छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 92, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| अथ खलु य उद्गीथ इत्यादि प्रणवोद्गीथैकत्वदर्शनमुक्तं तस्यैतत्फलमुच्यते—होतृषदनाद्धोता यत्रस्थः शंसति तत्स्थानं होतृषदनं हौत्रात्कर्मणः सम्यक्प्रयुक्तादित्यर्थः । न हि देशमात्रात् फलमाहर्तुं शक्यम् । किं तत् ? हैवापि दुरुद्गीतं दुष्टमुद्गीतमुद्गानं कृतमुद्गात्रा स्वकर्मणि क्षतं कृतमित्यर्थः, तदनुसमाहरत्यनुसंदधत इत्यर्थः । चिकित्सयेव धातुवैषम्यसमीकरणमिति ॥ ५ ॥ | 'अथ खलु य उद्गीथः' इत्यादि वाक्यसे प्रणव और उद्गीथकी एकताका प्रतिपादन किया गया है । उसीका यह फल बतलाया जाता है—होतृषदनात्—जहाँ स्थित होकर होता शंसन कर्म करता है उस स्थानका नाम होतृषदन है, [ उससे ] अर्थात् सम्यक् प्रकारसे अनुष्ठान किये हुए होताके कर्मसे—क्योंकि केवल देशमात्रसे किसी फलकी प्राप्ति नहीं हो सकती । क्या होता है ? उद्गाताद्वारा जो दुरुद्गीत–दोषयुक्त उद्गान किया होता है अर्थात् अपने कर्ममें कोई दोष किया होता है उसका वह (उद्गाता) समाहार अर्थात् अनुसन्धान (सुधार) कर देता है, जिस प्रकार कि चिकित्साद्वारा धातुओंकी विषमताको ठीक कर दिया जाता है ॥ ५ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये पञ्चमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ५ ॥