छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ५
| ४८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ५ |
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| विस्फुलिङ्गाः, ह्रादनयो गर्जित- | है; मेघोंकी गर्जनाके शब्दोंको |
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| शब्दा मेघानां विप्रकीर्णत्वसा- | 'ह्रादनि' कहते हैं; विप्रकीर्णत्व (इधर-उधर फैले रहने) में समानता |
| मान्यात् ॥ १ ॥ | होनेके कारण वे विस्फुलिङ्ग हैं ॥ १ ॥ |
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः सोमं राजानं जुह्वति तस्या आहुतेर्वर्ष सम्भवति ॥ २ ॥
उस अग्निमें देवगण राजा सोमका हवन करते हैं; उस आहुतिसे वर्षा होती है ॥ २ ॥
| तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः पूर्ववत्सोमं राजानं जुह्वति। तस्या आहुतेर्वर्षं संभवति । श्रद्धाख्या आपः सोमाकारपरिणता द्वितीये पर्याये पर्जन्याग्निं प्राप्य वृष्टि-त्वेन परिणमन्ते ॥ २ ॥ | उस इस अग्निमें देवगण पूर्ववत् राजा सोमका हवन करते हैं । उस आहुतिसे वर्षा होती है । श्रद्धासंज्ञक आप् इस द्वितीय पर्यायमें सोमके आकारमें परिणत हो पर्जन्याग्निको प्राप्त होकर वृष्टिरूपमें परिणत हो जाते हैं ॥ २ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये पञ्चमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ५ ॥
षष्ठ खण्ड
पृथिवीरूपा अग्निविद्या
पृथिवी वाव गौतमाग्निस्तस्याः संवत्सर एव समिदाकाशो धूमो रात्रिरर्चिर्दिशोऽङ्गारा अवान्तरदिशो विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥
हे गौतम ! पृथिवी ही अग्नि है। उसका संवत्सर ही समिध् है, आकाश धूम है, रात्रि ज्वाला है, दिशाएँ अङ्गारे हैं तथा अवान्तर दिशाएँ विस्फुलिङ्ग हैं ॥ १ ॥
| पृथिवी वाव गौतमाग्निरित्यादि पूर्ववत् । तस्याः पृथिव्याख्यस्याग्नेः संवत्सर एव समित्; संवत्सरेण हि कालेन समिद्धा पृथिवी व्रीह्यादिनिष्पत्तये भवति । आकाशो धूमः, पृथिव्या इवोत्थित आकाशो दृश्यते; यथाग्नेर्धूमः । रात्रिरर्चिः, पृथिव्या ह्यप्रकाशात्मिकाया अनुरूपा रात्रिः; तमोरूपत्वात्, अग्नेरिवानुरूपमर्चिः। | 'हे गौतम ! पृथिवी ही अग्नि है' इत्यादि पूर्ववत् समझना चाहिये । उस पृथिवीसंज्ञक अग्निका संवत्सर ही समिध् है, क्योंकि संवत्सररूप कालसे समिद्ध होकर अर्थात् पुष्टि लाभ करके ही पृथिवी धान्यादिकी निष्पत्तिमें समर्थ होती है । आकाश धूम है, क्योंकि आकाश पृथिवीसे उठा हुआ-सा दिखायी देता है, जिस प्रकार कि अग्निसे धुआँ उठता दिखायी देता है । रात्रि ज्वाला है; अप्रकाशात्मिका पृथिवीके अनुरूप ही रात्रि ज्वाला है, क्योंकि वह तमोरूपा है; अतः [ पृथिवीरूप ] अग्निके समान यह उसके अनुरूप ज्वाला है । |
४९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| दिशोऽङ्गाराः, उपशान्तत्वसामान्यात् । अवान्तरदिशो विस्फुलिङ्गाः, क्षुद्रत्वसामान्यात् ॥ १ ॥ | उपशान्तिमें समानता होनेके कारण दिशाएँ अङ्गारे हैं तथा क्षुद्रत्वमें समानता होनेके कारण अवान्तर-दिशाएँ (कोण) विस्फुलिङ्ग हैं ॥ १ ॥ |
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वर्षं जुह्वति तस्या आहुतेरन्नँसंभवति ॥ २ ॥
उस इस अग्निमें देवगण वर्षाका हवन करते हैं; उस आहुतिसे अन्न होता है ॥ २ ॥
| तस्मिन्नित्यादि समानम् । तस्या आहुतेरन्नं व्रीहियवादि संभवति ॥ २ ॥ | ‘तस्मिन्नेतस्मिन्’ इत्यादि श्रुतिका अर्थ पूर्ववत् है। उस आहुतिसे व्रीहियवादिरूप अन्न होता है ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
षष्ठखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥
सप्तम खण्ड
