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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

४०२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४

४०२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४

ष्टामुपकोसलायेति । तस्मा एवं जाययोक्तोऽपि हा प्रोच्यैवानुक्त्वैव किञ्चित्प्रवासाञ्चक्रे प्रवसितवान् २किन्तु, स्त्रीद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर भी, वह उससे कुछ कहे बिना ही बाहर चला गया ॥ २ ॥

— : ० : —

स ह व्याधिनानशितुं दध्रे तमाचार्यजायोवाच ब्रह्मचारिन्नशान किं नु नाश्नासीति। स होवाच बहव इमऽस्मिन्पुरुषे कामा नानात्यया व्याधिभिः प्रतिपूर्णोऽस्मि नाशिष्यामीति ॥ ३ ॥

उस उपकोसलने मानसिक खेदसे अनशन करनेका निश्चय किया। उससे आचार्यपत्नीने कहा—‘अरे ब्रह्मचारिन् ! तू भोजन कर, क्यों नहीं भोजन करता ?’ वह बोला—‘इस मनुष्यमें बहुत-सी कामनाएँ रहती हैं जो वस्तुके स्वरूपका उल्लङ्घन करके अनेक विषयोंकी ओर जानेवाली हैं। मैं उन्हीं नानात्यय (बहुमुखी) मानसिक चिन्ताओंसे परिपूर्ण हूँ, इसलिये भोजन नहीं करूँगा’ ॥ ३ ॥

(खेदादुपकोसलस्यानशनम्)

स होपकोसलो व्याधिना मानसेन दुःखेनानशितुमनशनं कर्तुं दध्रे धृतवान्मनः। तं तूष्णीमग्न्यगारेऽवस्थितमाचार्यजायोवाच हे ब्रह्मचारिन्नशान भुङ्क्ष्व किं नु कस्मान्नु कारणान्नाश्नासीति। <br><br> स होवाच बहवोऽनेकेऽस्मिन्पुरुषेऽकृतार्थे प्राकृते कामा इच्छाः कर्तव्यं प्रति नानात्ययो-उस उपकोसलने व्याधि—मानसिक दुःखसे अनशन करनेका मनमें निश्चय किया। तब अग्निशालामें चुपचाप बैठे हुए उससे आचार्यपत्नीने कहा—‘हे ब्रह्मचारिन् ! अशन—भोजन कर, क्यों—किस कारणसे भोजन नहीं करता ?’ <br><br> वह बोला—‘इस अकृतार्थ साधारण पुरुषमें अपने कर्तव्यके प्रति बहुत-सी कामनाएँ—इच्छाएँ रहती हैं, जिन व्याधियों—कर्तव्य-

खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ४०३


ऽतिगमनं येषां व्याधीनां कर्तव्यचिन्तानां ते नानात्यया व्याधयः कर्तव्यताप्राप्तिनिमित्तानि चित्तदुःखानीत्यर्थः। तैः प्रतिपूर्णोऽस्मि; अतो नाशिष्यामीति ॥ ३ ॥सम्बन्धिनी चिन्ताओंके अत्यय—अतिगमन-वस्तुके स्वरूपका उल्लङ्घन करके विषय-प्रवेशके मार्ग नाना हैं ऐसी जो नानात्यय कामनारूप व्याधियाँ अर्थात् कर्तव्यता प्राप्तिनिमित्तक मानसिक दुःख हैं, मैं उनसे परिपूर्ण हूँ, इसलिये भोजन नहीं करूँगा'❊ ॥३॥

उक्त्वा तूष्णींभूते ब्रह्मचारिणि--ब्रह्मचारीके इस प्रकार कहकर चुप हो जानेपर—

अथ हाग्नयः समूदिरे तप्तो ब्रह्मचारी कुशलं नः पर्यचारीद्धन्तास्मै प्रब्रवामेति तस्मै होचुः प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति ॥ ४ ॥

फिर अग्नियोंने एकत्रित होकर कहा—'यह ब्रह्मचारी तपस्या कर चुका है; इसने हमारी अच्छी तरह सेवा की है। अच्छा, हम इसे उपदेश करें' ऐसा निश्चयकर वे उससे बोले—'प्राण ब्रह्म है, 'क' ब्रह्म है, 'ख' ब्रह्म है' ॥४॥

अथ हाग्नयः शुश्रूषयावर्जिताः<br>अग्नीनां कारुण्याविष्टाः सन्त-<br>तस्मा उपदेष्टुं त्रयोऽपि समूदिरे<br>निश्चयः<br>संभूयोक्तवन्तः । हन्तेदानीमस्मै ब्रह्मचारिणेऽस्मद्भक्ताय दुःखिताय तपस्विने श्रद्दधानाय सर्वेऽनुशास्मोऽनुप्रब्रवाम ब्रह्मविद्यामिति । एवं संप्रधार्य तस्मै होचुरूक्तवन्तः-प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति ॥ ४ ॥फिर उसकी सेवासे अनुकूल हुए तीनों अग्नियोंने करुणावश, आपसमें मिलकर कहा—'अच्छा अपने अबभक्त इस दुखित, तपस्वी एवं श्रद्धालु ब्रह्मचारीको हम शिक्षा दें---इसे हम ब्रह्मविद्याका उपदेश करें---ऐसा निश्चयकर वे उससे बोले----'प्राण ब्रह्म है, 'क' ब्रह्म है, 'ख' ब्रह्म है' ॥ ४ ॥

