छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 79, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 79
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खण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ ७५
येनच्छन्दसा स्तोष्यन्स्यात्तच्छन्द उपधावेद्येन स्तोमेन स्तोष्यमाणः स्यात्तꣳस्तोममुपधावेत् ॥ १० ॥
वह जिस छन्दके द्वारा स्तुति करनेवाला हो उस छन्दका उपधावन करे तथा जिस स्तोमसे स्तुति करनेवाला हो उस स्तोमका चिन्तन करे ॥१०॥
| येनच्छन्दसा गायत्र्यादिना स्तोष्यन्स्यात्तच्छन्द उपधावेत् । येन स्तोमेन स्तोष्यमाणः स्यात्, स्तोमाङ्गफलस्य कर्तृगामित्वादात्मनेपदं स्तोष्यमाण इति, तं स्तोममुपधावेत् ॥ १० ॥ | वह जिस गायत्री आदि छन्दसे स्तुति करनेवाला हो उस छन्दका उपधावन करे तथा जिस स्तोमसे स्तुति करनेवाला हो उस स्तोमका चिन्तन करे। स्तोमकर्मका अङ्गभूत फल कर्ताको प्राप्त होनेवाला होनेसे यहाँ 'स्तोष्यमाणः' इस पदमें आत्मनेपदका प्रयोग किया गया है* ॥१०॥ |
यां दिशमभिष्टोष्यन्स्यात्तां दिशमुपधावेत् ॥ ११ ॥
जिस दिशाकी स्तुति करनेवाला हो उस दिशाका चिन्तन करे ॥ ११ ॥
| यां दिशमभिष्टोष्यन्स्यात्तां दिशमुपधावेदधिष्ठात्रादिभिः ॥ ११ ॥ | [ वह साम ] जिस दिशाकी स्तुति करनेवाला हो उस दिशाका उसके अधिष्ठाता देवता आदिके सहित चिन्तन करे ॥ ११ ॥ |
* क्योंकि 'स्वरितञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले' इस पाणिनिसूत्रके अनुसार जिस क्रियाका फल कर्ताको प्राप्त होनेवाला होता है उसमें आत्मनेपदका प्रयोग हुआ करता है।