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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

७२ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय २

७२छान्दोग्योपनिषद्[अध्याय २

उद्गीथाक्षरोंमें द्युलोकादि तथा सामवेदादिदृष्टि

त्रयाणां श्रुत्युक्तानि सामान्यानि तानि तेनानुरूपेण शेषेष्वपि द्रष्टव्यानि—इन तीनोंकी समानता श्रुतिने बतलायी है। उन्हींके अनुसार शेष स्थानोंमें भी समझनी चाहिये—

द्यौरेवोदन्तरिक्षं गीः पृथिवी थमादित्य एवोद्वायुर्गीरग्निस्थँ सामवेद एवोद्यजुर्वेदो गीरृग्वेदस्थं दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतान्येवं विद्वानुद्गीथाक्षराण्युपास्त उद्गीथ इति ॥ ७ ॥

द्यौ ही 'उत' है, अन्तरिक्ष 'गी' है और पृथिवी 'थ' है। आदित्य ही 'उत' है, वायु 'गी' है और अग्नि 'थ' है। सामवेद ही 'उत' है, यजुर्वेद 'गी' है और ऋग्वेद 'थ' है। इन अक्षरोंको इस प्रकार जाननेवाला जो विद्वान् 'उद्गीथ' इस प्रकार इन उद्गीथाक्षरोंकी उपासना करता है उसके लिये वाणी, जो [ऋग्वेदादि] वाक्का दोह है, उसका दोहन करती है तथा वह अन्नवान् और अन्नका भोक्ता होता है ॥ ७ ॥

| द्यौरेव उत्, उच्चैःस्थानात् । | ऊँचे स्थानवाला होनेके कारण द्युलोक ही 'उत्' है, | | अन्तरिक्षं गीर्गिरणाल्लोकानाम् । | लोकोंका गिरण करने (निगलने) से अन्तरिक्ष 'गी' है और | | पृथिवीथं प्राणिस्थानात् । आदित्य एव उत्; ऊर्ध्वत्वात् । वायुर्गीर- | प्राणियोंका स्थान होनेके कारण पृथिवी 'थ' है। ऊँचा होनेके कारण आदित्य ही 'उत्' है, | | ग्न्यादीनां गिरणात् । अग्निस्थं यज्ञकर्मावस्थानात् । सामवेद एव उत्, स्वर्गसंस्तुतत्वात् । यजुर्वेदो | अग्नि आदिको निगलनेके कारण वायु 'गी' है और यज्ञसम्बन्धी कर्मका अवस्थान (आश्रय) होनेसे अग्नि ही 'थ' है तथा स्वर्गमें स्तुत होनेके कारण सामवेद ही 'उत्' है, यजुर्वेद 'गी' है, क्योंकि |

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३


| गीर्यजुषां प्रत्तस्य हविषो देवता-नां गिरणात् । ऋग्वेदस्थम्,<br><br>ऋच्यध्यूढत्वात्साम्नः ।<br><br> उद्गीथाक्षरोपासनफलमधु-नोच्यते—दुग्धे दोग्ध्यस्मै साधकाय । का सा ? वाक्, कम् ? दोहम्, कोऽसौ दोहः ? इत्याह—यो वाचो दोहः । ऋग्वेदादिशब्दसाध्यं फलमित्य-भिप्रायः, तद्वाचो दोहस्तं स्वयमेव वाग्दोग्ध्यात्मानमेव दोग्धि । किं चान्नवान्प्रभूता-न्नोऽन्नादश्च दीप्ताग्निर्भवति य एतानि यथोक्तान्येवं यथोक्त-गुणान्युद्गीथाक्षराणि विद्वान्स-नुपास्त उद्गीथ इति ॥ ७ ॥ | यजुर्वेदियोंके दिये हुए हविको देवता-लोग निगलते हैं तथा ऋग्वेद 'थ' है; क्योंकि ऋक्में ही साम अधिष्ठित है ।<br><br> अब उद्गीथाक्षरोंकी उपासनाका फल बतलाया जाता है—इस साधक-के लिये दोहन करती है, कौन ? वाक्, किसका दोहन करती है ? दोहका, वह दोह क्या है ? इसपर कहते हैं—जो वाणीका दोह है; अभिप्राय यह है कि जो ऋग्वेदादि शब्दसे साध्य फल है, वह वाणीका दोह है, उसे वाणी स्वयं ही दुहती है । अपनेहीको दुहती है । यही नहीं वह अन्नवान्—बहुत-से अन्न-वाला और अन्नका भोक्ता भी हो जाता है, उसकी जठराग्नि उद्दीप्त रहती है, जो इन उपर्युक्त उद्गीथा-क्षरोंकी इन्हें उपर्युक्त गुणोंसे विशिष्ट जानकर, 'उद्गीथ' इस रूपसे उपा-सना करता है ॥ ७ ॥ |


सकामोपासनाका क्रम

अथ खल्वाशीःसमृद्धिरुपसरणानीत्युपासीत येन साम्ना स्तोष्यन्स्यात्तत्सामोपधावेत् ॥ ८ ॥

अब निश्चय ही कामनाओंकी समृद्धि [ के साधनका वर्णन किया जाता है—] अपने उपगन्तव्यों (ध्येयों) की इस प्रकार उपासना

७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [अध्याय १

७४छान्दोग्योपनिषद्[अध्याय १

करे—जिस सामके द्वारा उद्गाताको स्तुति करना हो उस सामका [उसकी उत्पत्ति आदिके क्रमसे] चिन्तन करे ॥ ८ ॥

