छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२३६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| २३६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
|---|
| पुरा पूर्वं प्रातरनुवाकस्य शस्त्रस्य प्रारम्भाज्जघनेन गार्हपत्यस्य पश्चादुदङ्मुखः संन्नुपविश्य स वासवं वसुदैवत्यं सामाभिगायति ॥ ३ ॥ | प्रातरनुवाकसे पूर्व अर्थात् प्रातःकालमें पढ़े जाने योग्य 'शस्त्र'* नामक स्तोत्रपाठसे पूर्व गार्हपत्याग्निके पीछेकी ओर उत्तराभिमुख बैठकर वह यजमान वासव—वसुदेवतासम्बन्धी सामका गान करता है ॥ ३ ॥ |
लो ३ कद्वारमपावा ३ र्णू ३ ३ पश्येम त्वा वयँरा ३ ३ ३ ३ ३ हु ३ म्आ ३ ३ ज्या ३ यो ३ आ ३ २ १ १ १ इति ॥४॥
[ हे अग्ने ! ] तुम इस लोकका द्वार खोल दो; जिससे कि हम राज्यप्राप्तिके लिये तुम्हारा दर्शन कर लें ॥ ४ ॥
| लोकद्वारमस्य पृथिवीलोकस्य प्राप्तये द्वारमपावृणु हेऽग्ने तेन द्वारेण पश्येम त्वा त्वां राज्यायेति ॥ ४ ॥ | हे अग्ने ! तुम लोकद्वार—इस पृथिवीलोककी प्राप्तिके लिये, इसका द्वार खोल दो। उस द्वारसे हम राज्यप्राप्तिके लिये तुम्हारा दर्शन करें ॥४॥ |
— : ० : —
अथ जुहोति नमोऽग्नये पृथिवीक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानस्य लोक एतास्मि ॥५॥
तदनन्तर [ यजमान इस मन्त्रद्वारा ] हवन करता है—पृथिवीमें रहनेवाले इहलोकनिवासी अग्निदेवको नमस्कार है। मुझ यजमानको तुम [ पृथिवी ] लोककी प्राप्ति कराओ। यह निश्चय ही यजमानका लोक है, मैं इसे प्राप्त करनेवाला हूँ ॥ ५ ॥
* जिन ऋक्-मन्त्रोंका गान नहीं किया जाता उन्हें 'शस्त्र' कहते हैं और जिन शस्त्रोंका प्रातःकाल पाठ किया जाता है उनका नाम 'प्रातरनुवाक' है।
खण्ड २४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २३७
| अथानन्तरं जुहोत्यनेन मन्त्रेण नमोऽग्नये प्रह्वीभूतास्तुभ्यं वयं पृथिवीक्षिते पृथिवीनिवासाय लोकक्षिते पृथिवीलोकनिवासायेत्यर्थः । लोकं मे मह्यं यजमानाय विन्द लभस्व । एष वै मम यजमानस्य लोक एता गन्तास्मि ॥ ५ ॥ | इसके पश्चात् वह इस मन्त्रद्वारा हवन करता है—अग्निदेवको नमस्कार है। हम पृथ्वीमें रहनेवाले और पृथ्वीलोकनिवासी तुम्हारे प्रति विनम्र होते हैं। मुझ यजमानको तुम पुण्यलोककी प्राप्ति कराओ। यह निश्चय ही यजमानका लोक है, मैं इसे प्राप्त करनेवाला हूँ ॥ ५ ॥ |
अत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहापजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै । वसवः प्रातःसवनँ संप्रयच्छन्ति ॥ ६ ॥
इस लोकमें यजमान 'मैं आयु समाप्त होनेके अनन्तर [पुण्यलोकको प्राप्त होऊँगा] 'स्वाहा'—ऐसा कहकर हवन करता है, और 'परिघ (अर्गला—अड़ंगे) को नष्ट करो' ऐसा कहकर उत्थान करता है। वसुगण उसे प्रातःसवन प्रदान करते हैं ॥ ६ ॥
| अत्रास्मिँल्लोके यजमानोऽहमायुषः परस्तादूर्ध्वं मृतः सन्नित्यर्थः, स्वाहेति जुहोति । अपजह्यपनय परिघं लोकद्वारार्गलमित्येतं मन्त्रमुक्त्वोत्तिष्ठति । एवमेतैर्वसुभ्यः प्रातःसवनसंबद्धो लोको निष्क्रीतः स्यात्तत्तस्ते | यहाँ—इस लोकमें यजमान 'मैं आयु समाप्त होनेपर—आयुके पीछे अर्थात् मरनेपर [पुण्यलोक प्राप्त करूँगा] स्वाहा' ऐसा कहकर हवन करता है। 'तुम परिघ यानी लोकद्वारकी अर्गलाको दूर करो'—इस मन्त्रको कहकर उत्थान करता है। इस प्रकार इन [साम, मन्त्र, होम और उत्थान] के द्वारा वसुओंसे प्रातःसवनसे सम्बद्ध लोक मोल |
२३८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| २३८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
|---|
| प्रातःसवनं वसवो यजमानाय सम्प्रयच्छन्ति ॥ ६ ॥ | ले लिया जाता है । तब वे वसुगण यजमानको प्रातःसवन प्रदान करते हैं ॥ ६ ॥ |
मध्याह्नसवनमें रुद्रसम्बन्धी सामगान
