भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 77

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३


| गीर्यजुषां प्रत्तस्य हविषो देवता-नां गिरणात् । ऋग्वेदस्थम्,<br><br>ऋच्यध्यूढत्वात्साम्नः ।<br><br> उद्गीथाक्षरोपासनफलमधु-नोच्यते—दुग्धे दोग्ध्यस्मै साधकाय । का सा ? वाक्, कम् ? दोहम्, कोऽसौ दोहः ? इत्याह—यो वाचो दोहः । ऋग्वेदादिशब्दसाध्यं फलमित्य-भिप्रायः, तद्वाचो दोहस्तं स्वयमेव वाग्दोग्ध्यात्मानमेव दोग्धि । किं चान्नवान्प्रभूता-न्नोऽन्नादश्च दीप्ताग्निर्भवति य एतानि यथोक्तान्येवं यथोक्त-गुणान्युद्गीथाक्षराणि विद्वान्स-नुपास्त उद्गीथ इति ॥ ७ ॥ | यजुर्वेदियोंके दिये हुए हविको देवता-लोग निगलते हैं तथा ऋग्वेद 'थ' है; क्योंकि ऋक्में ही साम अधिष्ठित है ।<br><br> अब उद्गीथाक्षरोंकी उपासनाका फल बतलाया जाता है—इस साधक-के लिये दोहन करती है, कौन ? वाक्, किसका दोहन करती है ? दोहका, वह दोह क्या है ? इसपर कहते हैं—जो वाणीका दोह है; अभिप्राय यह है कि जो ऋग्वेदादि शब्दसे साध्य फल है, वह वाणीका दोह है, उसे वाणी स्वयं ही दुहती है । अपनेहीको दुहती है । यही नहीं वह अन्नवान्—बहुत-से अन्न-वाला और अन्नका भोक्ता भी हो जाता है, उसकी जठराग्नि उद्दीप्त रहती है, जो इन उपर्युक्त उद्गीथा-क्षरोंकी इन्हें उपर्युक्त गुणोंसे विशिष्ट जानकर, 'उद्गीथ' इस रूपसे उपा-सना करता है ॥ ७ ॥ |


सकामोपासनाका क्रम

अथ खल्वाशीःसमृद्धिरुपसरणानीत्युपासीत येन साम्ना स्तोष्यन्स्यात्तत्सामोपधावेत् ॥ ८ ॥

अब निश्चय ही कामनाओंकी समृद्धि [ के साधनका वर्णन किया जाता है—] अपने उपगन्तव्यों (ध्येयों) की इस प्रकार उपासना