छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 240, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| २३६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| पुरा पूर्वं प्रातरनुवाकस्य शस्त्रस्य प्रारम्भाज्जघनेन गार्हपत्यस्य पश्चादुदङ्मुखः संन्नुपविश्य स वासवं वसुदैवत्यं सामाभिगायति ॥ ३ ॥ | प्रातरनुवाकसे पूर्व अर्थात् प्रातःकालमें पढ़े जाने योग्य 'शस्त्र'* नामक स्तोत्रपाठसे पूर्व गार्हपत्याग्निके पीछेकी ओर उत्तराभिमुख बैठकर वह यजमान वासव—वसुदेवतासम्बन्धी सामका गान करता है ॥ ३ ॥ |
लो ३ कद्वारमपावा ३ र्णू ३ ३ पश्येम त्वा वयँरा ३ ३ ३ ३ ३ हु ३ म्आ ३ ३ ज्या ३ यो ३ आ ३ २ १ १ १ इति ॥४॥
[ हे अग्ने ! ] तुम इस लोकका द्वार खोल दो; जिससे कि हम राज्यप्राप्तिके लिये तुम्हारा दर्शन कर लें ॥ ४ ॥
| लोकद्वारमस्य पृथिवीलोकस्य प्राप्तये द्वारमपावृणु हेऽग्ने तेन द्वारेण पश्येम त्वा त्वां राज्यायेति ॥ ४ ॥ | हे अग्ने ! तुम लोकद्वार—इस पृथिवीलोककी प्राप्तिके लिये, इसका द्वार खोल दो। उस द्वारसे हम राज्यप्राप्तिके लिये तुम्हारा दर्शन करें ॥४॥ |
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अथ जुहोति नमोऽग्नये पृथिवीक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानस्य लोक एतास्मि ॥५॥
तदनन्तर [ यजमान इस मन्त्रद्वारा ] हवन करता है—पृथिवीमें रहनेवाले इहलोकनिवासी अग्निदेवको नमस्कार है। मुझ यजमानको तुम [ पृथिवी ] लोककी प्राप्ति कराओ। यह निश्चय ही यजमानका लोक है, मैं इसे प्राप्त करनेवाला हूँ ॥ ५ ॥
* जिन ऋक्-मन्त्रोंका गान नहीं किया जाता उन्हें 'शस्त्र' कहते हैं और जिन शस्त्रोंका प्रातःकाल पाठ किया जाता है उनका नाम 'प्रातरनुवाक' है।