छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
८४४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
८४४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
तथा जिसे 'सत्रायण' ऐसा कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि ब्रह्मचर्यके द्वारा ही सत्—परमात्मासे अपना त्राण प्राप्त करता है। इसके सिवा जिसे 'मौन' ऐसा कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि ब्रह्मचर्यके द्वारा ही आत्माको जानकर पुरुष मनन करता है ॥२॥
| अथ यत्सत्रायणमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत्; तथा सतः परमादात्मन आत्मनस्त्राणं रक्षणं ब्रह्मचर्यसाधनेन विन्दते । अतः सत्रायणशब्दमपि ब्रह्मचर्यमेव तत् । अथ यन्मौनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत्, ब्रह्मचर्येणैव साधनेन युक्तः सन्नात्मानं शास्त्राचार्याभ्यामनुविद्य पश्चान्मन्ुते ध्यायति । अतो मौनशब्दमपि ब्रह्मचर्यमेव ॥ २ ॥ | तथा जिसे 'सत्रायण' ऐसा कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि पूर्वोक्त (यज्ञ और इष्ट) के समान ब्रह्मचर्यरूप साधनसे ही पुरुष सत्—परमात्मासे अपनी रक्षा कराता है। अतः सत्रायण नामवाला भी ब्रह्मचर्य ही है। और जिसे 'मौन' ऐसा कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि ब्रह्मचर्यरूप साधनसे युक्त हुआ ही साधक शास्त्र और आचार्यसे आत्माको जानकर फिर मनन अर्थात् ध्यान करता है। अतः 'मौन' नामवाला भी ब्रह्मचर्य ही है ॥ २ ॥ |
अथ यदनाशकायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तदेष ह्यात्मा न नश्यति यं ब्रह्मचर्येणानुविन्दतेऽथ यदरण्यायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत्तदरश्च ह वै ण्यश्चार्णवौ ब्रह्मलोके तृतीयस्यामितो दिवि तदैरंमदीयं सरस्तदश्वत्थः सोमसवनस्तदपराजिता पूर्ब्रह्मणः प्रभुविमितँ हिरण्मयम् ॥ ३ ॥
खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८४५
तथा जिसे अनाशकायन (नष्ट न होना) कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि जिसे [साधक] ब्रह्मचर्यके द्वारा प्राप्त होता है वह यह आत्मा नष्ट नहीं होता। और जिसे अरणयायन ऐसा कहा जाता है वह भी ब्रह्मचर्य ही है; क्योंकि इस ब्रह्मलोकमें 'अर' और 'ण्य' ये दो समुद्र हैं, यहाँसे तीसरे द्युलोकमें ऐरंमदीय सरोवर है, सोमसवन नामका अश्वत्थ है, वहाँ ब्रह्माकी अपराजिता पुरी है और प्रभुका विशेषरूपसे निर्माण किया हुआ सुवर्णमय मण्डप है ॥ ३ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अथ यदनाशकायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत्। यमात्मानं ब्रह्मचर्येणानुविन्दते स एष ह्यात्मा ब्रह्मचर्यसाधनवतो न नश्यति तस्मादनाशकायनमपि ब्रह्मचर्यमेव। | तथा जिसे 'अनाशकायन' ऐसा कहते हैं वह भी ब्रह्मचर्य ही है। जिस आत्माको ब्रह्मचर्यके द्वारा प्राप्त करता है, ब्रह्मचर्यरूप साधनवाले पुरुषका वह आत्मा नष्ट नहीं होता; अतः अनाशकायन भी ब्रह्मचर्य ही है। |
| अथ यदरणयायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत्। अरण्यशब्दयोरर्णवयोर्ब्रह्मचर्यवतोऽयनादरणयायनं ब्रह्मचर्यम्। यो ज्ञानाद्यज्ञ एषणादिष्टं सतस्त्राणात्सत्रायणं मननान्मौनमनशनादनाशकायनमरण्योर्गमनादरणयाय- | और जिसे 'अरणयायन' (वनवास) ऐसा कहते हैं वह भी ब्रह्मचर्य ही है। ब्रह्मचर्यवान् पुरुष 'अर' और 'ण्य' नामवाले दो समुद्रोंके प्रति गमन करता है, इसलिये ब्रह्मचर्य अरणयायन है। जो ब्रह्मचर्य ज्ञानरूप होनेके कारण यज्ञ है, एषणाके कारण इष्ट है, सत् (ब्रह्म) से रक्षा करानेके कारण सत्रायण है, मनन करनेके कारण मौन है, नष्ट न होनेके कारण अनाशकायन है और अर एवं ण्य इन |
८४६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
८४६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