पुरा माध्यन्दिनस्य सवनस्योपाकरणाज्जघनेनाग्नीध्रीयस्योदङ्मुख उपविश्य स रौद्रँसामाभि गायति ॥ ७ ॥
मध्याह्नसवनका आरम्भ करनेसे पूर्व यजमान दक्षिणाग्निके पीछे उत्तराभिमुख बैठकर रुद्रदेवतासम्बन्धी सामका गान करता है ॥ ७ ॥
| तथाग्नीध्रीयस्य दक्षिणाग्नेर्जघनेनोदङ्मुख उपविश्य स रौद्रं सामाभिगायति यजमानो रुद्रदैवत्यं वैराज्याय ॥ ७ ॥ | तथा आग्नीध्रीय यानी दक्षिणाग्निके पीछेकी ओर उत्तराभिमुख बैठकर यजमान वैराज्यपदकी प्राप्तिके लिये रुद्रदेवतासम्बन्धी सामका गान करता है ॥ ७ ॥ |
—: ० :—
लो३कद्वारमपावा३र्णू ३३ पश्येम त्वा वयं वैरा ३ ३ ३ ३ ३ हु ३ म् आ ३३ ज्या ३ यो ३ आ ३ २ १ १ १ इति ॥ ८ ॥
[ हे वायो ! ] तुम अन्तरिक्षलोकका द्वार खोल दो, जिससे कि वैराज्यपदकी प्राप्तिके लिये हम तुम्हारा दर्शन कर सकें ॥ ८ ॥
अथ जुहोति नमो वायवेऽन्तरिक्षक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानस्य लोक एतास्मि ॥ ९ ॥
खण्ड २४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३९
तदनन्तर [ यजमान इस मन्त्रद्वारा ] हवन करता है—अन्तरिक्षमें रहनेवाले अन्तरिक्षलोकनिवासी वायुदेवको नमस्कार है। मुझ यजमानको तुम [ अन्तरिक्ष ] लोककी प्राप्ति कराओ। यह निश्चय ही यजमानका लोक है; मैं इसे प्राप्त करनेवाला हूँ ॥ ९ ॥
अत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहापजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै रुद्रा माध्यन्दिनँ सवनँ सम्प्रयच्छन्ति ॥ १० ॥
यहाँ यजमान, 'मैं आयु समाप्त होनेपर [ अन्तरिक्षलोक प्राप्त करूँगा ] स्वाहा' ऐसा कहकर हवन करता है और 'लोकद्वारकी अर्गलाको दूर करो' ऐसा कहकर उत्थान करता है। रुद्रगण उसे मध्याह्नसवन प्रदान करते हैं ॥ १० ॥
| अन्तरिक्षित् इत्यादि समानम् ॥ ८-१० ॥ | 'अन्तरिक्षक्षिते' इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ [ पाँचवें और छठे मन्त्रके ] समान है ॥ ८-१० ॥ |
|---|
—: ० :—
तृतीय सवनमें आदित्य और विश्वेदेवसम्बन्धी सामका गान
पुरा तृतीयसवनस्योपाकरणाज्जघनेनाहवनीयस्योदङ्मुख उपविश्य स आदित्यँ स वैश्वदेवँसामाभिगायति ॥ ११ ॥
तृतीय सवनका आरम्भ करनेसे पूर्व यजमान आहवनीयाग्निके पीछे उत्तराभिमुख बैठकर आदित्य और विश्वेदेवसम्बन्धी सामका गान करता है १ १
| तथाहवनीयस्योदङ्मुख उपविश्य स आदित्यदैवत्यमादित्यं वैश्वदेवं च सामाभिगायति क्रमेण स्वाराज्याय साम्राज्याय ॥ ११ ॥ | तथा आहवनीयाग्निके पीछे उत्तराभिमुख बैठकर वह स्वाराज्य और साम्राज्यप्राप्तिके लिये क्रमशः आदित्यदेवतासम्बन्धी तथा विश्वेदेवसम्बन्धी सामका गान करता है ॥११॥ |
|---|
२४० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २
| २४० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
|---|
लो३ कद्वारमपावा३ र्णू ३३ पश्येम त्वा वयग्ँ-
स्वारा ३३३३३ हु३ म् आ ३३ ज्या ३ यो ३ आ
३२१११ इति ॥ १२ ॥ आदित्यमथ वैश्वदेवं लो-
३ कद्वारमपावा ३ र्णू ३३ पश्येम त्वा वयग्ँ साम्रा ३ ३
३३३ हु ३ म् आ ३३ ज्या ३ यो ३ आ ३२१११
इति ॥ १३ ॥
लोकका द्वार खोल दो, जिससे हम स्वाराज्यप्राप्तिके लिये तुम्हारा दर्शन कर सकें। यह आदित्यसम्बन्धी साम है; अब विश्वेदेवसम्बन्धी साम कहते हैं—लोकका द्वार खोल दो, जिससे हम साम्राज्यप्राप्तिके लिये तुम्हारा दर्शन कर सकें ॥ १२-१३ ॥
—: ० :—
अथ जुहोति नम आदित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवेभ्यो दिविक्षिद्भ्यो लोकक्षिद्भ्यो लोकं मे यजमानाय विन्दत ॥ १४ ॥
तत्पश्चात् [ यजमान इस मन्त्रद्वारा ] हवन करता है—स्वर्गमें रहनेवाले द्युलोकनिवासी आदित्योंको और विश्वेदेवोंको नमस्कार है। मुझ यजमानको तुम पुण्यलोककी प्राप्ति कराओ ॥ १४ ॥
