छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 787, कुल 978 में से
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द्वाविंशं
सुख ही जानने योग्य है
यदा वै सुखं लभतेऽथ करोति नासुखं लब्ध्वा करोति सुखमेव लब्ध्वा करोति सुखं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति । सुखं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥
[सनत्कुमार—] 'जब मनुष्यको सुख प्राप्त होता है तभी वह करता है; बिना सुख मिले कोई नहीं करता, अपितु सुख पाकर (पानेकी आशा रखकर) ही करता है; अतः सुखकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये।' [नारद—] 'भगवन् ! मैं सुखकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करता हूँ' ॥१॥
| सापि कृतिर्यदा सुखं लभते | वह कृति भी, जिस समय सुख मिलता है अर्थात् जिस समय ऐसा |
|---|---|
| सुखं निरतिशयं वक्ष्यमाणं | मानता है कि मुझे आगे बतलाया जानेवाला निरतिशय सुख प्राप्त |
| लब्धव्यं मयेति मन्यते तदा | करना चाहिये, तभी होती है। जिस प्रकार लौकिक कृति दृष्टफलजनित |
| भवतीत्यर्थः । यथा दृष्टफल- | सुखके लिये होती है उसी प्रकार इस प्रसंगमें भी बिना सुख मिले |
| सुखाकृतिस्तथेहापि नासुखं | कोई नहीं करता। यद्यपि वह फल भविष्यत्कालिक होता है तो भी |
| लब्ध्वा करोति । भविष्यदपि | 'लब्ध्वा' (पाकर) ऐसा [पूर्वकालिक क्रियारूपसे] कहा जाता |
| फलं लब्ध्वेत्युच्यते तदुद्दिश्य | है, क्योंकि उसीके उद्देश्यसे प्रवृत्ति होनी सम्भव है। |
| प्रवृत्त्युपपत्तेः । |