—: ०० :—
पुरुषरूपा अग्निविद्या
पुरुषो वाव गौतमाग्निस्तस्य वागेव समित्प्राणो धूमो जिह्वार्चिश्चक्षुरङ्गाराः श्रोत्रं विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥
हे गौतम ! पुरुष ही अग्नि है। उसकी वाक् ही समिध् है, प्राण धूम है, जिह्वा ज्वाला है, चक्षु अङ्गारे और श्रोत्र विस्फुलिङ्ग हैं ॥१॥
| पुरुषो वाव गौतमाग्निः। । तस्य वागेव समित्, वाचा हि मुखेन समिध्यते पुरुषो न मूकः। प्राणो धूमः, धूम इव मुखान्निर्गमनात्। जिह्वार्चिर्लोहितत्वात्। चक्षुरङ्गाराः, भास आश्रयत्वात्। श्रोत्रं विस्फुलिङ्गाः, विप्रकीर्णत्वसाम्यात् ॥ १ ॥ | हे गौतम ! पुरुष ही अग्नि है। उसकी वाक् ही समिध् है, क्योंकि वाणीरूप मुखके द्वारा ही पुरुष सुशोभित होता है, मूक पुरुष शोभित नहीं होता। प्राण धूम है, क्योंकि वह धूमके समान मुखसे निकलता है; लाल होनेके कारण जिह्वा ज्वाला है; प्रकाशका आश्रय होनेके कारण नेत्र अङ्गारे हैं तथा विप्रकीर्णत्वमें समानता होनेसे श्रोत्र विस्फुलिङ्ग हैं ॥ १ ॥ |
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुते रेतः संभवति ॥ २ ॥
४९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४९२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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उस इस अग्निमें देवगण अन्नका होम करते हैं। उस आहुतिसे वीर्य उत्पन्न होता है ॥ २ ॥
| समानमन्यत् । अन्नं जुह्वति <br><br> व्रीह्यादिसंस्कृतम् । तस्या <br><br> आहुते रेतः संभवति ॥ २ ॥ | शेष अर्थ पूर्ववत् है। देवगण इसमें व्रीहि आदिसे सम्यक् प्रकारसे तैयार किये हुए अन्नका हवन करते हैं। उस आहुतिसे वीर्य उत्पन्न होता है ॥ २ ॥ |
<div align="center">इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
सप्तमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ७ ॥
अष्टम खण्ड
—: ० :—
स्त्रीरूपा अग्निविद्या
योषा वाव गौतमाग्निस्तस्या उपस्थ एव समि- द्यदुपमन्त्रयते स धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽङ्गारा अभिनन्दा विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥
हे गौतम ! स्त्री ही अग्नि है। उसका उपस्थ ही समिध् है, पुरुष जो उपमन्त्रण करता है वह धूम है, योनि ज्वाला है तथा जो भीतरकी ओर करता है वह अङ्गारे हैं और उससे जो सुख होता है वह विस्फुलिङ्ग हैं ॥ १ ॥
| योषा वाव गौतमाग्निः । तस्या उपस्थ एव समित्, तेन हि सा पुत्राद्युत्पादनाय समिध्यते । यदुपमन्त्रयते स धूमः, स्त्रीसंभवादुपमन्त्रणस्य । योनिरर्चिर्लोहितत्वात् । यदन्तः करोति तेऽङ्गारा अग्निसंबन्धात् । अभिनन्दाः सुखलवा विस्फुलिङ्गाः क्षुद्रत्वात् ॥ १ ॥ | हे गौतम ! स्त्री ही अग्नि है। उसका उपस्थ ही समिध् है, क्योंकि उससे वह पुत्रादि उत्पन्न करनेके लिये समिद्ध होती है। पुरुष जो उपमन्त्रण करता है वह धूम है, क्योंकि उपमन्त्रणकी प्रवृत्ति स्त्रीसे ही होती है। लोहितवर्ण होनेके कारण योनि ज्वाला है तथा जो भीतरकी ओर करता है वह अग्निके सम्बन्धके कारण अङ्गारे हैं और अभिनन्द—सुखके कणमात्र क्षुद्र होनेके कारण विस्फुलिङ्ग हैं ॥ १ ॥ |
—: ० :—
४९४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ४९४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुतेर्गर्भः संभवति ॥ २ ॥
उस इस अग्निमें देवगण वीर्यका हवन करते हैं, उस आहुतिसे गर्भ उत्पन्न होता है ॥ २ ॥
| तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति, तस्या आहुतेर्गर्भः संभवतीति; एवं श्रद्धासोमवर्षान्नरेतोहवनपर्यायक्रमेणाप एव गर्भीभूतास्ताः। तत्रापामाहुतिसमवायित्वात्प्राधान्यविवक्षाः आपः पञ्चम्यामाहुतौ पुरुषवचसो भवन्तीति। न त्वाप एव केवलाः सोमादिकार्यमारभन्ते, न चापोऽत्रिवृत्कृताः सन्तीति। त्रिवृत्कृतत्वेऽपि विशेषसंज्ञालाभो दृष्टः पृथिवीयमिमा आपोऽयमग्निरित्यन्यतमबाहुल्यनिमित्तः। | उस इस अग्निमें देवगण वीर्यका हवन करते हैं; उस आहुतिसे गर्भ उत्पन्न होता है—इस प्रकार श्रद्धा, सोम, वर्षा, अन्न और रेतःरूप आहुतियोंके हवनके पर्यायक्रमसे वह जल ही गर्भरूपमें परिणत होता है। उनमें आहुतियोंसे सम्बद्ध होनेके कारण श्रुतिको जलकी ही प्रधानता बतलानी अभीष्ट है, इसीसे उसने कहा है कि पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुषवाची हो जाता है। केवल जल ही सोमादि कार्य आरम्भ कर देते हों—यह बात नहीं है, और न जल अत्रिवृत्कृत (पृथिवी, जल और तेज इन तीनोंके सम्मिश्रणसे रहित) हों—ऐसी ही बात है। त्रिवृत्कृत होनेपर भी एक-एक भूतकी बहुलताके कारण उनमेंसे प्रत्येकको 'यह पृथिवी है, यह जल है, यह अग्नि है' इस प्रकार भिन्न-भिन्न नाम प्राप्त होता देखा जाता है। अतः जलकी |
खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९५
| तस्मात्समुदितान्येव भूतान्यब्वाहुल्यात्कर्मसमवायीनि सोमादिकार्यारम्भकाण्याप इत्युच्यन्ते । दृश्यते च द्रवबाहुल्यं सोमवृष्ट्यन्नरेतोदेहेषु । बहुद्रवं च शरीरं यद्यपि पार्थिवम् । तत्र पञ्चम्यामाहुतौ हुतायां रेतोरूपा आपो गर्भीभूताः ॥ २ ॥ | बहुलता होनेके कारण कर्ममें सम्मिलित हुए सभी भूत सोमादिकार्य आरम्भ करनेवाले 'जल' कहे जाते हैं । इसके सिवा सोम, वृष्टि, अन्न, वीर्य और देहमें द्रवत्वकी बहुलता भी देखी ही जाती है । शरीर यद्यपि पार्थिव होता है, तो भी उसमें द्रवकी अधिकता होती है । उनमें पाँचवीं आहुतिके हुत होनेपर वीर्यरूप जल गर्भमें परिणत हो जाता है [अर्थात् 'पुरुष' शब्दवाची हो जाता है ] ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्यायेऽष्टमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ८ ॥
नवम खण्ड
—: ० :—
पञ्चम आहुतिमें पुरुषत्वको प्राप्त हुए जलकी गति
इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भव-
न्तीति स उल्बावृतो गर्भो दश वा नव वा मासा-
न्नन्तः शयित्वा यावद्वाथ जायते ॥ १ ॥
इस प्रकार पाँचवीं आहुतिके दिये जानेपर आप 'पुरुष' शब्दवाची हो जाते हैं। वह जरायुसे आवृत हुआ गर्भ दस या नौ महीने अथवा जवतक [पूर्णाङ्ग नहीं होता तबतक माताकी कुक्षिके] भीतर ही शयन करनेके अनन्तर फिर उत्पन्न होता है ॥ १ ॥
| इति त्वेवं तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति व्याख्यात एकः प्रश्नः यत्तु द्युलोकादिमां प्रत्यावृत्तयोराहुत्योः पृथिवीं पुरुषं स्त्रियं क्रमेणाविश्य लोकं प्रत्युत्थायी भवतीति वाजसनेयक उक्तं तत्प्रासङ्गिकमिहोच्यते । इह च प्रथमे प्रश्ने उक्तम् 'वेत्थ यदितोऽधि प्रजाः प्रयन्तीति ?' तस्य चायमुपक्रमः । | इस प्रकार पाँचवीं आहुतिमें जल पुरुषवाची हो जाता है—इस एक प्रश्नकी व्याख्या हुई। तथा वाजसनेय-श्रुतिमें जो द्युलोकसे पृथिवीकी ओर आयी हुई दो आहुतियोंके विषयमें यह कहा गया है कि वे क्रमशः पृथिवी, पुरुष और स्त्रीमें प्रवेश कर परलोकके प्रति उत्थान करनेवाली होती है, उसका भी प्रसङ्गवश यहाँ वर्णन कर दिया जाता है। यहाँ जो पहले प्रश्नमें कहा गया है कि 'क्या तुम जानते हो कि यह प्रजा [मरनेके अनन्तर] यहाँसे कहाँ जाती है?' उसका यह उपक्रम है। |
खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९७
