भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 85

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१


| यदा वा ऋचमाप्नोत्योमित्ये- <br> वातिस्वरत्येवं सामैवं यजुः। एष <br> उ स्वरः। कोऽसौ ? यदेतदक्षरमे- <br> तदमृतमभयम्, तत्प्रविश्य यथा- <br> गुणमेवामृता अभयाश्चाभवन् <br> देवाः ॥ ४ ॥ | जिस समय [ उपासक ] ऋक्‌को प्राप्त करता है उस समय वह ‘ॐ’ ऐसा कहकर ही बड़े आदरसे उच्चारण करता है । इसी प्रकार वह साम और यजुको भी प्राप्त करता है । यही स्वर है; वह स्वर कौन है ? यह जो अक्षर है, यह अमृत और अभयरूप है, उसमें प्रविष्ट होकर उसीके गुणके समान देवगण भी अमृत और अभय हो गये थे ॥ ४ ॥ |

ओंकारोपासनाका फल

स य एतदेवं विद्वानक्षरं प्रणौत्येतदेवाक्षरँ स्वरममृतमभयं प्रविशति तत्प्रविश्य यदमृता देवास्तदमृतो भवति ॥ ५ ॥

वह, जो इसे इस प्रकार जाननेवाला होकर इस अक्षरकी स्तुति (उपासना) करता है, इस अमृत और अभयरूप अक्षरमें ही प्रवेश कर जाता है तथा इसमें प्रविष्ट होकर जिस प्रकार देवगण अमर हो गये थे, उसी प्रकार अमर हो जाता है ॥ ५ ॥

| स योऽन्योऽपि देववदेवैतदक्ष- <br> रमेवममृतमभयगुणं विद्वान्प्रणौ- <br> ति स्तौति–उपासनमेवात्र स्तुति- | उन देवताओंके समान ही जो दूसरा उपासक भी इस अक्षरको इसी प्रकार अमृत और अभयगुणसे विशिष्ट जानता हुआ उसकी स्तुति करता है– यहाँ स्तुतिका अभिप्राय उपासना |