❊ यद्यपि 'नानात्ययाः' पद 'कामाः' का ही विशेषण है, तथापि भाष्यकारने कामनाओं और व्याधियोंको एक मानकर उसे व्याधिका भी विशेषण बनाया है ।

४०४ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ४

४०४ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ४


स होवाच विजानाम्यहं यत्प्राणो ब्रह्म कं च तु खं च न विजानामीति ते होचुर्यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कमिति प्राणं च हास्मै तदाकाशं चोचुः ॥ ५ ॥

वह बोला—'यह तो मैं जानता हूँ कि प्राण ब्रह्म है; किंतु 'कं' और 'ख' को नहीं जानता।' तब वे बोले—'निश्चय जो 'कं' है वही 'ख' है और जो 'ख' है वही 'कं' है।' इस प्रकार उन्होंने उसे प्राण और उसके [ आश्रयभूत ] आकाशका उपदेश किया ॥ ५ ॥

| [उपदिष्यमानस्य ब्रह्मचारिणः शङ्का]<br><br>स होवाच ब्रह्मचारी विजानाम्यहं यद्भवद्भिरुक्तं प्रसिद्धपदार्थकत्वात्प्राणो ब्रह्मेति; यस्मिन्सति जीवनं यदपगमे च न भवति, तस्मिन्वायुविशेषे लोके रूढः; अतो युक्तं ब्रह्मत्वं तस्य । तेन प्रसिद्धपदार्थकत्वाद्विजानाम्यहं यत्प्राणो ब्रह्मेति । कं च तु खं च न विजानामीति ।<br><br>ननु कंखंशब्दयोरपि सुखाकाशविषयत्वेन प्रसिद्धपदार्थक- | वह ब्रह्मचारी बोला—'आपने जो कहा कि प्राण ब्रह्म है, सो प्रसिद्ध पदार्थवाला होनेके कारण यह तो मैं जानता हूँ, जिसके रहनेपर जीवन रहता है और जिसके चले जानेपर जीवन भी नहीं रहता लोकमें उस वायुविशेषमें ही 'प्राण' शब्द रूढ है। अतः उसका ब्रह्म-रूप होना तो उचित ही है। अतः प्रसिद्ध पदार्थयुक्त होनेके कारण यह तो मैं जानता हूँ कि 'प्राण ब्रह्म-है' किंतु 'कं' और 'ख' को मैं नहीं जानता।'<br><br>शङ्का—सुख और आकाश-विषयक होनेके कारण 'कं' और 'ख' शब्द भी तो प्रसिद्ध पदार्थवाले ही |

खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ ४०५


संस्कृत-भाष्यम्भाष्यार्थ
त्वमेव कस्माद्ब्रह्मचारिणोऽज्ञानम् ।हैं; फिर ब्रह्मचारीको उनका अज्ञान कैसे रहा ?
नूनं सुखस्य कंशब्दवाच्यस्य तदीयश्शङ्काया युक्तत्वम् क्षणप्रध्वंसित्वात्खंशब्दवाच्यस्य चाकाशस्याचेतनस्य कथं ब्रह्मत्वमिति मन्यते, कथं च भवतां वाक्यमप्रमाणं स्यादिति; अतो न विजानामीत्याह ।**समाधान—**निश्चय ब्रह्मचारी यही मानता है कि 'क' शब्दका वाच्य सुख क्षणप्रध्वंसी होनेके कारण और 'ख' शब्दका वाच्य आकाश अचेतन होनेसे किस प्रकार ब्रह्म हो सकता है ? और आपका वचन भी कैसे अप्रमाणिक होगा ? इसीसे उसने कहा कि 'मैं नहीं जानता' ।
तमेवमुक्तवन्तं ब्रह्मचारिणं अग्निकर्तृकं ते हाग्नय ऊचुः । समाधानम् यद्भाव यदेव वयं कमवोचाम तदेव खमाकाशमिति । एवं खेन विशेष्यमाणं कं विषयेन्द्रियसंयोगजात्सुखान्निवर्तितं स्यान्नीलेनेव विशेष्यमाणमुत्पलं रक्तादिभ्यः । यदेव खमित्याकाशमवोचाम तदेव च कं सुखमिति जानीहि । एवं च सुखेन विशेष्यमाणं खं भौतिकादचेतनात्खान्निवर्तितं स्यान्नीलो-इस प्रकार कहते हुए उस ब्रह्मचारीसे अग्नियोंने कहा—'हम जिसे 'क' ऐसा कहकर पुकारते हैं वही 'ख' यानी आकाश है । इस प्रकार जैसे 'नील' इस विशेषणसे युक्त कमल रक्तकमलआदिसे विलग कर दिया जाता है, उसी प्रकार 'ख' शब्दसे विशेषित क' विषय और इन्द्रियोंके सहयोगसे होनेवाले सुखसे निवृत्त कर दिया जाता है । जिसे हम 'ख'—आकाश कहते हैं उसीको तू 'क'—सुख जान । इस प्रकार नीलोत्पलके समान ही 'सुखसे विशेषित किया हुआ 'ख' (आकाश) भौतिक अचेतन 'ख' से निवृत्त कर दिया जाता है । तात्पर्य यह है कि