एष वै यजमानस्य लोक एतास्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहापहत परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति ॥१५॥
यह निश्चय ही यजमानका लोक है; मैं इसे प्राप्त करनेवाला हूँ। यहाँ यजमान 'आयु समाप्त होनेपर [मैं इसे प्राप्त करूँगा] स्वाहा'—ऐसा कहकर हवन करता है और 'लोकद्वारकी अर्गलाको दूर करो'—ऐसा कहकर उत्थान करता है ॥ १५ ॥
खण्ड २४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४१
| दिविक्षिद्भ्य इत्येवमादि समानमन्यत् । विन्दतापहतेति बहुवचनमात्रं विशेषः । याजमानं त्वेतत् । एतास्म्यत्र यजमान इत्यादिलिङ्गात् ॥ १४-१५ ॥ | ‘दिविक्षिद्भ्यः’ इत्यादि शेष सब अर्थ पहलेके ही समान है। ‘विन्दत, अपहत’ इन क्रियाओंमें बहुवचन होना ही पूर्वकी अपेक्षा विशेष है। ये मन्त्र यजमान-सम्बन्धी हैं, क्योंकि ‘मैं यजमान इस लोकको प्राप्त करनेवाला हूँ’ इत्यादि लिङ्गसे यह स्पष्ट होता है ॥ १४-१५ ॥ |
—:००:—
तस्मा आदित्याश्च विश्वे च देवास्तृतीयसवनँ सम्प्रयच्छन्त्येष ह वै यज्ञस्य मात्रां वेद य एवं वेद य एवं वेद ॥ १६ ॥
उस (यजमान) को आदित्य और विश्वेदेव तृतीय सवन प्रदान करते हैं। जो इस प्रकार जानता है, जो इस प्रकार जानता है वह निश्चय ही यज्ञकी मात्रा (यज्ञके यथार्थ स्वरूप) को जानता है ॥ १६ ॥
| एष ह वै यजमान एवंविद् यथोक्तस्य सामादेर्विद्वान्यज्ञस्य मात्रां यज्ञयाथात्म्यं वेद यथोक्तम्। य एवं वेद य एवं वेदेति द्विरुक्तिरध्यायपरिसमाप्त्यर्था ॥ १६ ॥ | एवंवित्—इस प्रकार पूर्वोक्त सामादिको जाननेवाला यह यजमान निश्चय ही यज्ञकी मात्रा—यज्ञके पूर्वोक्त यथार्थ स्वरूपको जानता है। ‘य एवं वेद य एवं वेद’ यह द्विरुक्ति अध्यायकी समाप्तिके लिये है ॥ १६ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
चतुर्विंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २४ ॥
—: ० :—
इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्य-
श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ छान्दोग्यविवरणे
द्वितीयोऽध्यायः सम्पूर्णः ॥ २ ॥
—: ० :—
तृतीय अध्याय
तृतीय अध्याय
— : ० : —
प्रथम खण्ड
मधुविद्या
| प्रकरण-सम्बन्धः (संस्कृत) | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| ॐ असौ वा आदित्य इत्याद्यध्यायारम्भे सम्बन्धः। अतीतानन्तराध्यायान्त उक्तं यज्ञस्य मात्रां वेदेति यज्ञविषयाणि च सामहोममन्त्रोत्थानानि विशिष्टफलप्राप्तये यज्ञाङ्गभूतान्युपदिष्टानि । सर्वयज्ञानां च कार्यनिर्वृत्तिरूपः सविता महत्या श्रिया दीप्यते । स एष सर्वप्राणिकर्मफलभूतः प्रत्यक्षं सर्वैरुपजीव्यते । अतो यज्ञव्यपदेशानन्तरं तत्कार्यभूतसवितृविषयमुपासनं सर्वपुरुषा- | 'ॐ असौ वा आदित्यः' इत्यादि अध्यायके आरम्भमें पूर्वोत्तर ग्रन्थका सम्बन्ध [ बतलाया जाता है ]। अव्यवहितपूर्व अध्यायके अन्तमें यह बतलाया गया है कि 'वह यज्ञके यथार्थ स्वरूपको जान जाता है। तथा उसी अध्यायमें विशिष्ट फलकी प्राप्तिके लिये यज्ञके अङ्गभूत यज्ञ-सम्बन्धी साम, होम, मन्त्र और उत्थानोंका भी उपदेश किया गया है। [ इनके द्वारा ] सम्पूर्ण यज्ञोंका कार्यनिष्पत्तिरूप [ अर्थात् सम्पूर्ण यज्ञसाधनोंका फलस्वरूप ] सूर्य महती श्रीसे दीप्त हो जाता है। वह यह सूर्यदेव सम्पूर्ण प्राणियोंके कर्मोंका फलस्वरूप है; अतः समस्त जीव प्रत्यक्ष ही इसके आश्रयसे जीवन धारण करते हैं। अतः अब यज्ञका निरूपण करनेके पश्चात् मैं उसके फलस्वरूप सूर्यकी उपासना- |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४३
| र्थेभ्यः श्रेष्ठतमफलं विधास्यामी-<br><br>त्येवमारभते श्रुतिः— | का, जो सम्पूर्ण पुरुषार्थोंसे श्रेष्ठतम फलवाली है, विधान करूँगी—इस उद्देश्यसे श्रुति आरम्भ करती है— |
