छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 235, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड २३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३१
| दित्यर्थः । तामभ्यतपत्, पूर्ववत् । तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि संप्रास्रवन्त भूर्भुवः स्वरिति व्याहृतयः ॥ २ ॥ | प्रतिभान हुआ । प्रजापतिने पूर्ववत् उसके उद्देश्यसे भी तप किया । उस अभितप्त त्रयीविद्यासे भूः, भुवः और स्वः—ये व्याहृतिरूप अक्षर उत्पन्न हुए ॥ २ ॥ |
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ओंकारकी उत्पत्ति
तान्यभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्य ॐकारः संप्रास्रवत्तद्यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि संतृण्णान्येवमोङ्कारेण सर्वा वाक्संतृण्णोङ्कार एवेदꣳसर्वमोङ्कार एवेदꣳसर्वम् ॥ ३ ॥
[ फिर प्रजापतिने ] उन अक्षरोंका आलोचन किया । उन आलोचित अक्षरोंसे ओङ्कार उत्पन्न हुआ । जिस प्रकार शङ्कुओं (नसों) द्वारा सम्पूर्ण पत्ते व्याप्त रहते हैं उसी प्रकार ओङ्कारसे सम्पूर्ण वाक् व्याप्त है । ओङ्कार ही यह सब कुछ है—ओङ्कार ही यह सब कुछ है ॥ ३ ॥
| तान्यक्षराण्यभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्य ॐकारः संप्रास्रवत्तद्ब्रह्म कीदृशम् ? इत्याह—तद्यथा शङ्कुना पर्णनालेन सर्वाणि पर्णानि पत्रावयवजातानि संतृण्णानि विद्धानि व्याप्तानीत्यर्थः । एवमोङ्कारेण ब्रह्मणा परमात्मनः प्रतीकभूतेन सर्वा वाक्शब्दजातं | [ फिर उसने ] उन अक्षरोंकी आलोचना की । उन आलोचित अक्षरोंसे ओङ्कार उत्पन्न हुआ । वह [ ओङ्काररूप ] ब्रह्म कैसा है इसपर श्रुति कहती है—जिस प्रकार शङ्कु—पत्तेकी नसोंसे सम्पूर्ण पत्ते—पत्तोंके अवयवसमूह अनुविद्ध अर्थात् व्याप्त रहते हैं, इसी प्रकार परमात्माके प्रतीकभूत ओङ्काररूप ब्रह्मद्वारा |