४०६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४

४०६छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४
संस्कृतहिन्दी
त्पलवदेव । सुखमाकाशस्थं नेतरल्लौकिकम् । आकाशं च सुखाश्रयं नेतरद्भौतिकमित्यर्थः ।आकाशस्थित सुख ब्रह्म है अन्य लौकिक सुख नहीं तथा सुखके आश्रित रहनेवाला आकाश ब्रह्म है अन्य भौतिक आकाश नहीं।'
[विशेषणद्वयेऽन्यतरस्यायुक्तत्वशङ्कनम्]<br>नन्वाकाशं चेत्सुखेन विशेषयितुमिष्टमस्त्वन्यतरदेव विशेषणं यद्वाव कं तदेव खमित्यतिरिक्तमितरत् । यदेव खं तदेव कमिति पूर्वविशेषणं वा ।शङ्का— यदि यहाँ आकाशको सुखके द्वारा विशेषित करना इष्ट है तो कोई भी एक विशेषण रह सकता था; अर्थात् 'यद्वाव कं तदेव खम्' ऐसा एक विशेषण रह जाता, दूसरा 'यदेव खं तदेव कम्' यह विशेषण अधिक है। अथवा यदि 'यदेव कं तदेव कम्' यही रहे तो पहला विशेषण अधिक है।*
[उभयोरावश्यकताप्रदर्शनम्]<br>ननु सुखाकाशयोरुभयोरपि लौकिकसुखाकाशाभ्यां व्यावृत्तिरिष्टेत्यवोचाम । सुखेनाकाशे विशेषिते व्यावृत्तिरुभयोर्थप्राप्तैवेति चेत्सत्यमेवं किं तु सुखेन विशेषितस्यैवाकाशस्य ध्येयत्वं विहितं न त्वाकाशगुणस्य विशेष-समाधान— किंतु इन सुख और आकाश दोनोंहीकी लौकिक सुख और आकाशसे व्यावृत्ति अभीष्ट है—ऐसा हम पहले कह चुके हैं। यदि कहो कि सुखके द्वारा आकाशके विशेषित होनेपर दोनोंकी व्यावृत्ति स्वतः सिद्ध ही है तो यह ठीक है, किन्तु इससे सुखसे विशेषित आकाशका ही ध्येयत्व विहित होगा आकाशगुणसे युक्त विशेषणभूत सुखका ध्येयत्व विहित नहीं होगा;

* तात्पर्य यह है कि इन दो उक्तियोंमेंसे किसी भी एक उक्तिसे श्रुतिका अभिप्राय सिद्ध हो सकता था; फिर दोनोंका कथन क्यों हुआ ?

खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ४०७


संस्कृत शाङ्करभाष्यहिन्दी अनुवाद
जस्य सुखस्य ध्येयत्वं विहितं स्यात् । विशेषणोपादानस्य विशेष्यनियन्तृत्वेनैवोपक्षयात् । अतः खेन सुखमपि विशेष्यते ध्येयत्वाय ।क्योंकि विशेषणका ग्रहण अपने विशेष्यका नियन्त्रण करके ही समाप्त हो जाता है । इसलिये [ सुखका भी ] ध्येयत्व प्रतिपादन करनेके लिये आकाशसे सुखको भी विशेषित किया गया है ।
कुतश्चैतन्निश्चीयते ?शङ्का—किंतु ऐसा किस प्रकार निश्चय किया जाता है ?
कंशब्दस्यापि ब्रह्मशब्दसंबन्धात्मकं ब्रह्मेति । यदि हि सुखगुणविशिष्टस्य खस्य ध्येयत्वं विवक्षितं स्यात्कं खं ब्रह्मेति ब्रूयुरग्नयः प्रथमम् । न चैवमुक्तवन्तः; किं तर्हि ? कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति । अतो ब्रह्मचारिणो मोहापनयनाय कंखंशब्दयोरितरेतरविशेषणविशेष्यत्वनिर्देशो युक्त एव यद्वाव कमित्यादिः ।समाधान—'ब्रह्म' शब्दसे 'क' शब्दका भी सम्बन्ध होनेके कारण 'क' ब्रह्म है—ऐसा निश्चय होता है । यदि सुखगुणविशिष्ट आकाशका ही ध्येयत्व बतलाना इष्ट होता तो अग्निगण पहले 'कं खं ब्रह्म' ( सुखस्वरूप आकाश ब्रह्म है ) ऐसा कहते । किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं कहा; तो क्या कहा है ?—'क' ब्रह्म है, 'ख' ब्रह्म है, ऐसा कहा है । अतः ब्रह्मचारीके मोहकी निवृत्तिके लिये 'यद्वाव कम्' इत्यादि रूपसे 'क' और 'ख' दोनों ही शब्दोंको एक दूसरेके विशेषणविशेष्यरूपसे बतलाना उचित ही है ।
तदेतदग्निभिरुक्तं वाक्यार्थमस्मद्बोधाय श्रुतिराह—प्राणं चअग्नियोंके कहे हुए इस वाक्यके अर्थको श्रुति हमारे बोधके लिये