|---|
आदित्यादिमें मधु आदि-दृष्टि
ॐ असौ वा आदित्यो देवमधु तस्य द्यौरेव तिरश्चीनवँशोऽन्तरिक्षमपूपो मरीचयः पुत्राः ॥ १ ॥
ॐ यह आदित्य निश्चय ही देवताओंका मधु है। द्युलोक ही उसका तिरछा बाँस है [ जिसपर कि वह लटका हुआ है ], अन्तरिक्ष छत्ता है और किरणें [ उसमें रहनेवाले ] मक्खियोंके बच्चे हैं ॥ १ ॥
| असौ वा आदित्यो देवम-<br><br>ध्वित्यादि । देवानां मोदना-<br><br>न्मध्विव मध्वसावादित्यः ।<br><br>वस्वादीनां च मोदनहेतुत्वं वक्ष्यति सर्वयज्ञफलरूपत्वादादि-<br><br>त्यस्य । | ‘असौ वा आदित्यो देवमधु’ इत्यादि। देवताओंको प्रसन्न करने-वाला होनेसे वह आदित्य मधुके समान मानो मधु है। वसु आदिको प्रसन्न करनेमें उसकी हेतुताका श्रुति आगे ( ३।६।१ में ) प्रतिपादन करेगी, क्योंकि वह आदित्य सम्पूर्ण यज्ञोंका फलरूप है। | | कथं मधुत्वम् ? इत्याह—तस्य<br><br>मधुनो द्यौरेव भ्रामरस्येव मधु-<br><br>नस्तिरश्चीनश्चासौ वंशश्चेति तिर-<br><br>श्चीनवंशः। तिर्यग्गतेव हि द्यौर्ल-<br><br>क्ष्यते । अन्तरिक्षं च मध्वपूपो | इसका मधुत्व किस प्रकार है ! यह श्रुति बतलाती है—मधुकरके मधुके समान इस मधुका द्युलोक ही तिरछा बाँस है। जो तिरश्चीन (तिरछा) हो और वंश ( बाँस ) हो उसे तिरश्चीनवंश (तिरछा बाँस) कहते हैं; क्योंकि द्युलोक तिरछा ही दिखायी देता है। तथा अन्तरिक्ष मधुका छत्ता है, वह द्युलोकरूप बाँसमें लगकर |
२४४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| २४४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
| द्युवंशे लग्नः सँल्लम्बत इवातो मध्वपूपसामान्यादन्तरिक्षं मध्वपूपो मधुनः सवितुराश्रयत्वाच्च।<br><br>मरीचयो रश्मयो रश्मिस्था आपो भौमाः सवित्राकृष्टाः “एता वा आपः स्वराजो यन्मरीचयः” इति हि विज्ञायन्ते। ता अन्तरिक्षमध्वपूपस्थरश्म्यन्तर्गतत्वाद भ्रमरबीजभूताः पुत्रा इव हिता लक्ष्यन्त इति पुत्रा इव पुत्रा मध्वपूपनाड्यन्तर्गता हि भ्रमरपुत्राः ॥ १ ॥ | मानो लटकता है, अतः मधुके छत्तेके समान होनेके कारण तथा मधुरूप सूर्यका आश्रय होनेसे भी अन्तरिक्ष-लोक ही मधुका छत्ता है।<br><br>मरीचि—किरणें अर्थात् सूर्यद्वारा खींचा हुआ उसकी किरणोंमें स्थित पार्थिव जल—जिसका कि “स्वराट् (स्वयं प्रकाश सूर्य) की जो किरणें हैं वे निश्चय ही जल हैं” इस श्रुतिद्वारा ज्ञान होता है, वह अन्तरिक्षरूप शहदके छत्तेमें स्थित किरणोंके अन्तर्गत होनेके कारण मधुकरोंके बीजभूत पुत्रों (मधुमक्खियोंके बच्चों) के समान उनमें निहित दिखायी देता है। अतः वह सूर्यरश्मिस्थ जल भ्रमरपुत्रोंके समान पुत्ररूप है, क्योंकि छत्तेके छिद्रोंमें ही भ्रमरपुत्र रहा करते हैं ॥ १ ॥ |
आदित्यकी पूर्वदिक्सम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि-दृष्टि
तस्य ये प्राञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्राच्यो मधुनाड्यः। ऋच एव मधुकृत ऋग्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपस्ता वा एता ऋचः॥ २ ॥ एतमृग्वेदम्-अभ्यतपँस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्ना-द्यँरसोऽजायत ॥ ३ ॥
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४५
उस आदित्यकी जो पूर्वदिशाकी किरणें हैं, वे ही इस (अन्तरिक्ष-रूप छत्ते) के पूर्वदिशावर्ती छिद्र हैं। ऋक् ही मधुकर हैं, ऋग्वेद ही पुष्प हैं, वे सोम आदि अमृत ही जल हैं। उन इन ऋक् [रूप मधुकरों] ने ही इस ऋग्वेदका अभिताप किया। उस अभितप्त ऋग्वेदसे यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ ॥ २-३ ॥
