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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

७६० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७

७६० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७

स य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्त आकाशवतो वै स लोकान्प्रकाशवतोऽसम्बाधानुरुगायवतोऽभिसिध्यति यावदाकाशस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगव आकाशाद्भूय इत्याकाशाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥

वह जो कि आकाशकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है वह आकाशवान्, प्रकाशवान्, पीड़ारहित और विस्तारवाले लोकोंको प्राप्त करता है। जहाँतक आकाशकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि आकाशकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। [नारद—] 'भगवन् ! क्या आकाशसे बढ़कर भी कुछ है?' [ सनत्कुमार—] 'आकाशसे बढ़कर भी है ही।' [ नारद—] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ २ ॥

| फलं शृण्वाकाशवतो वै विस्तारयुक्तान् स विद्वाँल्लोकान् प्रकाशवतः प्रकाशाकाशयोर्नित्यसम्बन्धात्प्रकाशवतश्च लोकान् सम्बाधान् सम्बाधनं सम्बाधः सम्बाधोऽन्योऽन्यपीडा तद्रहितानसम्बाधानुरुगायवतो विस्तीर्णगतीन्विस्तीर्णप्रचाराँल्लोकानभिसिध्यति। यावदाकाशस्येत्याद्युक्तार्थम् ॥ २ ॥ | [ इसका ] फल सुनो—वह विद्वान् आकाशवान् यानी विस्तारयुक्त लोकोंको तथा 'प्रकाशवान्'—क्योंकि प्रकाश और आकाशका नित्य सम्बन्ध है अतः प्रकाशयुक्त लोकोंको, 'असम्बाध'—सम्बाधनका नाम सम्बाध और सम्बाध परस्परकी पीड़ाको कहते हैं, उससे रहित असम्बाध और 'उरुगायवान्'—विस्तीर्ण गतिवाले अर्थात् विस्तृत प्रचारवाले लोकोंको प्राप्त होता है। 'यावदाकाशस्य' आदि वाक्यका अर्थ पहले कहे हुएके समान है ॥२॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१२॥

त्रयोदश खण्ड

आकाशकी अपेक्षा स्मरणका महत्त्व

स्मरो वावाकाशाद्भूयस्तस्माद्यद्यपि बहव आसीरन्न स्मरन्तो नैव ते कञ्चन शृणुयुर्न मन्वीरन्न विजानीरन्यदा वाव ते स्मरेयुरथ शृणुयुरथ मन्वीरन्नथ विजानीरन्स्मरेण वै पुत्रान्विजानाति स्मरेण पशून्स्मरमुपास्स्वेति ॥ १ ॥

स्मर (स्मरण) ही आकाशसे बढ़कर है। इसीसे यद्यपि बहुत-से लोग [एक स्थानपर] बैठे हों तो भी स्मरण न करनेपर वे न कुछ सुन सकते हैं, न मनन कर सकते हैं और न जान ही सकते हैं। जिस समय वे स्मरण करते हैं उसी समय सुन सकते हैं, उसी समय मनन कर सकते हैं और उसी समय जान सकते हैं। स्मरण करनेसे ही पुरुष पुत्रोंको पहचानता है और स्मरणसे ही पशुओंको। तुम स्मरकी उपासना करो ॥ १ ॥


| स्मरो वावाकाशाद्भूयः । स्मरणं स्मरोऽन्तःकरणधर्मः । स आकाशाद्भूयानिति द्रष्टव्यं लिङ्गव्यत्ययेन । स्मर्तुः स्मरणे हि सत्याकाशादि सर्वमर्थवत्, स्मरणवतो | स्मर ही आकाशसे बढ़कर है। स्मरणका नाम 'स्मर' है, यह अन्तःकरणका धर्म है। वह आकाशकी अपेक्षा 'भूयान्' (बढ़कर) है—ऐसा लिङ्गपरिवर्तन करके* समझना चाहिये। स्मरण करनेवालेकी स्मृति होनेपर ही आकाशादि सब सार्थक |


※ मूल श्रुति में 'भूयः' यह नपुंसकलिंग है। किंतु 'स्मर' शब्द पुल्लिंग है, अतः उसका विशेषण होनेके कारण 'भूयः' के स्थानमें 'भूयान्' ऐसा पुँल्लिङ्ग पाठ कर लेना चाहिये।