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| स गर्भोऽपां पञ्चमः परिणामविशेष आहुतिकर्मसमवायिनीनां श्रद्धाशब्दवाच्यानामुल्बावृत उल्वेन जरायुणावृतो वेष्टितो दश वा नव वा मासानन्तर्मातुः कुक्षौ शयित्वा यावद्वा यावता कालेन न्यूनेनातिरिक्तेन वाथानन्तरं जायते। | आहुतिकर्मसे सम्बद्ध 'श्रद्धा' शब्दवाच्य जलका पञ्चम परिणाम-विशेष वह गर्भ उल्बावृत—उल्ब अर्थात् जरायुसंज्ञक गर्भवेष्टन चर्मसे आवृत-वेष्टित हुआ दश या नौ मासतक अथवा जितने भी न्यून या अधिक समयमें पूर्णान्न हो, माताकी कुक्षिमें शयन करनेके अनन्तर फिर उत्पन्न होता है। |
| उल्बावृत इत्यादि वैराग्यहेतोरिदमुच्यते। कष्टं हि मातुः कुक्षौ मूत्रपुरीषवातपित्तश्लेष्मादिपूर्णे तदनुलिप्तस्य गर्भस्योल्वाशुचिपटावृतस्य लोहितरेतोऽशुचिबीजस्य मातुरशितपीतरसानुप्रवेशेन विवर्धमानस्य निरुद्धशक्तिबलवीर्यतेजः प्रज्ञाचेष्टस्य शयनम्। ततो योनिद्वारेण पीड्यमानस्य कष्टतरा निःसृतिर्जन्मेति वैराग्यं ग्राहयति। मुहूर्तमप्यसह्यं दश वा नव वा | उल्बावृत इत्यादि यह सब कथन वैराग्यके लिये है। उल्बरूप अपवित्र वस्त्रसे लिपटे हुए, रज और वीर्यरूप अपवित्र बीजवाले, माताके खाये-पीये पदार्थोंके रसके प्रवेशसे बढ़नेवाले तथा जिसके शक्ति, बल, वीर्य, तेज, बुद्धि और चेष्टा—ये सब निरुद्ध (अविकसित) रहते हैं उस गर्भका माताकी मल-मूत्र-वात-पित्त एवं कफादिसे भरी हुई कुक्षिमें शयन करना कष्टमय ही है। उससे भी अधिक कष्टप्रद योनिद्वारसे पीडित हुए गर्भका बाहर निकलनारूप जन्म है; इस प्रकार श्रुति वैराग्यका ग्रहण कराती है। इसके सिवा जो एक मुहूर्त्तके लिये भी असह्य है उस मातृकुक्षिमें दश या नौ मासके |
४९८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
४९८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
| मासानतिदीर्घकालमन्तः शयि- | दीर्घकालपर्यन्त शयन करनेके अनन्तर [ जन्म लेना भी वैराग्यका ही हेतु है ] ॥ १ ॥ | | त्वेति च ॥ १ ॥ | |
— : ० : —
स जातो यावदायूषं जीवति तं प्रेतं दिष्टमितोऽग्नय एव हरन्ति यत एवेतो यतः संभूतो भवति ॥ २॥
इस प्रकार उत्पन्न होनेपर वह आयुपर्यन्त जीवित रहता है। फिर मरनेपर कर्मवश परलोकको प्रस्थित हुए उस जीवको अग्निके प्रति ही ले जाते हैं, जहाँसे कि वह आया था और जिससे उत्पन्न हुआ था ॥२॥
| स एवं जातो यावदायूषं पुनः | इस प्रकार उत्पन्न हुआ वह जबतक आयु होती है घटीयन्त्रके समान पुनः-पुनः आवागमनके लिये | | पुनर्घटीयन्त्रवद्गमनागमनाय कर्म | | | कुर्वन्कुलालचक्रवद्वा तिर्यग्भ्रम- | अथवा कुलालचक्रके समान चारों ओर चक्कर काटनेके लिये कर्म करता हुआ कर्मद्वारा जितनी आयु | | णाय यावत्कर्मणोपात्तमायुस्ताव- | प्राप्त की होती है उतना जीवित रहता है। फिर जिसकी आयु क्षीण | | ज्जीवति । तमेनं क्षीणायुषं प्रेतं | हो गयी है ऐसे इस प्रेत—मृत एवं | | मृतं दिष्टं कर्मणा निर्दिष्टं पर- | दिष्ट—कर्मद्वारा परलोकके प्रति नियुक्त किये हुए इस जीवको—क्योंकि यदि वह जीवित रहता तो | | लोकं प्रति यदि चेज्जीवन्वौदिके | कर्म अथवा ज्ञानका अधिकारी होता अतः उस मरे हुए प्राणीको यहाँसे—इस ग्रामसे ऋत्विक् अथवा | | कर्मणि ज्ञाने वाधिकृतस्तमेनं | | | मृतमितोऽस्माद्ग्रामादग्नयेऽग्न्य- | | | र्थमृत्विजो हरन्ति पुत्रा वान्त्य- | |
खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९९
| कर्मणे । यत एवेत आगतोऽग्नेः सकाशाच्छ्रद्धाद्याहुतिक्रमेण, यतश्च पञ्चम्योऽग्निभ्यः संभूत उत्पन्नो भवति, तस्मा एवाग्नये हरन्ति स्वामेव योनिमग्निमापादयन्तीत्यर्थः ॥ २ ॥ | पुत्रगण अन्त्येष्टि कर्मके लिये अग्निके प्रति ले जाते हैं, जिस अग्निसे कि श्रद्धा आदि आहुतियोंके क्रमसे वह यहाँ आया था तथा जिन पाँच अग्नियोंसे वह उत्पन्न होता है, उस अग्निके प्रति ही वे इसे ले जाते हैं। तात्पर्य यह है कि उसे अपनी योनिभूत अग्निको ही प्राप्त करा देते हैं ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
नवमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥
दशम खण्ड
—: ० :—
प्रथम प्रश्नका उत्तर
| वेत्थ यदितोऽधि प्रजा प्रयन्तीत्ययं प्रश्नः प्रत्युपस्थितोऽपाकर्त्तव्यतया । | अब, 'क्या तू जानता है कि इस लोकसे परे प्रजा कहाँ जाती है ?' ऐसा यह प्रश्न निराकरणके लिये प्रस्तुत किया जाता है । |
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तद्य इत्थं विदुः। ये चे मेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युपासते तेऽर्चिषमभिसंभवन्त्यर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमपूर्यमाणपक्षाद्यान्षडुदङ्ङेति मासाँस्तान् ॥ १ ॥
मासेभ्यः संवत्सरग्ँ संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषोऽमानवः स एनान्ब्रह्म गमयत्येष देवयानः पन्था इति ॥ २ ॥
वे जो कि इस प्रकार जानते हैं तथा वे जो कि वनमें श्रद्धा और तप इनकी उपासना करते हैं [ प्राणप्रयाणके अनन्तर ] अर्चिके अभिमानी देवताओंको प्राप्त होते हैं; अर्चिके अभिमानी देवताओंसे दिवसाभिमानी देवताओंको; दिवसाभिमानियोंसे शुक्लपक्षाभिमानी देवताओंको; शुक्लपक्षाभिमानियोंसे जिन छः महीनोंमें सूर्य उत्तरकी ओर जाता है, उन छः महीनोंको ॥ १ ॥ उन महीनोंसे संवत्सरको; संवत्सरसे आदित्यको; आदित्यसे चन्द्रमाको और चन्द्रमासे विद्युत्को प्राप्त होते हैं। वहाँ एक अमानव पुरुष है, वह उन्हें ब्रह्म ( कार्यब्रह्म ) को प्राप्त करा देता है। यह देवयानमार्ग है ॥ २ ॥
खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ५०१
| [गृहस्थेषु विदुषामुत्तरमार्गः कर्मिणां च दक्षिणमार्ग इति स्थापनम्]<br><br>तत्तत्र लोकं प्रत्युत्थितानामधिकृतानां गृहमेधिनां य इत्थमेवं यथोक्तं पञ्चाग्निदर्शनं द्युलोकाद्यग्निभ्यो वयं क्रमेण जाता अग्निसस्वरूपाः पञ्चाग्न्यात्मान इत्येवं विदुर्जानीयूः ।<br><br>कथमवगम्यत इत्थं विदुरिति गृहस्था एवोच्यन्ते नान्य इति ?<br><br>गृहस्थानां ये त्वनित्थंविदः केवलेष्टापूर्तदत्तपरास्ते धूमादिना चन्द्रं गच्छन्तीति वक्ष्यति । ये चारण्योपलक्षिता वैखानसाः परिव्राजकाश्च श्रद्धा तप इत्युपासते तेषां चेत्थंविद्भिः सहार्चिरादिना गमनं वक्ष्यति पारिशेष्यादग्निहोत्राहुतिसंबन्धाच्च गृहस्था एव गृह्यन्त इत्थं विदुरिति । | वहाँ इस लोकके प्रति उत्थित हुए अधिकारी गृहस्थोंमें जो इस प्रकार यानी उपर्युक्त पञ्चाग्निविद्याको जानते हैं अर्थात् जो ऐसा समझते हैं कि द्युलोकादि अग्नियोंसे क्रमशः उत्पन्न हुए हमलोग अग्नित्वरूप यानी पञ्चाग्निमय हैं [ वे अर्चिके अभिमानी देवताओंको प्राप्त होते हैं ] ।<br><br>शङ्का—'इत्थं विदुः' इस [सामान्य निर्देश] से यह कैसे जाना गया कि यहाँ गृहस्थोंके विषयमें ही कहा गया है, औरोंके लिये नहीं ?<br><br>**समाधान—**गृहस्थोंमें जो ऐसा जाननेवाले नहीं हैं, बल्कि केवल इष्टापूर्त्त एवं दत्त कर्मोंमें ही लगे रहते हैं वे धूमादिके द्वारा चन्द्रमाको ही प्राप्त होते हैं—ऐसा श्रुति आगे कहेगी; तथा जो 'अरण्य' पदसे उपलक्षित वानप्रस्थ एवं संन्यासी 'श्रद्धा और तप' इनकी उपासना करते हैं उनका तो इस प्रकार जाननेवालोंके साथ गमन करना श्रुति आगे कहेगी; अतः परिशेषसे और अग्निहोत्रकी आहुतियोंका सम्बन्ध होनेके कारण भी 'इत्थं विदुः' इस कथनसे गृहस्थोंका ही ग्रहण होता है । |