| नमित्यादिभिर्महद्भिः पुरुषार्थसाधनैः स्तुतत्वाद्ब्रह्मचर्यं परं ज्ञानस्य सहकारिकारणं साधनमित्यतो ब्रह्मविदा यत्नतो रक्षणीयमित्यर्थः । | अर्णवोंको गमन करनेके कारण अरणयायन है—इस प्रकारके पुरुषार्थके महान् साधनोंद्वारा स्तुति किया जानेके कारण ब्रह्मचर्य ज्ञानका परम सहकारी कारण है । अतः तात्पर्य यह है कि ब्रह्मवेत्ताको इसकी यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये। | | तत्तत्र हि ब्रह्मलोकेऽरश्च ह वै प्रसिद्धौ ण्यश्चार्णवौ समुद्रौ समुद्रोपमे वा सरसी तृतीयस्यां भुवमन्तरिक्षं चापेक्ष्य तृतीया द्यौस्तस्यां तृतीयस्यामितोऽस्माल्लोकादारभ्य गण्यमानायां दिवि । तत्तत्रैव चैरम्मिदानं तन्मय ऐरो मण्डस्तेन पूर्णमैरं मदीयं तदुपयोगिनां मदकरं हर्षोत्पादकं सरः । तत्रैव चाश्वत्थो वृक्षः सोमसवनो नामतः सोमाऽमृतं तन्निस्स्रवोऽमृतस्रव इति वा । तत्रैव च ब्रह्मलोके ब्रह्मचर्यसाधनरहितैर्ब्रह्मचर्यसाधनवद्भ्योऽन्यैर्न जीयत इत्यपराजिता नाम पूः पुरी ब्रह्मणो हिरण्यगर्भस्य । | वहाँ उस ब्रह्मलोकमें तीसरे अर्थात् इस लोकसे आरम्भ करनेपर भूलोंक और अन्तरिक्षकी अपेक्षा तीसरे द्युलोकमें प्रसिद्ध 'अर' और 'ण्य' ये दो समुद्र अथवा समुद्रके समान दो सरोवर हैं । तथा वहींपर ऐर—इरा अन्नको कहते हैं तन्मय ऐर अर्थात् मण्ड उससे भरा हुआ 'मदीय'—अपना उपयोग करनेवालोंको मद उत्पन्न करनेवाला अर्थात् हर्षोत्पादक सरोवर है । वहीं सोमसवन नामवाला अश्वत्थ वृक्ष है, अथवा सोम अमृतको कहते हैं उसका निस्रवण करनेवाला अमृतस्रावी वृक्ष है । वहाँ उस ब्रह्मलोकमें ही ब्रह्मचर्यरूप साधनसे रहित अर्थात् ब्रह्मचर्यसाधनवानोंसे भिन्न पुरुषोंद्वारा जो नहीं जीती जा सकती ऐसी ब्रह्मा यानी हिरण्यगर्भकी अपराजिता नामवाली पुरी |
खण्ड ५] शाङ्करभाष्यार्थ ८४७
| ब्रह्मणा च प्रभुणा विशेषेण मतं निर्मितं तच्च हिरण्मयं सौवर्णं प्रभुविमितं मण्डपमिति वाक्यशेषः ॥ ३ ॥ | है तथा ब्रह्मारूप प्रभुके द्वारा विशेषरूपसे मित—निर्मित (रची हुई) प्रभुविमित सुवर्णमय 'मण्डप है' ऐसा वाक्यशेष समझना चाहिये॥ ३॥ |
तद्य एवैतावरं च ण्यं चार्णवौ ब्रह्मलोके ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषामेवैष ब्रह्मलोकस्तेषाꣳसर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥ ४ ॥
उस ब्रह्मलोकमें जो लोग ब्रह्मचर्यके द्वारा इन 'अर' और 'ण्य' दोनों समुद्रोंको प्राप्त करते हैं उन्हींको इस ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छ गति हो जाती है ॥ ४ ॥
| तत्तत्र ब्रह्मलोक एतावर्णावौ यावरण्याख्यावुक्तौ ब्रह्मचर्येण साधनेनानुविन्दन्ति ये तेषामेवैष यो व्याख्यातो ब्रह्मलोकस्तेषां च ब्रह्मचर्यसाधनवतां ब्रह्मविदां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति नान्येषामब्रह्मचर्यपराणां बाह्यविषयासक्तबुद्धीनां कदाचिदपीत्यर्थः ।<br><br>नन्वत्र त्वमिन्द्रस्त्वं यमस्त्वं वरुण इत्यादिभिर्यथा कश्चित् | उस ब्रह्मलोकमें जो ये 'अर' और 'ण्य' नामवाले दो समुद्र कहे गये हैं इन्हें जो ब्रह्मचर्यरूप साधनके द्वारा प्राप्त करते हैं उन्हींको उस ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है, जिसकी व्याख्या पहले की जा चुकी है । तथा उन ब्रह्मचर्यसाधनसम्पन्न ब्रह्मवेत्ताओंकी सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छ गति हो जाती है; ब्रह्मचर्यमें तत्पर न रहनेवाले अन्य बाह्य विषयासक्तबुद्धि पुरुषोंकी स्वेच्छागति कभी नहीं होती ।<br><br>किंतु यहाँ कुछ लोगोंका मत है कि जिस प्रकार 'तुम इन्द्र हो, |
४५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ४५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| स्तूयते महार्ह एवमिष्टादिभिः शब्दैर्न स्त्र्यादिविषयतृष्णानिवृत्तिमात्रं स्तुत्यर्हं किं तर्हि ज्ञानस्य मोक्षसाधनत्वात्तदेवेष्टादिभिः स्तूयत इति केचित् । न । स्त्र्यादिबाह्यविषयतृष्णापहृतचित्तानां प्रत्यगात्मविवेकविज्ञानानुपपत्तेः । "पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्तरात्मन्" ( क० उ० २ । १ । १ ) इत्यादिश्रुतिस्मृतिशतेभ्यः । ज्ञानसहकारिकारणं स्त्र्यादिविषयतृष्णानिवृत्तिसाधनं विधातव्यमेवेति युक्तैव तत्स्तुतिः । <br><br> ननु च यज्ञादिभिः स्तुतं ब्रह्मचर्यमिति यज्ञादीनां पुरुषार्थ- | तुम यम हो, तुम वरुण हो' इत्यादि वाक्योंसे किसी परम पूजनीय पुरुषकी स्तुति की जाती है उसी प्रकार इष्टादि शब्दोंसे केवल स्त्री आदि विषयसम्बन्धिनी तृष्णाकी निवृत्ति ही स्तुति योग्य नहीं है, तो फिर क्या है ? [इसपर वे कहते हैं—] ज्ञान मोक्षका साधन है, अतः इष्टादि शब्दोंसे उसीकी स्तुति की जाती है। परंतु यह मत ठीक नहीं है, क्योंकि स्त्री आदि बाह्य विषयोंकी तृष्णाद्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है उन्हें प्रत्यगात्म-विषयक विवेकज्ञान होना सम्भव नहीं है। यह बात "स्वयम्भू ब्रह्माने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है; इसलिये जीव बाह्य विषयोंको देखता है, अन्तरात्माको नहीं देखता" इत्यादि सैकड़ों श्रुति-स्मृतियोंसे सिद्ध होती है। अतः ज्ञानके सहकारी कारण स्त्री आदि विषयसम्बन्धी तृष्णाकी निवृत्तिरूप साधनका विधान करना ही चाहिये—इसलिये उसकी स्तुति करना भी उचित ही है। <br><br> शिष्य—किंतु ब्रह्मचर्यकी यज्ञादिरूपसे स्तुति की गयी है; इससे यज्ञादिका पुरुषार्थसाधनत्व |
