भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 788, कुल 978 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 788
७८४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७

| अथेदानीं कृत्यादिषूत्तरोत्तरेषु सत्सु सत्यं स्वयमेव प्रतिभासत इति न तद्विज्ञानाय पृथग्यत्नः कार्य इति प्राप्तं तत इदमूच्यते—सुखं त्वेव विजिज्ञासितव्यमित्यादि । सुखं भगवो विजिज्ञास इत्यभिमुखीभूतायाह ॥ १ ॥ | अब यह प्राप्त होता है कि—कृतिसे लेकर उत्तरोत्तर साधनोंके होनेपर सत्य स्वयं ही अनुभव हो जायगा, उसके विज्ञानके लिये पृथक् प्रयत्न नहीं करना चाहिये—इसीसे यह कहा गया है कि 'सुखकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये' इत्यादि । फिर 'भगवन् ! मैं सुखकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करता हूँ' इस प्रकार [ सुखविज्ञानके प्रति ] अभिमुख हुए नारदजीसे सनत्कुमारजी कहते हैं ॥ १ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये द्वाविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २२ ॥

—: ० :—

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित) · पृष्ठ 788, कुल 978 में से · BharatKosha