| तस्य सवितुर्मध्वाश्रयस्य मधुनो ये प्राञ्चः प्राच्यां दिशि-गता रश्मयस्ता एवास्य प्राच्यः प्रागञ्चनान्मधुनो नाड्यो मधु-नाड्य इव मध्वाधारच्छिद्रा-णीत्यर्थः । <br><br> तत्र ऋच एव मधुकृतो लोहितरूपं सवित्राश्रयं मधु कुर्वन्तीति मधुकृतो भ्रमरा इव । यतो रसानादाय मधु कुर्वन्ति तत्पुष्पमिव पुष्पमृ-ग्वेद एव । <br><br> तत्र ऋग्ब्राह्मणसमुदायस्यर्त्वे-दाख्यत्वाच्छब्दमात्राच्च भोग्य-रूपरसनिस्त्रावासंभवादृग्वेदशब्दे-नात्र ऋग्वेदविहितं कर्म । ततो हि कर्मफलभूतमधुरसनिस्त्राव-संभवात् । मधुकरैरिव पुष्प- | मधुके आश्रयभूत उस सूर्यरूप मधुकी जो पूर्वदिशागत किरणें हैं वे ही पूर्वकी ओर जानेके कारण इसकी पूर्व मधुनाडियाँ हैं। मधुकी नाडियोंके समान मधुनाडियाँ हैं अर्थात् वे मधुके आधारभूत छिद्र हैं। <br><br> तहाँ ऋचाएँ ही मधुकर हैं, वे सूर्यमें रहनेवाला लोहितरूप मधु उत्पन्न करती हैं, अतः भ्रमरोंके समान वे ही मधुकर हैं। जिससे रसोंको ग्रहण करके वे मधु करती हैं वह ऋग्वेद ही पुष्पके समान पुष्प है। <br><br> किंतु यहाँ ऋग्ब्राह्मणसमुदायका ही नाम ऋग्वेद है और केवल शब्द-से ही भोग्यरूप रसका निकलना असम्भव है; अतः 'ऋग्वेद' शब्दसे यहाँ ऋग्वेदविहित कर्म अभिप्रेत है, क्योंकि उसीसे कर्मफलभूत मधुरूप रसका निकलना सम्भव है। मधुकरोंके समान उस पुष्प |
२४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| २४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| स्थानीयादृग्वेदविहितात्कर्मण अप आदाय ऋग्भिर्मधु निर्वर्त्यते। | स्थानीय ऋग्वेदविहित कर्मसे ही रस ग्रहण करके ऋचाओंद्वारा मधु तैयार किया जाता है। |
| कास्ता आपः ? इत्याह—ताः कर्मणि प्रयुक्ताः सोमाज्यपयोरूपा अग्नौ प्रक्षिप्तास्तत्पाकाभिनिर्वृत्ता अमृता अमृतार्थत्वादत्यन्तरसवत्य आपो भवन्ति। तद्रसानादाय ता वा एता ऋचः पुष्पेभ्यो रसमाददाना इव भ्रमरा ऋचः एतमृग्वेद-मृग्वेदविहितं कर्म पुष्पस्थानीयम् अभ्यतपन्नभितापं कृतवत्य इवैता ऋचः कर्मणि प्रयुक्ताः। | वे रस क्या हैं ? सो श्रुति बतलाती है—वे कर्मोंमें प्रयुक्त अर्थात् अग्निमें डाले हुए सोम, घृत एवं दुग्धरूप रस अग्निपाकसे निष्पन्न हुए अमृत होते हैं अर्थात् अमृतत्व ( मोक्ष ) के हेतु होनेके कारण वे [ अमृतसंज्ञक ] जल अत्यन्त रसमय होते हैं। उन रसोंको ही ग्रहण करके इन ऋचाओंने—पुष्पोंसे रस ग्रहण करनेवाले भ्रमरोंके समान इन ऋचाओंने इस ऋग्वेदको—पुष्पस्थानीय ऋग्वेदविहित कर्मको अभितप्त किया अर्थात् कर्ममें प्रयुक्त हुई इन ऋचाओंने मानो उनका अभिताप किया। |
| ऋग्भिर्हि मन्त्रैः शस्त्राद्यङ्गभावमुपगतैः क्रियमाणं कर्म मधुनिर्वर्तकं रसं मुञ्चतीत्युपपद्यते पुष्पाणीव भ्रमरैराचूष्यमाणानि। तदेतदाह—तस्यग्वेदस्याभितप्तस्य, कोऽसौ रसः? य | शस्त्रादि यज्ञाङ्गभावको प्राप्त हुए ऋगादि मन्त्रोंद्वारा ही किया हुआ कर्म भ्रमरोंसे चूसे जाते हुए पुष्पोंके समान मधु बनानेवाला रस छोड़ता है—यह कथन ठीक ही है। इसी बातको यह श्रुति बतलाती है—उस अभितप्त ऋग्वेदका वह कौन-सा रस |
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४७
| ऋङ्मधुकराभितापनिःसृत इत्युच्यते ।<br><br>यशो विश्रुतत्वं तेजो देहगता दीप्तिरिन्द्रियं सामर्थ्योपेतैरिन्द्रियैरवैकल्यं वीर्यं सामर्थ्यं बलमित्यर्थः, अन्नाद्यमन्नं च तदाद्यं च येनोपयुज्यमानेनाहन्यहनि देवानां स्थितिः स्यात्तदन्नाद्यमेष रसोऽजायत यागादिलक्षणात् कर्मणः ॥ २-३ ॥ | है ? जो ऋग्रूप मधुकरके अभितापसे निकला हुआ है—ऐसा कहा जाता है ।<br><br>उस यागादिरूप कर्मसे यश—विख्याति, तेज—देहगत दीप्ति, इन्द्रिय—सामर्थ्ययुक्त इन्द्रियोंके कारण—अविकलता, वीर्य—सामर्थ्य यानी बल और अन्नाद्य—जो अन्न हो और खाद्य (भक्ष्य) भी हो, जिसका प्रतिदिन उपयोग किये जानेपर देवताओंकी स्थिति हो उसे अन्नाद्य कहते हैं—ऐसा रस उत्पन्न हुआ ॥ २-३ ॥ |
—: ० :—
तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य रोहितꣳरूपम् ॥ ४ ॥
वह (यश आदि रस) विशेषरूपसे गया। उसने [जाकर] आदित्यके [पूर्व] भागमें आश्रय लिया। यह जो आदित्यका रोहित (लाल) रूप है वही यह (रस) है ॥ ४ ॥
| यशआद्यन्नाद्यपर्यन्तं तद्व्यक्षरद्विशेषेणाक्षरद्गमत् । गत्वा च तदादित्यमभितः पार्श्वतः पूर्वभागं सवितुरश्रयदाश्रितवदित्यर्थः । अमुष्मिन्नादित्ये संचितं | यशसे लेकर अन्नाद्यपर्यन्त वह रस ‘व्यक्षरत्’ विशेषरूपसे गया। उसने जाकर सूर्यको पार्श्वतः सूर्यके पूर्वभागको आश्रित किया, ऐसा इसका तात्पर्य है । हम इस आदित्यमें संचित हुए कर्मफलसंज्ञक |
२४८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| २४८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
| कर्मफलाख्यं मधु भोक्ष्यामह इत्येवं हि यशआदिलक्षणफलप्राप्तये कर्माणि क्रियन्ते मनुष्यैः केदारनिष्पादनमिव कर्षकैः । तत्प्रत्यक्षं प्रदर्श्यते श्रद्धाहेतोस्तद्वा एतत् । किं तत् ? यदेतदादित्यस्योद्यतो दृश्यते रोहितं रूपम् ॥ ४ ॥ | मधुको भोगेंगे—इस प्रकार यश आदिरूप फलकी प्राप्तिके लिये मनुष्योंद्वारा कर्म किये जाते हैं, जैसे कि कृषकलोग-[धान्यादिकी प्राप्तिके लिये] क्यारियाँ बनाते हैं। श्रद्धाकी उत्पत्तिके लिये अब उसे प्रत्यक्ष प्रदर्शित किया जाता है—वह निश्चय यह है। वह क्या है ? यह जो उदित होते हुए सूर्यका रोहित (लाल) रूप देखा जाता है ॥ ४ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
प्रथमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १ ॥
द्वितीय खण्ड
—: ० :—
आदित्यकी दक्षिणदिक्सम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि-दृष्टि
अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मयस्ता एवास्य दक्षिणा मधुनाड्यो यजूंष्येव मधुकृतो यजुर्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥
तथा इसकी जो दक्षिण दिशाकी किरणें हैं वे ही इसकी दक्षिण-दिशावर्तिनी मधुनाडियाँ हैं, यजुःश्रुतियाँ ही मधुकर हैं, यजुर्वेद ही पुष्प है तथा वह [सोमादिरूप] अमृत ही आप है ॥ १ ॥
| अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मय इत्यादि समानम् । यजूंष्येव मधुकृतो यजुर्वेदविहिते कर्मणि प्रयुक्तानि । पूर्ववन्मधुकृत इव । यजुर्वेदविहितं कर्म पुष्पस्थानीयं पुष्पमित्युच्यते । ता एव सोमाद्या अमृता आपः ॥ १ ॥ | 'अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मयः' इत्यादि श्रुतिका अर्थ पूर्ववत है । यजुःश्रुतियाँ ही मधुकर हैं अर्थात् यजुर्वेदविहित कर्मोंमें प्रयुक्त यजुर्मन्त्र ही पूर्ववत् मधुकरोंके समान हैं । यजुर्वेदविहित कर्म ही पुष्पस्थानीय होनेके कारण 'पुष्प है' ऐसा कहा जाता है। तथा वे सोम आदि अमृत ही आप हैं ॥ १ ॥ |
—: ० :—
तानि वा एतानि यजूंष्येतं यजुर्वेदमभ्यतपँस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यँरसोऽजा-
२५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
| २५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
यत ॥ २ ॥ तद्व्यक्षरंत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य शुक्लं रूपम् ॥ ३ ॥
उन इन यजुःश्रुतियोंने इस यजुर्वेदका अभिताप किया । उस अभितप्त यजुर्वेदसे यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ । उस रसने विशेषरूपसे गमन किया और आदित्यके निकट [ दक्षिण ] भागमें आश्रय लिया । यह जो आदित्यका शुक्ल रूप है वह वही है ॥ २-३ ॥
| तानि वा एतानि यजूंष्येतं यजुर्वेदमभ्यतपन्नित्येवमादि सर्वं समानम् । मध्वेतदादित्यस्य दृश्यते शुक्लं रूपम् ॥ २-३ ॥ | उन यजुःश्रुतियोंने ही इस यजुर्वेदको अभितप्त किया—इत्यादि प्रकारसे यह सब अर्थ पूर्ववत है । यह जो आदित्यका शुक्लरूप दिखायी देता है मधु है ॥ २-३ ॥ |