खण्ड ५] शाङ्करभाष्यार्थ ८४१
| साधनत्वं गम्यते । | प्रतीत होता है । |
|---|---|
| सत्यं गम्यते, न त्विह ब्रह्मलोकं प्रति यज्ञादीनां साधनत्वमभिप्रेत्य यज्ञादिभिर्ब्रह्मचर्यं स्तूयते । किं तर्हि ? तेषां प्रसिद्धं पुरुषार्थसाधनत्वमपेक्ष्य । यथेन्द्रादिभी राजा न तु यत्रेन्द्रादीनां व्यापारस्तत्रैव राज्ञ इति तद्वत् । | **गुरु—**ठीक है, ऐसा प्रतीत होता है । किंतु यहाँ, ब्रह्मलोकके प्रति यज्ञादिका साधनत्व है—ऐसे अभिप्रायसे यज्ञादिके द्वारा ब्रह्मचर्यकी स्तुति नहीं की जाती । तो फिर क्या बात है ?—उनके प्रसिद्ध पुरुषार्थसाधनत्वकी अपेक्षासे ही स्तुति की जाती है, जिस प्रकार कि इन्द्रादिरूपसे राजाकी । इससे यह अभिप्राय नहीं होता कि जहाँ इन्द्रादिका व्यापार है वहीं राजाका भी है [ अर्थात् जो काम इन्द्रादि देवगण करते हैं वही राजा भी करता है ] । उसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये । |
| (ब्रह्मलोकादिभोगानां स्वरूपविचारः)<br><br>य इमेऽर्णवादयो ब्राह्मलौकिकाः संकल्पजाश्च पित्रादयो भोगास्ते किं पार्थिवा आप्याश्च यथेह लोके दृश्यन्ते तद्वदर्णववृक्षपूःस्वर्णमण्डपान्याहो स्विन्मानसप्रत्ययमात्राणीति । | [ भला सोचो तो ] ये जो ब्रह्मलोकसम्बन्धी समुद्रादि और संकल्पजनित पितृलोकादिके भोग हैं वे—जैसे कि इस लोकमें समुद्र, वृक्ष, पुरी और सुवर्णमय मण्डप देखे जाते हैं उन्हींके समान पृथ्वी और जलके विकार हैं, अथवा केवल मानसिक प्रतीतिमात्र हैं ? |
८५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ८५० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| किञ्चातो यदि पार्थिवा आप्याश्च स्थूलाः स्युः ? | शिष्य— यदि वे पृथिवी और जलके विकारभूत स्थूल पदार्थ ही हों तो इसमें क्या आपत्ति है ? |
| हृद्याकाशे समाधानानुपपत्तिः। पुराणे च मनोमयानि ब्रह्मलोके शरीरादीनीति वाक्यं विरुध्येत। “अशोकमहिमम्” (बृ० उ० ५।१०।१) इत्याद्याश्च श्रुतयः। | गुरु— उनका हृदयाकाशमें स्थित होना सम्भव नहीं है तथा पुराणमें यह कहा गया है कि ब्रह्मलोकमें जो शरीरादि हैं वे मनोमय हैं—इस वाक्यसे विरोध आयेगा तथा “शोकरहित है, शीतस्पर्शरहित है” इत्यादि श्रुतियोंसे भी विरोध होगा। |
| ननु समुद्राः सरितः सरांसि वाप्यः कूपा यज्ञा वेदा मन्त्रादयश्च मूर्तिमन्तो ब्रह्माणमुपतिष्ठन्त इति मानसत्वे विरुध्येत पुराणस्मृतिः। | शिष्य— किंतु उन्हें मानसिक माननेपर भी ‘समुद्र, नदियाँ, सरोवर, वापी, कूप, यज्ञ, वेद और मन्त्रादि मूर्तिमान् होकर ब्रह्माके समीप उपस्थित रहते हैं’ ऐसे अर्थवाली पुराणस्मृतिसे विरोध आयेगा। |
| न; मूर्तिमत्त्वे प्रसिद्धरूपाणामेव तत्र गमनानुपपत्तेः। तस्मात्प्रसिद्धमूर्तिव्यतिरेकेण सागरादीनां मूर्त्यन्तरं सागरादिभिरुपात्तं ब्रह्मलोकगन्तृ कल्पनीयम्। | गुरु— यह बात नहीं है, क्योंकि मूर्तिमान् होनेपर तो उन समुद्रादिके प्रसिद्ध रूपोंका वहाँ गमन होना सम्भव नहीं है। इसलिये समुद्रादिके प्रसिद्ध रूपसे भिन्न सागरादिद्वारा ग्रहण किया हुआ कोई अन्य रूप ब्रह्मलोकमें गमन करनेवाला है—ऐसी कल्पना |
खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| तुल्यायां च कल्पनायां यथाप्रसिद्धा एव मानसस्य आकारवत्यः पुंस्त्र्याद्या मूर्तयो युक्ताः कल्पयितुं मानसदेहानुरूप्यसम्बन्धोपपत्तेः दृष्टा हि मानसस्य एवाकारवत्यः पुंस्त्र्याद्या मूर्तयः स्वप्ने । | करनी चाहिये । तथा [मनुष्यादि-के विषयमें भी] वैसी ही कल्पना होनेके कारण जैसी प्रसिद्ध हैं वैसे ही आकारवाली मानसिक पुरुष-स्त्री आदि मूर्तियोंकी कल्पना करनी चाहिये, क्योंकि मानसदेहके साथ तदनुरूप ही उनका सम्बन्ध होना सम्भव है । स्वप्नमें पुरुष एवं स्त्री आदिकी मूर्तियाँ मानसिक आकारवाली ही देखी भी गयी हैं । |
