छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 233, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड २३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२९
| [सांख्यबौद्धाज्ञकर्तृककर्मत्यागस्य मिथ्यात्वम्]<br><br>यत्तु सांख्यैः कर्मत्यागोऽभ्युपगम्यते, क्रियाकारकफलभेदबुद्धेः सत्यत्वाभ्युपगमात्, तन्मृषा । यच्च बौद्धैः शून्यताभ्युपगमादकर्तृत्वमभ्युपगम्यते, तदप्यसत्, तदभ्युपगन्तुः सत्त्वाभ्युपगमात् । यच्चाज्ञैरलसतयाकर्तृत्वभ्युपगमः सोऽप्यसत्कारकबुद्धेरनिवर्तितत्वात्प्रमाणेन । तस्माद्वेदान्तप्रमाणजनितैकत्वप्रत्ययवत एव कर्मनिवृत्तिलक्षणं पारिव्राज्यं ब्रह्मसंस्थत्वं चेति सिद्धम् । एतेन गृहस्थस्यैकत्वविज्ञाने सति पारिव्राज्यमर्थसिद्धम् ।<br><br>नन्वग्न्युत्सादनदोषभाक्स्यात्परिव्रजन्, “वीरहा वा एष देवानां योऽग्निमुद्वासयते” इति श्रुतेः; न, दैवोत्सादित्वादुत्सन्न | क्रिया, कारक और फलरूप भेदबुद्धिका सत्यत्व स्वीकार करनेके कारण सांख्यवादी जो कर्मत्यागको स्वीकार करते हैं, वह ठीक नहीं है । तथा बौद्धोंने जो शून्यताको स्वीकार करनेके कारण अकर्तृत्वको स्वीकार किया है वह भी ठीक नहीं है, क्योंकि उन्हें उसका अकर्तृत्व स्वीकार करनेवालेकी भी सत्ता माननी होगी [और बौद्ध लोग आत्माकी सत्ता स्वीकार नहीं करते] । तथा अज्ञानी लोग जो आलस्यवश अकर्तृत्व स्वीकार कर लेते हैं वह भी ठीक नहीं है, क्योंकि प्रमाणद्वारा उनकी कारकबुद्धिकी निवृत्ति नहीं होती । अतः वेदान्तप्रमाणजनित एकत्व ज्ञानवान्को ही कर्मनिवृत्तिरूप पारिव्राज्य और ब्रह्मनिष्ठत्व हो सकते हैं—यह सिद्ध होता है । इससे गृहस्थको भी एकत्व विज्ञान हो जानेपर पारिव्राज्य अर्थतः सिद्ध हो जाता है ।<br><br>यदि कहो कि परिव्राजक होनेसे तो वह अग्निपरित्यागरूप दोषका भागी होगा; जैसा कि “जो अग्निका त्याग करता है वह देवताओंका पुत्रघ्न होता है” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है—तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि विधाता- |