भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 790, कुल 978 में से

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पृष्ठ 790

चतुर्विंश खण्ड

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भूमाके स्वरूपका प्रतिपादन

किंलक्षणोऽसौ भूमेत्याह—यह भूमा किन लक्षणोंवाला है, सो बतलाते हैं—

यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यम्। स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति। स्वे महिम्नि यदि वा न महिम्नीति ॥ १ ॥

[सनत्कुमार—] 'जहाँ कुछ और नहीं देखता, कुछ और नहीं सुनता तथा कुछ और नहीं जानता वह भूमा है। किंतु जहाँ कुछ और देखता है, कुछ और सुनता है एवं कुछ और जानता है वह अल्प है। जो भूमा है वही अमृत है और जो अल्प है वह मर्त्य है।'
[नारद—] 'भगवन् ! वह (भूमा) किसमें प्रतिष्ठित है?'
[सनत्कुमार—] 'अपनी महिमामें, अथवा अपनी महिमामें भी नहीं है' ॥ १ ॥

यत्र यस्मिन्भूम्नि तत्त्वे नान्यद्द्रष्टव्यमन्येन करणेन द्रष्टान्यो विभक्तो दृश्यात्पश्यति तथा नान्यच्छृणोति। नामरूपयोरेवान्तर्भावाद्विषयभेदस्य, तद्ग्राहक-जहाँ—जिस भूमातत्त्वमें दृश्यसे भिन्न कोई अन्य द्रष्टा किसी अन्य द्रष्टव्य विषयको अन्य इन्द्रियके द्वारा नहीं देखता और न कुछ सुनता ही है। विषयभेदका अन्तर्भाव नाम और रूपमें ही हो जाता है; अतः उनका ग्रहण