| ननु ता अनृता एव, “त इमे सत्याः कामाः” (छा० उ० ८ । ३ । १) इति श्रुतिस्तथा सति विरुध्येत । | शिष्य—किंतु वे तो मिथ्या ही हैं; ऐसा होनेपर “वे ये सत्य काम हैं” इस श्रुतिसे विरोध आयेगा । |
| न; मानसप्रत्ययस्य सत्त्वोपपत्तेः। मानसा हि प्रत्ययाः स्त्रीपुरुषाद्याकाराः स्वप्ने दृश्यन्ते । | गुरु—नहीं [इस श्रुतिसे कोई विरोध नहीं आ सकता], क्योंकि मानसिक अनुभवका सत्य होना सम्भव है; क्योंकि स्वप्नमें मानसिक प्रतीतियाँ ही स्त्री-पुरुषादि आकारवाली दिखलायी देती हैं । |
| ननु जाग्रद्वासना रूपाः स्वप्नदृश्या न तु तत्र स्त्र्यादयः स्वप्ने विद्यन्ते । | शिष्य—किंतु स्वप्नमें दिखलायी देनेवाले पदार्थ तो जाग्रतिकी वासनारूप ही हैं; वहाँ स्वप्नावस्थामें वास्तवमें तो स्त्री आदि हैं ही नहीं । |
| अत्यल्पमिदमुच्यते । जाग्रद्विषया अपि मानसप्रत्ययाभि- | गुरु—यह तुम बहुत कम बता रहे हो । जाग्रत्कालके विषय भी |
८५२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ८५२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| निर्वृत्ता एव सदीक्षाभि-निर्वृत्ततेजोऽबन्नमयत्वाज्जाग्रद्विषयाणाम्। संकल्पमूला हि लोका इति चोक्तम् "समक्लृपतां द्यावापृथिवी" (छा० उ० ७।४।१) इत्यत्र। सर्वश्रुतिषु च प्रत्यगात्मन उत्पत्तिः प्रलयश्च तत्रैव स्थितिश्च "यथा वा अरा नाभौ" (छा० उ० ७।१५।१) इत्यादिनोच्यते। तस्मान्मानसानां बाह्यानां च विषयाणामितरेतरकार्यकारणत्वमिष्यत एव बीजाङ्कुरवत्। यद्यपि बाह्या एव मानसा मानसा एव च बाह्या नानृतत्वं तेषां कदाचिदपि स्वात्मनि भवति। | तो सर्वथा मानसिक प्रतीतियोंसे ही निष्पन्न हुए हैं; क्योंकि जाग्रत्-कालीन विषय सत्के ईक्षणसे निष्पन्न तेज, अप् और अन्नमय ही हैं। "समक्लृपतां द्यावापृथिवी" (पृथ्वी और द्युलोककी कल्पना की) इत्यादि स्थानपर यही कहा गया है कि सम्पूर्ण लोक संकल्पमूलक हैं। तथा सम्पूर्ण श्रुतियोंमें "जिस प्रकार नाभिमें अरे समर्पित हैं" इत्यादि दृष्टान्तसे उन सबकी उत्पत्ति प्रत्यगात्मासे ही बतलायी गयी है तथा उसीमें उनके लय और स्थिति भी बतलाये गये हैं। अतः बीज और अङ्कुरके समान मानसिक और बाह्य विषयोंका एक दूसरेके प्रति कार्य कारणभाव माना ही जाता है। यद्यपि बाह्य पदार्थ ही मानसिक है और मानसिक पदार्थ ही बाह्य हैं तो भी स्वात्मामें उनका मिथ्यात्व कभी नहीं होता। | | ननु स्वप्ने दृष्टाः प्रतिबुद्धस्यानृता भवन्ति विषयाः। | शिष्य—किंतु स्वप्नमें देखे हुए विषय तो जाग्रत् पुरुषके लिये मिथ्या हो जाते हैं। | | सत्यमेतत्; जाग्रद्बोधापेक्षं तु तदनृतत्वं न स्वतः। तथा | गुरु—यह ठीक है, किंतु उनका मिथ्यात्व जाग्रत्-ज्ञानकी अपेक्षासे है, स्वतः नहीं है। |
खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५३
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| स्वप्नबोधापेक्षं च जाग्रद्द्दष्टविषयानृतत्वं न स्वतः। विशेषाकारमात्रं तु सर्वेषां मिथ्याप्रत्ययनिमित्तमिति वाचारम्भणं विकारो नामधेयमनृतं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्। तान्यप्याकारविशेषतोऽनृतं स्वतः सन्मात्ररूपतया सत्यम्। प्राक्सदात्मप्रतिबोधात् स्वविषयेऽपि सर्वं सत्यमेव स्वप्नदृश्या इवेति न कश्चिद्विरोधः। तस्मान्मानसा एव ब्राह्मलौकिका अरण्यादयः संकल्पजाश्च पित्रादयः कामाः।<br><br>बाह्यविषयभोगवदशुद्धिरहितत्वाच्छुद्धसत्त्वसंकल्पजन्या इति निरतिशयसुखाः सत्याश्चेश्वराणां भवन्तीत्यर्थः। सन्सत्यात्मप्रतिबोधेऽपि रज्ज्वामिव कल्पिताः सर्पादयः सदात्मस्वरूपतामेव प्रतिपद्यन्त इति सदात्मना सत्या एव भवन्ति ॥ ४ ॥ | इसी प्रकार स्वप्नज्ञानकी अपेक्षा जाग्रत्कालमें देखे हुए विषयोंका मिथ्यात्व है, स्वतः नहीं। सम्पूर्ण पदार्थोंका जो विशेष आकारमात्र है वही मिथ्याज्ञानका कारण है, क्योंकि वाणीपर अवलम्बित विकार नाममात्र और मिथ्या है, बस तीन रूप ही सत्य हैं। वे तीन रूप भी आकारविशेष होनेसे स्वतः तो मिथ्या ही हैं, किंतु सन्मात्ररूप होनेसे सत्य हैं। सदात्माका साक्षात्कार होनेसे पूर्व तो स्वप्नदृश्य पदार्थोंके समान अपने क्षेत्रमें भी वे सब सत्य ही हैं, इसलिये किसी प्रकारका विरोध सम्भव नहीं है। अतः ब्रह्मलोकसम्बन्धी अरण्यादि और संकल्पजनित पित्रादि काम मानसिक ही हैं।<br><br>बाह्य विषयभोगोंके समान अशुद्धिरहित होनेके कारण वे शुद्धान्तःकरणके संकल्पसे होनेवाले हैं; इसलिये ईश्वरके संकल्प आत्यन्तिक सुखमय और सत्य होते हैं—ऐसा इसका तात्पर्य है। सत् ही वास्तविक आत्मा है—ऐसा बोध होनेपर भी वे रज्जुमें कल्पित सर्पादिके समान सदात्मरूपताको ही प्राप्त हो जाते हैं। इसलिये सत्स्वरूपसे वे सत्य ही रहते हैं ॥ ४ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्याये पञ्चमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ५ ॥
