भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 781

खण्ड १७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७७


| [विकारस्य परमार्थसत्यत्वनिरासः] <br><br> सत्यम्, उक्तं सत्यत्वं श्रुत्यन्तरे विकारस्य न तु परमार्थापेक्षमुक्तम् । किं तर्हि ? इन्द्रियविषयाविषयत्वापेक्षं सच्च त्यच्चेति सत्यमित्युक्तम् । तद्द्वारेण च परमार्थसत्यस्योपलब्धिर्विवक्षितेति । प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यमिति चोक्तम् ।<br><br>इहापि तदिष्टमेव, इह तु प्राणविषयात्परमार्थसत्यविज्ञानाभिमानाद्व्युत्थाप्य नारदं यत्तत्सदेव सत्यं परमार्थतो भूमाख्यं तद्विज्ञापयिष्यामीत्येष विशेषतो विवक्षितोऽर्थः । नाविजानन्सत्यं वदति । यस्त्वविजानन्वदति सोऽग्न्यादिशब्देनाग्न्यादीन्परमार्थसद्रूपान्मन्यमानो वदति । न तु ते रूपत्रयव्यतिरेकेण परमार्थतः सन्ति तथा तान्यपि रूपाणि सदपेक्षया | समाधान— ठीक है, श्रुत्यन्तरमें विकारका सत्यत्व अवश्य बतलाया गया है, परंतु वह परमार्थकी अपेक्षासे नहीं बतलाया गया । तो फिर क्या बात है?—इन्द्रियोंके विषय होने और न होनेकी अपेक्षासे सत् और त्यत् हैं, इस प्रकार वहाँ सत्यका उल्लेख किया गया है । तथा उसके द्वारा वहाँ परमार्थ सत्यकी उपलब्धि ही विवक्षित है । इसीसे वहाँ यह कहा गया है कि ‘[वागादि] प्राण ही सत्य है, यह [मुख्य प्राण] उनका भी सत्य है ।’<br><br>यहाँ भी वह इष्ट ही है । परंतु यहाँ विशेषरूपसे सनत्कुमारजीको यही अर्थ बतलाना अभीष्ट है कि नारदजीको प्राणविषयक परमार्थ सत्य विज्ञानके अभिमानसे निवृत्त कर जो भूमासंज्ञक सत् ही परमार्थ सत्य है, उसे विशेषरूपसे समझाऊँगा । उसे विशेषरूपसे जाने बिना कोई सत्य नहीं बोलता । जो कोई उसे बिना जाने बोलता है वह ‘अग्नि’आदि शब्दसे अग्नि आदिको ही परमार्थ सद्रूप समझकर बोलता है । किंतु परमार्थतः वे रूपत्रय (रक्त, शुक्ल और कृष्णरूप) से अतिरिक्त हैं नहीं । तथा वे रूप भी सत्‌की अपेक्षा |