छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 229, कुल 978 में से
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खण्ड २३ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२५
| गृहस्थस्यैव ब्रह्मचारिणो विशेषधर्माननुष्ठाने । | प्रकार कि ब्रह्मचारीके विशेष धर्मका अनुष्ठान न करनेपर गृहस्थको प्रत्यवाय नहीं हो सकता। |
|---|---|
| एवं तर्हि सर्वः स्वाश्रमस्थ उत्पन्नैकत्वप्रत्ययः परिव्राडिति चेत् ? | पूर्व०— इस प्रकार तब तो जिसे एकत्वका ज्ञान हो गया है वह कोई भी पुरुष अपने आश्रममें रहता हुआ ही परिव्राजक हो सकता है ? |
| न; स्वस्वामित्वभेदबुद्धयनिवृत्तेः । कर्मार्थत्वाच्चेतराश्रमाणां; "अथ कर्म कुर्वीय" (बृ० उ० १।४।१७) इति श्रुतेः । तस्मात्स्वस्वामित्वाभावाद्भिक्षुरेव एव परिव्राट्; न गृहस्थादिः । | सिद्धान्ती— नहीं, क्योंकि उनकी स्वस्वामित्वरूप^१ भेदबुद्धि निवृत्त नहीं होती, क्योंकि अन्य आश्रम कर्मानुष्ठानके ही लिये हैं; जैसा कि "[स्त्री-पुत्रादिकी प्राप्तिके] अनन्तर मैं कर्म करूँगा" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। अतः स्वस्वामिभावका अभाव हो जानेसे एकमात्र भिक्षु ही परिव्राट् हो सकता है, गृहस्थादि अन्य आश्रमावलम्बी नहीं हो सकता। |
| एकत्वप्रत्ययविधिजनितेन प्रत्ययेन विधिनिमित्तभेदप्रत्ययस्योपमर्दितत्वाद्यमनियमाद्यनुपपत्तिः परिव्राजकस्येति चेत् ? | पूर्व०— एकत्वकी प्रतीति करानेवाले विधिवाक्यसे उत्पन्न हुए ज्ञानद्वारा कर्मविधिनिमित्तक भेदज्ञानके निवृत्त हो जानेसे तो संन्यासीको यमनियमादिका पालन करना भी सम्भव नहीं है [अतः उसका स्वेच्छाचारी हो जाना बहुत सम्भव है]। |
^१ यह मेरा है और मैं इसका स्वामी हूँ ऐसी अधिकृत-अधिकारोरूप।