७६२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७

७६२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७

| भोग्यत्वात् । असति तु स्मरणे सदप्यसदेव, सत्त्वकार्याभावात् । नापि सत्त्वं स्मृत्यभावे शक्यमाकाशादीनामवगन्तुमित्यतः स्मरणस्याकाशाद्भूयस्त्वम् । <br><br> दृश्यते हि लोके स्मरणस्य भूयस्त्वं यस्मात्, तस्माद्यद्यपि समुदिता बहव एकस्मिन्नासीरन्नुपविशेयुः, ते तत्रासीना अन्योन्यभाषितमपि न स्मरन्तश्चेत्स्युः, नैव ते कञ्चन शब्दं शृणुयुः, तथा न मन्वीरन्, मन्तव्यं चेत्स्मरेयुस्तदा मन्वीरन्, स्मृत्यभावान्न मन्वीरन्; तथा न विजानीरन् । यदा वाव ते स्मरेयुर्मन्तव्यं विज्ञातव्यं श्रोतव्यं च, अथ शृणुयुरथ मन्वीरन्नथ विजानीरन् । तथा स्मरेण वै—मम पुत्रा एते—इति पुत्रान्विजानाति, स्मरेण पशून् । अतो | होते हैं, क्योंकि वे स्मृतिमान्‌के ही योग्य हैं । स्मृतिके न होनेपर तो विद्यमान वस्तु भी अविद्यमान ही है, क्योंकि उसकी सत्ताके कार्यका अभाव है । स्मृतिका अभाव होनेपर आकाशादिकी सत्ताका ज्ञान भी नहीं हो सकता । इसीसे स्मरणकी आकाशसे उत्कृष्टता है । <br><br> क्योंकि लोकमें स्मृतिकी उत्कृष्टता देखी जाती है, इसलिये यद्यपि बहुत-से लोग एक स्थानपर बैठे हों वे एक-दूसरेसे भाषण करते हुए भी, यदि स्मृतियुक्त नहीं होते तो कोई शब्द श्रवण नहीं कर सकते । इसी प्रकार मनन भी नहीं कर सकते । यदि वे मन्तव्य विषयका स्मरण करते तो मनन कर सकते थे, अतः स्मृतिका अभाव होनेके कारण मनन भी नहीं कर सकते और न जान ही सकते हैं । जिस समय वे मन्तव्य, विज्ञातव्य अथवा श्रोतव्य विषयका स्मरण करते हैं तभी उसे सुन सकते, मनन कर सकते और जान सकते हैं । इसी प्रकार स्मरण करनेसे ही 'ये मेरे पुत्र हैं' इस प्रकार पुत्रोंको जानते हैं और स्मरणसे ही पशुओंको । |

खण्ड ११]शाङ्करभाष्यार्थ७६३

भूयस्त्वात्स्मरमुपास्स्वेति ॥१॥अतः उत्कृष्ट होनेके कारण तुम स्मरणकी उपासना करो ॥ १ ॥
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—: ० :—

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स यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्ते यावत्स्मरस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवः स्मराद्भूय इति स्मराद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥

वह जो कि स्मरकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है, उसकी जहाँतक स्मरकी गति है वहाँतक स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि स्मरकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है । [ नारद—] 'भगवन् ! क्या स्मरसे भी श्रेष्ठ कुछ है ?' [ सनत्कुमार—] 'स्मरसे भी श्रेष्ठ है ही।' [ नारद—] 'भगवान् मेरे प्रति उसका वर्णन करें' ॥२॥

उक्तार्थमन्यत् ॥२॥शेष सबका अर्थ पूर्वोक्तके समान है ॥ २ ॥
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
त्रयोदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१३॥

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चतुर्दश खण्ड

—: ० :—

स्मरणसे आशाकी महत्ता

आशा वाव स्मराद्भूयस्याशेद्धो वै स्मरो मन्त्रानधीते कर्माणि कुरुते पुत्रांश्च पशूूंश्चेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छत आशामुपास्स्वेति ॥ १ ॥

आशा ही स्मरणकी अपेक्षा उत्कृष्ट है। आशासे दीप्त हुआ स्मरण ही मन्त्रोंका पाठ करता है, कर्म करता है, पुत्र और पशुओंकी इच्छा करता है तथा इस लोक और परलोककी कामना करता है। तुम आशाकी उपासना करो ॥ १ ॥

| आशा वाव स्मराद्भूयसी।<br><br>आशाप्राप्तवस्त्वाकाङ्क्षा, आशा तृष्णा काम इति यामाहुः पर्यायैः, सा च स्मराद्भूयसी।<br><br>कथम् ? आशया ह्यन्तःकरणस्थया स्मरति स्मर्तव्यम्। आशाविषयरूपं स्मरन्नसौ स्मरो भवत्यत आशेद्ध, आशयाभिवर्धितः स्मरभूतः स्मरन्नृगादीन्मन्त्रान- | आशा ही स्मरणसे बढ़कर है।<br><br>आशा--अप्राप्त वस्तुकी इच्छाका नाम आशा है; जिसका तृष्णा और काम इन पर्याय शब्दोंसे भी निरूपण किया जाता है। वह स्मरकी अपेक्षा बढ़कर है।<br><br>सो किस प्रकार ?—अन्तःकरणमें स्थित हुई आशासे ही मनुष्य स्मरणीय विषयका स्मरण करता है। आशाके विषयके रूपका स्मरण करनेसे यह स्मृतिको प्राप्त होता है। अतः आशासे दीप्त---आशासे वृद्धिको प्राप्त हुआ स्मृतिभूत वह स्मरण करता हुआ ऋगादि मन्त्रोंका |

