छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 412, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४०८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| हास्मै ब्रह्मचारिणे तस्याकाश-<br><br>स्तदाकाशः प्राणस्य संबन्ध्या-<br><br>श्रयत्वेन हार्द आकाश इत्यर्थः,<br><br>सुखगुणवत्वनिर्देशात् चाकाशं<br><br>सुखगुणविशिष्टं ब्रह्म तत्स्थं च<br><br>प्राणं ब्रह्मसंपर्कादेव ब्रह्मेत्युभयं<br><br>प्राणं चाकाशं च समुच्चित्य<br><br>ब्रह्मणी ऊचुरग्नय इति ॥ ५ ॥ | कहती है—अग्नियोंने उस ब्रह्म-<br>चारीको प्राण और 'तदाकाश'—<br>उसके आकाशका अर्थात् आश्रय-<br>रूपसे प्राणसे सम्बद्ध हृदयाकाशका<br>उपदेश किया, तथा सुखगुण-<br>विशिष्टता बतलानेके कारण उस<br>आकाशको सुखगुणविशिष्ट ब्रह्म<br>और उसमें स्थित प्राणको<br>ब्रह्मके सम्पर्कके कारण ही ब्रह्म<br>बतलाया। इस प्रकार प्राण<br>और आकाश इन दोनोंका<br>समुच्चय कर अग्नियोंने दो ब्रह्म<br>बतलाये' ॥ ५ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये दशमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १० ॥