भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 509
खण्ड १० ]शाङ्करभाष्यार्थ५०५
संस्कृतहिन्दी
ममृतत्वं हि भाष्यते" इति । यच्चात्यन्तिकममृतत्वम्, तदपेक्षया "न तत्र दक्षिणा यन्ति" "स एनमविदितो न भुनक्ति" इत्याद्याः श्रुतयः, इत्यतो न विरोधः ।कहलाता है।" किंतु जो आत्यन्तिक अमृतत्व है उसकी अपेक्षासे "वहाँ दक्षिणमार्गी नहीं जाते" "अपना ज्ञान न होनेपर वह (परमात्मा) इस जीवका [मोक्षप्रदानद्वारा] पालन नहीं करता" इत्यादि श्रुतियाँ हैं; अतः इससे कोई विरोध नहीं है ।
"न च पुनरावर्तन्ते" इति "इमं मानवमावर्तं नावर्त्तन्ते" (छा० उ० ४ । १५ । ५) इत्यादिश्रुतिविरोध इति चेत् ।शङ्का— किंतु [ऐसा मानें तो] "वे फिर नहीं लौटते" "इस मानव आवर्त्तमें फिर नहीं आते" इत्यादि श्रुतिसे विरोध आता है ।
न; 'इमं मानवम्' इति विशेषणात् "तेषामिह न पुनरावृत्तिरस्ति' इति च । यदि ह्येकान्तेनैवनावर्तेरन्निमं मानवमिहेति च विशेषणमनर्थकं स्यात् । इममिहेत्याकृतिमात्रमुच्यत इति चेत्, न; अनावृत्तिशब्देनैव नित्यानावृत्त्यर्थस्य प्रतीतत्वादाकृतिकल्पनाऽनर्थिका । अत इममिहेतिसमाधान— ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योंकि 'इमं मानवम्' ऐसा विशेषण है, तथा यह भी कहा गया है कि 'उनकी यहाँ पुनरावृत्ति नहीं होती'। यदि उनकी सर्वथा पुनरावृत्ति न होती तो 'इमं मानवम्' तथा 'इह'—ये विशेषण व्यर्थ हो जाते । यदि कहो कि 'इमम्' और 'इह' इन शब्दोंसे आकृतिमात्र बतलायी गयी है [अर्थात् किसी देशकालविशेषका नियम न करके उसके नित्य मोक्षका प्रतिपादन किया गया है]—तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि नित्य अनावृत्तिरूप अर्थकी प्रतीति तो 'अनावृत्ति' शब्दसे ही हो जाती है; अतः उसमें आकृतिकी कल्पना निरर्थक ही