—: ० :—
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये द्वितीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २ ॥
तृतीय खण्ड
—: ✤ :—
आदित्यकी पश्चिमदिक्सम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि-दृष्टि
अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्रतीच्यो मधुनाड्यः सामान्येव मधुकृतः सामवेद एव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥
तथा ये जो इसकी पश्चिम ओरकी रश्मियाँ हैं वे ही इसकी पश्चिमीय मधुनाडियाँ हैं। सामश्रुतियाँ ही मधुकर हैं, सामवेदविहित कर्म ही पुष्प है तथा वह [ सोमादिरूप ] अमृत ही आप.है ॥ १ ॥
तानि वा एतानि सामान्येतग्ँसामवेदमभ्यतपग्ँस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यग्ँरसोऽजायत ॥ २ ॥
उन इन सामश्रुतियोंने ही इस सामवेदविहित कर्मका अभिताप किया। उस अभितप्त सामवेदसे ही यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ ॥ २ ॥
तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य कृष्णग्ँरूपम् ॥ ३ ॥
उस रसने विशेषरूपसे गमन किया और आदित्यके समीप [पश्चिम] भागमें आश्रय लिया। यह जो आदित्यका कृष्ण तेज है यह वही है ॥ ३ ॥
| अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मय इत्यादि समानम्। तथा साम्नां मधु एतदादित्यस्य कृष्णं रूपम् ॥ १–३ ॥ | ‘अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मयः’इत्यादि श्रुतियोंका अर्थ पूर्ववत है। तथा सामश्रुतियोंका जो मधु है वही यह आदित्यका कृष्ण तेज है ॥१-३॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
तृतीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥
चतुर्थ खण्ड
—: ० :—
आदित्यकी उत्तरदिक्सम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि-दृष्टि
अथ येऽस्योदञ्चो रश्मयस्ता एवास्योदीच्यो मधुनाड्योऽथर्वाङ्गिरस एव मधुकृत इतिहासपुराणं पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥
तथा इसकी जो उत्तर दिशाकी किरणें हैं वे ही इसकी उत्तरदिशाकी मधुनाडियाँ हैं। अथर्वाङ्गिरस श्रुतियाँ ही मधुकर हैं, इतिहास-पुराण ही पुष्प हैं तथा वह [ सोमादिरूप ] अमृत ही आप है ॥ १ ॥
ते वा एतेऽथर्वाङ्गिरस एतदितिहासपुराणमभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यꣳरसोऽजायत ॥ २ ॥
उन इन अथर्वाङ्गिरस श्रुतियोंने ही इस इतिहास-पुराणको अभितप्त किया। उस अभितप्त हुए [ इतिहास-पुराणरूप पुष्प ] से ही यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रसकी उत्पत्ति हुई ॥ २ ॥
तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य परं कृष्णꣳरूपम् ॥ ३ ॥
उस रसने विशेषरूपसे गमन किया और आदित्यके निकट [ उत्तर ] भागमें आश्रय लिया। यह जो आदित्यका अत्यन्त कृष्ण रूप है यह वही है ॥ ३ ॥
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २५३
| अथ येऽस्योदञ्चो रश्मय इत्यादि समानम् । अथर्वाङ्गिरसोऽथर्वाङ्गिरसा च दृष्टा मन्त्रा अथर्वाङ्गिरसः कर्माणि प्रयुक्ता मधुकृतः । इतिहासपुराणं पुष्पम् । तयोश्चेतिहासपुराणयोरश्वमेधे पारिप्लवासु रात्रिषु कर्माङ्गत्वेन विनियोगः सिद्धः । मध्वेवेदादित्यस्य परं कृष्णं रूपमतिशयेन कृष्णमित्यर्थः ॥ १-३ ॥ | ‘अथ येऽस्योदञ्चो रश्मयः’ इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ पूर्ववत् है । अथर्वाङ्गिरसः—अथर्वा और अङ्गिरा ऋषियोंके प्रत्यक्ष किये हुए मन्त्र अथर्वाङ्गिरस कहलाते हैं; कर्ममें प्रयुक्त हुए वे ही मन्त्र मधुकर हैं। इतिहास-पुराण ही पुष्प हैं। उन इतिहास और पुराणोंका अश्वमेध यज्ञमें पारिप्लवा रात्रियोंमें* कर्माङ्गरूपसे विनियोग प्रसिद्ध ही है। इस आदित्यका जो परम कृष्ण अर्थात् अतिशय कृष्ण रूप है वही मधु है ॥ १-३ ॥ |
