भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 236, कुल 978 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 236
२३२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २

| संतृण्णा । “अकारो वै सर्वा वाक्” इत्यादिश्रुतेः । | सम्पूर्ण वाक्—शब्दसमूह व्याप्त है, जैसा कि "अकार ही सम्पूर्ण वाक् है"इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है। | | परमात्मविकारश्च नामधेयमात्रमित्यत ॐकार एवेदँ सर्वमिति । द्विरभ्यास आदरार्थः । लोकादिनिष्पादनकथनमोङ्कारस्तुत्यर्थमिति ॥३॥ | जितना नामधेयमात्र है सब परमात्माका ही विकार है। अतः यह सब ओङ्कार ही है। द्विरुक्ति आदरके लिये है। तथा लोकादिको प्राप्त कराना आदि जो कहा गया है वह ओंकारकी स्तुतिके लिये है॥३॥ |

<div align="center">

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
त्रयोविंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २३ ॥

</div>