अथ खल्विदानीमाशीः समृद्धिराशिषः कामस्य समृद्धैर्यथा भवेत्तदुच्यत इति वाक्यशेषः। उपसरणान्युपसर्तव्यान्युपगन्तव्यानि ध्येयानीत्यर्थः; कथम्?<br><br>इत्युपासीत—एवमुपासीत;<br><br>तद्यथा—येन साम्ना येन सामविशेषेण स्तोष्यन्स्तुतिं करिष्यन् स्याद्भवेदुद्गाता तत्सामोपधावेदुपसरेच्चिन्तयेदुत्पत्त्यादिभिः॥८॥इसके अनन्तर अब निश्चय ही आशीःसमृद्धि—जिस प्रकार आशीः अर्थात् कामनाकी समृद्धि होगी वह बतलायी जानी है, इस प्रकार इस वाक्यकी पूर्ति करनी चाहिये। उपसरण—उपसर्तव्य-उपगन्तव्य अर्थात् ध्येय--इनकी किस प्रकार उपासना करनी चाहिये? इनको उपासना इस प्रकार करे; यथा—जिस सामसे अर्थात् जिस सामविशेषसे उद्गाताको स्तुति करनी हो उस सामका उसकी उत्पत्ति आदिके क्रमसे उपधावन—उपसरण अर्थात् चिन्तन करे ॥ ८ ॥

यस्यामृचि तामृचं यदार्षेयं तमृषिं यां देवतामभिष्टोष्यन्स्यात्तां देवतामुपधावेत् ॥ ९ ॥

[वह साम] जिस ऋचामें [प्रतिष्ठित हो] उस ऋचाका, जिस ऋषिवाला हो उस ऋषिका तथा जिस देवताकी स्तुति करनेवाला हो उस देवताका चिन्तन करे ॥ ९ ॥

यस्यामृचि तत्साम तां चर्चमुपधावेद्देवतादिभिः। यदार्षेयं साम तं चर्षिम्। यां देवतामभिष्टोष्यन्स्यात्तां देवतामुपधावेत् ॥ ९ ॥वह साम जिस ऋचामें अधिष्ठित हो उस ऋचाका उसके देवतादिके सहित चिन्तन करे। तथा वह साम जिस ऋषिवाला हो उस ऋषिका और जिस देवताकी स्तुति करनेवाला हो उस देवताका भी चिन्तन करे ॥९॥

खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ ७५


येनच्छन्दसा स्तोष्यन्स्यात्तच्छन्द उपधावेद्येन स्तोमेन स्तोष्यमाणः स्यात्तꣳस्तोममुपधावेत् ॥ १० ॥

वह जिस छन्दके द्वारा स्तुति करनेवाला हो उस छन्दका उपधावन करे तथा जिस स्तोमसे स्तुति करनेवाला हो उस स्तोमका चिन्तन करे ॥१०॥

येनच्छन्दसा गायत्र्यादिना स्तोष्यन्स्यात्तच्छन्द उपधावेत् । येन स्तोमेन स्तोष्यमाणः स्यात्, स्तोमाङ्गफलस्य कर्तृगामित्वादात्मनेपदं स्तोष्यमाण इति, तं स्तोममुपधावेत् ॥ १० ॥वह जिस गायत्री आदि छन्दसे स्तुति करनेवाला हो उस छन्दका उपधावन करे तथा जिस स्तोमसे स्तुति करनेवाला हो उस स्तोमका चिन्तन करे। स्तोमकर्मका अङ्गभूत फल कर्ताको प्राप्त होनेवाला होनेसे यहाँ 'स्तोष्यमाणः' इस पदमें आत्मनेपदका प्रयोग किया गया है* ॥१०॥
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यां दिशमभिष्टोष्यन्स्यात्तां दिशमुपधावेत् ॥ ११ ॥

जिस दिशाकी स्तुति करनेवाला हो उस दिशाका चिन्तन करे ॥ ११ ॥

यां दिशमभिष्टोष्यन्स्यात्तां दिशमुपधावेदधिष्ठात्रादिभिः ॥ ११ ॥[ वह साम ] जिस दिशाकी स्तुति करनेवाला हो उस दिशाका उसके अधिष्ठाता देवता आदिके सहित चिन्तन करे ॥ ११ ॥
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* क्योंकि 'स्वरितञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले' इस पाणिनिसूत्रके अनुसार जिस क्रियाका फल कर्ताको प्राप्त होनेवाला होता है उसमें आत्मनेपदका प्रयोग हुआ करता है।

७६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ ]

७६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ ]


आत्मानमन्तत उपसृत्य स्तुवीत कामं ध्यायन्नप्र-
मत्तोऽभ्याशो ह यदस्मै स कामः समृद्ध्येत यत्कामः
स्तुवीतेति यत्कामः स्तुवीतेति ॥ १२ ॥

