भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 495, कुल 978 में से

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पृष्ठ 495

सप्तम खण्ड

—: ०० :—

पुरुषरूपा अग्निविद्या

पुरुषो वाव गौतमाग्निस्तस्य वागेव समित्प्राणो धूमो जिह्वार्चिश्चक्षुरङ्गाराः श्रोत्रं विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥

हे गौतम ! पुरुष ही अग्नि है। उसकी वाक् ही समिध् है, प्राण धूम है, जिह्वा ज्वाला है, चक्षु अङ्गारे और श्रोत्र विस्फुलिङ्ग हैं ॥१॥

| पुरुषो वाव गौतमाग्निः। । तस्य वागेव समित्, वाचा हि मुखेन समिध्यते पुरुषो न मूकः। प्राणो धूमः, धूम इव मुखान्निर्गमनात्। जिह्वार्चिर्लोहितत्वात्। चक्षुरङ्गाराः, भास आश्रयत्वात्। श्रोत्रं विस्फुलिङ्गाः, विप्रकीर्णत्वसाम्यात् ॥ १ ॥ | हे गौतम ! पुरुष ही अग्नि है। उसकी वाक् ही समिध् है, क्योंकि वाणीरूप मुखके द्वारा ही पुरुष सुशोभित होता है, मूक पुरुष शोभित नहीं होता। प्राण धूम है, क्योंकि वह धूमके समान मुखसे निकलता है; लाल होनेके कारण जिह्वा ज्वाला है; प्रकाशका आश्रय होनेके कारण नेत्र अङ्गारे हैं तथा विप्रकीर्णत्वमें समानता होनेसे श्रोत्र विस्फुलिङ्ग हैं ॥ १ ॥ |


तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुते रेतः संभवति ॥ २ ॥