५०२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ५०२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| ननु ब्रह्मचारिणोऽप्यगृहीता ग्रामश्रुत्यारण्यश्रुत्या चानुपलक्षिता विद्यन्ते कथं पारिशेष्यसिद्धिः । | शङ्का— जिनका ग्रामश्रुति और अरण्यश्रुति दोनोंहीसे ग्रहण नहीं होता वे ब्रह्मचारी लोग भी तो रह जाते हैं; फिर तुम्हारे परिशेषकी सिद्धि कैसे हो सकती है ? | | नैष दोषः, पुराणस्मृतिप्रामाण्यादूर्ध्वरेतसां नैष्ठिकब्रह्मचारिणामुत्तरेणार्यम्णः पन्थाः प्रसिद्धः। अतस्तेऽप्यरण्यवासिभिः सह गमिष्यन्ति । उपकुर्वाणकास्तु स्वाध्यायग्रहणार्था इति न विशेषनिर्देशार्हाः । | समाधान— यह कोई दोष नहीं है, पुराण और स्मृतियोंसे ऊर्ध्वरेता नैष्ठिक ब्रह्मचारियोंका सूर्यसम्बन्धी उत्तर मार्ग प्रसिद्ध है, अतः वे भी अरण्यवासियोंके साथ ही जायँगे। तथा उपकुर्वाणक ब्रह्मचारी तो स्वाध्यायग्रहणके लिये होते हैं; अतः वे विशेष निर्देशके योग्य नहीं हैं। | | ननूर्ध्वरेतस्त्वं चेदुत्तरमार्गप्रतिपत्तिकारणं पुराणस्मृतिप्रामाण्यादिष्यत इत्थं वित्त्वमनर्थकं प्राप्तम् । | शङ्का— यदि पुराण और स्मृतियोंकी प्रमाणतासे उत्तरायणकी प्राप्तिका कारण ऊर्ध्वरेता होना माना जाता है तब तो इस प्रकार पञ्चाग्निविद्याका ज्ञान व्यर्थ सिद्ध होता है ? | | न; गृहस्थान्प्रत्यर्थवत्त्वात् । | समाधान— ऐसी बात नहीं है, क्योंकि गृहस्थोंके लिये वह सार्थक है। | | ये गृहस्था अनित्थंविदस्तेषां स्वभावतो दक्षिणो धूमादिः पन्थाः प्रसिद्धस्तेषां य इत्थं विदुः सगुणं वान्यद्ब्रह्मविदुः, “अथ | जो गृहस्थ ऐसा जाननेवाले नहीं हैं उनके लिये स्वभावतः धूमादि दक्षिण-मार्ग प्रसिद्ध है; किंतु उनमें जो ऐसा जाननेवाले हैं अथवा जो इनसे भिन्न सगुणब्रह्मके उपासक हैं वे (छा० ४। १५। ५ |
खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ ५०३
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| यदु चैवास्मिञ्शव्यं कुर्वन्ति यदि च नार्चिषमेव" इति लिङ्गादुत्तरेण ते गच्छन्ति । | के ) “इस (सगुण ब्रह्मोपासक) के लिये प्रेतकर्म करें अथवा न करें वह अर्चिरादि मार्गको ही प्राप्त होता है” इस श्रुतिरूप लिङ्गके अनुसार उत्तर मार्गसे ही जाते हैं । |
| नन्वूर्ध्वरेतसां गृहस्थानां च समान आश्रमित्वे ऊर्ध्वरेतसामेवोत्तरेण पथा गमनं न गृहस्थानामिति न युक्तमग्निहोत्रादिवैदिककर्मबाहुल्ये च सति । | **शङ्का—**ऊर्ध्वरेता और गृहस्थ—ये दोनों आश्रमी होनेमें समान ही हैं । अतः उनमें केवल ऊर्ध्वरेताओंका ही उत्तरायणमार्गसे गमन होता है, गृहस्थोंका अग्निहोत्रादि वैदिक कर्मोंकी बहुलता होनेपर भी नहीं होता—यह ठीक नहीं है । |
| नैष दोषः, अपूता हि ते । (ऊर्ध्वरेतसां वनौकसां च उत्तरमार्ग एव) शत्रुमित्रसंयोगनिमित्तं हि तेषां रागद्वेषौ तथा धर्माधर्मौ हिंसानुग्रहनिमित्तौ । हिंसानृतमायाब्रह्मचर्यादि च बहुशुद्धिकारणमपरिहार्यं तेषाम्, अतोऽपूताः । अपूतत्वान्नोत्तरेण पथा गमनम् । हिंसानृतमायाब्रह्मचर्यादिपरिहाराच्च शुद्धात्मा- | **समाधान—**यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि वे अपवित्र होते हैं । शत्रु और मित्रोंका संयोग रहनेके कारण उनमें राग-द्वेष रहते हैं तथा हिंसा और कृपाके कारण धर्माधर्म भी रहते ही हैं । उनके लिये हिंसा, अनृत, कपट और अब्रह्मचर्य आदि बहुतसे अशुद्धिके कारण अनिवार्य ही हैं; इसलिये वे अपवित्र हैं । अपवित्र होनेके कारण उनका उत्तर मार्गसे गमन नहीं हो सकता । किंतु दूसरे वानप्रस्थादि हिंसा, अनृत, माया और अब्रह्मचर्यका त्याग कर देनेके कारण शुद्धचित्त हो जाते हैं, शत्रु- |