षष्ठ खण्ड
—: ꕤ :—
हृदयनाडी और सूर्यरश्मिरूप मार्गकी उपासना
| यस्तु हृदयपुण्डरीकगतं यथोक्तगुणविशिष्टं ब्रह्म ब्रह्मचर्यादिसाधनसम्पन्नस्त्यक्तबाह्यविषयानृततृष्णः सन्नुपास्ते तस्येयं मूर्धन्यया नाड्या गतिर्वक्तव्येति नाडीखण्ड आरभ्यते— | जो पुरुष ब्रह्मचर्यादि साधनोंसे सम्पन्न और बाह्य विषयोंकी मिथ्या तृष्णासे निवृत्त होकर अपने हृदयकमलमें विराजमान उपर्युक्त गुणविशिष्ट ब्रह्मकी उपासना करता है उसकी यह मूर्धन्य नाडीके द्वारा गति बतलानी है; इसीलिये इस नाडीखण्डका आरम्भ किया जाता है— |
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अथ या एता हृदयस्य नाड्यस्ताः पिङ्गलस्याणिम्नस्तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पीतस्य लोहितस्येत्यसौ वा आदित्यः पिङ्गल एष शुक्ल एष नील एष पीत एष लोहितः ॥ १ ॥
अब, ये जो हृदयकी नाडियाँ हैं वे पिंगलवर्ण सूक्ष्म रसकी हैं। वे शुक्ल, नील, पीत और लोहित रसकी हैं; क्योंकि यह आदित्य पिङ्गल वर्ण है, यह शुक्ल है, यह नील है, यह पीत है और यह लोहितवर्ण है ॥ १ ॥
| अथ या एता वक्ष्यमाणा हृदयस्य पुण्डरीकाकारस्य ब्रह्मो- | अब, आगे कहे जानेवाले ब्रह्मोपासनाके आश्रयभूत इस पुण्डरीकाकार हृदयकी जो उससे |
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खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थे ८५५
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| पासनस्थानस्य सम्बन्धिन्यो नाड्यो हृदयमांसपिण्डात्सर्वतो विनिःसृता आदित्यमण्डलादिव रश्मयस्ताश्चैताः पिङ्गलस्य वर्णविशेषविशिष्टस्याणिम्नः सूक्ष्मरसस्य रसेन पूर्णास्तदाकारा एव तिष्ठन्ति वर्तन्त इत्यर्थः । | सम्बद्ध नाडियाँ आदित्यमण्डलसे किरणोंके समान उस हृदयरूप मांसपिण्डसे सब ओर निकली हुई हैं, वे पिंगलनामक एक वर्णविशेषसे युक्त अणिमा अर्थात् सूक्ष्म रसकी हैं; तात्पर्य यह है कि वे उस रससे पूर्ण होकर तदाकार ही रहती हैं। |
| तथा शुक्लस्य नीलस्य पीतस्य लोहितस्य च रसस्य पूर्णा इति सर्वत्राध्याहार्यम् । सौरेण तेजसा पित्ताख्येन पाकाभिनिर्वृत्तेन कफेनाल्पेन सम्पर्कात्पिङ्गलं भवति सौरं तेजः पित्ताख्यम् । तदेव च वातभूयस्त्वान्नीलं भवति । तदेव च कफभूयस्त्वाच्छुक्लम् । कफेन समतायां पीतम् । शोणितबाहुल्येन लोहितम् । वैद्यकाद्वा वर्णविशेषा अन्वेष्टव्याः, कथं भवन्तीति ? | इसी प्रकार वे शुक्ल, नील, पीत और लोहित रससे पूर्ण हैं—इस प्रकार पूर्ण पदका सर्वत्र अध्याहार करना चाहिये। पित्तसंज्ञक सौर तेजसे परिपक्व हुए थोड़े-से कफसे सम्पर्क होनेपर पित्तनामक सौर तेज पिङ्गल वर्ण हो जाता है। वही वातकी अधिकता होनेपर नीला हो जाता है और कफकी अधिकता होनेपर वही शुक्ल हो जाता है। कफसे [ वातकी ] समता होनेपर वह पीला हो जाता है और रक्तकी अधिकता होनेपर लोहित। अथवा वैद्यक शास्त्रसे इन वर्णविशेषोंका—ये किस प्रकार होते हैं, ऐसा—अन्वेषण करना चाहिये। |
| श्रुतिस्त्वाहादित्यसम्बन्धादेव तत्तेजसो नाडीष्वनुगतस्यैते | किंतु श्रुतिका तो यही कथन है कि आदित्यके सम्बन्धसे ही, नाड़ियोंमें अनुस्यूत हुए उस तेजके |
८५६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ८५६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| वर्णविशेषा इति । कथम् ? असौ वा आदित्यः पिङ्गलो वर्णत एष आदित्यः शुक्लोऽप्येष नील एष पीत एष लोहित आदित्य एव ॥ १ ॥ | ये वर्णविशेष हो जाते हैं । यह किस प्रकार ? [ इसपर कहते हैं-] यह आदित्य वर्णतः पिङ्गल है, यह आदित्य शुक्ल भी है तथा यही नीलवर्ण है, यही पीला है और यही लोहित भी है ॥ १ ॥ |
— : ० : —
| तस्याध्यात्मं नाडीभिः कथं सम्बन्ध इत्यत्र दृष्टान्तमाह— | शरीरके भीतर नाडियोंके साथ उसका सम्बन्ध किस प्रकार होता है - इस विषयमें श्रुति दृष्टान्त देती है— |
