छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 494, कुल 978 में से
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| ४९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| दिशोऽङ्गाराः, उपशान्तत्वसामान्यात् । अवान्तरदिशो विस्फुलिङ्गाः, क्षुद्रत्वसामान्यात् ॥ १ ॥ | उपशान्तिमें समानता होनेके कारण दिशाएँ अङ्गारे हैं तथा क्षुद्रत्वमें समानता होनेके कारण अवान्तर-दिशाएँ (कोण) विस्फुलिङ्ग हैं ॥ १ ॥ |
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वर्षं जुह्वति तस्या आहुतेरन्नँसंभवति ॥ २ ॥
उस इस अग्निमें देवगण वर्षाका हवन करते हैं; उस आहुतिसे अन्न होता है ॥ २ ॥
| तस्मिन्नित्यादि समानम् । तस्या आहुतेरन्नं व्रीहियवादि संभवति ॥ २ ॥ | ‘तस्मिन्नेतस्मिन्’ इत्यादि श्रुतिका अर्थ पूर्ववत् है। उस आहुतिसे व्रीहियवादिरूप अन्न होता है ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये
षष्ठखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ६ ॥