छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 231, कुल 978 में से
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खण्ड २३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२७
| मूल संस्कृत | भाष्यार्थ |
|---|---|
| कर्तव्यता स्यात् । एतेन कर्मच्छिद्रे ब्रह्मसंस्थतासामर्थ्यम्, अप्रतिषेधश्च प्रत्युक्तः । तथा ज्ञानवानेव निवृत्तकर्मा परिव्राडिति ज्ञानवैयर्थ्यं प्रत्युक्तम् । | कर्तव्यता भी रह सकती' है । इससे अन्य आश्रमवालोंको भी कर्मोंसे अवकाश मिलनेपर ब्रह्मस्थितिके सामर्थ्यका तथा उनके लिये ब्रह्मनिष्ठाके अप्रतिषेधका भी निषेध कर दिया गया । तथा ज्ञानी ही निवृत्तकर्मा परिव्राट् हो सकता है—इससे ज्ञानकी निरर्थकताका भी खण्डन कर दिया गया ! |
| (परिव्राजके ब्रह्मसंस्थशब्दस्यारूढत्वनिरासः)<br>यत्पुनरुक्तं यववराहादिशब्दवत्परिव्राजके न रूढो ब्रह्मसंस्थशब्द इति तत्परिहृतम् । तस्यैव ब्रह्मसंस्थतासंभवान्नान्यस्येति । | तथा ऐसा जो कहा कि 'यव' और 'वराह' आदि शब्दोंके समान 'ब्रह्मसंस्थ' शब्द परिव्राजकमें रूढ नहीं है उसका भी परिहार कर दिया गया, क्योंकि उसीकी ब्रह्मनिष्ठा होनी सम्भव है, और किसीकी नहीं । |
| ('रूढिनिमित्तं नोपादत्ते' इति न्यायस्यानित्यत्वम्)<br>यत्पुनरुक्तं रूढशब्दा निमित्तं नोपाददत इति, तन्न, गृहस्थतक्षपरिव्राजकादिशब्ददर्शनात् । गृहस्थितिपरिव्राज्यतक्षणादिनिमित्तोपादाना अपि गृहस्थपरिव्राजकावाश्रमविशेषे विशिष्टजातिमति च तक्षेति रूढा दृश्यन्ते शब्दाः । न यत्र यत्र तानि निमित्तानि तत्र तत्र | इसके सिवा वादीने जो कहा कि रूढ शब्द निमित्तको स्वीकार नहीं करता, सो ऐसी बात नहीं है, क्योंकि गृहस्थ, तक्षा और परिव्राजकादि शब्द देखे जाते हैं । गृहमें रहना, पारिव्राज्य सब कुछ त्याग कर चला जाना और तक्षण काष्ठ छेदन आदि निमित्तोंको स्वीकार करते हुए भी 'गृहस्थ' और 'परिव्राजक' शब्द आश्रमविशेषोंमें और 'तक्षा' शब्द जातिविशेषमें रूढ देखे जाते हैं । ये गृहस्थादि शब्द जहाँ-जहाँ वे निमित्त हैं वहीं-वहीं प्रवृत्त |
छा० उ० ८—