छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 90, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| मुपासीतेत्यादि पूर्ववत् । तथो- | है, उसीकी दृष्टिसे उद्गीथकी उपासना करे—इस प्रकार पूर्ववत् समझना चाहिये । तथा यह प्राण भी 'ॐ' इस प्रकार कहता हुआ अर्थात् वागादिकी प्रवृत्तिके लिये 'ॐ' इस प्रकार अनुज्ञा करता हुआ-सा गमन करता है । मरणकालमें मरनेवाले पुरुषके समीप रहनेवाले लोग प्राणका 'ॐ' उच्चारण करना नहीं सुनते [ इसीलिये 'अनुज्ञा करता हुआ-सा' कहा है ] । इसी सादृश्यके कारण आदित्यमें भी ओंकारोच्चारण केवल अनुज्ञामात्र समझना चाहिये ॥ ३ ॥ | | मिति शेष प्राणोऽपि स्वरन्नेत्यो- | | | मिति ह्यनुज्ञां कुर्वन्निव वागा- | | | दिप्रवृत्त्यर्थमेतीत्यर्थः । न हि | | | मरणकाले मुमूर्षोः समीपस्थाः | | | प्राणस्योंकरणं शृण्वन्तीति । | | | एतसामान्यादादित्येऽप्योंकरण- | | | मनुज्ञामात्रं द्रष्टव्यम् ॥ ३ ॥ | |
प्राणभेददृष्टिसे मुख्य प्राणकी व्यस्तोपासनाका विधान और फल
एतमु एवाहमभ्यगासिषं तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच प्राणाꣳस्त्वं भूमानमभिगायताद्बहवो वै मे भविष्यन्तीति ॥ ४ ॥
'मैंने प्रमुखतासे केवल इसीका ( मुख्य प्राणहीका ) गान किया था, इसलिये मेरे तू अकेला ही पुत्र हुआ'— ऐसा कौषीतकिने अपने पुत्रसे कहा 'अतः तू 'मेरे बहुत-से पुत्र होंगे' इस अभिप्रायसे भेदगुण-विशिष्ट प्राणोंका प्रमुखतासे गान कर' ॥ ४ ॥
| एतमु एवाहमभ्यगासिषमित्यादि पूर्ववदेव । अन्नो वागादीन् | 'एतमु एवाहमभ्यगासिषम्' इत्यादि वाक्यका अर्थ पूर्ववत् ही |
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