भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 93

षष्ठ खण्ड

अनेक प्रकारकी आधिदैविक उद्गीथोपासनाएँ

अथेदानीं सर्वफलसंपत्त्यर्थमुद्गीथस्य उपासनान्तरं विधित्स्यते—*अब समस्त फलकी प्राप्तिके लिये श्रुति उद्गीथसम्बन्धिनी अन्य प्रकारकी उपासनाओंका विधान करना चाहती है।

इयमेवर्गग्निः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढꣳसाम तस्मादृच्यध्यूढꣳसाम गीयत इयमेव साग्निरमस्तत्साम ॥ १॥

यह (पृथिवी) ही ऋक् है और अग्नि साम है। वह यह [अग्निसंज्ञक] साम इस ऋक्‌में अधिष्ठित है। अतः ऋक्‌में अधिष्ठित सामका ही गान किया जाता है। यह पृथिवी ही 'सा' है और अग्नि 'अम' है; इस प्रकार ये [दोनों मिलकर] साम हैं ॥१॥

इयमेव पृथिवी ऋक्, ऋचि पृथिवीदृष्टिः कार्या। तथाग्निः साम, सामन्यग्निदृष्टिः। कथं पृथिव्यग्न्योर्ऋक्सामत्वम् ? इत्युच्यते—तदेतत्तदेतदग्न्याख्यं सामैतस्यां पृथिव्यामृच्यध्यूढमधिगतमुपरिभावेन स्थितमित्यर्थः,यह पृथिवी ही ऋक् है, अर्थात् ऋक्‌में पृथिवीदृष्टि करनी चाहिये। तथा अग्नि साम है, साममें अग्निदृष्टि करनी चाहिये। पृथिवी और अग्नि ऋक् एवं साम किस प्रकार हैं ? सो बतलाया जाता है—यह जो अग्नि-संज्ञक साम है, इस पृथिवीसंज्ञक ऋक्-में अध्यूढ—अधिगत अर्थात् उपरि-भावसे स्थित है, जिस प्रकार कि साम

* यहाँतक पुत्रादिप्राप्तिरूप एकदेशीय फलवाली उपासनाओंका वर्णन किया गया है।