्टम खण्डके प्रथम मन्त्रमें भी आया है। परन्तु वहाँ उसका तात्पर्य केवल शास्त्रज्ञान है और यहाँ विशेष ज्ञान अर्थात् वास्तविक ज्ञान है।
अष्टादश
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मति ही जानने योग्य है.
यदा वै मनुतेऽथ विजानाति नामत्वा विजानाति मत्वैव विजानाति मतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति । मतिं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[ सनत्कुमार— ] 'जिस समय मनुष्य मनन करता है तभी वह विशेषरूपसे जानता है; बिना मनन किये कोई नहीं जानता, अपितु मनन करनेपर ही जानता है । अतः मतिकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद— ] 'भगवन् ! मैं मतिके विज्ञानकी इच्छा करता हूँ' ॥ १ ॥
| यदा वै मनुत इति । मतिर्मननं तर्को मन्तव्यविषय आदरः ॥१॥ | जिस समय मनन करता है इत्यादि । 'मति' अर्थात् मनन—तर्क—मन्तव्य विषयके प्रति आदर। |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्यायेऽष्टादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १८ ॥
एकोनविंश खण्ड
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श्रद्धा ही जानने योग्य है
यदा वै श्रद्दधात्यथ मनुते नाश्रद्दधन्मनुते श्रद्दध-
देव मनुते श्रद्धा त्वेव विजिज्ञासितव्येति । श्रद्धां
भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[ सनत्कुमार— ] 'जिस समय मनुष्य श्रद्धा करता है तभी वह मनन करता है; बिना श्रद्धा किये कोई मनन नहीं करता । अपितु श्रद्धा करनेवाला ही मनन करता है । अतः श्रद्धाको ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद— ] 'भगवन् ! मैं श्रद्धाके विज्ञानकी इच्छा करता हूँ' ॥१॥
| आस्तिक्यबुद्धिः श्रद्धा ॥१॥ | आस्तिक्य बुद्धिका नाम श्रद्धा है ॥ १ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये एकोन-
विंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १९ ॥
विंश खण्ड
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निष्ठा ही जानने योग्य है
यदा वै निस्तिष्ठत्यथ श्रद्दधाति नानिस्तिष्ठञ्छ्रद्द- धाति निस्तिष्ठन्नेव श्रद्दधाति निष्ठा त्वेव विजिज्ञा- सितव्येति । निष्ठां भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[ सनत्कुमार— ] जिस समय पुरुषकी निष्ठा होती है तभी वह श्रद्धा करता है; बिना निष्ठाके कोई श्रद्धा नहीं करता, अपितु निष्ठा करनेवाला ही श्रद्धा करता है। अतः निष्ठाको ही विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करनी चाहिये।' [ नारद— ] 'भगवन् ! मैं निष्ठाको विशेषरूपसे जानना चाहता हूँ' ॥ १ ॥
| निष्ठा गुरुशुश्रूषादिस्तत्परत्वं <br> ब्रह्मविज्ञानाय ॥ १ ॥ | निष्ठा गुरुशुश्रूषा आदिको कहते हैं। उसमें ब्रह्मविज्ञानके लिये तत्पर रहना ॥ १ ॥ |
—:००:—
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
विंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २० ॥
एकविंश
—: ० :—
कृति ही जानने योग्य है
