छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 243, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड २४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३९
तदनन्तर [ यजमान इस मन्त्रद्वारा ] हवन करता है—अन्तरिक्षमें रहनेवाले अन्तरिक्षलोकनिवासी वायुदेवको नमस्कार है। मुझ यजमानको तुम [ अन्तरिक्ष ] लोककी प्राप्ति कराओ। यह निश्चय ही यजमानका लोक है; मैं इसे प्राप्त करनेवाला हूँ ॥ ९ ॥
अत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहापजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै रुद्रा माध्यन्दिनँ सवनँ सम्प्रयच्छन्ति ॥ १० ॥
यहाँ यजमान, 'मैं आयु समाप्त होनेपर [ अन्तरिक्षलोक प्राप्त करूँगा ] स्वाहा' ऐसा कहकर हवन करता है और 'लोकद्वारकी अर्गलाको दूर करो' ऐसा कहकर उत्थान करता है। रुद्रगण उसे मध्याह्नसवन प्रदान करते हैं ॥ १० ॥
| अन्तरिक्षित् इत्यादि समानम् ॥ ८-१० ॥ | 'अन्तरिक्षक्षिते' इत्यादि मन्त्रोंका अर्थ [ पाँचवें और छठे मन्त्रके ] समान है ॥ ८-१० ॥ |
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तृतीय सवनमें आदित्य और विश्वेदेवसम्बन्धी सामका गान
पुरा तृतीयसवनस्योपाकरणाज्जघनेनाहवनीयस्योदङ्मुख उपविश्य स आदित्यँ स वैश्वदेवँसामाभिगायति ॥ ११ ॥
तृतीय सवनका आरम्भ करनेसे पूर्व यजमान आहवनीयाग्निके पीछे उत्तराभिमुख बैठकर आदित्य और विश्वेदेवसम्बन्धी सामका गान करता है १ १
| तथाहवनीयस्योदङ्मुख उपविश्य स आदित्यदैवत्यमादित्यं वैश्वदेवं च सामाभिगायति क्रमेण स्वाराज्याय साम्राज्याय ॥ ११ ॥ | तथा आहवनीयाग्निके पीछे उत्तराभिमुख बैठकर वह स्वाराज्य और साम्राज्यप्राप्तिके लिये क्रमशः आदित्यदेवतासम्बन्धी तथा विश्वेदेवसम्बन्धी सामका गान करता है ॥११॥ |
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