अन्तमें अपने स्वरूपका चिन्तन कर अपनी कामनाका चिन्तन करते हुए अप्रमत्त होकर स्तुति करे। जिस फलकी इच्छासे युक्त होकर वह स्तुति करता है वही फल तत्काल समृद्धिको प्राप्त होता है ॥ १२ ॥

| आत्मानमुद्गाता स्वं रूपं गोत्रनामादिभिः सामादीन्क्रमेण स्वं चात्मानमन्ततोऽन्त उपसृत्य स्तुवीत। कामं ध्यायन्नप्रमत्तः स्वरोष्मव्यञ्जनादिभ्यः प्रमादमकुर्वन्। ततोऽभ्याशः क्षिप्रमेव ह यद्यत्रास्मा एवंविदे स कामः समृद्ध्येत समृद्धिं गच्छेत्। कोऽसौ ? यत्कामो यः कामोऽस्य सोऽयं यत्कामः सन् स्तुवीतेति द्विरुक्तिरादरार्था ॥ १२ ॥ | उद्गाताको चाहिये कि गोत्र और नामादिके सहित अपना—अपने स्वरूपका चिन्तन करता हुआ अर्थात् सामादि क्रमसे अन्तमें अपना स्मरण करता हुआ स्तुति करे। [किस प्रकार स्तुति करे ?] फलका चिन्तन करता हुआ अप्रमत्त होकर अर्थात् स्वर, ऊष्म एवं व्यञ्जनादि वर्णोच्चारणमें प्रमाद न करता हुआ [स्तुति करे]। इस प्रकार जाननेवाले उस उपासककी जो कामना होती है वह शीघ्र ही समृद्ध (फलवती) हो जाती है। वह कामना कौन-सी है ? वह उपासक यत्काम अर्थात् जिस कामनावाला होकर स्तुति करता है। [श्रुतिमें] 'यत्कामः स्तुवीत' इन पदोंका दो बार प्रयोग आदरके लिये है ॥ १२ ॥ |

—: ॐ :—
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये तृतीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥

चतुर्थ खण्ड

उद्गीथसंज्ञक ओंकारोपासनासे सम्बद्ध आख्यायिका

ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीतोमिति ह्युद्गायति तस्योपव्याख्यानम् ॥ १ ॥

‘ॐ’ यह अक्षर उद्गीथ है—इस प्रकार इसकी उपासना करे। ‘ॐ’ ऐसा [ उच्चारण करके यज्ञमें उद्गाता ] उद्गान करता है। उस ( उद्गीथोपासना ) की ही व्याख्या की जाती है ॥ १ ॥

| ओमित्येतदित्यादिप्रकृतस्याक्षरस्य पुनरुपादानमुद्गीथाक्षराद्युपासनान्तरितत्वादन्यत्र प्रसङ्गो मा भूदित्येवमर्थम्। प्रकृतस्यैवाक्षरस्यामृताभयगुणविशिष्टस्योपासनं विधातव्यमित्यारम्भः।<br><br>ओमित्यादिव्याख्यातम् ॥१॥ | पूर्व-प्रस्तावित ओंकार अक्षरका ही ‘ओमित्येतत्’ इत्यादि वाक्यद्वारा इसलिये ग्रहण किया गया है जिससे बीचमें ‘उद्गीथ’ शब्दके अक्षरोंकी उपासनासे व्यवहित हो जानेके कारण अन्यत्र प्रसङ्ग न हो जाय। उस पूर्वप्रस्तावित अक्षरके ही अमृत और अभय गुणविशिष्ट स्वरूपकी उपासनाका विधान करना है—इसीके लिये [आगेका ग्रन्थ] आरम्भ किया जाता है। ओमित्यादि मन्त्रकी व्याख्या पहले की जा चुकी है ॥१॥ |

—: ० :—

७८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

७८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

देवा वै मृत्योर्बिभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्राविशंस्ते छन्दोभिरच्छादयन्द्यदेभिरच्छादयँस्तच्छन्दसां छन्दस्त्वम् ॥ २ ॥

[ एक बार ] मृत्युसे भय मानते हुए देवताओंने त्रयीविद्यामें प्रवेश किया। उन्होंने अपनेको छन्दोंसे आच्छादित कर लिया। देवताओंने जो उनके द्वारा अपनेको आच्छादित किया वही छन्दोंका छन्दपन है। [ अर्थात् देवताओंको आच्छादित करनेके कारण ही मन्त्रोंका नाम छन्द हुआ है ] ॥ २ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
देवा वै मृत्योर्मारकाद्विभ्यतः किं कृतवन्तः ? इत्युच्यते—त्रयीं विद्यां त्रयीविहितं कर्म प्राविशन् प्रविष्टवन्तो वैदिकं कर्म प्रारब्धवन्त इत्यर्थः, तन्मृत्योस्त्राणं मन्यमानाः। किं च ते कर्मण्य-विनियुक्तैश्छन्दोभिर्मन्त्रैर्जपहोमादि कुर्वन्त आत्मानं कर्मान्तरेष्वच्छादयंश्छादितवन्तः। यद्यस्मादेभिर्मन्त्रैरच्छादयंस्तत्तस्माच्छन्दसां मन्त्राणां छादनाच्छन्दस्त्वं प्रसिद्धमेव ॥ २ ॥प्रसिद्ध देवताओंने मारक मृत्युसे भय मानते हुए क्या किया ? यह बतलाया जाता है—उन्होंने त्रयी विद्यामें—वेदत्रयीद्वारा प्रतिपादित कर्ममें प्रवेश किया। अर्थात् वैदिक कर्मको ही मृत्युसे बचनेका साधन समझकर उन्होंने उसीका आरम्भ कर दिया। तथा कर्ममें जिनका विनियोग नहीं है उन छन्दों—मन्त्रों—से जप एवं होमादि करते हुए उन्होंने अपनेको कर्मान्तरोंमें आच्छादित कर दिया। क्योंकि उन्होंने अपनेको इन मन्त्रोंसे आच्छादित कर दिया था, इसलिये छादन करनेके कारण ही छन्दों यानी मन्त्रोंका छन्दपन प्रसिद्ध ही है ॥२॥
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खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९