५०४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ५०४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| नो हीतरे शत्रुमित्ररागद्वेषादिपरिहाराच्च विरजसस्तेषां युक्त उत्तरः पन्थाः । | मित्रसम्बन्धी भाव और राग-द्वेषका त्याग कर देनेसे वे मलहीन हो जाते हैं; अतः उनके लिये उत्तर मार्ग ठीक ही है। | | तथा च पौराणिकाः “ये प्रजामीषिरेऽधीरास्ते श्मशानानि भेजिरे । ये प्रजां नेषिरे धीरास्तेऽमृतत्वं हि भेजिरे” इत्याहुः । | तथा पौराणिक लोग भी ऐसा कहते हैं कि “जिन मन्दमति पुरुषोंने संतानकी इच्छा की वे श्मशानको ही प्राप्त हुए, किंतु जिन बुद्धिमानोंने संतानकी इच्छा नहीं की वे अमरत्वको ही प्राप्त हुए”। | | इत्थंविदां गृहस्थानामरण्यवासिनां च समानमार्गत्त्वेऽमृतत्वफले च सत्यरण्यवासिनां विद्यानर्थक्यं प्राप्तम् । तथा च श्रुतिविरोधः “न तत्र दक्षिणा यन्ति नाविद्वांसस्तपस्विनः” इति “स एनमविदितो न भुनक्ति” इति च विरुद्धम् । | शङ्का—इस प्रकार जाननेवाले गृहस्थ और वनवासियोंको समानमार्ग और अमृतत्वरूप फल प्राप्त होनेपर तो वनवासियोंके ज्ञानकी व्यर्थता सिद्ध होती है और ऐसा होनेसे “वहाँ दक्षिणमार्गी और अज्ञानी तपस्वी नहीं जाते” इस श्रुतिसे विरोध आता है तथा “अपना ज्ञान न होनेपर वह (परमात्मा) इस जीवका [मोक्षदानद्वारा] पालन नहीं करता” यह कथन भी विपरीत हो जाता है। | | न; आभूतसंप्लवस्थानस्यामृतत्वेन विवक्षितत्वात् । तत्रैवोक्तं पौराणिकैः—“आभूतसंप्लवं स्थान- | समाधान—नहीं, क्योंकि यहाँ अमृतत्वसे भूतोंके प्रलयपर्यन्त रहना ही अभिप्रेत है। इसी सम्बन्धमें पौराणिकोंने कहा है कि “भूतोंके प्रलयपर्यन्त रहना अमृतत्व ही |
| खण्ड १० ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५०५ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| ममृतत्वं हि भाष्यते" इति । यच्चात्यन्तिकममृतत्वम्, तदपेक्षया "न तत्र दक्षिणा यन्ति" "स एनमविदितो न भुनक्ति" इत्याद्याः श्रुतयः, इत्यतो न विरोधः । | कहलाता है।" किंतु जो आत्यन्तिक अमृतत्व है उसकी अपेक्षासे "वहाँ दक्षिणमार्गी नहीं जाते" "अपना ज्ञान न होनेपर वह (परमात्मा) इस जीवका [मोक्षप्रदानद्वारा] पालन नहीं करता" इत्यादि श्रुतियाँ हैं; अतः इससे कोई विरोध नहीं है । |
| "न च पुनरावर्तन्ते" इति "इमं मानवमावर्तं नावर्त्तन्ते" (छा० उ० ४ । १५ । ५) इत्यादिश्रुतिविरोध इति चेत् । | शङ्का— किंतु [ऐसा मानें तो] "वे फिर नहीं लौटते" "इस मानव आवर्त्तमें फिर नहीं आते" इत्यादि श्रुतिसे विरोध आता है । |
| न; 'इमं मानवम्' इति विशेषणात् "तेषामिह न पुनरावृत्तिरस्ति' इति च । यदि ह्येकान्तेनैवनावर्तेरन्निमं मानवमिहेति च विशेषणमनर्थकं स्यात् । इममिहेत्याकृतिमात्रमुच्यत इति चेत्, न; अनावृत्तिशब्देनैव नित्यानावृत्त्यर्थस्य प्रतीतत्वादाकृतिकल्पनाऽनर्थिका । अत इममिहेति | समाधान— ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योंकि 'इमं मानवम्' ऐसा विशेषण है, तथा यह भी कहा गया है कि 'उनकी यहाँ पुनरावृत्ति नहीं होती'। यदि उनकी सर्वथा पुनरावृत्ति न होती तो 'इमं मानवम्' तथा 'इह'—ये विशेषण व्यर्थ हो जाते । यदि कहो कि 'इमम्' और 'इह' इन शब्दोंसे आकृतिमात्र बतलायी गयी है [अर्थात् किसी देशकालविशेषका नियम न करके उसके नित्य मोक्षका प्रतिपादन किया गया है]—तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि नित्य अनावृत्तिरूप अर्थकी प्रतीति तो 'अनावृत्ति' शब्दसे ही हो जाती है; अतः उसमें आकृतिकी कल्पना निरर्थक ही |
५०६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५
| ५०६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| च विशेषणार्थवत्त्वायान्यत्रावृत्तिः कल्पनीया। | है। इसलिये 'इमम्' और 'इह' इन विशेषणोंकी सार्थकताके लिये उसकी अन्यत्र आवृत्ति माननी चाहिये।* |