यदा वै करोत्यथ निस्तिष्ठति नाकृत्वा निस्तिष्ठति कृत्वैव निस्तिष्ठति कृतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति । कृतिं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[ सनत्कुमार— ] 'जिस समय मनुष्य करता है उस समय वह निष्ठा भी करने लगता है; बिना किये किसीकी निष्ठा नहीं होती, पुरुष करनेपर ही निष्ठावान् होता है । अतः कृतिकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ?' [ नारद— ] 'भगवन् ! मैं कृतिकी विशेष-रूपसे जिज्ञासा करता हूँ' ॥ १ ॥
| यदा वै करोति । कृतिरिन्द्रियसंयमश्चित्तैकाग्रताकरणं च । सत्यां हि तस्यां निष्ठादीनि यथोक्तानि भवन्ति विज्ञानावसानानि ॥ १ ॥ | जिस समय मनुष्य करता है । 'कृति' इन्द्रियसंयम और चित्तकी एकाग्रता करनेको कहते हैं । उसके होनेपर ही उपर्युक्त [विपरीत क्रमसे] निष्ठासे लेकर विज्ञानपर्यन्त समस्त साधन होते हैं ॥ १ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये एकविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २१ ॥
द्वाविंशं
सुख ही जानने योग्य है
यदा वै सुखं लभतेऽथ करोति नासुखं लब्ध्वा करोति सुखमेव लब्ध्वा करोति सुखं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति । सुखं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[सनत्कुमार—] 'जब मनुष्यको सुख प्राप्त होता है तभी वह करता है; बिना सुख मिले कोई नहीं करता, अपितु सुख पाकर (पानेकी आशा रखकर) ही करता है; अतः सुखकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये।' [नारद—] 'भगवन् ! मैं सुखकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करता हूँ' ॥१॥
| सापि कृतिर्यदा सुखं लभते | वह कृति भी, जिस समय सुख मिलता है अर्थात् जिस समय ऐसा |
|---|---|
| सुखं निरतिशयं वक्ष्यमाणं | मानता है कि मुझे आगे बतलाया जानेवाला निरतिशय सुख प्राप्त |
| लब्धव्यं मयेति मन्यते तदा | करना चाहिये, तभी होती है। जिस प्रकार लौकिक कृति दृष्टफलजनित |
| भवतीत्यर्थः । यथा दृष्टफल- | सुखके लिये होती है उसी प्रकार इस प्रसंगमें भी बिना सुख मिले |
| सुखाकृतिस्तथेहापि नासुखं | कोई नहीं करता। यद्यपि वह फल भविष्यत्कालिक होता है तो भी |
| लब्ध्वा करोति । भविष्यदपि | 'लब्ध्वा' (पाकर) ऐसा [पूर्वकालिक क्रियारूपसे] कहा जाता |
| फलं लब्ध्वेत्युच्यते तदुद्दिश्य | है, क्योंकि उसीके उद्देश्यसे प्रवृत्ति होनी सम्भव है। |
| प्रवृत्त्युपपत्तेः । |
७८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ७८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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| अथेदानीं कृत्यादिषूत्तरोत्तरेषु सत्सु सत्यं स्वयमेव प्रतिभासत इति न तद्विज्ञानाय पृथग्यत्नः कार्य इति प्राप्तं तत इदमूच्यते—सुखं त्वेव विजिज्ञासितव्यमित्यादि । सुखं भगवो विजिज्ञास इत्यभिमुखीभूतायाह ॥ १ ॥ | अब यह प्राप्त होता है कि—कृतिसे लेकर उत्तरोत्तर साधनोंके होनेपर सत्य स्वयं ही अनुभव हो जायगा, उसके विज्ञानके लिये पृथक् प्रयत्न नहीं करना चाहिये—इसीसे यह कहा गया है कि 'सुखकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये' इत्यादि । फिर 'भगवन् ! मैं सुखकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करता हूँ' इस प्रकार [ सुखविज्ञानके प्रति ] अभिमुख हुए नारदजीसे सनत्कुमारजी कहते हैं ॥ १ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये द्वाविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २२ ॥