तानु तत्र मृत्युर्यथा मत्स्यमुदके परिपश्येदेवं पर्यपश्यदृचि साम्नि यजुषि । ते नु विदित्वोर्ध्वा ऋचः साम्नो यजुषः स्वरमेव प्राविशन् ॥ ३ ॥

जिस प्रकार [मछेरा] जलमें मछलियोंको देख लेता है, उसी प्रकार ऋक्, साम और यजुःसम्बन्धी कर्मोंमें लगे हुए उन देवताओंको मृत्युने देख लिया । इस बातको जान लेनेपर उन देवताओंने ऋक्, साम और यजुः सम्बन्धी कर्मोंसे निवृत्त होकर स्वर (ॐ इस अक्षर) में ही प्रवेश किया॥ ३॥


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
तांस्तत्र देवान्कर्मपरान्मृत्युर्यथा लोके मत्स्यघातको मत्स्यमुदके नातिगम्भीरे परिपश्येद्दण्डिशोदकस्रावोपायसाध्यं मन्यमानः, एवं पर्यपश्यद्दृष्टवान्मृत्युः; कर्मक्षयोपायेन साध्यान्देवान्मेन इत्यर्थः। क्वासौ देवान्ददर्श? इत्युच्यते—ऋचि साम्नि यजुषि । ऋग्यजुःसामसम्बन्धिकर्मणीत्यर्थः । ते नु देवा वैदिकेन कर्मणा संस्कृताः शुद्धात्मानः सन्तो मृत्योश्चिकीर्षितं विदितवन्तः । विदित्वा च त ऊर्ध्वा व्यावृत्ताः कर्मभ्य ऋचः साम्नोजिस प्रकार लोकमें बंसी लगाने और जल उलीचने आदि उपायोंसे मछलियोंको पकड़ा जा सकता है, यह जाननेवाला मछेरा उन्हें कम गहरे जलमें देख लेता है उसी प्रकार मृत्युने कर्मपरायण देवताओंको वहाँ [छिपे हुए] देख लिया, अर्थात् मृत्युने यह समझ लिया कि देवताओंको कर्मक्षयरूप उपायके द्वारा अपने अधीन किया जा सकता है । उसने देवताओंको कहाँ देखा ? यह बतलाया जाता है—ऋक्, साम और यजुमें अर्थात् ऋक्, यजुः और सामसम्बन्धी कर्ममें। वैदिक कर्मानुष्ठानके कारण शुद्धचित्त हुए उन देवताओंने 'मृत्यु क्या करना चाहता है ?' यह जान लिया। यह जानकर वे ऋक्, साम और यजुःसे अर्थात् ऋक्, यजुः और सामसम्बन्धी कर्मसे निवृत्त

८० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

८०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| यजुष ऋग्यजुःसामसंबद्धात्कर्मणोऽभ्युत्थायेत्यर्थः। तेन कर्मणा मृत्युभयापगमं प्रति निराशास्तदपास्यामृताभयगुणमक्षरं स्वरं स्वरशब्दितं प्राविशन्नेव प्रविष्टवन्तः; ॐकारोपासनपराः संवृत्ताः। एवशब्दोऽवधारणार्थः सन्समुच्चयप्रतिषेधार्थः। तदुपासनपराः संवृत्ता इत्यर्थः ॥३॥ | होकर ऊपरकी ओर उठे । उस कर्मसे मृत्युके भयकी निवृत्तिके प्रति निराश होनेके कारण वे उसे छोड़-कर अमृत और अभय गुणविशिष्ट अक्षर यानी स्वरमें—स्वरसंज्ञक अक्षरमें ही प्रविष्ट हो गये अर्थात् ओंकारोपासनामें तत्पर हो गये । यहाँ 'एव' शब्द अवधारणके लिये होकर [ पूर्व स्थानोंके साथ स्वरके ] समुच्चयका प्रतिषेध करनेके लिये है । तात्पर्य यह है कि वे उसीकी उपासनामें तत्पर हो गये ॥ ३ ॥ |

—: ० :—

ओंकारका उपयोग और महत्त्व

कथं पुनः स्वरशब्दवाच्यत्वमक्षरस्य ? इत्युच्यते—किंतु वह अक्षर 'स्वर' शब्दका वाच्यार्थ किस प्रकार है ? यह बतलाया जाता है—

य दा वा ऋचमाप्नोत्योमित्येवातिस्वरत्येवꣲ सामैवं यजुरेष उ स्वरो यदेतदक्षरमेतदमृतमभयं तत्प्रविश्य देवा अमृता अभया अभवन् ॥ ४ ॥

जिस समय [ उपासक अध्ययनद्वारा ] ऋक्‌को प्राप्त करता है उस समय वह ॐ ऐसा कहकर ही बड़े आदरसे उच्चारण करता है । इसी प्रकार वह साम और यजुःको भी प्राप्त करता है । यह जो अक्षर है, वह अन्य स्वरोंके समान स्वर है । यह अमृत और अभयरूप है, इसमें प्रविष्ट होकर देवगण अमृत और अभय हो गये थे ॥ ४ ॥

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१


| यदा वा ऋचमाप्नोत्योमित्ये- <br> वातिस्वरत्येवं सामैवं यजुः। एष <br> उ स्वरः। कोऽसौ ? यदेतदक्षरमे- <br> तदमृतमभयम्, तत्प्रविश्य यथा- <br> गुणमेवामृता अभयाश्चाभवन् <br> देवाः ॥ ४ ॥ | जिस समय [ उपासक ] ऋक्‌को प्राप्त करता है उस समय वह ‘ॐ’ ऐसा कहकर ही बड़े आदरसे उच्चारण करता है । इसी प्रकार वह साम और यजुको भी प्राप्त करता है । यही स्वर है; वह स्वर कौन है ? यह जो अक्षर है, यह अमृत और अभयरूप है, उसमें प्रविष्ट होकर उसीके गुणके समान देवगण भी अमृत और अभय हो गये थे ॥ ४ ॥ |

