छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 234, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| २३० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| एव हि स एकत्वदर्शने जाते "अपागादग्नेरग्नित्वम्" इति श्रुतेः। अतो न दोषभाग्गृहस्थः परिव्रजन्निति ॥ १ ॥ | द्वारा उच्छिन्न कर दिया जानेके कारण वह अग्नि एकत्वदर्शन होनेपर स्वतः ही त्यक्त हो जाता है, जैसा कि "अग्निका अग्नित्व निवृत्त हो गया" ऐसी श्रुतिसे सिद्ध होता है। अतः परिव्राजक होनेसे गृहस्थ दोषका भागी नहीं होता ॥ १ ॥ |
त्रयीविद्या और व्याहृतियोंकी उत्पत्ति
| यत्संस्थोऽमृतत्वमेति तन्निरूपणार्थमाह— | जिसमें स्थित हुआ पुरुष अमृतत्व प्राप्त कर लेता है उसका निरूपण करनेके लिये श्रुति कहती है— |
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प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या संप्रास्रवत्तामभ्यतपत्तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि संप्रास्रवन्त भूर्भुवः स्वरिति ॥ २ ॥
प्रजापतिने लोकोंके उद्देश्यसे ध्यानरूप तप किया। उन अभितप्त लोकोंसे त्रयी विद्याकी उत्पत्ति हुई तथा उस अभितप्त त्रयी विद्यासे 'भूः, भुवः और स्वः' ये अक्षर उत्पन्न हुए ॥ २ ॥
| प्रजापतिर्विराट् कश्यपो वा। लोकानुद्दिश्य तेषु सारजिघृक्षयाभ्यतपदभितापं कृतवान्ध्यानं तपः कृतवानित्यर्थः। तेभ्योऽभितप्तेभ्यः सारभूता त्रयी विद्या संप्रास्रवत्प्रजापतेर्मनसि प्रत्यभा- | प्रजापति अर्थात् विराट् या कश्यपजीने लोकोंके उद्देश्यसे—उनमेंसे सार ग्रहण करनेकी इच्छासे अभिताप किया अर्थात् ध्यानरूप तप किया। इस प्रकार अभितप्त हुए उन भूतोंसे उनकी सारभूता त्रयीविद्या प्रादुर्भूत हुई; तात्पर्य यह कि प्रजापतिके मनमें त्रयीविद्याका |
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