| न च 'सदेकमेवाद्वितीयम्' आत्मविदोऽनु- इत्येवं प्रत्ययवतां क्रान्तिनिरूपणम् मूर्धन्यनाड्यार्चिरादिमार्गेण गमनम्, 'ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति' (बृ० उ० ४ । ४ । ६)। "तस्मात्तत्सर्वमभवत्" (बृ० उ० १ । ४ । १०)। "न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति। अत्रैव समवलीयन्ते" (बृ० उ० ४ । ४ । ६) इत्यादि श्रुतिशतेभ्यः। | इसके सिवा जिनका ऐसा अनुभव है कि 'एकमात्र अद्वितीय सत् ही है' उनका शीर्षस्थानीय नाडीद्वारा अर्चिरादि मार्गसे गमन भी नहीं होता; जैसा कि "वह ब्रह्म ही होकर ब्रह्मको प्राप्त होता है" "इसीसे यह सब कुछ हो गया" "उसके प्राण उत्क्रमण नहीं करते, यहीं लीन हो जाते हैं" इत्यादि सैकड़ों श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है। |
| ननु तस्माज्जीवादुच्चिक्रमिषोः प्राणा नोत्क्रामन्ति सहैव गच्छन्तीत्ययमर्थः कल्प्यत इति चेत् ? | शङ्का—यदि इस श्रुतिका ऐसा अर्थ माना जाय कि उत्क्रमण करनेकी इच्छावाले उस जीवके पाससे प्राण उत्क्रमण नहीं करते, बल्कि उसके साथ ही जाते हैं, तो ? |
| न; 'अत्रैव समवलीयन्ते' इति विशेषणानर्थक्यात्, "सर्वे प्राणा अनूत्क्रामन्ति" (बृ० उ० ४ । | समाधान—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे 'यहीं लीन हो जाते हैं' यह विशेषण व्यर्थ हो जायगा। तथा इसके सिवा "सब प्राण उसका अनुगमन करते हैं" |
* अर्चिमार्गसे जानेवाले पुरुषकी इस लोकमें तो आवृत्ति नहीं होती; किंतु ब्रह्मलोकमें ही ऐसे कई लोक हैं जिनमें वह अपने तपके प्रभावसे जाता है। महः, जनः, तपः और सत्य—ये चारों ही लोक ब्रह्मलोकके अन्तर्गत हैं। साधक अपनी साधनाके प्रभावसे इनमेंसे किसी एक लोकमें जाता है और फिर वहाँसे ज्ञानद्वारा उत्तरोत्तर लोकमें जाता हुआ सत्यलोकमें पहुँचकर मुक्त हो जाता है। यह लोकान्तरगमन ही उसकी अन्यत्र आवृत्ति है।
खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ ५०७
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| ४।२) इति च प्राणैर्गमनस्य प्राप्तत्वात्। तस्मादुत्क्रामन्तीत्यनाशङ्कवैषा। | इस श्रुतिसे प्राणोंके सहित जीवका गमन सिद्ध भी होता है। अतः ‘प्राण उत्क्रमण करते हैं’ इस विषयमें कोई शङ्का नहीं हो सकती। |
| यदापि मोक्षस्य संसारगतिवैलक्षण्यात्प्राणानां जीवेन सहागमनमाशङ्क्य तस्मान्नोत्क्रामन्तीत्युच्यते, तदाप्यत्रैव समवलीयन्त इति विशेषणमनर्थकं स्यात्। न च प्राणैर्वियुक्तस्य गतिरुपपद्यते जीवत्वं वा। सर्वगतत्वात्सदात्मनो निरवयवत्वात् प्राणसंबन्धमात्रमेव ह्यग्निविस्फुलिङ्गवज्जीवत्वभेदकारणमित्यतस्तद्वियोगे जीवत्वं गतिर्वा न शक्या परिकल्पयितुं श्रुतयश्चेत्प्रमाणम्। | इसके सिवा संसारगतिसे मोक्षकी विलक्षणता होनेके कारण जब कि जीवके साथ प्राणोंके न जानेकी आशङ्का करके ऐसा कहा जाता है कि वे उससे उत्क्रमण ही नहीं करते [अर्थात् जीव प्राणोंके बिना ही चला जाता है] तो उस समय भी ‘वे यहीं लीन हो जाते हैं’ यह विशेषण व्यर्थ हो जाता है, क्योंकि प्राणोंसे वियुक्त हुए प्राणीकी गति अथवा जीवत्व सम्भव ही नहीं है। क्योंकि सदात्मा तो सर्वगत और निरवयव है; प्राणसे सम्बन्ध होना ही अग्निके विस्फुलिङ्गोंके समान जीवभावरूप भेदका कारण है। अतः यदि श्रुतिको प्रमाण माना जाय तो प्राणोंका वियोग हो जानेपर चिदात्माके जीवत्व अथवा गतिकी कल्पना नहीं की जा सकती। |
| न च सतोऽणुरवयवः स्फुटितो जीवाख्यः सद्रूपं छिद्रीकुर्वन् गच्छतीति शक्यं कल्पयितुम्। | इसके सिवा ऐसी कल्पना भी नहीं की जा सकती कि सदात्माका उससे अलग हुआ अणुमात्र अवयव जीवसंज्ञक है और वह सदात्माको छिद्रयुक्त करता हुआ जाता है। |