ओंकारोपासनाका फल

स य एतदेवं विद्वानक्षरं प्रणौत्येतदेवाक्षरँ स्वरममृतमभयं प्रविशति तत्प्रविश्य यदमृता देवास्तदमृतो भवति ॥ ५ ॥

वह, जो इसे इस प्रकार जाननेवाला होकर इस अक्षरकी स्तुति (उपासना) करता है, इस अमृत और अभयरूप अक्षरमें ही प्रवेश कर जाता है तथा इसमें प्रविष्ट होकर जिस प्रकार देवगण अमर हो गये थे, उसी प्रकार अमर हो जाता है ॥ ५ ॥

| स योऽन्योऽपि देववदेवैतदक्ष- <br> रमेवममृतमभयगुणं विद्वान्प्रणौ- <br> ति स्तौति–उपासनमेवात्र स्तुति- | उन देवताओंके समान ही जो दूसरा उपासक भी इस अक्षरको इसी प्रकार अमृत और अभयगुणसे विशिष्ट जानता हुआ उसकी स्तुति करता है– यहाँ स्तुतिका अभिप्राय उपासना |

८२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

८२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| रभिप्रेता—स तथैवैतदेवाक्षरं स्वरममृतमभयं प्रविशति ।<br><br>तत्प्रविश्य च राजकुलं प्रविष्टानमिव राज्ञोऽन्तरङ्गबहिरङ्गतावन्न परस्य ब्रह्मणोऽन्तरङ्गबहिरङ्गताविशेषः, किं तर्हि ?<br><br>यदमृता देवा येनामृतत्वेन यदमृता अभूवंस्तेनैवामृतत्वेन विशिष्टस्तदमृतो भवति न न्यूनता नाप्यधिकतामृतत्व इत्यर्थः ॥५॥ | ही है—वह उसी प्रकार ( उन देवताओंके ही समान ) इस अमृत और अभयरूप अक्षरमें ही प्रविष्ट हो जाता है ।<br><br>तथा उसमें प्रविष्ट होनेपर, जिस प्रकार राजकुलमें प्रवेश करनेवालोंमें कोई राजाके अन्तरङ्ग रहते हैं और कोई बहिरङ्ग रहते हैं, इस प्रकार परब्रह्मके अन्तरङ्ग-बहिरङ्गताका भेद नहीं रहता । तो फिर क्या रहता है ? जिस अमृतत्वसे देवगण अमर हो गये थे उसी अमृतत्वसे विशिष्ट होकर यह भी उन्हींके समान अमर हो जाता है । इसके अमृतत्वमें न तो न्यूनता रहती है और न अधिकता ही ॥ ५ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये
चतुर्थखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥४॥

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पञ्चम खण्ड

ओंकार, उद्गीथ और आदित्यका अभेद

प्राणादित्यदृष्टिविशिष्टस्योद्गीथ-<br>स्योपासनमुक्तमेवानूद्य प्रणवोद्गी-<br>थयोरेकत्वं कृत्वा तस्मिन्प्राण-<br>रश्मिभेदगुणविशिष्टदृष्ट्याक्ष-<br>रस्योपासनमनेकपुत्रफलमिदानीं<br>वक्तव्यमित्यारभ्यते—पूर्वोक्त प्राण और आदित्यदृष्टिसे विशिष्ट उद्गीथोपासनाका ही अनुवाद (पुनरुल्लेख) कर प्रणव और उद्गीथकी एकता करते हुए अब उसी प्रसङ्गमें प्राण और रश्मियोंके भेदरूप गुणसे युक्त दृष्टिसे उस अक्षरकी (उद्गीथावयवभूत ओंकारकी) अनेक पुत्ररूप फलवाली उपासनाका निरूपण करना है—इसीलिये [आगेका ग्रन्थ] आरम्भ किया जाता है—

अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथ एष प्रणव ओमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ १ ॥

निश्चय ही जो उद्गीथ है वही प्रणव है और जो प्रणव है वही उद्गीथ है। इस प्रकार यह आदित्य ही उद्गीथ है, यही प्रणव है; क्योंकि यह (आदित्य) 'ॐ' ऐसा उच्चारण करता हुआ ही गमन करता है ॥ १ ॥

अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो बह्वृचानाम्, यश्च प्रणव-निश्चय ही जो उद्गीथ है वही ऋग्वेदियोंका प्रणव है तथा उनका