४०८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४

४०८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४

| हास्मै ब्रह्मचारिणे तस्याकाश-<br><br>स्तदाकाशः प्राणस्य संबन्ध्या-<br><br>श्रयत्वेन हार्द आकाश इत्यर्थः,<br><br>सुखगुणवत्वनिर्देशात् चाकाशं<br><br>सुखगुणविशिष्टं ब्रह्म तत्स्थं च<br><br>प्राणं ब्रह्मसंपर्कादेव ब्रह्मेत्युभयं<br><br>प्राणं चाकाशं च समुच्चित्य<br><br>ब्रह्मणी ऊचुरग्नय इति ॥ ५ ॥ | कहती है—अग्नियोंने उस ब्रह्म-<br>चारीको प्राण और 'तदाकाश'—<br>उसके आकाशका अर्थात् आश्रय-<br>रूपसे प्राणसे सम्बद्ध हृदयाकाशका<br>उपदेश किया, तथा सुखगुण-<br>विशिष्टता बतलानेके कारण उस<br>आकाशको सुखगुणविशिष्ट ब्रह्म<br>और उसमें स्थित प्राणको<br>ब्रह्मके सम्पर्कके कारण ही ब्रह्म<br>बतलाया। इस प्रकार प्राण<br>और आकाश इन दोनोंका<br>समुच्चय कर अग्नियोंने दो ब्रह्म<br>बतलाये' ॥ ५ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये दशमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १० ॥

एकादश खण्ड

-: • :-

गार्हपत्याग्निविद्या

संभूयाग्नयो ब्रह्मचारिणे ब्रह्मोक्तवन्तः ।[ इस प्रकार ] सब अग्नियोंने मिलकर ब्रह्मचारीको ब्रह्मका उपदेश किया ।

अथ हैनम् गार्हपत्योऽनुशशास पृथिव्यग्निरन्नमादित्य इति । य एष आदित्ये पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥

फिर उसे गार्हपत्याग्निने शिक्षा दी—'पृथिवी, अग्नि, अन्न और आदित्य [ ये मेरे चार शरीर हैं ] । आदित्यके अन्तर्गत जो यह पुरुष दिखायी देता है वह मैं हूँ, वही मैं हूँ' ॥ १ ॥

अथानन्तरं प्रत्येकं स्वस्वविषयां विद्यां वक्तुमारेभिरे । तत्रादावेनं ब्रह्मचारिणं गार्हपत्योऽग्निरनुशशास । पृथिव्यग्निरन्नमादित्य इति ममैताश्चतस्रस्तनवः । तत्र य आदित्य एष पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि गार्हपत्योऽग्निर्यश्च गार्हपत्योऽग्निः स एवाहमादित्ये पुरुषोऽस्मीति । पुनः परावृत्त्या स एवाहमस्मीति वचनम् ।फिर उनमेंसे प्रत्येकने अपने-अपनेसे सम्बद्ध विद्याका निरूपण करना आरम्भ किया । उनमें सबसे पहले उस ब्रह्मचारीको गार्हपत्याग्निने शिक्षा दी—'पृथिवी, अग्नि, अन्न और आदित्य—ये मेरे चार शरीर हैं । उनमें आदित्यमें जो यह पुरुष दिखायी देता है वह मैं गार्हपत्याग्नि हूँ और यह जो गार्हपत्याग्नि है वही मैं आदित्यमें पुरुष हूँ । 'वही मैं हूँ' यह वाक्य [ पूर्ववाक्यकी ] पुनरावृत्ति करके कहा गया है ।

४१० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४

४१०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४

| पृथिव्यन्नयोरिव भोज्यत्वलक्षणयोः संबन्धो न गार्हपत्यादित्ययोः । अत्तृत्वपक्तृत्वप्रकाशनधर्मा अविशिष्टा इत्यत एकत्वमेवानयोरत्यन्तम् । पृथिव्यन्नयोस्तु भोज्यत्वेनाभ्यां संबन्धः ॥ १ ॥ | भोज्यत्व ही जिनका लक्षण है उन पृथिवी और अन्नके समान गार्हपत्याग्नि और आदित्यका सम्बन्ध नहीं है । इन दोनोंमें भोक्तृत्व, पाचकत्व और प्रकाशकत्व ये धर्म समानरूपसे हैं; अतः इन दोनोंका अत्यन्त अभेद है । पृथिवी और अन्नका तो इनसे भोज्यरूपसे सम्बन्ध है ॥ १ ॥ |

—: ० :—

स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥

वह पुरुष, जो इसे इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है, पापकर्मोंको नष्ट कर देता है, अग्निलोकवान् होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है तथा इसके उत्तरवर्ती (संतानपरम्परामें उत्पन्न ) पुरुष क्षीण नहीं होते । तथा उसका हम इस लोक और परलोकमें भी पालन करते हैं जो कि इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है [ उसको पूर्वोक्त फलकी प्राप्ति होती है ] ॥ २ ॥

स यः कश्चिदेवं यथोक्तं गार्हपत्यमग्निमन्नान्नादत्वेन चतुर्धा प्रविभक्तमुपास्ते सोऽपहते विनाशयति पापकृत्यां पापंवह पुरुष, जो कोई कि इस प्रकार भोग्य और भोक्तारूपसे चार प्रकारोंमें विभक्त हुए पूर्वोक्त गार्हपत्याग्निकी उपासना करता है वह पापकर्मोंका नाश कर देता है, तथा

