भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 789, कुल 978 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 789

त्रयोविंश खण्ड

—:०:—

भूमा ही जानने योग्य है

यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति । भूमानं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥

[सनत्कुमार—] ‘निश्चय जो भूमा है वही सुख है, अल्पमें सुख नहीं है। सुख भूमा ही है। भूमाकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये।’ [नारद—] ‘भगवन्! मैं भूमाकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करता हूँ ॥ १ ॥

| यो वै भूमा महन्निरतिशयं बह्विति पर्यायास्तत्सुखम् । ततोऽर्वाक्सातिशयत्वादल्पम् । अतस्तस्मिन्नल्पे सुखं नास्ति । अल्पस्याधिकतृष्णाहेतुत्वात् । तृष्णा च दुःखबीजम् । न हि दुःखबीजं सुखं दृष्टं ज्वरादि लोके । तस्माद्युक्तं नाल्पे सुखमस्तीति । अतो भूमैव सुखम् । तृष्णादिदुःखबीजत्वासम्भवाद्भुम्नः ॥ १ ॥ | निश्चय जो भूमा है—महान्, निरतिशय और बहु—ये इसके पर्याय हैं—वही सुख है। उससे नीचेके पदार्थ सातिशय (न्यूनाधिक) होनेके कारण अल्प हैं। अतः उस अल्पमें सुख नहीं है; क्योंकि अल्प तो अधिक तृष्णाका हेतु है और तृष्णा दुःखका बीज है। तथा लोकमें दुःखके बीजभूत ज्वरादि सुखरूप नहीं देखे गये। अतः ‘अल्पमें सुख नहीं है’ यह कथन ठीक ही है। इसलिये भूमा ही सुखरूप है; क्योंकि भूमामें दुःखके बीजभूत तृष्णादिका होना असम्भव है ॥ १ ॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये त्रयोविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २३ ॥ —:००:—