<div align="center">—: ० :—
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये चतुर्थखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ४ ॥
</div>* अश्वमेधयज्ञ बहुत दिनोंमें समाप्त होता है। उसके अनुष्ठानमें चुपचाप बैठे-बैठे यज्ञकर्ताओंको आलस्य आने लगता है। उसकी निवृत्तिके लिये श्रुतिने रात्रिके समय इतिहास-पुराणादिश्रवणका विधान किया है। विविध उपाख्यानादिके समुदायका नाम ‘पारिप्लव’ है; जिन रात्रियोंमें उनके श्रवणका विधान है वे ‘पारिप्लवा रात्रियाँ’ कहलाती हैं।
पञ्चम
आदित्यकी ऊर्ध्वदिक्सम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि-दृष्टि
अथ येऽस्योध्र्वा रश्मयस्ता एवास्योर्ध्वा मधुनाड्यो गुह्या एवादेशा मधुकृतो ब्रह्मैव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥
तथा इसकी जो ऊर्ध्वरश्मियाँ हैं वे ही इसकी ऊपरकी ओरकी मधुनाडियाँ हैं। गुह्य आदेश ही मधुकर हैं; [ प्रणवरूप ] ब्रह्म ही पुष्प है तथा वह [ सोमादिरूप ] अमृत ही आप है ॥ १ ॥
ते वा एते गुह्या आदेशा एतद्ब्रह्माभ्यतपंस्तस्याभि-तप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यꣳरसोऽजायत ॥ २ ॥
उन इन गुह्य आदेशोंने ही इस [ प्रणवसंज्ञक ] ब्रह्मको अभितप्त किया। उस अभितप्त ब्रह्मसे ही यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ ॥ २ ॥
तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदा-दित्यस्य मध्ये क्षोभत इव ॥ ३ ॥
उस रसने विशेषरूपसे गमन किया और वह आदित्यके निकट [ ऊर्ध्व ] भागमें आश्रित हुआ। यह जो आदित्यके मध्यमें क्षुब्ध-सा होता है यही वह (मधु) है ॥ ३ ॥
| अथ येऽस्योध्र्वा रश्मय इत्यादि पूर्ववत् । गुह्या गोप्य रहस्या एवादेशा लोकद्वारीयादिविधय | 'अथ येऽस्योध्र्वा रश्मयः' इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ पूर्ववत् है। गुह्य—गोपनीय अर्थात् रहस्यभूत जो आदेश हैं यानी जो लोकद्वारीयादि* |
* 'लोकद्वारमपावृणु पश्येम त्वा वयम्' (लोकका द्वार खोल दे; जिससे हम तुझे देखें) इत्यादि ही 'लोकद्वारीयादि विधियाँ' हैं।
खण्ड ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३५५
| उपासनानि च कर्माङ्गविषयाणि मधुकृतः । ब्रह्मैव शब्दाधिकारात् प्रणवाख्यं पुष्पं समानमन्यत् । मध्वेतदादित्यस्य मध्ये क्षोभत इव समाहितदृष्टैर्दृश्यते सञ्चलतीव ॥ १-३ ॥ | विधियाँ और कर्माङ्गसम्बन्धिनी उपासनाएँ हैं वे ही मधुकर हैं। ब्रह्म शब्दका अधिकार होनेसे प्रणवसंज्ञक ब्रह्म ही पुष्प है। शेष अर्थ पूर्ववत् है। समाहितदृष्टि पुरुषको इस आदित्यके मध्यमें जो क्षुभित अर्थात् संचलित-सा होता दिखायी देता है वही मधु है॥१-३॥ |
ते वा एते रसानाꣳरसा वेदा हि रसास्तेषामेते रसास्तानि वा एतान्यमृतानाममृतानि वेदा ह्यमृतास्तेषामेतान्यमृतानि ॥ ४ ॥
वे ये [ पूर्वोक्त लोहितादि रूप ] ही रसोंके रस हैं, वेद ही रस हैं और ये उनके भी रस हैं। वे ही ये अमृतोंके अमृत हैं—वेद ही अमृत हैं और ये उनके भी अमृत हैं ॥ ४ ॥
| ते वा एते यथोक्ता रोहितादिरूपविशेषा रसानां रसाः । केषां रसानाम् ? इत्याह—वेदा हि यस्माल्लोकनिष्यन्दत्वात्सारा इति रसास्तेषां रसानां कर्मभावमापन्नानामप्येते रोहितादिविशेषा रसा अत्यन्तसारभूता इत्यर्थः । | वे ये पूर्वोक्त रोहितादि रूप विशेष ही रसोंके रस हैं। किन रसोंके रस हैं ? ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति कहती है—क्योंकि लोकोंके सारभूत होनेके कारण वेद ही सार अर्थात् रस हैं और कर्मभावको प्राप्त हुए उन रसोंके भी वे रोहितादि रूप-विशेष रस यानी अत्यन्त सारभूत हैं। |