खण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४११


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
कर्म। लोकी लोकवांश्चास्मदीयेन लोकेनाग्नेयेन तद्वान्भवति यथा वयम्। इह च लोके सर्वं वर्षशतमायुरेति प्राप्नोति। ज्योगुज्ज्वलं जीवति नाप्रख्यातः इत्येतत्। न चास्यावराश्च ते पुरुषाश्चास्य विदुषः सन्ततिजा इत्यर्थः। न क्षीयन्ते सन्तत्युच्छेदो न भवतीत्यर्थः। किं च तं वयमुपभुञ्ज्मः पालयामोऽस्मिंश्च लोके जीवन्तममुष्मिंश्च परलोके। य एतमेवं विद्वानुपास्ते यथोक्तं तस्यैतत्फलमित्यर्थः ॥ २ ॥हमारे आग्नेय लोकके द्वारा उसी प्रकार लोकी—लोकवान् होता है जैसे कि हम हैं। इस लोकमें भी वह सम्पूर्ण—सौ वर्षकी आयु प्राप्त करता है; ज्योक्—उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है अर्थात् अप्रसिद्ध होकर नहीं जीता तथा इसके अवर पुरुष जो अवर—पश्चाद्वर्ती यानी संततिमें उत्पन्न हुए पुरुष हैं वे क्षीण नहीं होते अर्थात् इसकी संततिका उच्छेद नहीं होता। यही नहीं, इस लोकमें जीवित रहते हुए तथा परलोकमें भी हम उसका पालन करते हैं। तात्पर्य यह है कि जो विद्वान् इस प्रकार इसकी उपासना करता है उसे पूर्वोक्त फल प्राप्त होता है ॥ २ ॥

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये
एकादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ११ ॥

द्वादश खण्ड

—: o :—

अन्वाहार्यपचनाग्निविद्या

अथ हैनमन्वाहार्यपचनोऽनुशशासापो दिशो नक्षत्राणि चन्द्रमा इति । य एष चन्द्रमसि पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥

फिर उसे अन्वाहार्यपचन (दक्षिणाग्नि) ने शिक्षा दी—'जल, दिशा, नक्षत्र और चन्द्रमा [ ये मेरे चार शरीर हैं ]। चन्द्रमामें जो यह पुरुष दिखायी देता है वह मैं हूँ, वही मैं हूँ' ॥ १ ॥

स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥

वह पुरुष, जो इसे इस प्रकार जानकर इस (चार भागोंमें विभक्त अग्नि) की उपासना करता है, पापकर्मोंका नाश कर देता है, लोकवान् होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है और उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है। उसके पीछे होनेवाले पुरुष (वंशज) क्षीण नहीं होते तथा इस लोक और परलोकमें भी हम उसका पालन करते हैं, जो कि इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है ॥ २ ॥

| अथ हैनमन्वाहार्यपचनोऽनुशशास दक्षिणाग्निरापो दिशो नक्षत्राणि चन्द्रमा इत्येता मम चतस्रस्तनवश्चतुर्धाहमन्वाहार्यप- | फिर उसे अन्वाहार्यपचन—दक्षिणाग्निने शिक्षा दी—'जल, दिशा, नक्षत्र और चन्द्रमा—ये मेरे चार शरीर हैं। मैं अपनेको चार प्रकारसे विभक्त करके अन्वा- |

खण्ड १२ ]शाङ्करभाष्यार्थ४१३
संस्कृतहिन्दी
चन आत्मानं प्रविभज्यावस्थितः । तत्र य एष चन्द्रमसि पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति पूर्ववत् ।<br><br>अन्नसंबन्धाज्ज्योतिष्ट्वसामान्याच्चान्वाहार्यपचनचन्द्रमसोरेकत्वं दक्षिणदिक्संबन्धाच्च । अपां नक्षत्राणां च पूर्ववदन्नत्वेनैव संबन्धः । नक्षत्राणां चन्द्रमसो भोग्यत्वप्रसिद्धेः । अपामन्नोत्पादकत्वादन्नत्वं दक्षिणाग्नेः पृथिवीवद्गार्हपत्यस्य । समानमन्यत् ॥ १-२ ॥हार्यपचनरूपसे स्थित हूँ। उनमेंसे चन्द्रमामें जो यह पुरुष दिखायी देता है वह मैं हूँ, वही मैं हूँ—' ऐसा पूर्ववत् समझना चाहिये ।<br><br>अन्नसे ¹ सम्बन्ध होनेके कारण, ज्योतिष्ट्वमें समानता होनेसे तथा दक्षिण ² दिशासे सम्बन्ध होनेके कारण अन्वाहार्यपचन और चन्द्रमाकी एकता है । जल और नक्षत्रोंका तो पूर्ववत् अन्नरूपसे ही सम्बन्ध है, क्योंकि नक्षत्र चन्द्रमाके भोग्य हैं, यह प्रसिद्ध है तथा अन्नके उत्पत्तिकर्ता होनेके कारण जलोंका भी इसी प्रकार दक्षिणाग्निका अन्नत्व प्राप्त है जैसे पृथिवीको गार्हपत्याग्निका । शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ १-२ ॥
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—: ॐ :—

