छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 777, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १५] शाङ्करभाष्यार्थे ७७३
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| तं चेद्ब्रूयुस्तं यद्येवमतिवादिनं सर्वदा सर्वैः शब्दैर्नामाद्याशान्तमतीत्य वर्तमानं प्राणमेव वदन्त्येवं पश्यन्तमतिवदनशीलमतिवादिनं ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तस्य हि जगतः प्राण आत्माहमिति ब्रुवाणं यदि ब्रूयुरतिवाद्यसीति । बाढमतिवाद्यस्मीति ब्रूयान्नापह्नुवीत । कस्माद्ध्यसावपह्नुवीत यत्प्राणं सर्वेश्वरमयमहमस्मीत्यात्मत्वेनोपगतः ॥ ४ ॥ | उससे यदि कहें, अर्थात इस प्रकार अतिवदन करनेवाले यानी जो ऐसा देखता है कि सब लोग सर्वदा सम्पूर्ण शब्दोंद्वारा नामसे लेकर आशापर्यन्त तत्त्वोंका अतिक्रमण करके स्थित हुए प्राणका ही वर्णन करते हैं उस अतिवदनशील अतिवादीसे, जो 'मैं ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्का प्राण यानी आत्मा हूँ' ऐसा कहनेवाला है, यदि कहें कि 'तू अतिवादी है' तो उसे यही कहना चाहिये कि 'हाँ, मैं अतिवादी हूँ' उसे छिपाना नहीं चाहिये। जो सर्वेश्वर प्राणको 'यह मैं हूँ' इस प्रकार आत्मभावसे प्राप्त हो गया है वह किस प्रकार उस (अतिवादित्व) को छिपावेगा ? [ अर्थात् उसके लिये अपने अतिवादित्वको छिपानेका कोई प्रयोजन नहीं है ] ॥ ४ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये पञ्चदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १५ ॥