छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 237, कुल 978 में से
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चतुर्विंश खण्ड
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| सामोपासनप्रसङ्गेन कर्मगुणभूतत्वान्निवर्स्योङ्कारं परमात्मप्रतीकत्वादमृतत्वहेतुत्वेन महीकृत्य प्रकृतस्यैव यज्ञस्याङ्गभूतानि सामहोममन्त्रोत्थानान्युपदिदिक्षन्नाह— | सामोपासनाके प्रसङ्गसे कर्मका गुणभूत (अङ्ग) हो जानेके कारण अब ओङ्कारको [उपासनाकाण्डसे] निवृत्त कर वह परमात्माका प्रतीक होनेके कारण अमृतत्वका साधन है— इस प्रकार उसे महान् बताकर प्रकरण-प्राप्त यज्ञके ही अङ्गभूत साम, होम, मन्त्र और उत्थानोंका उपदेश करनेकी इच्छासे श्रुति कहती है— |
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सवनोंके अधिकारी देवता
ब्रह्मवादिनो वदन्ति यद्वसूनां प्रातःसवनꣳरुद्राणां माध्यन्दिनꣳसवनमादित्यानां च विश्वेषां च देवानां तृतीयसवनम् ॥ १ ॥
ब्रह्मवादी कहते हैं कि प्रातःसवन वसुओंका है, मध्याह्नसवन् रुद्रोंका है तथा तृतीय सवन आदित्य और विश्वेदेवोंका है ॥ १ ॥
| ब्रह्मवादिनो वदन्ति यत्प्रातःसवनं प्रसिद्धं तद्वसूनाम् । तैश्च प्रातःसवनसंबद्धोऽयं लोको वशीकृतः सवनेशानैः । तथा रुद्रै- | ब्रह्मवादी लोग कहते हैं कि जो प्रातःसवन प्रसिद्ध है वह वसुओंका है । उन सवनके अधीश्वरोंद्वारा यह प्रातःसवनसम्बन्धी लोक अपने वशीभूत किया हुआ है । तथा मध्याह्नसवनके अधीश्वर रुद्रोंद्वारा |
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