तद्यथा महापथ आतत उभौ ग्रामौ गच्छतीमं चामुं चैवमेवैता आदित्यस्य रश्मय उभौ लोकौ गच्छन्तीमं चामुं चामुष्मादादित्यात्प्रतायन्ते ता आसु नाडीषु सृप्ता आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्ते तेऽमुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः ॥ २ ॥
इस विषयमें यह दृष्टान्त है कि जिस प्रकार कोई विस्तीर्ण महापथ इस (समीपवर्ती) और उस (दूरवर्ती) दोनों गाँवोंको जाता है उसी प्रकार ये सूर्यकी किरणें इस पुरुषमें और उस आदित्यमण्डलमें दोनों लोकोंमें प्रविष्ट हैं । वे निरन्तर इस आदित्यसे ही निकली हैं और इन नाडियोंमें व्याप्त हैं तथा जो इन नाडियोंसे निकलती हैं वे इस आदित्यमें व्याप्त हैं ॥ २ ॥
| तत्तत्र यथा लोके महान्विस्तीर्णः पन्था महापथ आततो | इस विषयमें यों समझना चाहिये कि जिस प्रकार लोकमें कोई महान् |
खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५७
| व्यास उभौ ग्रामा गच्छतीमं च संनिहितममुं च विप्रकृष्टं दूरम्, एवं यथा दृष्टान्तो महापथ उभौ ग्रामौ प्रविष्टः, एवमेवैता आदित्यस्य रश्मय उभौ लोकावमुं चादित्यमण्डलमिमं च पुरुषं गच्छन्त्युभयत्र प्रविष्टाः; यथा महापथः ।<br><br>कथम् ? अमुष्मादादित्यमण्डलात्प्रतायन्ते संतता भवन्ति, ता अध्यात्ममासु पिङ्गलादिवर्णासु यथोक्तासु नाडीषु सृप्ता गताः प्रविष्टा इत्यर्थः । आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्ते प्रवृत्ताः संतानभूताः सत्यस्तेऽमुष्मिन् रश्मीनामुभयलिङ्गत्वात् इत्युच्यन्ते ॥ २ ॥ | यानी विस्तीर्ण मार्ग अर्थात् महापथ आतत—व्यास हुआ इस समीपवर्ती और उस दूरस्थ दोनों ग्रामोंको जाता है इसी प्रकार, जैसा कि यह दृष्टान्त है कि महापथ दोनों ग्रामोंमें प्रवेश करता है, ये सूर्यकी किरणें दोनों लोकोंमें—उस आदित्यमण्डलमें और इस पुरुषमें जाती हैं अर्थात् महापथके समान दोनों जगह प्रवेश किये हुए हैं।<br><br>किस प्रकार प्रवेश किये हुए हैं ?—वे इस आदित्यमण्डलसे फैलती हैं और शरीरमें उन उपर्युक्त पिङ्गलादि वर्णोंवाली नाड़ियोंमें सृप्त—गत अर्थात् प्रविष्ट होती हैं तथा इन नाड़ियोंसे व्याप्त होती अर्थात् प्रवृत्त होकर फैलती हुई इस आदित्यमण्डलमें प्रवेश करती हैं। ‘रश्मि’ शब्द [ स्त्रीलिङ्ग और पुँल्लिङ्ग ] दोनों लिङ्गोंवाला होनेके कारण उनके लिये [ पहले ‘ताः’ सर्वनामका प्रयोग होनेपर भी पीछे ] ‘ते’ ऐसा कहा गया है ॥ २ ॥ |
तद्यत्रैतत्सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्यासु तदा नाडीषु सृप्तो भवति तं न कश्चन पाप्मा स्पृशति तेजसा हि तदा सम्पन्नो भवति ॥ ३ ॥
८५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
८५८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
ऐसी अवस्थामें जिस समय यह सोया हुआ—भली प्रकार लीन हुआ पुरुष सम्यक् प्रकारसे प्रसन्न होकर स्वप्न नहीं देखता उस समय यह इन नाड़ियोंमें चला जाता है, तब इसे कोई पाप स्पर्श नहीं करता और यह तेजसे व्याप्त हो जाता है ॥ ३ ॥
| तत्तत्रैवं सति यत्र यस्मिन् काल एतत्स्वप्नमयं जीवः सुप्तो भवति। स्वापस्य द्विप्रकारत्वाद्विशेषणं समस्त इति; उपसंहृतसर्वकरणवृत्तिरित्येतत् । अतो बाह्यविषयसम्पर्कजनितकालुष्याभावात्सम्यक् प्रसन्नः सम्प्रसन्नो भवति । अत एव स्वप्नं विषयाकाराभासं मानसं स्वप्नप्रत्ययं न विजानाति नानुभवतीत्यर्थः। यदैवं सुप्तो भवत्यासु सौरतेजःपूर्णासु यथोक्तासु नाडीषु तदा | 'तत्'—उस अवस्थामें ऐसा होनेपर वहाँ—जिस समय यह जीव इस स्वप्नावस्था अर्थात् निद्राको प्राप्त होकर सो जाता है । निद्रा* दो प्रकारकी है इसलिये यहाँ 'समस्त' ऐसा विशेषण दिया गया है । तात्पर्य यह है कि जिस समय वह, जिसकी सम्पूर्ण इन्द्रियवृत्तियोंका उपसंहार हो गया है, ऐसा हो जाता है; इसलिये बाह्य विषयोंके सम्पर्कसे प्राप्त हुई मलिनताका अभाव हो जानेके कारण यह सम्यक् प्रकारसे प्रसन्न-सम्प्रसन्न होता है; तात्पर्य यह है कि इसीलिये यह स्वप्न—विषयाकारसे भासित होनेवाले मानसिक स्वप्नप्रत्ययको नहीं जानता, अर्थात् उसका अनुभव नहीं करता । जिस समय इस प्रकार सो जाता है उस समय सूर्यके तेजसे पूर्ण हुई इन पूर्वोक्त नाड़ियोंमें सृप्त अर्थात् प्रविष्ट होता है, तात्पर्य यह है कि वह |
* निद्राकी दो वृत्तियाँ हैं—दर्शनवृत्ति यानी स्वप्न और अदर्शनवृत्ति—गाढ सुषुप्ति । यहाँ दर्शनवृत्तिकी व्यावृत्तिके लिये 'समस्त' ऐसा विशेषण दिया गया है ।
खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| सुप्तः प्रविष्टा नाडीभिर्द्वारभूताभिर्हृद्याकाशं गतो भवतीत्यर्थः। न ह्यन्यत्र सत्सम्पत्तेः स्वप्नादर्शनमस्तीति सामर्थ्यान्नाडीष्विति सप्तमी तृतीयाया परिणम्यते । | इन द्वारभूत नाड़ियोंसे हृदयाकाशमें पहुँच जाता है । सत्सम्पत्ति (सत्को प्राप्त हो जाने) के सिवा और कहीं स्वप्नका अदर्शन नहीं होता— इस सामर्थ्यसे ‘नाडीषु’ इस पदमें जो सप्तमी विभक्ति है उसे [‘नाडीभि:’ इस प्रकार] तृतीयाके रूपमें बदल ली जाती है । |
| तं सता सम्पन्नं न कश्चन न कश्चिदपि धर्माधर्मरूपः पाप्मा स्पृशतीति स्वरूपावस्थितत्वात्तदात्मनः। देहेन्द्रियविशिष्टं हि सुखदुःखकार्यप्रदानेन पाप्मा स्पृशतीति न तु सत्सम्पन्नं स्वरूपावस्थं कश्चिदपि पाप्मा स्प्रष्टुमुत्सहते; अविषयत्वात् । अन्यो ह्यन्यस्य विषयो भवति न त्वन्यत्वं केनचित्कुतश्चिदपि सत्सम्पन्नस्य । स्वरूपप्रच्यवनं त्वात्मनो जाग्रत्स्वप्नावस्थां प्रति गमनं बाह्यविषयप्रतिबोधोऽविद्याकाम- | सत्को प्राप्त हुए उस प्राणीको कोई भी धर्माधर्मरूप पाप स्पर्श नहीं करता, क्योंकि उस अवस्थामें आत्मा अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है । जो जीव देह और इन्द्रियोंसे विशिष्ट है उसीको सुख-दुःखरूप अपने कार्य प्रदान करके पाप स्पर्श कर सकता है । सत्को प्राप्त हुए स्वरूपावस्थित आत्माको स्पर्श करनेका कोई भी पाप साहस नहीं कर सकता, क्योंकि वह उसका विषय नहीं है । अन्य ही अन्यका विषय हुआ करता है और सत्को प्राप्त हुए जीवका किसीसे भी किसी भी कारणसे अन्यत्व है नहीं । आत्माका जाग्रत् या स्वप्नावस्थाको प्राप्त होना तथा बाह्य विषयोंको अनुभव करना ही स्वरूपसे च्युत होना है, क्योंकि अविद्यारूप काम और कर्मका बीज |
८६० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
८६० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
| कर्मबीजस्य ब्रह्मविद्याहुताशादाहनिमित्तमित्यवोचाम षष्ठ एव तदिहापि प्रत्येत्तव्यम् ।<br><br>यदैवं सुप्तः सौरेण तेजसा हि नाड्यन्तर्गतेन सर्वतः सम्पन्नो व्याप्तो भवति । अतो विशेषेण चक्षुरादिनाडीद्वारैर्बाह्यविषयभोगायाप्रसृतानि करणान्यस्य तदा भवन्ति । तस्मादयं करणानां निरोधात्स्वात्मन्येवावस्थितःस्वप्नं न विजानातीति युक्तम् ॥ ३ ॥ | ब्रह्मविद्यारूप अग्निसे दग्ध न होनेके कारण ही रहता है—ऐसा हम छठे अध्यायमें ही कह चुके हैं, उसीपर यहाँ भी विश्वास करना चाहिये।<br><br>जिस समय यह जीव इस प्रकार सो जाता है उस समय सब ओरसे नाडीके अन्तर्गत और तेजसे सम्पन्न—व्याप्त हो जाता है इसलिये तब इसकी इन्द्रियाँ बाह्य विषयोंके भोगके लिये चक्षु आदि नाड़ियोंके द्वारा विशेषरूपसे अप्रसृत अर्थात् निरुद्ध हो जाती हैं। इसीसे इन्द्रियोंका निरोध हो जानेके कारण अपने स्वरूपमें ही स्थित हुआ यह जीव स्वप्न नहीं देखता ॥ ३ ॥ |
—: ० :—
| तत्रैवं सति— | ऐसा होनेपर— |
अथ यत्रैतदबलिमानं नीतो भवति तमभित आसीना आहुर्जानासि मां जानासि मामिति स यावदस्माच्छरीरादनुत्क्रान्तो भवति तावज्जानाति ॥ ४ ॥
अब, जिस समय यह जीव शरीरकी दुर्बलताको प्राप्त होता है उस समय उसके चारों ओर बैठे हुए [ बन्धुजन ] कहते हैं—'क्या तुम मुझे जानते हो ? क्या तुम मुझे जानते हो ? वह जबतक इस शरीरसे उत्क्रमण नहीं करता तबतक उन्हें जानता है ॥ ४ ॥
खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८६१
| अथ यत्र यस्मिन् कालेऽबलिमानमबलभावं देहस्य रोगादिनिमित्तं जरादिनिमित्तं वा कृशीभावमेतन्नयनं नीतः प्रापितो देवदत्तो भवति मुमूर्षुर्यदा भवतीत्यर्थः, तमभितः सर्वतो वेष्टयित्वासीना ज्ञातय आहुर्जानासि मां तव पुत्रं जानासि मां पितरं चेत्यादि । स मुमूर्षुर्यावदस्माच्छरीरादनुत्क्रान्तोऽनिर्गतो भवति तावत्पुत्रादीञ्जानाति ॥ ४ ॥ | अब, जिस समय यह देवदत्त [ नामक पुरुषविशेष ] अबलिमान् रोगादिके कारण अथवा जरादिके कारण देहकी दुर्बलता—कृशताको प्राप्त करा दिया जाता है अर्थात् जिस समय यह मरणासन्न होता है, उस समय उसके चारों ओर बैठे हुए बन्धुजन कहते हैं—‘क्या तुम मुझ अपने पुत्रको जानते हो ? क्या तुम मुझ अपने पिताको पहचानते हो ?’ इत्यादि । वह मुमूर्षु जीव जबतक इस शरीरसे अनुत्क्रान्त रहता है अर्थात् बहिर्गत नहीं होता तबतक उन पुत्रादिको पहचानता है ॥ ४ ॥ |