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १२ ॥

—: ० :—

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१. दर्श-पूर्णमास यज्ञमें अन्वाहार्यपचन अग्निमें हविष्य पकाया जाता है; तथा चन्द्रमाके विषयमें 'चन्द्रमाको प्राप्त होकर अन्न हो जाता है' ऐसा श्रुति-वाक्य है । इसलिये इन दोनोंका अन्नसे सम्बन्ध है ।
२. अन्वाहार्यपचनको दक्षिणाग्नि भी कहते हैं; तथा चन्द्रमाको भी दक्षिण मार्गसे जानेवाले ही प्राप्त होते हैं । इसलिये इन दोनोंका दक्षिण दिशासे सम्बन्ध है ।

त्रयोदश खण्ड

— : ० : —

आहवनीयाग्निविद्या

अथ हैनमाहवनीयोऽनुशशास प्राण आकाशो द्यौर्विद्युदिति । एष विद्युति पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥

तदनन्तर उसे आहवनीयाग्निने उपदेश किया—‘प्राण, आकाश, द्युलोक और विद्युत् [ ये मेरे चार शरीर हैं ] । यह जो विद्युत्में पुरुष दिखायो देता है वह मैं हूँ, वही मैं हूँ’ ॥ १ ॥

स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥

वह पुरुष, जो इसे इस प्रकार जानकर इस ( चतुर्धा विभक्त अग्नि ) की उपासना करता है, पापकर्मको नष्ट कर देता है, लोकवान् होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है तथा उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है । उसके पश्चाद्वर्ती पुरुष ( वंशज ) क्षीण नहीं होते तथा उसका हम इस लोक और परलोकमें भी पालन करते हैं जो कि इसे इस प्रकार जानकर इसको उपासना करता है ॥ २ ॥

खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१५


| अथ हैनमाहवनीयोऽनुशशास <br><br> प्राण आकाशो द्यौर्विद्युदिति <br><br> ममाप्येताश्चतस्रस्तनवः । य एष <br><br> विद्युति पुरुषो दृश्यते सोऽहम-<br><br>स्मीत्यादि पूर्ववत्सामान्यात् । <br><br> दिवाकाशयोस्त्वाश्रयत्वाद्बिद्युदा-<br><br>हवनीययोर्भोग्यत्वेनैव संबन्धः । <br><br> समानमन्यत् ॥ १-२ ॥ | तदनन्तर उसे आहवनीयाग्निने उपदेश किया—'प्राण, आकाश, द्युलोक और विद्युत्—ये मेरे भी चार शरीर हैं। यह जो विद्युत्‌में पुरुष दिखायी देता है वह मैं हूँ' इत्यादि अर्थ पहलेहीके समान होनेके कारण पूर्ववत् है। द्युलोक और आकाशके साथ विद्युत् और आहवनीयका भोग्यरूपसे ही सम्बन्ध है, क्योंकि ये क्रमशः इनके आश्रय हैं। शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ १-२ ॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये
त्रयोदशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १३ ॥

चतुर्दश खण्ड

आचार्यका आगमन

ते होचुरुपकोसलैषा सोम्य तेऽस्मद्विद्यात्मविद्या चाचार्यस्तु ते गतिं वक्तेत्याजगाम हास्याचार्यस्तमाचार्योऽभ्युवादोपकोसल ३ इति ॥ १ ॥

उन्होंने कहा—'उपकोसल! हे सोम्य! यह अपनी विद्या और आत्मविद्या तेरे प्रति कही। आचार्य तुझे [इनके फलकी प्राप्तिका] मार्ग बतलावेंगे।' तदनन्तर उसके आचार्य आये। उससे आचार्यने कहा—'उपकोसल!' ॥ १ ॥

| ते पुनः संभूयोचुर्होपकोसलैषा सोम्य ते तवास्मद्विद्याग्निविद्येत्यर्थः । आत्मविद्या पूर्वोक्ता प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति च । आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता विद्याफलप्राप्तय इत्युक्त्वोपेरेमुरग्नयः । आजगाम हास्याचार्यः कालेन । तं च शिष्यमाचार्योऽभ्युवादोपकोसल ३ इति ॥१॥ | तब उन्होंने पुनः एक साथ कहा—'उपकोसल! हे सोम्य! यह हमने तेरे प्रति अपनी विद्या अर्थात् अग्निविद्या और आत्मविद्या—जो पहले 'प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म' इत्यादि रूपसे कही गयी है कह दी। अब इस विद्याके फलकी प्राप्तिके लिये आचार्य तुझे मार्ग बतलावेंगे।' ऐसा कहकर अग्निगण उपरत हो गये। कालान्तरमें उसके आचार्य आये तब आचार्यने उस अपने शिष्यसे कहा—'उपकोसल!' ॥ १ ॥ |

खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्य ४१७


आचार्य और उपकोशलका संवाद

भगव इति ह प्रतिशुश्राव ब्रह्मविद् इव सोम्य ते मुखं भाति को नु त्वानुशशासेति को नु मानुशिष्याद्भो इतीहापेव निहुत इमे नूनमीदृशां अन्यादृशा इतोहाग्नीनभ्यूदे किं नु सोम्य किलऽते वोचन्निति ॥ २ ॥