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त्रयोविंश खण्ड
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भूमा ही जानने योग्य है
यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति । भूमानं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[सनत्कुमार—] ‘निश्चय जो भूमा है वही सुख है, अल्पमें सुख नहीं है। सुख भूमा ही है। भूमाकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये।’ [नारद—] ‘भगवन्! मैं भूमाकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करता हूँ ॥ १ ॥
| यो वै भूमा महन्निरतिशयं बह्विति पर्यायास्तत्सुखम् । ततोऽर्वाक्सातिशयत्वादल्पम् । अतस्तस्मिन्नल्पे सुखं नास्ति । अल्पस्याधिकतृष्णाहेतुत्वात् । तृष्णा च दुःखबीजम् । न हि दुःखबीजं सुखं दृष्टं ज्वरादि लोके । तस्माद्युक्तं नाल्पे सुखमस्तीति । अतो भूमैव सुखम् । तृष्णादिदुःखबीजत्वासम्भवाद्भुम्नः ॥ १ ॥ | निश्चय जो भूमा है—महान्, निरतिशय और बहु—ये इसके पर्याय हैं—वही सुख है। उससे नीचेके पदार्थ सातिशय (न्यूनाधिक) होनेके कारण अल्प हैं। अतः उस अल्पमें सुख नहीं है; क्योंकि अल्प तो अधिक तृष्णाका हेतु है और तृष्णा दुःखका बीज है। तथा लोकमें दुःखके बीजभूत ज्वरादि सुखरूप नहीं देखे गये। अतः ‘अल्पमें सुख नहीं है’ यह कथन ठीक ही है। इसलिये भूमा ही सुखरूप है; क्योंकि भूमामें दुःखके बीजभूत तृष्णादिका होना असम्भव है ॥ १ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये त्रयोविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २३ ॥ —:००:—
चतुर्विंश खण्ड
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भूमाके स्वरूपका प्रतिपादन
| किंलक्षणोऽसौ भूमेत्याह— | यह भूमा किन लक्षणोंवाला है, सो बतलाते हैं— |
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यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यम्। स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति। स्वे महिम्नि यदि वा न महिम्नीति ॥ १ ॥
[सनत्कुमार—] 'जहाँ कुछ और नहीं देखता, कुछ और नहीं सुनता तथा कुछ और नहीं जानता वह भूमा है। किंतु जहाँ कुछ और देखता है, कुछ और सुनता है एवं कुछ और जानता है वह अल्प है। जो भूमा है वही अमृत है और जो अल्प है वह मर्त्य है।'
[नारद—] 'भगवन् ! वह (भूमा) किसमें प्रतिष्ठित है?'
[सनत्कुमार—] 'अपनी महिमामें, अथवा अपनी महिमामें भी नहीं है' ॥ १ ॥
| यत्र यस्मिन्भूम्नि तत्त्वे नान्यद्द्रष्टव्यमन्येन करणेन द्रष्टान्यो विभक्तो दृश्यात्पश्यति तथा नान्यच्छृणोति। नामरूपयोरेवान्तर्भावाद्विषयभेदस्य, तद्ग्राहक- | जहाँ—जिस भूमातत्त्वमें दृश्यसे भिन्न कोई अन्य द्रष्टा किसी अन्य द्रष्टव्य विषयको अन्य इन्द्रियके द्वारा नहीं देखता और न कुछ सुनता ही है। विषयभेदका अन्तर्भाव नाम और रूपमें ही हो जाता है; अतः उनका ग्रहण |