८४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

८४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| स्तेषां स एव छान्दोग्य उद्गीथ-शब्दवाच्यः। असौ वा आदित्य उद्गीथ एष प्रणवः। प्रणवशब्दवाच्योऽपि स एव बह्वृचानां नान्यः।<br><br>उद्गीथ आदित्यः, कथम् ?<br><br>उद्गीथाख्यमक्षरमोमित्येतदेष हि यस्मात्स्वरन्नुच्चारयन्ननेकार्थत्वाद्धात्तूनाम्, अथवा स्वरन्नाच्छन्नेति; अतोऽसावुद्गीथः सविता ॥ १ ॥ | जो प्रणव है वही छान्दोग्य-उपनिषद्में 'उद्गीथ' शब्दसे कहा गया है। यह आदित्य ही उद्गीथ है, यही प्रणव है; अर्थात् ऋग्वेदियोंके यहाँ प्रणवशब्दवाच्य भी वही है, कोई और नहीं है।<br><br>आदित्य उद्गीथ है—सो कैसे ? क्योंकि यह उद्गीथसंज्ञक अक्षरको 'ॐ' इस प्रकार स्वरन्—उच्चारण करते हुए जाता है [ यद्यपि 'स्वर आक्षेपे' इस धातुसूत्रके अनुसार 'स्वरन्' का अर्थ आक्षेप या गमन करते हुए होना चाहिये तथापि] धातुओंके अनेक अर्थ होते हैं [इसलिये 'स्वरन्' का अर्थ 'उच्चारण करते हुए' भी होता है] अथवा स्वरन् यानी चलनेवाला सूर्य [ प्राणोंकी प्रवृत्तिके प्रति 'ॐ' इस प्रकार अनुज्ञा करता हुआ ] जाता है। अतः यह सविता उद्गीथ ही है ॥ १ ॥ |

रश्मिदृष्टिसे आदित्यकी व्यस्तोपासनाका विधान और फल

एतमु एवाहमभ्यगासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच रश्मीꣳस्त्वं पर्यावर्तयाद्बहवो वै ते भविष्यन्तीत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥

'मैंने प्रमुखतासे इसका गान किया था; इसीसे मेरे तू एक ही पुत्र है'—ऐसा कौषीतकिने अपने पुत्रसे कहा। अतः तू रश्मियोंका [ आदित्यसे ] भेदरूपसे चिन्तन कर। इससे निश्चय ही तेरे बहुत-से पुत्र होंगे। यह अधिदैवत उपासना है ॥ २ ॥

खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५


| तमेतममु एवाहमभ्यगासिषमाभिमुख्येन गीतवानस्म्यादित्यरश्म्यभेदं कृत्वा ध्यानं कृतवानस्मीत्यर्थः । तेन तस्मात्कारणान्मम त्वमेकोऽसि पुत्र इति ह कौषीतकिः कुषीतकस्यापत्यं कौषीतकिः पुत्रमुवाचोक्तवान् । अतो रश्मीनादित्यं च भेदेन त्वं पर्यावर्तयात्पर्यावर्तयेत्यर्थः, त्वं योगात् । एवं बहवो वै ते तव पुत्रा भविष्यन्तीत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥ | ‘निश्चय इसीका मैंने आभिमुख्य ( प्रमुखता ) से गान किया था; अर्थात् मैंने आदित्य और उसकी रश्मियोंका अभेद करके ध्यान किया था । इसी कारणसे मेरे तू एक ही पुत्र है’—ऐसा कौषीतकि—कुषीतकके पुत्र कौषीतकिने अपने पुत्रसे कहा । अतः तू सूर्य और रश्मियोंका भेदपूर्वक चिन्तन कर । श्रुतिमें कर्तृपद ‘त्वं’ होनेके कारण पर्यावर्तयात् [ इस प्रथमपुरुषकी ] क्रियाके स्थानमें ‘पर्यावर्तय’ यह मध्यमपुरुषकी क्रिया समझनी चाहिये । इस प्रकार [ उपासना करनेसे] तेरे बहुत-से पुत्र उत्पन्न होंगे। यह अधिदैवत उपासना है ॥ २ ॥ |


मुख्यप्राणदृष्टिसे उद्गीथोपासना

अथाध्यात्मं य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासीतोमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ ३ ॥

इसके आगे अध्यात्म उपासना है—यह जो मुख्य प्राण है उसीके रूपमें उद्गीथकी उपासना करे, क्योंकि यह ‘ॐ’ इस प्रकार अनुज्ञा करता हुआ गमन करता है ॥ ३ ॥

| अथानन्तरमध्यात्ममुच्यते ।<br>य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथ- | इसके आगे अध्यात्म उपासना<br>कही जाती है—यह जो मुख्य प्राण |

८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

८६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| मुपासीतेत्यादि पूर्ववत् । तथो- | है, उसीकी दृष्टिसे उद्गीथकी उपासना करे—इस प्रकार पूर्ववत् समझना चाहिये । तथा यह प्राण भी 'ॐ' इस प्रकार कहता हुआ अर्थात् वागादिकी प्रवृत्तिके लिये 'ॐ' इस प्रकार अनुज्ञा करता हुआ-सा गमन करता है । मरणकालमें मरनेवाले पुरुषके समीप रहनेवाले लोग प्राणका 'ॐ' उच्चारण करना नहीं सुनते [ इसीलिये 'अनुज्ञा करता हुआ-सा' कहा है ] । इसी सादृश्यके कारण आदित्यमें भी ओंकारोच्चारण केवल अनुज्ञामात्र समझना चाहिये ॥ ३ ॥ | | मिति शेष प्राणोऽपि स्वरन्नेत्यो- | | | मिति ह्यनुज्ञां कुर्वन्निव वागा- | | | दिप्रवृत्त्यर्थमेतीत्यर्थः । न हि | | | मरणकाले मुमूर्षोः समीपस्थाः | | | प्राणस्योंकरणं शृण्वन्तीति । | | | एतसामान्यादादित्येऽप्योंकरण- | | | मनुज्ञामात्रं द्रष्टव्यम् ॥ ३ ॥ | |


