छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 239, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड २४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २३५
| सामादिविज्ञानस्तुतिपरत्वा- <br> न्नाविदुषः कर्तृत्वं कर्ममात्रविदः <br> प्रतिषिध्यते । स्तुतये च सामा- <br> दिविज्ञानस्याविद्वत्कर्तृत्वप्रतिषे- <br> धाय चेति हि भिद्येत वाक्यम् । <br> आद्ये चौषस्त्ये काण्डेऽविदु- <br> षोऽपि कर्मास्तीति हेतुमवो- <br> चाम । अथैतद्वक्ष्यमाणं सामा- <br> द्युपायं विद्वान् कुर्यात् ॥ २ ॥ | [ यह वाक्य ] सामादिविज्ञानकी <br> स्तुति करनेवाला है, अतः इसके <br> द्वारा केवल कर्ममात्रके ज्ञाता अज्ञानी- <br> के कर्तृत्वका प्रतिषेध नहीं किया <br> जाता। '[यह वाक्य] सामादिविज्ञान- <br> की स्तुतिके लिये है और अविद्वान्के <br> कर्म-कर्तृत्वका प्रतिषेध करनेके लिये <br> भी है' यदि ऐसा माना जाय तो <br> वाक्य भेद हो जायगा; क्योंकि प्रथम <br> अध्यायके औषस्त्यकाण्डमें (दशम <br> खण्डमें) कर्म अविद्वान्के भी लिये <br> है—ऐसा हमने [कर्मानुष्ठानमें] हेतु <br> बतलाया है। अतः आगे बतलाये <br> जानेवाले सामादि उपायोंको जानने- <br> वाला होकर ही कर्म करे ॥ २ ॥ |
प्रातःसवनमें वसुदेवतासम्बन्धी सामगान
| किं तद्वेद्यम् ? इत्याह— | वह उसका ज्ञातव्य साम क्या <br> है ? सो श्रुति बतलाती है— |
पुरा प्रातरनुवाकस्योपाकरणाज्जघनेन गार्हपत्यस्यो- <br> दङ्मुख उपविश्य स वासवँसामाभिगायति ॥ ३ ॥
प्रातरनुवाकका आरम्भ करनेसे पूर्व वह (यजमान) गार्हपत्याग्निके पीछेकी ओर उत्तराभिमुख बैठकर वसुदेवतासम्बन्धी सामका गान करता है ॥ ३ ॥