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| खण्ड २४] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७८७ |
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| संस्कृत (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी भाष्यार्थ |
|---|---|
| योरेवेह दर्शनश्रवणयोर्ग्रहणम्, अन्येषां चोपलक्षणार्थत्वेन। मननं त्वत्रोक्तं द्रष्टव्यं नान्यन्मनुत इति, प्रायशो मननपूर्वकत्वाद्विज्ञानस्य। तथा नान्यद्विजानाति; एवंलक्षणो यः भूमा। | करनेवाली दर्शन और श्रवण इन दो इन्द्रियोंका ही यहाँ अन्य इन्द्रियोंके उपलक्षणार्थ ग्रहण किया गया है। किंतु मननका यहाँ 'नान्यन्मनुते' ऐसा कहकर अलग उल्लेख किया गया है—ऐसा जानना चाहिये, क्योंकि विज्ञान प्रायः मननपूर्वक हुआ करता है; तथा जहाँ कुछ और जानता भी नहीं—जो ऐसे लक्षणोंवाला है वह भूमा है। |
| किमत्र प्रसिद्धान्यदर्शनाभावो भूम्युच्यते नान्यत्पश्यतीत्यादिना ? अथान्यन्न पश्यत्यात्मानं पश्यतीत्येतत् ? | गुरु—यहाँ [यह विचारना है कि] 'नान्यत्पश्यति' इत्यादि वाक्यसे भूमामें लोकप्रसिद्ध अन्य दर्शनका अभाव बतलाया गया है अथवा अन्यको नहीं देखता, इसलिये अपनेको ही देखता है—यह बतलाया गया है ? |
| किं चातः ? | शिष्य—इससे क्या [हानि-लाभ] है ! |
| यद्यन्यदर्शनाद्यभावमात्रमित्युच्यते तदा द्वैतसंव्यवहारविलक्षणो भूमेत्युक्तं भवति। अथान्यदर्शनविशेषप्रतिषेधेनात्मानं पश्यतीत्युच्यते तदैकस्मिन्नेव | गुरु—यदि इस वाक्यद्वारा अन्य पदार्थके दर्शनादिका अभाव ही बतलाया गया हो तब तो यह बात कही जाती है कि भूमा द्वैतव्यवहारसे विलक्षण है और यदि अन्यदर्शनविशेषका प्रतिषेध करके यह कहा गया हो कि वह अपनेको देखता है तो एकमें |
५८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ५८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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| क्रियाकारकफलभेदोऽभ्युपगतो भवेत् । <br> यद्येवं को दोषः स्यात् ? <br><br> नन्वयमेव दोषः संसारावि-वृत्तिः । क्रियाकारकफलभेदो हि संसार इति । आत्मैकत्व एव क्रियाकारकफलभेदः संसारवि-लक्षण इति चेत् ? न; आत्मनो निर्विशेषैकत्वाभ्युपगमे दर्शना-दिक्रियाकारकफलभेदाभ्युपगमस्य शब्दमात्रत्वात् । <br><br> अन्यदर्शनाद्यभावोक्तिपक्षेऽपि यत्रेत्यन्यन्न पश्यतीति च विशे-षणे अनर्थके स्यातामिति चेत् ? दृश्यते हि लोके यत्र शून्ये गृहेऽन्यन्न पश्यतीत्युक्ते स्तम्भा-दीनात्मानं च न पश्यतीति न गम्यते। एवमिहापीति चेत् ? | ही क्रिया, कारक और फलरूप भेद मानना हो जाता है। <br> **शिष्य—**यदि ऐसा ही हो तो उसमें दोष क्या होगा ? <br><br> **गुरु—**उसके संसारकी निवृत्ति न होना—बस यही दोष है, क्योंकि क्रिया, कारक और फलरूप भेद ही संसार है। यदि कहो कि आत्माका एकत्व होनेपर भी उसमें जो क्रिया, कारक और फलरूप भेद है वह संसारसे विलक्षण है तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि आत्माका निर्विशेष एकत्व स्वीकार करनेपर जो उसमें दर्शनादि क्रिया, कारक और फलरूप भेद स्वीकार करना है वह तो शब्दमात्र है। <br><br> **शिष्य—**किंतु अन्य दर्शनादि-का अभाव प्रतिपादन करनेके पक्षमें भी 'यत्र' और 'अन्यन्न पश्यति' ये दो विशेषण निरर्थक होंगे। लोकमें यह देखा ही जाता है कि जहाँ सूने घरमें 'किसी औरको नहीं देखता' ऐसा कहा जाता है वहाँ यह नहीं समझा जाता कि उस घरके स्तम्भादि और अपनेको भी नहीं देखता। यदि ऐसा ही यहाँ भी हो तो ? |