प्राणभेददृष्टिसे मुख्य प्राणकी व्यस्तोपासनाका विधान और फल

एतमु एवाहमभ्यगासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच प्राणाꣳस्त्वं भूमानमभिगायताद्बहवो वै मे भविष्यन्तीति ॥ ४ ॥

'मैंने प्रमुखतासे केवल इसीका ( मुख्य प्राणहीका ) गान किया था, इसलिये मेरे तू अकेला ही पुत्र हुआ'— ऐसा कौषीतकिने अपने पुत्रसे कहा 'अतः तू 'मेरे बहुत-से पुत्र होंगे' इस अभिप्रायसे भेदगुण-विशिष्ट प्राणोंका प्रमुखतासे गान कर' ॥ ४ ॥

एतमु एवाहमभ्यगासिषमित्यादि पूर्ववदेव । अन्नो वागादीन्'एतमु एवाहमभ्यगासिषम्' इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् ही

खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७

| मुख्यं च प्राणं भेदगुणविशिष्ट- मुद्गीथं पश्यन्भूमानं मनसाभिगायतात् पूर्ववदावर्तयेत्यर्थः । बहवो वै मे मम पुत्रा भविष्यन्तीत्येवमभिप्रायः सन्नित्यर्थः । | समझना चाहिये । अतः तू वागादि और मुख्य प्राण इनकी दृष्टिसे उद्गीथको भेदगुणविशिष्ट देखता हुआ उसका मनसे बहुत्वरूपसे अभिगान अर्थात् पूर्ववत् आवर्तन कर । तात्पर्य यह है कि 'मेरे बहुत-से पुत्र होंगे' ऐसे अभिप्रायसे युक्त होकर [ उसकी उपासना कर ] । | | प्राणादित्यैकत्वोद्गीथदृष्टेरेकपुत्रत्वफलदोषेणापोदितत्वाद्रश्मिप्राणभेददृष्टेः कर्तव्यता चोद्यतेऽस्मिन्काण्डे बहुपुत्रफलत्वार्थम् ॥ ४ ॥ | एकपुत्रप्राप्तिरूप फलके दोषसे प्राण और आदित्यके एकत्वरूप उद्गीथदृष्टिकी निन्दा की जानेके कारण इस खण्डमें अनेक पुत्ररूप फलकी प्राप्तिके लिये रश्मि और प्राण इनकी भेददृष्टिका प्रतिपादन किया गया है ॥ ४ ॥ |

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प्रणव और उद्गीथका अभेद

अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथ इति होतृषदनाद्धैवापि दुरुद्गीतमनुसमाहरतीत्यनु समाहरतीति ॥ ५ ॥

निश्चय ही जो उद्गीथ है, वही प्रणव है तथा जो प्रणव है, वही उद्गीथ है—इस प्रकार [उपासना करके] उद्गाता होताके कर्ममें किये हुए उद्गानसम्बन्धी दोषका अनुसन्धान (संशोधन) करता है, अनुसन्धान करता है ॥ ५ ॥

८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

८८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| अथ खलु य उद्गीथ इत्यादि प्रणवोद्गीथैकत्वदर्शनमुक्तं तस्यैतत्फलमुच्यते—होतृषदनाद्धोता यत्रस्थः शंसति तत्स्थानं होतृषदनं हौत्रात्कर्मणः सम्यक्प्रयुक्तादित्यर्थः । न हि देशमात्रात् फलमाहर्तुं शक्यम् । किं तत् ? हैवापि दुरुद्गीतं दुष्टमुद्गीतमुद्गानं कृतमुद्गात्रा स्वकर्मणि क्षतं कृतमित्यर्थः, तदनुसमाहरत्यनुसंदधत इत्यर्थः । चिकित्सयेव धातुवैषम्यसमीकरणमिति ॥ ५ ॥ | 'अथ खलु य उद्गीथः' इत्यादि वाक्यसे प्रणव और उद्गीथकी एकताका प्रतिपादन किया गया है । उसीका यह फल बतलाया जाता है—होतृषदनात्—जहाँ स्थित होकर होता शंसन कर्म करता है उस स्थानका नाम होतृषदन है, [ उससे ] अर्थात् सम्यक् प्रकारसे अनुष्ठान किये हुए होताके कर्मसे—क्योंकि केवल देशमात्रसे किसी फलकी प्राप्ति नहीं हो सकती । क्या होता है ? उद्गाताद्वारा जो दुरुद्गीत–दोषयुक्त उद्गान किया होता है अर्थात् अपने कर्ममें कोई दोष किया होता है उसका वह (उद्गाता) समाहार अर्थात् अनुसन्धान (सुधार) कर देता है, जिस प्रकार कि चिकित्साद्वारा धातुओंकी विषमताको ठीक कर दिया जाता है ॥ ५ ॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये पञ्चमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ५ ॥

षष्ठ खण्ड

अनेक प्रकारकी आधिदैविक उद्गीथोपासनाएँ

अथेदानीं सर्वफलसंपत्त्यर्थमुद्गीथस्य उपासनान्तरं विधित्स्यते—*अब समस्त फलकी प्राप्तिके लिये श्रुति उद्गीथसम्बन्धिनी अन्य प्रकारकी उपासनाओंका विधान करना चाहती है।

इयमेवर्गग्निः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳसाम तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयत इयमेव साग्निरमस्तत्साम ॥ १॥

यह (पृथिवी) ही ऋक् है और अग्नि साम है। वह यह [अग्निसंज्ञक] साम इस ऋक्‌में अधिष्ठित है। अतः ऋक्‌में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है। यह पृथिवी ही 'सा' है और अग्नि 'अम' है; इस प्रकार ये [दोनों मिलकर] साम हैं ॥१॥