खण्ड १४]
शाङ्करभाष्यार्थ
७६५


| धीतेऽधीत्य च तदर्थं ब्राह्मणेभ्यो विधींश्च श्रुत्वा कर्माणि कुरुते तत्फलाशयैव पुत्रांश्च पशूंश्च कर्मफलभूतानिच्छतेऽमिवाञ्छत्याशयैव तत्साधनान्यनुतिष्ठति । इमं च लोकमाशेद्ध एव स्मरँल्लोकसंग्रहहेतुभिरिच्छते । अमुं च लोकमाशेद्धः स्मरंस्तत्साधनानुष्ठानेनेच्छतेऽत आशारशनावबद्धं स्मराकाशादि नामपर्यन्तं जगच्चक्रीभूतं प्रतिप्राणि । अत आशायाः स्मरादपि भूयस्त्वमित्यत आशामुपास्स्व ॥ १ ॥ | अध्ययन करता है तथा उनका अध्ययन कर और ब्राह्मणोंके मुखसे उनका अर्थ एवं विधि श्रवण कर उनके फलकी आशासे ही कर्म करता है तथा कर्मके फलभूत पुत्र और पशुओंकी इच्छा-कामना करता है एवं आशासे ही उनके साधनोंका अनुष्ठान करता है। आशासे समृद्ध हुआ ही वह लोकसंग्रहरूप हेतुओंसे इस लोकका स्मरण करता हुआ इसको इच्छा करता है तथा आशासे समृद्ध हुआ ही वह परलोककी, उसके साधनोंका अनुष्ठान करते हुए इच्छा करता है । इस प्रकार आशारूप रस्सीसे बँधा हुआ यह स्मर एवं आकाशसे लेकर नामपर्यन्त जगत् प्रत्येक प्राणीमें चक्रकी भाँति घूम रहा है। इसलिये आशा स्मरकी अपेक्षा भी उत्कृष्ट है; अतः तुम आशाकी उपासना करो ॥ १ ॥ |


स य आशां ब्रह्मेत्युपास्त आशायास्य सर्वे कामाः समृध्यन्त्यमोघा हास्याशिषो भवन्ति यावदाशाया गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति य आशां ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगव आशाया भूय इत्याशाया वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवन्ब्रवीत्विति ॥ २ ॥

७६६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७

७६६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७


वह जो कि आशाको 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है उसकी सब कामनाएँ आशासे समृद्ध होती हैं । उसकी प्रार्थनाएँ सफल होती हैं । जहाँतक आशाकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि आशाकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है । [ नारद— ] 'भगवन् ! क्या आशासे बढ़कर भी कुछ है ?' [ सनत्कुमार— ] 'आशासे बढ़कर भी है ही।' [ नारद— ] 'भगवान् मुझे वह बतलावें' ॥ २ ॥

| यस्त्वाशां ब्रह्मेत्युपास्ते शृणु तस्य फलम् । आशया सदोपासितयास्योपासकस्य सर्वे कामाः समृध्यन्ति समृद्धिं गच्छन्ति । अमोघा हास्याशिषः प्रार्थनाः सर्वा भवन्ति यत्प्रार्थितं सर्वं तदवश्यं भवतीत्यर्थः । यावदाशाया गतमित्यादि पूर्ववत् ॥२॥ | जो पुरुष आशाकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है उसका फल श्रवण करो । सर्वदा उपासना की हुई आशासे उसके उपासककी सब कामनाएँ समृद्ध अर्थात् उन्नतिको प्राप्त हो जाती हैं और उसकी सब आशा-प्रार्थनाएँ सफल होती हैं । तात्पर्य यह है कि जो कुछ उसका प्रार्थित होता है वह अवश्य सिद्ध होता है । 'यावदाशाया गतम्'इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है ॥ २ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये चतुर्दशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १४ ॥

पञ्चदश खण्ड

आशासे प्राणका प्राधान्य

| नामोपक्रममाशान्तं कार्य-कारणत्वेन निमित्तनैमित्तिकत्वेन चोत्तरोत्तरभूयस्तयावस्थितं स्मृतिनिमित्तसद्भावमाशारशनापाशैर्विपाशितं सर्वं सर्वतो बिसमिव तन्तुभिर्यस्मिन्प्राणे समर्पितम्, येन च सर्वतोव्यापिनान्तर्बहिर्गतेन सूत्रे मणिगणा इव सूत्रेण ग्रथितं विधृतं च स एषः— | नामसे लेकर आशापर्यन्त जो कार्यकारण एवं निमित्त-नैमित्तिक रूपसे उत्तरोत्तर बढ़कर स्थित है तथा जिसका सद्भाव स्मृतिके निमित्त-रूपसे सिद्ध होता है उस आशारूप जालसे तन्तुसे कमलनालके समान सब ओरसे जकड़ा हुआ यह सम्पूर्ण जगत् जिस प्राणमें समर्पित है तथा बाहर-भीतर व्याप्त हुए जिस सर्वगत सूत्र (प्राण) के द्वारा सूतमें मणियों [मनकों] के समान यह सब गूँथा हुआ और विधृत है। वह यह— |

प्राणो वा आशाया भूयान्यथा वा अरा नाभौ समर्पिता एवमस्मिन्प्राणे सर्वँसमर्पितम्। प्राणःप्राणेन याति प्राणः प्राणं ददाति प्राणाय ददाति। प्राणो ह पिता प्राणो माता प्राणो भ्राता प्राणः स्वसा प्राण आचार्यः प्राणो ब्राह्मणः ॥ १ ॥

प्राण ही आशासे बढ़कर है। जिस प्रकार रथचक्रकी नाभिमें अरे समर्पित रहते हैं उसी प्रकार इस प्राणमें सारा जगत् समर्पित है। प्राण प्राण (अपनी शक्ति) के द्वारा गमन करता है; प्राण प्राणको देता है और प्राणके लिये ही देता है। प्राण ही पिता है; प्राण