| खण्ड २४ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७८९ |
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| न; तत्त्वमसीत्येकत्वोपदेशादधिकरणाधिकर्तव्यभेदानुपपत्तेः। तथा सदेकमेवाद्वितीयं सत्यमिति षष्ठे निर्धारितत्वात्। "अदृश्येऽनात्म्ये" (तै० उ० २।७।१) "न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य" (क० उ० ६।९) "विज्ञातारमरे केन विजानीयात्" (बृ० उ० २।४।१४) इत्यादिश्रुतिभ्यः स्वात्मनि दर्शनाद्यनुपपत्तिः। | गुरु— ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि 'तू वह है' इस प्रकार एकत्वका उपदेश होनेके कारण आधार-आधेयरूप भेदका होना सम्भव नहीं है। इसी प्रकार छठे अध्यायमें भी यह निश्चय किया जा चुका है कि 'एकमात्र अद्वितीय सत् ही सत्य है'। तथा "देखनेमें न आने-वाले शरीररहित····आत्मामें" "इसका रूप दृष्टिमें नहीं आता" "अरे ! विज्ञाताको किसके द्वारा जाने" इत्यादि श्रुतियोंसे भी स्वात्मामें दर्शनादिका होना सम्भव नहीं है। | | यत्रेति विशेषणमनर्थकं प्राप्तमिति चेत् ? | शिष्य— किंतु इस प्रकार 'यत्र' यह विशेषण व्यर्थ सिद्ध होता है ? | | न, अविद्याकृतभेदापेक्षत्वात्। यथा सत्यैकत्वाद्वितीयत्वबुद्धिं प्रकृतामपेक्ष्य सदेकमेवाद्वितीयमिति संख्याद्यनर्हमप्युच्यते, एवं भूम्न्येकस्मिन्नेव यत्रेति विशेषणम्। अविद्यावस्थायामन्यदर्शनानुवादेन च भूम्नस्तदभावत्वलक्षणस्य विवक्षितत्वान्नान्यत्पश्यतीति विशेषणम्। तस्मात्संसारव्यवहारो भूम्नि नास्तीति समुदायार्थः। | गुरु— नहीं, क्योंकि यह अविद्याकृत भेदकी अपेक्षासे है। जिस प्रकार प्रासङ्गिक सत्य एकत्व और अद्वितीयत्वबुद्धिकी अपेक्षासे—संख्या आदिके योग्य न होनेपर भी—'सत् एक और अद्वितीय है' ऐसा कहा जाता है उसी प्रकार एक ही भूमामें 'यत्र' यह विशेषण है। तथा अविद्यावस्थामें अन्य दर्शनका अनुवाद होनेके कारण भूमाको उसके अभावत्वरूप लक्षण-वाला बतलाना इष्ट होनेसे 'नान्यत्पश्यति' ऐसा विशेषण दिया गया है। अतः सारांश यह है कि भूमामें संसारव्यवहार नहीं है। |
७१० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७
| ७१० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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| अथ यत्राविद्याविषयेऽन्योऽन्येनान्यत्पश्यतीति तदल्पमविद्याकालभावीत्यर्थः । यथा स्वप्नदृश्यं वस्तु प्राक् प्रबोधात्तत्कालभावीति तद्वत् । तत एव तन्मर्त्यं विनाशि स्वप्नवस्तुवदेव तद्विपरीतो भूमा यस्तदमृतम् । तच्छब्दोऽमृतत्वपरः । | किंतु जहाँ अविद्याके राज्यमें अन्य अन्यको अन्यके द्वारा देखता है वह अल्प है, तात्पर्य यह है कि वह केवल अविद्याके समय ही रहनेवाला है । जिस प्रकार स्वप्नमें दिखलायी देनेवाली वस्तु जागनेसे पूर्व स्वप्नकालमें ही रहनेवाली होती है उसी प्रकार [ उसे जानना चाहिये । इसीसे वह स्वप्नके पदार्थके समान ही मर्त्य—विनाशी है । उसके विपरीत जो भूमा है वह अमृत । 