उसने 'भगवन् !' ऐसा उत्तर दिया। [ आचार्य बोले— ] 'हे सोम्य ! तेरा मुख ब्रह्मवेत्ताके समान जान पड़ता है; तुझे किसने उपदेश किया है ?' 'अजी ! मुझे कौन उपदेश करता' ऐसा कहकर वह मानो उसे छिपाने लगा। [ फिर अग्नियोंकी ओर संकेत करके बोला— ] 'निश्चय इन्होंने [ उपदेश किया है ] जो अन्य प्रकारके थे और अब ऐसे हैं'—ऐसा कहकर उसने अग्नियोंको बतलाया। [ तब आचार्यने पूछा— ] 'हे सोम्य ! इन्होंने तुझे क्या बतलाया है ?' ॥ २ ॥

इदमिति ह प्रतिजज्ञे लोकान्वाव किल सोम्य तेऽवोचन्नहं तु ते तद्वक्ष्यामि यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यत इति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच ॥ ३ ॥

तब उसने 'यह बतलाया है' ऐसा कहकर उत्तर दिया। [ इसपर आचार्यने कहा— ] 'हे सोम्य ! उन्होंने तो तुझे केवल लोकोंका ही उपदेश किया है; अब मैं तुझे वह बतलाता हूँ जिसे जाननेवालेसे पापकर्मका उसी प्रकार सम्बन्ध नहीं होता जैसे कमलपत्रसे जलका सम्बन्ध नहीं होता।' वह बोला—'भगवान् मुझे बतलावें।' तब आचार्य उससे बोले ॥ ३ ॥

४१८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १४

४१८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय १४

| भगव इति ह प्रतिशुश्राव । <br><br> ब्रह्मविद इव सोम्य ते मुखं प्रसन्नं भाति, को नु त्वानुशशासेत्युक्तः प्रत्याह—को नु मानुशिष्यादनुशासनं कुर्यात्को भगवंस्त्वयि प्रोषित इतीहापेव निह्नुतेऽपनिह्नुत इवेति व्यवहितेन संबन्धः, न चापनिह्नुते न च यथावदग्निभिरुक्तं ब्रवीतीत्यभिप्रायः । <br><br> कथम् ? इमेऽग्नयो मया परिचरिता उक्तवन्तो नूनं यतस्त्वां दृष्ट्वा वेपमाना इवेदृशा दृश्यन्ते पूर्वमन्यादृशाः सन्त इतीहाग्नीनभ्यूदेऽभ्युक्तवान्काक्वाग्नीन्दर्शयन् । किं नु सोम्य किल ते तुभ्यमवोचन्नग्नय इति पृष्ट इत्येवमिदमुक्तवन्त इत्येवं ह प्रति- | उसने 'भगवन् !' ऐसा उत्तर दिया। फिर आचार्यद्वारा 'हे सोम्य ! तेरा मुख ब्रह्मवेत्ताके समान प्रसन्न बान पड़ता है, सो तुझे किसने उपदेश किया है, ऐसा कहे जानेपर वह बोला—'भगवन् ! आपके बाहर चले जानेपर भला मुझे कौन उपदेश करता ?' इस प्रकार मानो वह [ अग्निके कथनका ] अपह्नव- ( गोपन ) सा करने लगा। 'अप-इव निह्नुते' इसमें 'अप' उपसर्गका 'इव' के द्वारा व्यवधानयुक्त 'निह्नुते' क्रियाके साथ सम्बन्ध है, अतः 'अपनिह्नुते इव' ऐसा समझना चाहिये। तात्पर्य यह है कि वह अग्निके कथनको न तो ज्यो-का-त्यों बतलाता ही है और न उसे [सर्वथा] छिपाता ही है। <br><br> 'सो कैसे ? देखिये मेरे द्वारा परिचर्या किये हुए इन अग्नियोंने ही मुझे उपदेश किया है; क्योंकि अब आपको देखकर ये इस प्रकार काँपते हुए-से दिखायी देते हैं, जब कि पहले ये अन्य प्रकारके थे' इस प्रकार काकुवचन ( व्यङ्ग्योक्ति ) के द्वारा उसने अग्नियोंको बतलाया। फिर 'हे सोम्य ! अग्नियोंने तुझे क्या बतलाया है ? इस प्रकार पूछे जानेपर 'यही कहा है' |

खण्ड १४]शाङ्करभाष्यार्थ४१९

| जज्ञे प्रतिज्ञातवान्प्रतीकमात्रं किञ्चिन्न सर्वं यथोक्तमग्निभिरुक्तमवोचत् ।<br><br>यत आहाचार्यो लोकान्वाव पृथिव्यादीन्हे सोम्य किल तेऽवोचन्न ब्रह्म साकल्येन । अहं तु ते तुभ्यं तद्ब्रह्म यदिच्छसि त्वं श्रोतुं वक्ष्यामि, शृणु तस्य मयोच्यमानस्य ब्रह्मणो ज्ञानमाहात्म्यम्—यथा पुष्करपलाशे पद्मपत्र आपो न श्लिष्यन्त एवं यथा वक्ष्यामि ब्रह्मैवंविवि पापं कर्म न श्लिष्यते न संबध्यत इत्येवमुक्तवत्याचार्य आहोपकोसलो ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाचाचार्यः ॥ २-३ ॥ | ऐसा कहा, अर्थात् कुछ प्रतीकमात्र ही बतलाया, अग्नियोंका कहा हुआ सारा उपदेश यथावत् नहीं कहा ।<br><br>अतः आचार्यने कहा—'हे सोम्य ! अग्नियोंने तुझे पृथिवी आदि लोक ही बतलाये हैं, ब्रह्मका पूर्णतया उपदेश नहीं किया । अब मैं तुझे उस ब्रह्मका उपदेश करूँगा, जिसे कि तू सुनना चाहता है । मेरेद्वारा कहे जाते हुए उस ब्रह्मके ज्ञानका माहात्म्य सुन—जिस प्रकार पुष्कर-पलाश—कमलपत्रमें जल श्लिष्ट-सम्बद्ध नहीं होता उसी प्रकार जैसे ब्रह्मका मैं उपदेश करूँगा उसे जाननेवालेमें पापकर्मका सम्बन्ध नहीं होता ।' आचार्यके इस प्रकार कहनेपर उपकोसलने कहा—'भगवान् मुझे बतलावें ।' तब आचार्य उससे बोले ॥ २-३ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये चतुर्दशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १४ ॥