७६८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७

७६८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७

माता है, प्राण भाई है, प्राण बहिन है, प्राण आचार्य है और प्राण ही ब्राह्मण है ॥ १ ॥

| प्राणो वा आशाया भूयान्<br><br>कथमस्य भूयस्त्वम् ? इत्याह दृष्टान्तेन समर्थयंस्तद्भूयस्त्वम्—यथा वै लोके रथचक्रस्यारा रथनाभौ समर्पिताः सम्प्रोताः सम्प्रवेशिता इत्येतत्; एवमस्मिँल्लिङ्गसङ्घातरूपे प्राणे प्रज्ञात्मनि दैहिके मुख्ये यस्मिन् परा देवता नामरूपव्याकरणायादर्शादौ प्रतिबिम्बवज्जीवेनात्मनानुप्रविष्टा । यश्च महाराजस्येव सर्वाधिकारीश्वरस्य । "कस्मिन्न्वहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति स प्राणमसृजत" [प्र० उ० ६ । ३] इति श्रुतेः । यस्तु च्छायेवानुगत ईश्वरम्, "तद्यथा रथस्यारेषु नेमिरर्पितो | प्राण ही आशासे बढ़कर है। इसकी उत्कृष्टता किस प्रकार है ? ऐसी जिज्ञासा होनेपर दृष्टान्तद्वारा उसकी उत्कृष्टताका समर्थन करते हुए [सनत्कुमारजी-] कहते हैं—लोकमें जिस प्रकार रथके पहियेके अरे रथकी नाभिमें समर्पित-सम्प्रोत अर्थात् सम्यक् प्रकारसे प्रवेशित रहते हैं उसी प्रकार लिङ्ग संघातस्वरूप¹ इस प्राण यानी प्रज्ञात्मामें² अर्थात् दैहिक मुख्य प्राणमें, जिसमें कि परादेवताने नामरूपकी अभिव्यक्ति करनेके लिये दर्पणादिमें प्रतिबिम्बके समान जीवरूपसे प्रवेश किया है, जो महाराजके सर्वाधिकार के समान ईश्वरका सर्वाधिकारी है, जैसा कि "किसके उत्क्रमण करनेपर मैं उत्क्रमण करूँगा तथा किसके स्थित होनेपर स्थित होऊँगा—ऐसा ईक्षण करके उसने प्राणकी रचना की" इस श्रुतिसे प्रमाणित होता है तथा जो छायाके समान ईश्वरका अनुगामी |


१—व्यष्टिलिंगदेहोंका समुदायरूप समष्टिसूत्रात्मा।
२—उपाधि प्राण और उपाधिमान् आत्माको एकता मानकर यह विशेषण दिया गया है।

खण्ड १५] शाङ्करभाष्यार्थं ७६९


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
नाभावरा अर्पिता एवमेवैता भूतमात्राः प्रज्ञामात्रास्वर्पिताः प्रज्ञामात्राः प्राणेऽर्पिताः स एष प्राण एव प्रज्ञात्मा" (कौ०उ० ३।८) इति कौषीतकिनाम् । अत एवमस्मिन्प्राणे सर्वं यथोक्तं समर्पितम् ।<br><br>अतः स एष प्राणोऽपरतन्त्रः प्राणेन स्वशक्त्यैव याति नान्यकृतं गमनादिक्रियास्वस्य सामर्थ्यमित्यर्थः । सर्वं क्रियाकारकफलभेदजातं प्राण एव न प्राणाद्बहिर्भूतमस्तीति प्रकरणार्थः । प्राणः प्राणं ददाति । यद्ददाति तत्स्वात्मभूतमेव । यस्मै ददाति तदपि प्राणायैव । अतः पित्राद्याख्योऽपि प्राण एव ॥ १ ॥है, जैसा कि कौषीतकी ब्राह्मणोपनिषद्की श्रुति है कि “जिस प्रकार रथके अरोंमें नेमि अर्पित है और रथकी नाभिमें अरे अर्पित हैं इसी प्रकार यह भूतमात्रा प्रज्ञामात्रामें अर्पित हैं और प्रज्ञामात्रा प्राणमें अर्पित है । वह यह प्राण ही प्रज्ञात्मा है ।” इसीसे इस प्राणमें ही उपर्युक्त सब समर्पित हैं ।<br><br>अतः वह यह परतन्त्र प्राण प्राणसे अर्थात् अपनी शक्तिसे ही गमन करता है । तात्पर्य यह है कि गमनादि क्रियाओंमें जो इसका सामर्थ्य है वह किसी अन्यके कारण नहीं है । सम्पूर्ण क्रिया, कारक और फलरूप भेदसमुदाय प्राण ही है, प्राणसे बाहर इनमें कोई नहीं है—ऐसा इस प्रकरणका तात्पर्य है । प्राण प्राण ( शक्ति ) प्रदान करता है; वह जो कुछ देता है उसका स्वात्मभूत ही है, जिसे देता है वह दान भी प्राणके लिये ही होता है । अतः पितृ आदि नामवाला भी प्राण ही है ॥ १ ॥
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७७० | छान्दोग्योपनिषत् | [ अध्याय ७