इयमेव पृथिवी ऋक्, ऋचि पृथिवीदृष्टिः कार्या। तथाग्निः साम, सामन्यग्निदृष्टिः। कथं पृथिव्यग्न्योर्ऋक्सामत्वम् ? इत्युच्यते—तदेतत्तदेतदग्न्याख्यं सामैतस्यां पृथिव्यामृच्यध्यूढमधिगतमुपरिभावेन स्थितमित्यर्थः,यह पृथिवी ही ऋक् है, अर्थात् ऋक्‌में पृथिवीदृष्टि करनी चाहिये। तथा अग्नि साम है, साममें अग्निदृष्टि करनी चाहिये। पृथिवी और अग्नि ऋक् एवं साम किस प्रकार हैं ? सो बतलाया जाता है—यह जो अग्नि-संज्ञक साम है, इस पृथिवीसंज्ञक ऋक्-में अध्यूढ—अधिगत अर्थात् उपरि-भावसे स्थित है, जिस प्रकार कि साम

* यहाँतक पुत्रादिप्राप्तिरूप एकदेशीय फलवाली उपासनाओंका वर्णन किया गया है।

६० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १

६०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १

| ऋचीव साम । तस्मादत एव कारणादृच्यध्यूढमेव साम गीयत इदानीमपि सामगैः ।<br><br>यथा च ऋक्सामनी नात्यन्तं भिन्ने अन्योन्यं तथैतौ पृथिव्याग्नी । कथम् ? इयमेव पृथिवी सा सामनामार्धशब्दवाच्या । इतरार्धशब्दवाच्योऽग्निरमस्तदेतत्पृथिव्यग्निद्वयं सामैकशब्दाभिधेयत्वमापन्नं साम । तस्मान्नान्योन्यं भिन्नं पृथिव्यग्निद्वयं नित्यसंश्लिष्टमृक्सामनी इव। तस्माच्च पृथिव्यग्न्योर्ऋक्सामत्वमित्यर्थः ।<br><br>सामाक्षरयोः पृथिव्यग्निदृष्टिविधानार्थमियमेव साग्निरम इति केचित् ॥ १ ॥ | ऋक्में अधिष्ठित रहता है । अतः इस समय भी सामगान करनेवाले द्विजोंद्वारा ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है ।<br><br>जिस प्रकार ऋक् और साम परस्पर अत्यन्त भिन्न नहीं हैं, उसी प्रकार ये पृथिवी और अग्नि भी अत्यन्त भिन्न नहीं हैं । यह किस प्रकार ? [ सो बतलाते हैं— ] यह पृथिवी ही ‘सा’—‘साम’ नामके आधे शब्दद्वारा प्रतिपाद्य है तथा उसके अन्य नामार्ध ‘अम’ शब्दका वाच्य अग्नि ‘अम’ है । इस प्रकार ‘साम’ इस एक शब्दके वाच्यत्वको प्राप्त हुए वे ही ये पृथिवी और अग्नि दोनों साम कहे जाते हैं । अतः ऋक् और सामके समान सर्वदा मिले-जुले रहनेके कारण ये पृथिवी और अग्नि एक-दूसरेसे भिन्न नहीं हैं । भाव यह कि इसीसे पृथिवी और अग्निको ऋक् एवं साम कहा गया है । किन्हीं-किन्हींका मत है कि ‘साम’ शब्दके अक्षरोंमें पृथिवी और अग्निदृष्टिका विधान करनेके लिये ही ‘इयमेव सा अग्निरमः’ ऐसा उपदेश किया गया है ॥ १ ॥ |


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खण्ड ६] शाङ्करभाष्यार्थ ९१


अन्तरिक्षमेवर्ग्यायुः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳ साम । तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयतेऽन्तरिक्षमेव सा वायुरमस्तत्साम ॥ २ ॥

अन्तरिक्ष ही ऋक् है और वायु साम है। वह यह साम इस ऋक्में अधिष्ठित है; अतः ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है। अन्तरिक्ष ही 'सा' है और वायु 'अम' है। इस प्रकार ये [ दोनों मिलकर ] साम हैं ॥ २ ॥

द्यौ रेवर्गादित्यः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳ साम। तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयते। द्यौरेव सादित्योऽमस्तत्साम ॥ ३ ॥

द्यौ ही ऋक् है और आदित्य साम है। वह यह [ आदित्यरूप ] साम इस [ द्यौरूप ] ऋक्में अधिष्ठित है अतः ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है। द्यौ ही 'सा' है और आदित्य 'अम' है। इस प्रकार ये [ दोनों मिलकर ] साम हैं ॥ ३ ॥

अन्तरिक्षमेवर्ग्यायुः सामेत्यादि पूर्ववत् ॥ २-३ ॥अन्तरिक्ष ही ऋक् है और वायु साम है इत्यादि पूर्ववत् समझना चाहिये ॥ २-३ ॥

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नक्षत्राण्येवर्क्चन्द्रमाः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳसाम । तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयते । नक्षत्राण्येव सा चन्द्रमा अमस्तत्साम ॥ ४ ॥

नक्षत्र ही ऋक् हैं और चन्द्रमा साम है। वह यह [ चन्द्रमारूप ] साम इस [ नक्षत्ररूप ] ऋक्में अधिष्ठित है। अतः ऋक्में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है। नक्षत्र ही 'सा' है और चन्द्रमा 'अम' है, इस प्रकार ये [ दोनों मिलकर ] साम हैं ॥ ४ ॥