छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 506, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५०२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| ननु ब्रह्मचारिणोऽप्यगृहीता ग्रामश्रुत्यारण्यश्रुत्या चानुपलक्षिता विद्यन्ते कथं पारिशेष्यसिद्धिः । | शङ्का— जिनका ग्रामश्रुति और अरण्यश्रुति दोनोंहीसे ग्रहण नहीं होता वे ब्रह्मचारी लोग भी तो रह जाते हैं; फिर तुम्हारे परिशेषकी सिद्धि कैसे हो सकती है ? | | नैष दोषः, पुराणस्मृतिप्रामाण्यादूर्ध्वरेतसां नैष्ठिकब्रह्मचारिणामुत्तरेणार्यम्णः पन्थाः प्रसिद्धः। अतस्तेऽप्यरण्यवासिभिः सह गमिष्यन्ति । उपकुर्वाणकास्तु स्वाध्यायग्रहणार्था इति न विशेषनिर्देशार्हाः । | समाधान— यह कोई दोष नहीं है, पुराण और स्मृतियोंसे ऊर्ध्वरेता नैष्ठिक ब्रह्मचारियोंका सूर्यसम्बन्धी उत्तर मार्ग प्रसिद्ध है, अतः वे भी अरण्यवासियोंके साथ ही जायँगे। तथा उपकुर्वाणक ब्रह्मचारी तो स्वाध्यायग्रहणके लिये होते हैं; अतः वे विशेष निर्देशके योग्य नहीं हैं। | | ननूर्ध्वरेतस्त्वं चेदुत्तरमार्गप्रतिपत्तिकारणं पुराणस्मृतिप्रामाण्यादिष्यत इत्थं वित्त्वमनर्थकं प्राप्तम् । | शङ्का— यदि पुराण और स्मृतियोंकी प्रमाणतासे उत्तरायणकी प्राप्तिका कारण ऊर्ध्वरेता होना माना जाता है तब तो इस प्रकार पञ्चाग्निविद्याका ज्ञान व्यर्थ सिद्ध होता है ? | | न; गृहस्थान्प्रत्यर्थवत्त्वात् । | समाधान— ऐसी बात नहीं है, क्योंकि गृहस्थोंके लिये वह सार्थक है। | | ये गृहस्था अनित्थंविदस्तेषां स्वभावतो दक्षिणो धूमादिः पन्थाः प्रसिद्धस्तेषां य इत्थं विदुः सगुणं वान्यद्ब्रह्मविदुः, “अथ | जो गृहस्थ ऐसा जाननेवाले नहीं हैं उनके लिये स्वभावतः धूमादि दक्षिण-मार्ग प्रसिद्ध है; किंतु उनमें जो ऐसा जाननेवाले हैं अथवा जो इनसे भिन्न सगुणब्रह्मके उपासक हैं वे (छा० ४। १५। ५ |