छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 414, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४१० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| पृथिव्यन्नयोरिव भोज्यत्वलक्षणयोः संबन्धो न गार्हपत्यादित्ययोः । अत्तृत्वपक्तृत्वप्रकाशनधर्मा अविशिष्टा इत्यत एकत्वमेवानयोरत्यन्तम् । पृथिव्यन्नयोस्तु भोज्यत्वेनाभ्यां संबन्धः ॥ १ ॥ | भोज्यत्व ही जिनका लक्षण है उन पृथिवी और अन्नके समान गार्हपत्याग्नि और आदित्यका सम्बन्ध नहीं है । इन दोनोंमें भोक्तृत्व, पाचकत्व और प्रकाशकत्व ये धर्म समानरूपसे हैं; अतः इन दोनोंका अत्यन्त अभेद है । पृथिवी और अन्नका तो इनसे भोज्यरूपसे सम्बन्ध है ॥ १ ॥ |
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स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्त उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥
वह पुरुष, जो इसे इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है, पापकर्मोंको नष्ट कर देता है, अग्निलोकवान् होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है तथा इसके उत्तरवर्ती (संतानपरम्परामें उत्पन्न ) पुरुष क्षीण नहीं होते । तथा उसका हम इस लोक और परलोकमें भी पालन करते हैं जो कि इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है [ उसको पूर्वोक्त फलकी प्राप्ति होती है ] ॥ २ ॥
| स यः कश्चिदेवं यथोक्तं गार्हपत्यमग्निमन्नान्नादत्वेन चतुर्धा प्रविभक्तमुपास्ते सोऽपहते विनाशयति पापकृत्यां पापं | वह पुरुष, जो कोई कि इस प्रकार भोग्य और भोक्तारूपसे चार प्रकारोंमें विभक्त हुए पूर्वोक्त गार्हपत्याग्निकी उपासना करता है वह पापकर्मोंका नाश कर देता है, तथा |
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