अथ यत्रैतदस्माच्छरीरादुत्क्रामत्यथैतैरेव रश्मिभि-
रूर्ध्वमाक्रमते स ओमिति वा होद्वा मीयते स यावत्क्षि-
प्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छत्येतद्वै खलु लोकद्वारं
विदुषां प्रपदनं निरोधोऽविदुषाम् ॥ ५ ॥
फिर जिस समय यह इस शरीरसे उत्क्रमण करता है उस समय इन किरणोंसे ही ऊपरकी ओर चढ़ता है। वह ‘ॐ’ ऐसा [ कहकर आत्माका ध्यान करता हुआ ] ऊर्ध्वलोक अथवा अधोलोकको जाता है। वह जितनी देरमें मन जाता है उतनी ही देरमें आदित्यलोकमें पहुँच जाता है। यह [आदित्य] निश्चय ही लोकद्वार है। यह विद्वानोंके लिये ब्रह्मलोकप्राप्तिका द्वार है और अविद्वानोंका निरोधस्थान है ॥ ५ ॥
८१२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८
| ८१२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
|---|
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| अथ यत्र यदैतत्क्रियाविशेषणमित्यस्माच्छरीरादुत्क्रामति । अथ तदैतैरेव यथोक्ताभी रश्मिभिरूर्ध्वमाक्रमते यथाकर्मजितं लोकं प्रत्यविद्वान् । इतरस्तु विद्वान्यथोक्तसाधनसम्पन्नः स ओमित्योङ्कारेणात्मानं ध्यायन्यथापूर्वं वा हैव । उद्बोर्ध्वं वा विद्वांश्चेदितरस्तिर्यङ्ङ्वेत्यभिप्रायः। मीयते प्रमीयते गच्छतीत्यर्थः। | फिर जिस समय—'एतत्' यह शब्द क्रियाविशेषण है—यह इस शरीरसे उत्क्रमण करता है तब वह अज्ञानी अपने कर्मोंके अनुसार उपार्जित लोकोंके प्रति इन उपर्युक्त किरणोंके द्वारा ही ऊपर चढ़ता है। तथा दूसरा जो उपर्युक्त साधनोंसे सम्पन्न ज्ञानी (निर्गुणोपासक) है वह ओंकारके द्वारा पूर्ववत् आत्माका ध्यान करता हुआ—तात्पर्य यह है कि यदि वह विद्वान् होता है तो ऊर्ध्वलोकोंको और अविद्वान् होता है तो अधोलोकोंको 'मीयते' अर्थात् जाता है। |
| स विद्वानुत्क्रमिष्यन्यावत्क्षिप्येन्मनो यावता कालेन मनसः क्षेपः स्यात्तावता कालेनादित्यं गच्छति प्राप्नोति क्षिप्रं गच्छतीत्यर्थो न तु तावतैव कालेनेति विवक्षितम् । | वह उत्क्रमण करनेवाला विद्वान् जितनी देरमें मन जाता है अर्थात् जितने समयमें मनको कहीं ले जाया जाता है, उतने ही समयमें आदित्यलोकमें जाता—पहुँचता ह । तात्पर्य यह है कि वह शीघ्र चलता है, इससे यह बतलाना अभीष्ट नहीं है कि उतने ही समयमें पहुँचता है। |
| किमर्थमादित्यं गच्छतीत्युच्यते। एतद्वै खलु प्रसिद्धं ब्रह्मलोकस्य द्वारं य आदित्यस्तेन द्वार- | वह आदित्यलोकमें क्यों जाता है? यह बतलाया जाता है—यह जो आदित्य है वह निश्चय ही ब्रह्मलोकका प्रसिद्ध द्वार है; उस |
खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८६३
| भूतेन ब्रह्मलोकं गच्छति विद्वान्। अतो विदुषां प्रपदनं प्रपद्यते ब्रह्मलोकमनेन द्वारेणेति प्रपदनम्। निरोधनं निरोधोऽस्मादादित्यादविदुषां भवतीति निरोधः। सौरेण तेजसा देह एव निरुद्धाः सन्तो मूर्धन्यया नाड्या नोत्क्रमन्त एवेत्यर्थः। विष्वङ्ङन्या इति श्लोकात् ॥ ५ ॥ | द्वारभूत आदित्यके द्वारा विद्वान् ब्रह्मलोकको जाता है। अतः इस द्वारसे विद्वान् ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं इसलिये यह विद्वानोंका प्रपदन है। निरोधनका नाम निरोध है; इस आदित्यसे अविद्वानोंका निरोध होता है, इसलिये यह निरोध है। तात्पर्य यह है कि अविद्वान् लोग सौर तेजके द्वारा देहमें ही निरुद्ध होकर मूर्धन्यनाडीसे उत्क्रमण नहीं करते, जैसा कि 'विष्वङ्डन्या' इत्यादि आगेके मन्त्रसे सिद्ध होता है ॥५॥ |
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तदेष श्लोकः। शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका। तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्त्युत्क्रमणे भवन्ति ॥ ६ ॥
इस विषयमें यह मन्त्र है—हृदयकी एक सौ एक नाडियाँ हैं। उनमेंसे एक मस्तककी ओर निकल गयी है। उसके द्वारा ऊपरकी ओर जानेवाला जीव अमरत्वको प्राप्त होता है; शेष इधर-उधर जानेवाली नाडियाँ केवल उत्क्रमणका कारण होती हैं, उत्क्रमणका कारण होती हैं [ उनसे अमरत्वकी प्राप्ति नहीं होती ] ॥ ६ ॥
| तदेतस्मिन्यथोक्तेऽर्थ एष श्लोको मन्त्रो भवति। शतं चैका चैकोत्तरशतं नाड्यो हृदयस्य मांसपिण्डभूतस्य सम्बन्धिन्यः | उस इस उपर्युक्त अर्थमें यह श्लोक यानी मन्त्र है—मांसके पिण्डभूत हृदयसे सम्बन्ध रखनेवाली सौ आर एक अर्थात् एक ऊपर सौ प्रधान नाडियाँ हैं, [ 'प्रधानतः' |