भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 407

खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ४०३


ऽतिगमनं येषां व्याधीनां कर्तव्यचिन्तानां ते नानात्यया व्याधयः कर्तव्यताप्राप्तिनिमित्तानि चित्तदुःखानीत्यर्थः। तैः प्रतिपूर्णोऽस्मि; अतो नाशिष्यामीति ॥ ३ ॥सम्बन्धिनी चिन्ताओंके अत्यय—अतिगमन-वस्तुके स्वरूपका उल्लङ्घन करके विषय-प्रवेशके मार्ग नाना हैं ऐसी जो नानात्यय कामनारूप व्याधियाँ अर्थात् कर्तव्यता प्राप्तिनिमित्तक मानसिक दुःख हैं, मैं उनसे परिपूर्ण हूँ, इसलिये भोजन नहीं करूँगा'❊ ॥३॥

उक्त्वा तूष्णींभूते ब्रह्मचारिणि--ब्रह्मचारीके इस प्रकार कहकर चुप हो जानेपर—

अथ हाग्नयः समूदिरे तप्तो ब्रह्मचारी कुशलं नः पर्यचारीद्धन्तास्मै प्रब्रवामेति तस्मै होचुः प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति ॥ ४ ॥

फिर अग्नियोंने एकत्रित होकर कहा—'यह ब्रह्मचारी तपस्या कर चुका है; इसने हमारी अच्छी तरह सेवा की है। अच्छा, हम इसे उपदेश करें' ऐसा निश्चयकर वे उससे बोले—'प्राण ब्रह्म है, 'क' ब्रह्म है, 'ख' ब्रह्म है' ॥४॥

अथ हाग्नयः शुश्रूषयावर्जिताः<br>अग्नीनां कारुण्याविष्टाः सन्त-<br>तस्मा उपदेष्टुं त्रयोऽपि समूदिरे<br>निश्चयः<br>संभूयोक्तवन्तः । हन्तेदानीमस्मै ब्रह्मचारिणेऽस्मद्भक्ताय दुःखिताय तपस्विने श्रद्दधानाय सर्वेऽनुशास्मोऽनुप्रब्रवाम ब्रह्मविद्यामिति । एवं संप्रधार्य तस्मै होचुरूक्तवन्तः-प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति ॥ ४ ॥फिर उसकी सेवासे अनुकूल हुए तीनों अग्नियोंने करुणावश, आपसमें मिलकर कहा—'अच्छा अपने अबभक्त इस दुखित, तपस्वी एवं श्रद्धालु ब्रह्मचारीको हम शिक्षा दें---इसे हम ब्रह्मविद्याका उपदेश करें---ऐसा निश्चयकर वे उससे बोले----'प्राण ब्रह्म है, 'क' ब्रह्म है, 'ख' ब्रह्म है' ॥ ४ ॥

❊ यद्यपि 'नानात्ययाः' पद 'कामाः' का ही विशेषण है, तथापि भाष्यकारने कामनाओं और व्याधियोंको एक मानकर उसे व्याधिका भी विशेषण बनाया है ।