छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 230, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| २२६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| न; बुभुक्षादिनैकत्वप्रत्ययात् प्रच्यावितस्योपपत्तेर्निवृत्त्यर्थत्वात्। <br><br> न च प्रतिषिद्धसेवाप्राप्तिः; एकत्वप्रत्ययोत्पत्तेः प्रागेव प्रतिषिद्धत्वात्। न हि रात्रौ कूपे कण्टके वा पतित उदितेऽपि सवितरि पतति तस्मिन्नेव। तस्मात्सिद्धं निवृत्तकर्मा भिक्षुक एव ब्रह्मसंस्थ इति। <br><br> (तपःशब्देन परिव्राड्ग्रहणस्य प्रत्याख्यानम्) <br> यत्पुनरुक्तं सर्वेषां ज्ञानवर्जितानां पुण्यलोकतेति, सत्यमेतत्। यच्चोक्तं तपःशब्देन परिव्राडप्युक्त इति, एतदसत्; कस्मात् ? परिव्राजकस्यैव ब्रह्मसंस्थतासंभवात्। स एव ह्यवशेषित इत्यवोचाम। एकत्वविज्ञानवतोऽग्निहोत्रादिवत्तपोन्निवृत्तेश्च। भेदबुद्धि मत एव हि तपः- | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि क्षुधा आदिद्वारा एकत्वप्रत्ययसे च्युत कर दिये जानेपर उसके द्वारा अनुचित कर्मोंसे निवृत्ति-के लिये उनका पालन किया जाना सम्भव है। इसके सिवा उसके द्वारा प्रतिषिद्धि कर्मोंका सेवन किया जाना भी सम्भव नहीं है, क्योंकि उनका प्रतिषेध तो वह एकत्वज्ञानकी उत्पत्तिसे पूर्व ही कर चुकता है। रात्रिके समय कुएँ या काँटोंमें गिर जानेवाला पुरुष सूर्योदय होनेपर भी उन्हींमें नहीं गिर जाता। अतः सिद्ध होता है कि कर्मोंसे निवृत्त हुआ भिक्षुक ही ब्रह्मनिष्ठ हो सकता है। <br><br> तथा यह जो कहा कि सम्पूर्ण ज्ञान-रहित पुरुषोंको पुण्यलोककी प्राप्ति होती है सो ठीक ही है; परंतु ऐसा जो कहा कि 'तपः' शब्दसे संन्यासी-का भी कथन है सो ठीक नहीं। ऐसा क्यों है ? क्योंकि परिव्राजककी ही ब्रह्मनिष्ठता होनी सम्भव है। और वही [पुण्यलोकको प्राप्त होनेवालों-मेंसे] बच रहा है—ऐसा हम पहले कह चुके हैं, क्योंकि एकत्वविज्ञानवान्का तो अग्निहोत्रादिके समान तप भी निवृत्त हो ही जाता है। भेदबुद्धिमान्में ही तपकी |