छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 253, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय खण्ड
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आदित्यकी दक्षिणदिक्सम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि-दृष्टि
अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मयस्ता एवास्य दक्षिणा मधुनाड्यो यजूंष्येव मधुकृतो यजुर्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥
तथा इसकी जो दक्षिण दिशाकी किरणें हैं वे ही इसकी दक्षिण-दिशावर्तिनी मधुनाडियाँ हैं, यजुःश्रुतियाँ ही मधुकर हैं, यजुर्वेद ही पुष्प है तथा वह [सोमादिरूप] अमृत ही आप है ॥ १ ॥
| अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मय इत्यादि समानम् । यजूंष्येव मधुकृतो यजुर्वेदविहिते कर्मणि प्रयुक्तानि । पूर्ववन्मधुकृत इव । यजुर्वेदविहितं कर्म पुष्पस्थानीयं पुष्पमित्युच्यते । ता एव सोमाद्या अमृता आपः ॥ १ ॥ | 'अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मयः' इत्यादि श्रुतिका अर्थ पूर्ववत है । यजुःश्रुतियाँ ही मधुकर हैं अर्थात् यजुर्वेदविहित कर्मोंमें प्रयुक्त यजुर्मन्त्र ही पूर्ववत् मधुकरोंके समान हैं । यजुर्वेदविहित कर्म ही पुष्पस्थानीय होनेके कारण 'पुष्प है' ऐसा कहा जाता है। तथा वे सोम आदि अमृत ही आप हैं ॥ १ ॥ |
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तानि वा एतानि यजूंष्येतं यजुर्वेदमभ्यतपँस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यँरसोऽजा-