७७०छान्दोग्योपनिषत्[ अध्याय ७

| कथं पित्रादिशब्दानां प्रसिद्धार्थोत्सर्गेण प्राणविषयत्वमिति उच्यते । सति प्राणे पित्रादिषु पित्रादिशब्दप्रयोगात्तदुत्क्रान्तौ च प्रयोगाभावात् । कथं तत् ? इत्याह— | 'पितृ' आदि शब्दोंके प्रसिद्ध अर्थका त्याग करके उनका प्राणविषयक होना कैसे सम्भव है ! ऐसा प्रश्न होनेपर कहा जाता है-- क्योंकि प्राण रहनेपर ही पिता आदिके लिये 'पितृ' आदि शब्दका प्रयोग किया जाता है, उसके उत्क्रमण करनेपर इस प्रकारका प्रयोग भी नहीं होता । किस प्रकार है ? यह बतलाते हैं— |

स यदि पितरं वा मातरं वा भ्रातरं वा स्वसारं वाचार्यं वा ब्राह्मणं वा किञ्चिद्भृशमिव प्रत्याह धिक्त्वास्त्वित्येवैनमाहुः पितृहा वै त्वमसि मातृहा वै त्वमसि भ्रातृहा वै त्वमसि स्वसृहा वै त्वमस्याचार्यहा वै त्वमसि ब्राह्मणहा वै त्वमसीति ॥ २ ॥

यदि कोई पुरुष अपने पिता, माता, भ्राता, भगिनी, आचार्य अथवा ब्राह्मणके लिये कोई अनुचित बात कहता है तो [ उसके समीपवर्ती लोग ] उससे कहते हैं—'तुझे धिक्कार है, तू निश्चय ही पिताका हनन करनेवाला है, तू तो माताका वध करनेवाला है, तू तो भाईको मारनेवाला है, तू तो बहिनकी हत्या करनेवाला है, तू तो आचार्यका घात करनेवाला है, तू निश्चय ही ब्रह्मघाती है' ॥ २ ॥

| स यः कश्चित्पित्रादीनामन्यतमं यदि तं भृशमिव तदननुरूपमिव किञ्चिद्वचनं त्वङ्कारा- | जो कोई कि पिता आदिमेंसे किसीके प्रति यदि कोई 'भृशमिव'--उनके अननुरूप कोई त्वंकारादि (अरे-तू आदि) से युक्त वचन बोलता |

खण्ड १५] शाङ्करभाष्यार्थ ७७१

| दियुक्तं प्रत्याह तदैनं पार्श्वस्था आहुर्विवेकिनो धिक्त्वास्तु धिगस्तु त्वामित्येवम्। पितृहा वै त्वं पितुर्हन्तेत्यादि ॥ २ ॥ | है तो उसके समीपवर्ती विचारशील लोग उससे 'धिक्त्वास्तु'—तुझे धिक्कार है—ऐसा कहते हैं। 'तू निश्चय ही पितृहा—पिताका हनन करनेवाला है' इत्यादि ॥ २ ॥ |


अथ यद्यप्येनानुत्क्रान्तप्राणाञ्छूलेन समासं व्यतिषंदहेन्नैवैनं ब्रूयुः पितृहासीति न मातृहासीति न भ्रातृहासीति न स्वसृहासीति नाचार्यहासीति न ब्राह्मणहासीति ॥ ३ ॥

किंतु जिनके प्राण उत्क्रमण कर गये हैं उन पिता आदिको यदि वह शूलसे एकत्रित और छिन्न-भिन्न करके जला दे तो भी उससे 'तू पितृहा है' 'तू मातृहा है' 'तू भ्रातृहा है' 'तू बहिनकी हत्या करनेवाला है' 'तू आचार्यका घात करनेवाला है' अथवा 'तू ब्रह्मघाती है' ऐसा कुछ नहीं कहते ॥ ३ ॥

| अथैनानेवोत्क्रान्तप्राणांस्त्यक्तदेहानथ यद्यपि शूलेन समासं समस्य व्यतिषन्दहेद्यत्यस्य सन्दहेदेवमप्यतिक्रूरं कर्म समास-व्यासादिप्रकारेण दहनलक्षणं तद्देहसम्बद्धमेव कुर्वाणं नैवैनं ब्रूयुः पितृहेत्यादि। तस्मादन्वयव्यतिरेकाभ्यामवगम्यत एतत्पित्राद्याख्योऽपि प्राण एवेति ॥ ३॥ | किंतु प्राण निकल जानेपर—देहका त्याग कर देनेपर इन्हींको यदि वह शूलसे समास—एकत्रित करके व्यतिषन्दहन करे अर्थात् छिन्न-भिन्न करके जलावे; उनके देहसे सम्बद्ध समास-व्यासादि क्रमसे दहन करारूप ऐसा अत्यन्त क्रूर कर्म करनेपर भी उससे 'तू पितृहा है' इत्यादि नहीं कहते। अतः अन्वय-व्यतिरेकसे यह ज्ञात होता है कि यह पिता आदि नाम-वाला भी प्राण ही है ॥ ३ ॥ |

—: ✤ :—
छा० उ० २५—

७७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७

७७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७


तस्मात्—अतः—

प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नतिवादी भवति तं चेद्ब्रूयुरतिवाद्यसीत्यतिवाद्यस्मीति ब्रूयान्नापह्नुवीत ॥४॥

