छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 238, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| २३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| माध्यन्दिनसवनेशानैरन्तरिक्ष-<br><br>लोकः । आदित्यैश्च विश्वैर्देवैश्च<br><br>तृतीयसवनेशानैस्तृतीयो लोको<br><br>वशीकृतः । इति यजमानस्य<br><br>लोकोऽन्यःपरिशिष्टो न विद्यते । १॥ | अन्तरिक्षलोक और तृतीय सवन-<br><br>के स्वामी आदित्यों एवं विश्वेदेवों-<br><br>द्वारा तृतीय लोक अपने अधीन<br><br>किया हुआ है । इस प्रकार यजमान-<br><br>के लिये इनके अधिकारसे बचा<br><br>हुआ कोई दूसरा लोक नहीं है ॥१॥ |
<div align="center">—: ० :—</div>साम आदिको जाननेवाला ही यज्ञ कर सकता है
क्व तर्हि यजमानस्य लोक इति स यस्तं न विद्यात्कथं कुर्यादथ विद्वान्कुर्यात् ॥ २ ॥
तो फिर यजमानका लोक कहाँ है ? जो यजमान उस लोकको नहीं जानता वह किस प्रकार यज्ञानुष्ठान करेगा ? अतः उसे जाननेवाला ही यज्ञ करेगा ॥ २ ॥
| अतः क्व तर्हि यजमानस्य<br><br>लोको यदर्थं यजते । न क्वचि-<br><br>ल्लोकोऽस्तीत्यभिप्रायः।"लोकाय<br><br>वै यजते यो यजते" इति श्रुतेः;<br><br>लोकाभावे च स यो यजमानस्तं<br><br>लोकस्वीकरणोपायं सामहोम-<br><br>मन्त्रोत्थानलक्षणं न विद्यान्न<br><br>विजानीयात्सोऽज्ञः कथं कुर्या-<br><br>द्यज्ञम् । न कथञ्चन तस्य कर्तृत्व-<br><br>मुपपद्यत इत्यर्थः । | अतः यजमानका वह लोक कहाँ<br><br>है जिसके लिये वह यज्ञानुष्ठान<br><br>करता है ? तात्पर्य यह है कि वह<br><br>लोक कहीं नहीं है । किंतु "जो भी<br><br>यज्ञ करता है वह पुण्यलोकके ही<br><br>लिये करता है" ऐसी श्रुति होनेके<br><br>कारण जो यजमान लोकका अभाव<br><br>होनेसे साम, होम, मन्त्र और<br><br>उत्थानरूप लोकस्वीकृतिके उपायको<br><br>नहीं जानता वह अज्ञानी किस प्रकार<br><br>यज्ञानुष्ठान कर सकता है ? तात्पर्य<br><br>यह है कि उसका कर्तृत्व किसी<br><br>प्रकार सम्भव नहीं है । |