भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 89

खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५


| तमेतममु एवाहमभ्यगासिषमाभिमुख्येन गीतवानस्म्यादित्यरश्म्यभेदं कृत्वा ध्यानं कृतवानस्मीत्यर्थः । तेन तस्मात्कारणान्मम त्वमेकोऽसि पुत्र इति ह कौषीतकिः कुषीतकस्यापत्यं कौषीतकिः पुत्रमुवाचोक्तवान् । अतो रश्मीनादित्यं च भेदेन त्वं पर्यावर्तयात्पर्यावर्तयेत्यर्थः, त्वं योगात् । एवं बहवो वै ते तव पुत्रा भविष्यन्तीत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥ | ‘निश्चय इसीका मैंने आभिमुख्य ( प्रमुखता ) से गान किया था; अर्थात् मैंने आदित्य और उसकी रश्मियोंका अभेद करके ध्यान किया था । इसी कारणसे मेरे तू एक ही पुत्र है’—ऐसा कौषीतकि—कुषीतकके पुत्र कौषीतकिने अपने पुत्रसे कहा । अतः तू सूर्य और रश्मियोंका भेदपूर्वक चिन्तन कर । श्रुतिमें कर्तृपद ‘त्वं’ होनेके कारण पर्यावर्तयात् [ इस प्रथमपुरुषकी ] क्रियाके स्थानमें ‘पर्यावर्तय’ यह मध्यमपुरुषकी क्रिया समझनी चाहिये । इस प्रकार [ उपासना करनेसे] तेरे बहुत-से पुत्र उत्पन्न होंगे। यह अधिदैवत उपासना है ॥ २ ॥ |


मुख्यप्राणदृष्टिसे उद्गीथोपासना

अथाध्यात्मं य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासीतोमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ ३ ॥

इसके आगे अध्यात्म उपासना है—यह जो मुख्य प्राण है उसीके रूपमें उद्गीथकी उपासना करे, क्योंकि यह ‘ॐ’ इस प्रकार अनुज्ञा करता हुआ गमन करता है ॥ ३ ॥

| अथानन्तरमध्यात्ममुच्यते ।<br>य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथ- | इसके आगे अध्यात्म उपासना<br>कही जाती है—यह जो मुख्य प्राण |