प्राण ही ये सब [ पिता आदि ] हैं । वह जो इस प्रकार देखनेवाला, इस प्रकार चिन्तन करनेवाला और इस प्रकार जाननेवाला है अतिवादी होता है । उससे यदि कोई कहे कि, 'तू अतिवादी है' तो उसे यही कहना चाहिये कि 'हाँ, अतिवादी हूँ', उसे छिपाना नहीं चाहिये ॥४॥

| प्राणो ह्येवैतानि पित्रादीनि सर्वाणि भवति चलानि स्थिराणि च। स वा एष प्राणविदेवं यथोक्तप्रकारेण पश्यन्फलतोऽनुभवन्नेवं मन्वान उपपत्तिभिश्चिन्तयन्नेवं विजानन्नुपपत्तिभिः संयोज्यैवमेवेति निश्चयं कुर्वन्नित्यर्थः । मननविज्ञानाभ्यां हि सम्भूतः शास्त्रार्थो निश्चितो दृष्टो भवेत् । अत एवं पश्यन्नतिवादी भवति नामाद्याशान्तमतीत्य वदनशीलो भवतीत्यर्थः । | प्राण ही ये सब चर और अचर पिता आदि हैं । वह यह प्राणवेत्ता इस प्रकार उपर्युक्त रीतिसे देखता हुआ अर्थात् फलतः अनुभव करता हुआ¹, इस प्रकार मनन करता हुआ अर्थात् युक्तियोंद्वारा चिन्तन करता हुआ और इस प्रकार जानता हुआ यानी उपपत्तियोंसे संयुक्त करके 'यह ऐसा ही है' इस प्रकार निश्चय करता हुआ, क्योंकि मनन और विज्ञानके द्वारा निष्पन्न हुआ शास्त्रका अर्थ निश्चित देखा जाता है; अतः इस प्रकार देखता हुआ वह अतिवादी होता है; तात्पर्य यह है कि उसका नामसे लेकर आशापर्यन्त सम्पूर्ण तत्त्वोंका अतिक्रमण करके बोलनेका स्वभाव होता है। |


१. यानी स्वरूपतः साक्षात्कार करता हुआ।

खण्ड १५] शाङ्करभाष्यार्थे ७७३

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| तं चेद्ब्रूयुस्तं यद्येवमतिवादिनं सर्वदा सर्वैः शब्दैर्नामाद्याशान्तमतीत्य वर्तमानं प्राणमेव वदन्त्येवं पश्यन्तमतिवदनशीलमतिवादिनं ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तस्य हि जगतः प्राण आत्माहमिति ब्रुवाणं यदि ब्रूयुरतिवाद्यसीति । बाढमतिवाद्यस्मीति ब्रूयान्नापह्नुवीत । कस्माद्ध्यसावपह्नुवीत यत्प्राणं सर्वेश्वरमयमहमस्मीत्यात्मत्वेनोपगतः ॥ ४ ॥ | उससे यदि कहें, अर्थात इस प्रकार अतिवदन करनेवाले यानी जो ऐसा देखता है कि सब लोग सर्वदा सम्पूर्ण शब्दोंद्वारा नामसे लेकर आशापर्यन्त तत्त्वोंका अतिक्रमण करके स्थित हुए प्राणका ही वर्णन करते हैं उस अतिवदनशील अतिवादीसे, जो 'मैं ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्‌का प्राण यानी आत्मा हूँ' ऐसा कहनेवाला है, यदि कहें कि 'तू अतिवादी है' तो उसे यही कहना चाहिये कि 'हाँ, मैं अतिवादी हूँ' उसे छिपाना नहीं चाहिये। जो सर्वेश्वर प्राणको 'यह मैं हूँ' इस प्रकार आत्मभावसे प्राप्त हो गया है वह किस प्रकार उस (अतिवादित्व) को छिपावेगा ? [ अर्थात् उसके लिये अपने अतिवादित्वको छिपानेका कोई प्रयोजन नहीं है ] ॥ ४ ॥ |

—: ० :—

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये पञ्चदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १५ ॥

षोडश खण्ड

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सत्य ही जानने योग्य है

| स एष नारदः सर्वातिशयं प्राणं स्वमात्मानं सर्वात्मानं श्रुत्वा नातः परमस्तीत्युपरराम । न पूर्ववत्किमस्ति भगवः प्राणाद्भूय इति पप्रच्छयतः । तमेवं विकारानृतब्रह्मविज्ञानेन परितुष्टमकृतार्थं परमार्थसत्यातिवादिनमात्मानं मन्यमानं योग्यं शिष्यं मिथ्याग्रहविशेषाद्विप्रच्यावयन्नाह भगवान्सनत्कुमारः । एष तु वा अतिवदति यमहं वक्ष्यामि न प्राणविद्वतिवादी परमार्थतः । नामाद्यपेक्षं तु तस्यातिवादित्वम् । यस्तु भूमाख्यं सर्वातिक्रान्तं तत्त्वं परमार्थसत्यं वेद सोऽतिवादीत्यत आह— | वे नारदजी सबसे उत्कृष्ट अपने आत्मा प्राणको ही सर्वात्मा सुनकर यह समझकर कि इससे परे और कुछ नहीं है, शान्त हो गये, क्योंकि पूर्ववत् उन्होंने ऐसा प्रश्न नहीं किया कि 'भगवन् ! प्राणसे बढ़कर क्या है ?' इस प्रकार विकाररूप मिथ्या ब्रह्मके ज्ञानसे संतुष्ट हुए, अकृतार्थ तथा अपनेको परमार्थसत्यातिवादी माननेवाले उस योग्य शिष्यको उस मिथ्याग्रहविशेषसे च्युत करते हुए, भगवान् सनत्कुमारने कहा—'मैं जिसका आगे वर्णन करूँगा वही अतिवदन करता है, परमार्थतः प्राणवेत्ता अतिवादी नहीं है । उसका अतिवादित्व तो नामादिकी अपेक्षासे ही है । किंतु अतिवादी तो वही है जो भूमासंज्ञक सर्वातीत परमार्थसत्य तत्त्वको जानता है ।' इसी आशयसे वे कहते हैं— |