'तत्' शब्द अमृतत्वपरक है [ इसीसे नपुंसकलिङ्गका प्रयोग किया गया ] । | | स तर्ह्येवंलक्षणो भूमा हे भगवन् कस्मिन् प्रतिष्ठित इत्युक्तवन्तं नारदं प्रत्याह सनत्कुमारः—स्वे महिम्नीति; स्व आत्मीये महिम्नि माहात्म्ये विभूतौ प्रतिष्ठितो भूमा। यदि प्रतिष्ठामिच्छसि क्वचिद्यदि वा परमार्थमेव पृच्छसि न महिम्न्यपि प्रतिष्ठित इति ब्रूमः । | 'तो, हे भगवन् ! वह ऐसे लक्षणवाला भूमा किसमें प्रतिष्ठित है ?' इस प्रकार पूछते हुए नारदजीसे सनत्कुमारजीने कहा—'अपनी महिमामें।' तो वह भूमा 'स्वे'—अपनी 'महिम्नि'—महिमा अर्थात् विभूतिमें प्रतिष्ठित है । और यदि कहीं उसकी प्रतिष्ठा जानना चाहते हो—अथवा यदि परमार्थतः ही पूछते हो तो हमारा यह कथन है कि वह अपनी महिमामें भी प्रतिष्ठित नहीं |
खण्ड २४] शाङ्करभाष्यार्थ ७९१
| अप्रतिष्ठितोऽनाश्रितो भूमा क्वचिदपीत्यर्थः ॥ १ ॥ | है। तात्पर्य यह है कि 'भूमा अप्रतिष्ठित है अर्थात् कहीं भी आश्रित नहीं है' ॥ १ ॥ |
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| यदि स्वमहिम्नि प्रतिष्ठितो भूमा कथं तर्ह्यप्रतिष्ठ उच्यते, शृणु | 'यदि भूमा अपनी महिमामें प्रतिष्ठित है तो उसे अप्रतिष्ठित क्यों कहा जाता है?' सुनो— |
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गोअश्वमिह महिमेत्याचक्षते हस्तिहिरण्यं दासभार्यं क्षेत्राण्यायतनानीति नाहमेवं ब्रवीमि ब्रवीमीति होवाचान्यो ह्यन्यस्मिन्प्रतिष्ठित इति ॥ २ ॥
‘इस लोकमें ‘गौ, अश्व आदिको महिमा कहते हैं तथा हाथी, सुवर्ण, दास, भार्या, क्षेत्र और घर—इनका नाम भी महिमा है। किन्तु मेरा ऐसा कथन नहीं है, क्योंकि अन्य पदार्थ अन्यमें प्रतिष्ठित होता है। मैं तो यह कहता हूँ’—ऐसा सनत्कुमारजीने कहा ॥ २ ॥
| गोअश्वादीह महिमेत्याचक्षते ।<br><br>गावश्चाश्वाश्च गोअश्वं द्वन्द्वैकवद्भावः। सर्वत्र गवाश्वादि महिमेति प्रसिद्धम्। तदाश्रितस्तत्प्रतिष्ठश्चैत्रो भवति यथा नाहमेवं | 'इस लोकमें गो-अश्वादिको महिमा कहते हैं। गो और अश्वको 'गोअश्व' कहते हैं। इन दोनों शब्दोंका द्वन्द्व समासमें एकवद्भाव* हुआ है। सर्वत्र गौ और अश्व आदि ही महिमा हैं इस प्रकार प्रसिद्ध है। जिस प्रकार चैत्र [नामका कोई पुरुष] उनके |
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* यहाँ यह प्रश्न होता है कि 'गावश्च अश्वाश्च' ऐसा विग्रह करके पुंल्लिङ्ग एवं बहुवचनान्त शब्दोंका द्वन्द्वसमास हुआ है, ऐसी दशामें 'गोअश्वम्' यह एकवचनान्त नपुंसकलिङ्ग प्रयोग कैसे हुआ ? इसीका उत्तर देते हुए कहते हैं कि एकवद्भाव हुआ है। 'द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम्' इस पाणिनिसूत्रसे यहाँ एकवद्भाव किया गया है, इससे एकवचनान्त हो गया है तथा जहाँ एकवद्भाव होता है वहाँ 'स नपुंसकम्' इस सूत्रके अनुसार नपुंसकता भी हो जाती है।