भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 232
२९८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय २
संस्कृतहिन्दी
वर्तन्ते; प्रसिद्धयभावात् । तथेहापि ब्रह्मसंस्थशब्दो निवृत्तसर्वकर्मतत् साधनपरिव्राडेकविषयेऽत्याश्रमिणि परमहंसाख्ये वृत्त इह भवितुमर्हति, मुख्यामृतत्वफलश्रवणात् ।नहीं होते, क्योंकि ऐसी प्रसिद्धि नहीं है। इसी प्रकार यहाँ भी 'ब्रह्मसंस्थ' शब्दकी वृत्ति सम्पूर्ण कर्म और उनके साधनोंसे निवृत्त हुए एकमात्र अत्याश्रमी परमहंस परिव्राजकमें ही होनी उचित है, क्योंकि उन्हींको मुख्य अमृतत्वरूप फलकी प्राप्ति सुनी गयी है।
अतश्चेदमेवैकं वेदोक्तं पारिव्राज्यम्। न यज्ञोपवीतत्रिदण्डकमण्डल्वादिपरिग्रह इति ।अतः एकमात्र यही वेदोक्त पारिव्राज्य है। यज्ञोपवीत, त्रिदण्ड या कमण्डलु आदिका ग्रहण करना मुख्य पारिव्राज्य नहीं है।
“मुण्डोऽपरिग्रहः” (जाबा० उ० ५) “असङ्गः” इति च श्रुतिः, “अत्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रम्” (श्वे० उ० ६।२१) इत्यादि च श्वेताश्वतरीये । “निःस्तुतिर्निर्नमस्कारः” इत्यादिस्मृतिभ्यश्च । “तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः। तस्मादलिङ्गो धर्मज्ञोऽव्यक्तलिङ्गः” इत्यादिस्मृतिभ्यश्च ।इस विषयमें “मुण्डित अपरिग्रही” और “असङ्ग” ऐसी श्रुति है; तथा “अत्याश्रमियोंको परम पवित्र [ ज्ञानका उपदेश किया ]” इस श्वेताश्वतरीय श्रुतिसे और “निःस्तुतिर्निर्नमस्कारः” इत्यादि स्मृतियोंसे एवं “अतः पारदर्शी यतिगण कर्म नहीं करते, इसलिये अलिङ्ग धर्मज्ञ और अव्यक्तलिङ्ग [होकर विचरे]” इत्यादि स्मृतियोंसे भी यही बात सिद्ध होती है।