एष तु वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति सोऽहं भगवः सत्येनातिवदानोति सत्यं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति सत्यं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥

खण्ड १६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७५


[ सनत्कुमार— ] जो सत्य ( परमार्थ सत्य आत्माके विज्ञान ) के कारण अतिवदन करता है वही निश्चय अतिवदन करता है । [ नारद— ] भगवन् ! मैं तो परमार्थ सत्य विज्ञानके कारण ही अतिवदन करता हूँ । [ सनत्कुमार— ] सत्यकी ही तो विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये । [ नारद— ] भगवन् ! मैं विशेषरूपसे सत्यकी जिज्ञासा करता हूँ ॥ १ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
एष तु वा अतिवदति यः सत्येन परमार्थसत्यविज्ञानवत्तयातिवदति सोऽहं त्वां प्रपन्नो भगवन्सत्येनातिवदानि । तथा मां नियुनक्तु भगवान् यथाहं सत्येनातिवदानीत्यभिप्रायः । यद्येवं सत्येनातिवदितुमिच्छसि सत्यमेव तु तावद्विजिज्ञासितव्यमित्युक्त आह नारदः । तथास्तु तर्हि सत्यं भगवो विजिज्ञासे विशेषेण ज्ञातुमिच्छेयं त्वत्तोऽहमिति ॥ १ ॥[ सनत्कुमार— ] किंतु अतिवदन तो वही करता है जो परमार्थसत्यविज्ञानके कारण अतिवदन करता है । [ नारद— ] भगवन् ! आपका शरणागत हुआ मैं तो सत्यके ही कारण अतिवदन करता हूँ । तात्पर्य यह है कि भगवान् मुझे इस प्रकार उपदेश करें जिससे कि मैं सत्य ज्ञानके कारण अतिवदन करूँ । 'यदि इस प्रकार तुम सत्यके द्वारा अतिवदन करना चाहते हो तो सत्यकी ही जिज्ञासा करनी चाहिये'—ऐसा कहे जानेपर नारदजी बोले—'ठीक है, अच्छा तो भगवन् ! मैं सत्यकी विजिज्ञासा—आपके द्वारा विशेषरूपसे सत्यको जाननेकी इच्छा करता हूँ' ॥१॥
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
षोडशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १६ ॥

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सप्तदश खण्ड

—: ॐ :—

विज्ञान ही जानने योग्य है

यदा वै विजानात्यथ सत्यं वदति नाविजानन्सत्यं वदति विजानन्नेव सत्यं वदति विज्ञानं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति विज्ञानं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥

जिस समय पुरुष सत्यको विशेषरूपसे जानता है तभी वह सत्य बोलता है, बिना जाने सत्य नहीं बोलता; अपितु विशेषरूपसे जानने-वाला ही सत्यका कथन करता है। अतः विज्ञानकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये। [नारद—] ‘भगवन्! मैं विज्ञानको विशेष-रूपसे जानना चाहता हूँ’ ॥ १ ॥

यदा वै सत्यं परमार्थतो विजानाति। इदं परमार्थतः सत्यमिति। ततोऽनृतं विकारजात वाचारम्भणं हित्वा सर्वविकारावस्थं सदेवैकं सत्यमिति तदेवाथ वदति यद्वदति। <br><br> ननु विकारोऽपि सत्यमेव। “नामरूपे सत्यं ताभ्यामयं प्राणश्छन्नः” (बृ०उ० १।६।३)। “प्राणा वै सत्यं तेषामेव सत्यम्” (बृ० उ० २।१।२०) इति श्रुत्यन्तरात्।जिस समय पुरुष सत्यको परमार्थतः जानता है, अर्थात् ‘यह परमार्थतः सत्य है’ ऐसा जानता है उस समय वह वाणीपर अवलम्बित मिथ्या विकारजातको त्यागकर सम्पूर्ण विकारमें स्थित एक सत् ही सत्य है—ऐसा समझकर फिर जो कुछ बोलता है उसीको बोलता है। <br><br> शङ्का—किंतु विकार भी तो सत्य ही है, क्योंकि “नाम और रूप सत्य हैं, उनसे यह प्राण आच्छादित है”, “[वागादि] प्राण ही सत्य हैं, यह [मुख्य प्राण] उनका भी सत्य है”, इस अन्य श्रुतिसे भी [यही सिद्ध होता है]।

