भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 413, कुल 978 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 413

एकादश खण्ड

-: • :-

गार्हपत्याग्निविद्या

संभूयाग्नयो ब्रह्मचारिणे ब्रह्मोक्तवन्तः ।[ इस प्रकार ] सब अग्नियोंने मिलकर ब्रह्मचारीको ब्रह्मका उपदेश किया ।

अथ हैनम् गार्हपत्योऽनुशशास पृथिव्यग्निरन्नमादित्य इति । य एष आदित्ये पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥

फिर उसे गार्हपत्याग्निने शिक्षा दी—'पृथिवी, अग्नि, अन्न और आदित्य [ ये मेरे चार शरीर हैं ] । आदित्यके अन्तर्गत जो यह पुरुष दिखायी देता है वह मैं हूँ, वही मैं हूँ' ॥ १ ॥

अथानन्तरं प्रत्येकं स्वस्वविषयां विद्यां वक्तुमारेभिरे । तत्रादावेनं ब्रह्मचारिणं गार्हपत्योऽग्निरनुशशास । पृथिव्यग्निरन्नमादित्य इति ममैताश्चतस्रस्तनवः । तत्र य आदित्य एष पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि गार्हपत्योऽग्निर्यश्च गार्हपत्योऽग्निः स एवाहमादित्ये पुरुषोऽस्मीति । पुनः परावृत्त्या स एवाहमस्मीति वचनम् ।फिर उनमेंसे प्रत्येकने अपने-अपनेसे सम्बद्ध विद्याका निरूपण करना आरम्भ किया । उनमें सबसे पहले उस ब्रह्मचारीको गार्हपत्याग्निने शिक्षा दी—'पृथिवी, अग्नि, अन्न और आदित्य—ये मेरे चार शरीर हैं । उनमें आदित्यमें जो यह पुरुष दिखायी देता है वह मैं गार्हपत्याग्नि हूँ और यह जो गार्हपत्याग्नि है वही मैं आदित्यमें पुरुष हूँ । 'वही मैं हूँ' यह वाक्य [ पूर्ववाक्यकी ] पुनरावृत्ति करके कहा गया है ।