छा० उ० १४—

पञ्चदश खण्ड

आचार्यका उपदेश—नेत्रस्थित पुरुषकी उपासना

य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति । तद्यद्यप्यस्मिन्सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति ॥ १ ॥

‘यह जो नेत्रमें पुरुष दिखाई देता है यह आत्मा है’—ऐसा उसने कहा ‘यह अमृत है, अभय है और ब्रह्म है।’ उस (पुरुषके स्थानरूप नेत्र) में यदि घृत या जल डाले तो वह पलकोंमें ही चला जाता है ॥१॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते निवृत्तचक्षुर्भिर्रह्मचर्यादिसाधनसंपन्नैः शान्तैर्विवेकिभिर्दृष्टेर्द्रष्टा, “चक्षुषश्चक्षुः” (के०उ० १।२) इत्यादिश्रुत्यन्तरात् ।‘जिनका बाह्य इन्द्रियग्राम निवृत्त हो गया है उन ब्रह्मचर्यादि साधन-सम्पन्न, शान्तात्मा विवेकियोंद्वारा जो यह नेत्रके अन्तर्गत दृष्टिका द्रष्टा पुरुष देखा जाता है, जैसा कि “वह चक्षुओंका चक्षु है” ऐसी अन्य श्रुतिसे प्रमाणित होता है’ [वह प्राणियोंका आत्मा है—ऐसा आचार्यने कहा ।]
नन्वग्निभिरुक्तं वितथं यत आचार्यस्तु ते गतिं वक्तेति गतिमात्रस्य वक्तेत्यवोचन्भविष्यद्विषयापरिज्ञानं चाग्नीनाम् ।शङ्का—[आचार्यके इस कथनसे अग्नियोंका कथन मिथ्या प्रमाणित होता है, क्योंकि उन्होंने तो ‘आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता’ ऐसा कहकर ‘केवल गतिमात्र कहलावेंगे’ इतना ही कहा था। तथा इससे अग्नियोंका भविष्यद्विषयसम्बन्धी ज्ञान न होना सिद्ध होता है ।

खण्ड १५] शाङ्करभाष्यार्थ ४२१

| नैष दोषः; सुखाकाशस्यैवाक्षिणि दृश्यत इति द्रष्टुरनुवादात् । एष आत्मा प्राणिनामिति होवाचैवमुक्तवानेतद्यदेवात्मतत्त्वमवोचाम एतदमृतममरणधर्म्यविनाशयत एवाभयं यस्य हि विनाशाशङ्का तस्य भयोपपत्तिस्तदभावादभयमत एवैतद्ब्रह्म बृहदनन्तमिति ।<br><br>किञ्चास्य ब्रह्मणोऽक्षिपुरुषस्य माहात्म्यं तत्तत्र पुरुषस्य स्थानेऽक्षिणि यद्यप्यस्मिन्सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति पक्ष्मावेव गच्छति न चक्षुषा संबध्यते पद्मपत्रेणेवोदकम् । स्थानस्याप्येतन्माहात्म्यं किं पुनः स्थानिनोऽक्षिपुरुषस्य निरञ्जनत्वं वक्तव्यमित्यभिप्रायः ॥ १ ॥ | समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि ऐसा कहकर आचार्यने [ अग्नियोंके बतलाये हुए ] सुखाकाशरूप द्रष्टाका ही 'जो नेत्रमें दिखायी देता है' इस प्रकार अनुवाद किया है । यह प्राणियोंका आत्मा है 'इति होवाच'—इस प्रकार कहा । जिस आत्मतत्त्वका वर्णन हम पहले कर चुके हैं वही यह अमृत—अमरणधर्मा यानी अविनाशी है; इसीसे अभय भी है, क्योंकि जिसके नाशकी शङ्का होती है उसीको भय हो सकता है; अतः उसका अभाव होनेके कारण यह अभय है । इसीसे यह ब्रह्म—बृहत् यानी अनन्त है ।<br><br>तथा इस ब्रह्म—नेत्रस्थ पुरुषका ऐसा माहात्म्य है कि इस रुषके स्थानभूत नेत्रमें यदि घृत या जल डाला जाय तो वह इधर-उधर पलकोंमें ही चला जाता है; पद्मपत्र-से जलके समान नेत्रसे उसका सम्बन्ध नहीं होता। जब कि स्थानका भी ऐसा माहात्म्य है तो स्थानी नेत्रस्थ पुरुषकी निःसङ्गताके विषयमें तो कहना ही क्या है ? यह इसका अभिप्राय है ॥ १ ॥ |

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