खण्ड १७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७७


| [विकारस्य परमार्थसत्यत्वनिरासः] <br><br> सत्यम्, उक्तं सत्यत्वं श्रुत्यन्तरे विकारस्य न तु परमार्थापेक्षमुक्तम् । किं तर्हि ? इन्द्रियविषयाविषयत्वापेक्षं सच्च त्यच्चेति सत्यमित्युक्तम् । तद्द्वारेण च परमार्थसत्यस्योपलब्धिर्विवक्षितेति । प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यमिति चोक्तम् ।<br><br>इहापि तदिष्टमेव, इह तु प्राणविषयात्परमार्थसत्यविज्ञानाभिमानाद्व्युत्थाप्य नारदं यत्तत्सदेव सत्यं परमार्थतो भूमाख्यं तद्विज्ञापयिष्यामीत्येष विशेषतो विवक्षितोऽर्थः । नाविजानन्सत्यं वदति । यस्त्वविजानन्वदति सोऽग्न्यादिशब्देनाग्न्यादीन्परमार्थसद्रूपान्मन्यमानो वदति । न तु ते रूपत्रयव्यतिरेकेण परमार्थतः सन्ति तथा तान्यपि रूपाणि सदपेक्षया | समाधान— ठीक है, श्रुत्यन्तरमें विकारका सत्यत्व अवश्य बतलाया गया है, परंतु वह परमार्थकी अपेक्षासे नहीं बतलाया गया । तो फिर क्या बात है?—इन्द्रियोंके विषय होने और न होनेकी अपेक्षासे सत् और त्यत् हैं, इस प्रकार वहाँ सत्यका उल्लेख किया गया है । तथा उसके द्वारा वहाँ परमार्थ सत्यकी उपलब्धि ही विवक्षित है । इसीसे वहाँ यह कहा गया है कि ‘[वागादि] प्राण ही सत्य है, यह [मुख्य प्राण] उनका भी सत्य है ।’<br><br>यहाँ भी वह इष्ट ही है । परंतु यहाँ विशेषरूपसे सनत्कुमारजीको यही अर्थ बतलाना अभीष्ट है कि नारदजीको प्राणविषयक परमार्थ सत्य विज्ञानके अभिमानसे निवृत्त कर जो भूमासंज्ञक सत् ही परमार्थ सत्य है, उसे विशेषरूपसे समझाऊँगा । उसे विशेषरूपसे जाने बिना कोई सत्य नहीं बोलता । जो कोई उसे बिना जाने बोलता है वह ‘अग्नि’आदि शब्दसे अग्नि आदिको ही परमार्थ सद्रूप समझकर बोलता है । किंतु परमार्थतः वे रूपत्रय (रक्त, शुक्ल और कृष्णरूप) से अतिरिक्त हैं नहीं । तथा वे रूप भी सत्‌की अपेक्षा |

७७८ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय ७

७७८छान्दोग्योपनिषद्[अध्याय ७

| नैव सन्तीत्यतो नाविजानन्सत्यं वदति । विजानन्नेव सत्यं वदति ।<br><br>न च तत्सत्यविज्ञानमविजिज्ञासितमप्रार्थितं ज्ञायत इत्याह—<br><br>विज्ञानंत्वेव विजिज्ञासितव्यमिति । यद्येवं विज्ञानं भगवो विजिज्ञास इति । एवं सत्यादीनां चोत्तरोत्तराणां करोत्यन्तानां पूर्वपूर्वहेतुत्वं व्याख्यातव्यम् ॥ १ ॥ | तो हैं ही नहीं। अतः परमार्थको बिना जाने कोई सत्य नहीं बोल सकता। सत्यका विशेष ज्ञान होनेपर ही पुरुष सत्य बोल सकता है।<br><br>किन्तु वह सत्यविज्ञान बिना जिज्ञासा किये—बिना उसकी प्रार्थना किये नहीं जाना जाता; इसीसे कहते हैं कि 'विज्ञानकी* ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये।' [नारद—] 'यदि ऐसी बात है, तो भगवन्! मैं विज्ञानको विशेषरूपसे जाननेकी इच्छा करता हूँ। इसी प्रकार सत्यसे लेकर [आगे बाईसवें खण्डके] 'करोति' पर्यन्त उत्तरोत्तर पदार्थोंके पूर्व-पूर्व पदार्थ कारण हैं—ऐसी व्याख्या करनी चाहिये ॥ १ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये सप्तदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १७ ॥


* 'विज्ञान' शब्द अष्टम खण्डके प्रथम मन्त्रमें भी आया है। परन्तु वहाँ उसका तात्पर्य केवल शास्त्रज्ञान है और यहाँ विशेष ज्ञान अर्थात् वास्तविक ज्ञान है।

अष्टादश

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मति ही जानने योग्य है.

यदा वै मनुतेऽथ विजानाति नामत्वा विजानाति मत्वैव विजानाति मतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति । मतिं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १ ॥

[ सनत्कुमार— ] 'जिस समय मनुष्य मनन करता है तभी वह विशेषरूपसे जानता है; बिना मनन किये कोई नहीं जानता, अपितु मनन करनेपर ही जानता है । अतः मतिकी ही विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये ।' [ नारद— ] 'भगवन् ! मैं मतिके विज्ञानकी इच्छा करता हूँ' ॥ १ ॥

| यदा वै मनुत इति । मतिर्मननं तर्को मन्तव्यविषय आदरः ॥१॥ | जिस समय मनन करता है इत्यादि । 'मति' अर्थात् मनन—तर्क—मन्तव्य विषयके प्रति आदर। |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्यायेऽष्टादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १८ ॥