छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 241, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड २४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २३७
| अथानन्तरं जुहोत्यनेन मन्त्रेण नमोऽग्नये प्रह्वीभूतास्तुभ्यं वयं पृथिवीक्षिते पृथिवीनिवासाय लोकक्षिते पृथिवीलोकनिवासायेत्यर्थः । लोकं मे मह्यं यजमानाय विन्द लभस्व । एष वै मम यजमानस्य लोक एता गन्तास्मि ॥ ५ ॥ | इसके पश्चात् वह इस मन्त्रद्वारा हवन करता है—अग्निदेवको नमस्कार है। हम पृथ्वीमें रहनेवाले और पृथ्वीलोकनिवासी तुम्हारे प्रति विनम्र होते हैं। मुझ यजमानको तुम पुण्यलोककी प्राप्ति कराओ। यह निश्चय ही यजमानका लोक है, मैं इसे प्राप्त करनेवाला हूँ ॥ ५ ॥ |
अत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहापजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै । वसवः प्रातःसवनँ संप्रयच्छन्ति ॥ ६ ॥
इस लोकमें यजमान 'मैं आयु समाप्त होनेके अनन्तर [पुण्यलोकको प्राप्त होऊँगा] 'स्वाहा'—ऐसा कहकर हवन करता है, और 'परिघ (अर्गला—अड़ंगे) को नष्ट करो' ऐसा कहकर उत्थान करता है। वसुगण उसे प्रातःसवन प्रदान करते हैं ॥ ६ ॥
| अत्रास्मिँल्लोके यजमानोऽहमायुषः परस्तादूर्ध्वं मृतः सन्नित्यर्थः, स्वाहेति जुहोति । अपजह्यपनय परिघं लोकद्वारार्गलमित्येतं मन्त्रमुक्त्वोत्तिष्ठति । एवमेतैर्वसुभ्यः प्रातःसवनसंबद्धो लोको निष्क्रीतः स्यात्तत्तस्ते | यहाँ—इस लोकमें यजमान 'मैं आयु समाप्त होनेपर—आयुके पीछे अर्थात् मरनेपर [पुण्यलोक प्राप्त करूँगा] स्वाहा' ऐसा कहकर हवन करता है। 'तुम परिघ यानी लोकद्वारकी अर्गलाको दूर करो'—इस मन्त्रको कहकर उत्थान करता है। इस प्रकार इन [साम, मन्त्र, होम और उत्थान] के द्वारा वसुओंसे प्रातःसवनसे सम्बद्ध लोक मोल |